कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 141

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Companies Act 2013

यह लेख स्कूल ऑफ लॉ, क्राइस्ट (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी), बैंगलोर की कानून की छात्रा  Subhadeepa Sen द्वारा लिखा गया है। यह लेख एक कंपनी में लेखा परीक्षकों (ऑडिटर्स) की योग्यता, अयोग्यता और नियुक्ति की प्रक्रिया पर चर्चा करता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja द्वारा किया गया है।

परिचय 

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 141, एक कंपनी के लेखा परीक्षक के बारे में बात करती है। विशेष रूप से, यह एक लेखा परीक्षक की आवश्यक योग्यता और अयोग्यता के बारे में बात करती है। किसी भी कंपनी के लिए, लेखा परीक्षक अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेखा परीक्षक कंपनी के वित्तीय रिकॉर्ड के मूल्यांकनकर्ता (एसेसर) के रूप में कार्य करता है और यह सुनिश्चित करता है कि कंपनी के रिकॉर्ड और लेनदेन की सटीकता, विश्वसनीयता और वास्तविकता मौजूद है। एक लेखा परीक्षक के कंधों पर रखी गई प्राथमिक जिम्मेदारी यह देखना है कि पारदर्शिता और जवाबदेही से समझौता नहीं किया गया है। लेखा परीक्षक की रिपोर्ट हितधारकों, जैसे निवेशकों, लेनदारों और नियामकों (रेगुलेटर) के लिए एक हॉलमार्क के रूप में है, कि कंपनी का कामकाज धोखाधड़ी या त्रुटि से मुक्त है। वे कंपनी की गुडविल की रक्षा करने और हितधारकों को आश्वासन प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी भूमिका कंपनी की जोखिम प्रबंधन प्रक्रिया की प्रभावशीलता का प्रत्यक्ष प्रतिबिंब है। कंपनी अधिनियम 2013 ने एक लेखा परीक्षक की नियुक्ति, उसे हटाने, इस्तीफे, पारिश्रमिक (रिम्यूनरेशन), शक्तियों और कर्तव्यों के पहलुओं से संबंधित विस्तृत प्रावधान निर्धारित किए हैं। इस लेख का उद्देश्य, लेखा परीक्षक बनने की योग्यता और इसके लिए अयोग्यताओं से जुड़े पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करना है। 

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 141 के अनुसार कंपनी में लेखा परीक्षक बनने के लिए कौन योग्य है

धारा 141(1) में कहा गया है कि किसी व्यक्ति को किसी कंपनी के लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त करने के लिए प्राथमिक योग्यता यह है कि उक्त व्यक्ति एक चार्टर्ड एकाउंटेंट होना चाहिए। चार्टर्ड एकाउंटेंट्स अधिनियम, 1949 की धारा 2(1)(b) बताती है कि एक व्यक्ति जो भारत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स संस्थान का सदस्य है, वह एक चार्टर्ड एकाउंटेंट (“सीए”) होगा। सामान्य शब्दों में, एक चार्टर्ड एकाउंटेंट एक लेखा पेशेवर को संदर्भित करता है जो एक विशेष पेशेवर निकाय से संबद्ध (एफिलिएटेड) होता है। इस तरह का पहला लेखा पेशेवर निकाय 1854 में स्कॉटलैंड में बनाया गया था। अधिकांश देशों के अपने पेशेवर लेखा निकाय या संस्थान हैं। भारत में इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आईसीएआई) है, जो राष्ट्रीय पेशेवर लेखा निकाय है। इसकी स्थापना वर्ष 1949 में चार्टर्ड एकाउंटेंसी अधिनियम, 1949 के तहत की गई थी। चार्टर्ड एकाउंटेंट कराधान (टैक्सेशन), कर रिटर्न दाखिल करने, वित्तीय विवरणों का लेखा परीक्षा करने, वित्तीय विवरणों की समीक्षा (रिव्यू) करने और प्रस्तुत करने और वित्तीय सलाह प्रदान करने के मामलों में विशेषज्ञता रखने वाले पेशेवर हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड फाइनेंशियल एनालिस्ट्स ऑफ इंडिया बनाम काउंसिल फॉर द इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया, (2007) 12 एससीसी 210 के मामले में न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने अभ्यास के दायरे पर चर्चा करते हुए जिसे चार्टर्ड एकाउंटेंट्स द्वारा समझा जा सकता है, कहा कि एक सीए का काम केवल लेखा परीक्षण तक सीमित नहीं किया जा सकता है, यह वित्तीय सलाहकार सेवाओं जैसे अन्य कार्यों तक फैला हुआ है। उन्होंने आगे कहा कि एक चार्टर्ड एकाउंटेंट एक कंपनी के लिए लेखा परीक्षा का कार्य करता है और उसी समय दूसरी कंपनी के वित्तीय सलाहकार के रूप में भी कार्य कर सकता है। इस तरह के कार्यों से हितों का कोई टकराव नहीं होगा क्योंकि एक लेखा परीक्षक शेयरधारकों के लिए प्रहरी के रूप में कार्य करता है, जबकि एक वित्तीय सलाहकार की भूमिका प्रबंधन को सलाह देना है। हालाँकि, सीए को एक ही संगठन में दोनों कार्य नहीं करने चाहिए। 

प्रावधान “अभ्यास में” शब्द का उपयोग करता है। इसे चार्टर्ड एकाउंटेंसी अधिनियम, 1949 के संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। अधिनियम की धारा 2(2) प्रदान करती है कि शब्द “अभ्यास में होने” का अर्थ है कि सदस्य, या तो व्यक्तिगत क्षमता में या साझेदारी में, पारिश्रमिक को ध्यान में रखते हुए खुद को एकाउंटेंसी के अभ्यास में संलग्न (इंगेज) करता है। यह प्रावधान उन विभिन्न कार्यों को निर्धारित करता है जो एक चार्टर्ड एकाउंटेंट के साथ संलग्न हो सकते हैं, जो “अभ्यास में” होने के दायरे में आते हैं। यह प्रदान करता है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट लेखा परीक्षा, खातों के सत्यापन (वेरिफिकेशन), पुस्तकों, वित्तीय विवरणों और रिकॉर्ड से संबंधित सेवाओं की पेशकश करने के लिए पात्र है। वे विभिन्न वित्तीय लेखा विवरणों को तैयार, सत्यापित और प्रमाणित कर सकते हैं और खुद को बड़े पैमाने पर जनता के लिए अकाउंटेंट के रूप में रख सकते हैं।

लेखांकन के संदर्भ में पेशेवर सेवाएं प्रदान करना और लेखांकन की प्रक्रिया के बारे में विभिन्न मामलों में सहायता प्रदान करना भी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का एक वैधानिक कार्य है। वे वित्तीय डेटा रिकॉर्ड करने, वित्तीय डेटा प्रस्तुत करने और वित्तीय तथ्यों और डेटा को प्रमाणित करने में विशेषज्ञ के रूप में कार्य कर सकते हैं।

धारा 2(2)(iv) बताती है कि एक चार्टर्ड अकाउंटेंट को तब भी अभ्यास में माना जाएगा यदि वह अधिनियम के परिशिष्ट (अपेंडिक्स) 2 और चार्टर्ड अकाउंटेंट विनियम (रेगुलेशन) 1988 के विनियम 191 के तहत प्रदान किए गए किसी भी कार्य में लगा हुआ है। परिशिष्ट 2 निर्धारित करता है कि एक चार्टर्ड एकाउंटेंट लागत, कराधान या वित्तीय मामलों के लिए परिसमापक (लिक्विडेटर), निष्पादक (एग्जिक्यूटर), ट्रस्टी, प्रशासक, मध्यस्थ (आर्बिट्रेटर), रिसीवर, सलाहकार या प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर सकता है। वह केंद्र या राज्य सरकार या न्यायपालिका या किसी अन्य कानूनी/सचिवीय नियुक्ति के तहत नियुक्तियों के लिए भी पात्र है। हालाँकि, यह उसकी पेशेवर क्षमता में किया जाना चाहिए न कि एक कर्मचारी के रूप में उसकी व्यक्तिगत क्षमता में। इसके अतिरिक्त, इन कार्यों को अभ्यास के दायरे में नहीं माना जाएगा यदि वे पूर्णकालिक (फुल टाइम) कर्मचारी की क्षमता में ऐसी सेवाएं प्रदान करते हैं।

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स विनियम 1988 के विनियम 191 में अभ्यास में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के अंशकालिक (पार्ट टाइम) रोजगार की स्वीकृति के लिए प्रावधान है।

धारा 2(2) आगे प्रावधान करती है कि संस्थान का एक सदस्य जो एक चार्टर्ड एकाउंटेंट का वेतन पर कार्य कर रहा कर्मचारी है या चार्टर्ड एकाउंटेंट की एक फर्म है, को ‘अभ्यास मे’ माना जाएगा।

चार्टर्ड एकाउंटेंट/संस्थान के सदस्य दो प्रकार के होते हैं- एसोसिएट सदस्य और फेलो, जैसा कि चार्टर्ड अकाउंटेंट अधिनियम की धारा 5 के तहत प्रदान किया गया है। हालाँकि, कंपनी अधिनियम यह निर्दिष्ट नहीं करता है कि लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त व्यक्ति को एसोसिएट होना चाहिए या फेलो होना चाहिए।

धारा 141(2) प्रदान करती है कि सीमित दायित्व भागीदारी फर्म सहित एक फर्म को लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त किया जा सकता है; हालाँकि, केवल वे भागीदार जो चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं, कंपनी के लेखा परीक्षक के रूप में कार्य करते समय फर्म की ओर से हस्ताक्षर करने के पात्र होंगे। 

कौन एक लेखा परीक्षक होने से अयोग्य है

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 141(3) उन व्यक्तियों या संस्थाओं के बारे में बात करती है जो लेखा परीक्षक बनने से अयोग्य हैं। कंपनी (लेखा परीक्षा और लेखा परीक्षक) नियम 2014 के नियम 10 में भी अयोग्यता की शर्तें हैं। 

पहली शर्त यह है कि एक निगमित निकाय को लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त नहीं किया जा सकता है। अब यह समझना होगा कि इस संदर्भ में एक निगमित निकाय का क्या अर्थ होगा। कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(11) “कॉर्पोरेट निकाय” शब्द की परिभाषा प्रदान करती है। यह प्रदान करती है कि सहकारी समिति को छोड़कर सभी कंपनियां, चाहे भारत के अंदर या बाहर निगमित हों, कॉर्पोरेट निकाय के दायरे में आएंगी। धारा 141 निगमित निकाय पर लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त होने पर रोक लगाती है। इसका कारण यह है कि किसी कंपनी में असीमित दायित्व की अवधारणा मौजूद नहीं होती है। एक लेखा परीक्षक द्वारा किया गया कार्य अत्यधिक महत्व का होता है और इसके उच्च दांव के परिणाम हो सकते हैं। हालांकि, इस तरह की कोई समस्या उत्पन्न होने पर कंपनी के निदेशकों (डायरेक्टर्स) को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं बनाया जा सकता है। दूसरी ओर, फर्मों और यहां तक ​​कि सीमित दायित्व भागीदारी फर्मों के मामले में, यह जोखिम मौजूद नहीं है। फर्मों में, कम से कम एक भागीदार की असीमित दायित्व होती है। इसलिए जवाबदेही भी अधिक है। इन कारणों से, सीमित दायित्व भागीदारी फर्मों सहित फर्मों को लेखा परीक्षकों के रूप में नियुक्त किया जाता है, जबकि कॉरपोरेट्स निकाय वर्जित हैं।

दूसरा प्रतिबंध कंपनी के किसी अधिकारी या कर्मचारी की नियुक्ति पर है। शब्द अधिकारी को कंपनी अधिनियम की धारा 2(59) के तहत परिभाषित किया गया है; इसमें निदेशक, प्रबंधक, प्रमुख प्रबंधकीय कर्मी, या कोई भी व्यक्ति शामिल है जिसके निर्देश के तहत निदेशक मंडल (बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स) कार्य करने का आदी है। एक कर्मचारी को कंपनी द्वारा नियोजित व्यक्ति के रूप में समझा जा सकता है और वह कंपनी से वेतन प्राप्त करता है। यह समझा जाना चाहिए कि लेखा परीक्षक द्वारा किए गए कार्य के लिए अत्यधिक स्वतंत्रता और व्यवहार में निष्पक्षता की आवश्यकता होती है। हालांकि, एक कंपनी के एक अधिकारी या कर्मचारी होने के नाते उक्त व्यक्तियों के कार्यों में पक्षपात और पूर्वाग्रह (बायस) की संभावना होती है। जब लेखा परीक्षा रिपोर्ट की बात आती है तो पक्षपात विनाशकारी साबित हो सकता है क्योंकि यह लेखा परीक्षा रिपोर्ट है जो सभी हितधारकों के लिए विश्वसनीयता की पहचान के रूप में कार्य करती है।

इसी कारण से, एक भागीदार या कोई भी जो उपर्युक्त व्यक्तियों का कर्मचारी है, यानी कंपनी का एक अधिकारी या कर्मचारी, एक लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त नहीं किया जाएगा। चूंकि ये व्यक्ति 141(3)(b) के तहत उल्लिखित व्यक्तियों के साथ संबंध साझा करते हैं, इसलिए उनके कार्यों को निष्पक्ष नहीं माना जा सकता है और वे प्रभाव से पीड़ित हो सकते हैं। इसलिए, उन्हें कंपनी के लिए एक लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त नहीं किया जा सकता है।

धारा 141(3) का खंड ‘d’ उन श्रेणियों की सूची प्रदान करता है जो लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त होने से प्रतिबंधित हैं। यह आगे बताता है:

एक भागीदार या उसका कोई रिश्तेदार या संगठन या इसकी किसी सहायक कंपनी या इसकी किसी होल्डिंग कंपनी की होल्डिंग या सहयोगी या सहायक कंपनी में किसी भी प्रकार की प्रतिभूति (सिक्योरिटी) या हित रखने वाले भागीदार को लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त नहीं किया जाएगा। एक शेयरधारक होने के नाते, एक व्यक्ति स्वाभाविक रूप से कंपनी को लाभ कमाने वाले के रूप में रखने में रुचि रखता है ताकि रिटर्न अधिक हो। इसलिए, इस तरह के एक व्यक्ति की एक रिपोर्ट पेश करने की संभावना मौजूद है जिसने मुनाफे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है। हालांकि प्रत्यक्ष प्रभाव की कोई स्थिति नहीं है, फिर भी हितों के टकराव की संभावना बनी रहती है। इस प्रकार कंपनी अधिनियम 2013 द्वारा ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त करने से रोक कर इस तरह के जोखिम को खारिज कर दिया गया है।

कंपनी (लेखा परीक्षा और लेखा परीक्षक) नियम, 2014 का नियम 10 इस प्रावधान के लिए एक परंतुक (प्रोविजो) प्रदान करता है। यह प्रदान करता है कि केवल एक लेखा परीक्षक के रिश्तेदार को अंकित मूल्य में एक लाख रुपये से अधिक की प्रतिभूति रखने की अनुमति नहीं है। यदि ऐसा व्यक्ति निर्धारित सीमा से अधिक प्रतिभूतियों का अधिग्रहण (एक्विजिशन) करता है, तो लेखापरीक्षक को ऐसे अधिग्रहण के 60 दिनों के भीतर सुधारात्मक उपाय करने होंगे।

एक भागीदार या उसका कोई रिश्तेदार या भागीदार जो 5 लाख से अधिक की राशि के लिए ऋणी है (जैसा कि कंपनी (लेखा परीक्षा और लेखा परीक्षक) नियम, 2014 के नियम 10 के तहत प्रदान किया गया है) कंपनी या उसके किसी भी होल्डिंग/सहयोगी/सहायक के लिए होल्डिंग कंपनियों की नियुक्ति पर रोक लगा दी गई है। यह माना जाता है कि एक व्यक्ति जो किसी कंपनी का ऋणी है, वह ऐसी स्थिति में है जहां वह कंपनी के प्रबंधन से प्रभावित हो सकता है और इस प्रकार, यह संभावना है कि पूर्वाग्रह लेखा परीक्षा रिपोर्ट तैयार करने में आ सकता है जिसका कंपनी के हितधारकों पर हानिकारक प्रभाव होगा।

एक भागीदार या उसका कोई रिश्तेदार या भागीदार जो एक गारंटर है या जिसने 1 लाख रुपये से अधिक की प्रतिभूति प्रदान की है (जैसा कि कंपनी (लेखा परीक्षा और लेखा परीक्षक) नियम, 2014 के नियम 10 के तहत प्रदान किया गया है) को भी एक लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त होने से रोक दिया गया है। इसके कारण एक भागीदार या उसके रिश्तेदारों या उसके साथी के कंपनी के ऋणी होने के समान हैं। इसलिए, यह हितधारकों के हित में है कि ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किए जाने से रोका जाए।

अब यह समझने की आवश्यकता है कि इस धारा के संदर्भ में ‘रिश्तेदार’ के प्रावधान के अंतर्गत कौन-कौन आएंगे। कंपनी अधिनियम की धारा 2(77) का संदर्भ लिया जा सकता है, जो ‘रिश्तेदार’ शब्द की परिभाषा प्रदान करता है। प्रावधान की शाब्दिक व्याख्या का अर्थ यह होगा कि सौतेले पिता/माता/भाई/बहन/पुत्र के साथ साथ एचयूएफ के सदस्य इस प्रावधान के तहत रिश्तेदारों के दायरे में आएंगे।

धारा 141(3)(e) में प्रावधान है कि यदि कंपनी या उसकी किसी सहायक कंपनी का किसी व्यक्ति या फर्म के साथ व्यावसायिक संबंध है, तो ऐसा व्यक्ति या फर्म लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त होने के योग्य नहीं होगा। कंपनी (लेखा परीक्षा और लेखा परीक्षक) नियम, 2014 के नियम 10(4) के अनुसार ‘व्यावसायिक संबंध’ शब्द का अर्थ किसी भी प्रकार का व्यावसायिक संबंध होगा। हालाँकि, इसके दो अपवाद हैं जो इस प्रकार हैं:

  1. कंपनी अधिनियम, 2013 या चार्टर्ड एकाउंटेंट्स अधिनियम, 1949 के तहत लेखा परीक्षकों या लेखा परीक्षक फर्मों द्वारा प्रदान की जाने वाली व्यावसायिक सेवाएं, भले ही वह वाणिज्यिक (कमर्शियल) प्रकृति की हों, व्यावसायिक संबंध नहीं मानी जाएंगी।
  2. लेन-देन जो व्यवसाय के सामान्य पाठ्यक्रम में हैं, भले ही वाणिज्यिक प्रकृति के हों, उन्हें इस श्रेणी से छूट दी जाएगी।

कंपनी के लेखा परीक्षा में किसी भी तरह के पक्षपात को खत्म करने के लिए यह प्रतिबंध फिर से प्रदान किया गया है।

अगला प्रतिबंध उस व्यक्ति पर है जिसका रिश्तेदार कंपनी के निदेशक या केएमपी के रूप में काम कर रहा है।

खंड (g) दो प्रकार के व्यक्तियों को निर्धारित करता है जिन्हें लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त नहीं किया जा सकता है।

पहले प्रकार के वे व्यक्ति हैं जो किसी अन्य स्थान पर पूर्णकालिक रोजगार में हैं। यह प्रावधान चार्टर्ड एकाउंटेंट्स अधिनियम, 1949 की धारा 2(2)(i) से संबंधित है। चार्टर्ड एकाउंटेंट्स अधिनियम के तहत, एक व्यक्ति जो पूर्णकालिक रोजगार धारण कर रहा है, उसे चार्टर्ड एकाउंटेंट नहीं माना जाएगा, और जैसा कि धारा 141(1) में स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है, एक व्यक्ति को ऑडिटर के रूप में तब तक नियुक्त नहीं किया जा सकता जब तक कि वह प्रैक्टिस में चार्टर्ड एकाउंटेंट न हो।

दूसरा प्रतिबंध किसी व्यक्ति या फर्म के भागीदार पर है जो एक ही समय में 20 से अधिक कंपनियों के लिए लेखा परीक्षक के रूप में कार्य कर रहा है। यह प्रतिबंध इसलिए लगाया गया है ताकि लेखा परीक्षकों को अत्यधिक संख्या में ग्राहकों को शामिल करने से रोका जा सके ताकि वे प्रत्येक क्लाइंट पर पर्याप्त ध्यान दे सकें क्योंकि लेखा परीक्षा एक अत्यधिक महत्वपूर्ण मामला है।

धारा 141(3)(h) एक व्यक्ति को कंपनी के लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त होने से रोकता है अगर उसे 10 साल से कम समय पहले धोखाधड़ी से जुड़े अपराध के लिए अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया हो। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 17 ‘धोखाधड़ी’ शब्द को परिभाषित करती है। उक्त धारा के तहत, धोखाधड़ी के तत्व में तथ्यों की जानबूझकर गलत बयानी, तथ्य को सक्रिय रूप से छिपाना, इसे पूरा करने के इरादे के बिना वादा करना, कोई अन्य भ्रामक कार्य या कोई भी कार्य शामिल है जिसे विशेष रूप से कानून द्वारा धोखाधड़ी घोषित किया गया है।

धारा 141(3)(i) निर्धारित करती है कि यदि किसी व्यक्ति ने कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 144 के तहत कंपनी/उसकी सहायक कंपनी या होल्डिंग को कोई सेवा प्रदान की है, तो ऐसे व्यक्ति को लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त नहीं किया जाएगा। धारा 144 गैर लेखा परीक्षा सेवाओं की एक सूची प्रदान करती है जो एक लेखा परीक्षक को किसी कंपनी को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रदान करने की अनुमति नहीं है। यह या तो लेखा सेवा हो सकती है; या आंतरिक (इंटरनल) लेखा परीक्षा; या बीमांकिक (एक्चुअरियल) सेवाएं; या निवेश सलाहकार सेवाएं; या निवेश बैंकिंग सेवाएं; आउटसोर्स वित्तीय सेवाएं प्रदान करना आदि। यदि कोई लेखा परीक्षक इनमें से किसी भी सेवा में खुद को संलग्न करता है, तो उसे लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त करने से रोक दिया जाएगा।

न्यायिक दृष्टिकोण

संजय श्रीशा बनाम गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (2022) के मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक कंपनी के लेखा परीक्षकों की पात्रता मानदंड (एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया) पर चर्चा की। यह दोहराया गया कि लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त होने के लिए चार्टर्ड एकाउंटेंट होना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने कहा कि यदि चार्टर्ड एकाउंटेंट उस फर्म का भागीदार है जिसे किसी कंपनी के लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त किया गया है, तो वह फर्म की ओर से लेखा परीक्षा रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने के लिए पात्र होगा। दायित्व की सीमा पर चर्चा करते हुए, न्यायालय ने निर्धारित किया कि फर्म और भागीदार को समान रूप से उत्तरदायी माना जाएगा, और फर्म के कंधों पर संपूर्ण दायित्व को डाल कर भागीदार जांच से बच नहीं सकता है। यह एक बार फिर स्पष्ट करता है कि फर्मों को लेखा परीक्षकों के रूप में नियुक्त करने की अनुमति क्यों दी जाती है। हालांकि, निगमित निकाय को लेखा परीक्षकों के रूप में नियुक्त करने की अनुमति नहीं हैं।

एनई मर्चेंट और अन्य बनाम राज्य (1967) के मामले में, न्यायालय ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त करने के महत्व को निर्धारित किया। न्यायालय ने कहा कि एक लेखा परीक्षक द्वारा किए गए कर्तव्यों के लिए उसे विशेषज्ञ ज्ञान लागू करने की आवश्यकता होती है और कंपनी के प्रबंधन द्वारा उसे नहीं झुकाया जा सकता क्योंकि उसके पास कंपनी की सही वित्तीय स्थिति को पेश करने की जिम्मेदारी है। उसे बिना किसी डर या पक्षपात के एक लेखा परीक्षक के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करना और कंपनी के खातों का लेखा परीक्षा करना आवश्यक है। न्यायालय ने कहा कि एक चार्टर्ड एकाउंटेंट ऐसे मामलों को संभालने के लिए अच्छी तरह से सुसज्जित (इक्विप्ड) है और वह कंपनी के व्यवसाय के वित्तीय पहलुओं के संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। न्यायालय ने इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया द्वारा जारी एक पैम्फलेट के एक अंश का उल्लेख किया, जिसमें यह निर्धारित किया गया था कि एक चार्टर्ड अकाउंटेंट न केवल तकनीकी योग्यता के मामले में एक विशेषज्ञ है बल्कि उसके पास उच्च निष्पक्षता, विचार की स्वतंत्रता और अखंडता (इंटीग्रिटी) भी है।

अमर नाथ मल्हेत्रा बनाम एमसीएस लिमिटेड (1992) के मामले में न्यायालय ने लेखा परीक्षक की योग्यता और अयोग्यता पर चर्चा करते हुए लेखा परीक्षक की स्वतंत्रता बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। न्यायालय ने निर्धारित किया कि एक लेखा परीक्षक को शेयरधारकों की सुरक्षा के लिए एक प्रहरी के रूप में कार्य करने की आवश्यकता होती है और शेयरधारकों को उसी की सच्ची और निष्पक्ष तस्वीर देने की दृष्टि से खातों की जांच करने की आवश्यकता होती है। लेखा परीक्षक कंपनी के सभी लाभार्थियों के प्रति कर्तव्यबद्ध है। इसलिए, उन्हें नियुक्त करते समय उनकी स्वतंत्रता का पहलू अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत संघ बनाम श्री मुकेश मानेकलाल चोकसी और अन्य (2019) के मामले में, लेखा परीक्षक के परिवार के सदस्यों के पास कंपनी के शेयर थे, जो कि धारा 141(3)(d) में निर्धारित प्रतिबंध का उल्लंघन है। इसके बावजूद, लेखा परीक्षक ने रिकॉर्ड की पुस्तकों की जांच किए बिना ही लेखा परीक्षक प्रमाण पत्र (सर्टिफिकेट) जारी कर दिया। यह लेखा परीक्षक की ओर से घोर अनियमितता (इररेगुलेरिटी) और धोखाधड़ी की कार्रवाई का मामला था। यह माना गया कि इस तरह की कार्रवाई को माफ नहीं किया जा सकता है। लेखा परीक्षक का प्राथमिक कर्तव्य कंपनी और साथ साथ कंपनी के हितधारकों के सर्वोत्तम हितों के प्रति है। लेखा परीक्षक को स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहिए और अपने दृष्टिकोण में पक्षपाती नहीं होना चाहिए।

लेखा परीक्षक की नियुक्ति कैसे होती है- कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 139

कंपनी अधिनियम की धारा 139 और कंपनी (लेखा परीक्षा और लेखा परीक्षक) नियम, 2014 के नियम 3 के तहत एक लेखा परीक्षक को नियुक्त किया जाता है। उक्त प्रावधानों के अनुसार, एक लेखा परीक्षक को एक कंपनी की लेखा परीक्षा समिति द्वारा नियुक्त किया जाता है। इस लेखा परीक्षा समिति में कम से कम 3 निदेशक होते हैं, और अन्य निदेशक मंडल द्वारा समय-समय पर तय किए जाएंगे। यह निर्धारित है कि न्यूनतम ⅔ लेखा परीक्षा समिति के सदस्यों में पूर्णकालिक या प्रबंध निदेशक शामिल नहीं होने चाहिए। लेखा परीक्षा समिति के अध्यक्ष के पास वित्तीय विवरणों को समझने की क्षमता होनी चाहिए। वित्त और लेखा के पहलुओं में ज्ञान रखने वाले व्यक्ति, जो कंपनी का हिस्सा नहीं हैं, को लेखा परीक्षा समिति में शामिल किया जाना चाहिए। इस समिति का प्राथमिक कार्य कंपनी के वित्तीय विवरणों की तैयारी, प्रस्तुति और रिपोर्टिंग की निगरानी करना है। समिति द्वारा अनुमोदित रिपोर्टों पर इसके सदस्यों के हस्ताक्षर की आवश्यकता होती है, और सदस्यों को किसी भी प्रकार की गलतबयानी या धोखाधड़ी की रिपोर्टिंग के लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा। समिति कंपनी के वैधानिक लेखा परीक्षकों के साथ समन्वय (कोऑर्डिनेशन) में काम करती है। लेखा परीक्षा समिति निदेशक मंडल को सिफारिश करती है। ऐसी सिफारिश करने से पहले, उम्मीदवार के खिलाफ योग्यता, अनुभव और लंबित कार्यवाही सहित कई कारकों पर विचार करने के लिए लेखा परीक्षा समिति की आवश्यकता होती है। ऐसी योग्यता कंपनी अधिनियम की धारा 141 के तहत निर्धारित आवश्यकताओं के अनुरूप होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, उन्हें यह भी सत्यापित (वेरिफाई) करना चाहिए कि ऐसा कोई आधार मौजूद नहीं है जिसके लिए अनुशंसित व्यक्ति अधिनियम के तहत अयोग्य हो सकता है। सिफारिश प्राप्त होने पर, निदेशक मंडल के पास सिफारिश को स्वीकार करने या इसे अस्वीकार करने का विकल्प होता है। यदि बोर्ड सिफारिश को स्वीकार करता है, तो वह इसे वार्षिक आम बैठक में सदस्यों के समक्ष रखेगा। यदि निदेशक मंडल (बी.ओ.डी.) अस्वीकार करते है, तो यह नाम वापस लेखा परीक्षा समिति को भेजेगा, जो या तो फिर से उसी व्यक्ति को नियुक्त करने की सिफारिश करेगी, जो यह दर्शाता है कि वे अपने सुझावों को बदलने के इच्छुक नहीं हैं; ऐसे मामले में, निदेशक मंडल को स्वयं एक नाम का सुझाव देना होगा और वार्षिक आम बैठक में इसका प्रस्ताव करना होगा, लेखा परीक्षा समिति के साथ उनकी असहमति के कारणों का हवाला देते हुए या अन्य परिदृश्य हो सकता है कि लेखापरीक्षा समिति किसी अन्य व्यक्ति का नाम, यदि यह नाम निदेशक मंडल द्वारा अनुमोदित किया जाता है, तो इसे वार्षिक आम बैठक में अन्य सदस्यों के समक्ष प्रस्तावित किया जाएगा और यदि यह नाम स्वीकृत नहीं करता है तो वही चक्र दोहराया जाएगा।

धारा 139(1) को कंपनी (लेखा परीक्षा और लेखा परीक्षक) नियम 2014 के नियम 4 के साथ पढ़ने पर, फर्म/व्यक्ति लिखित सहमति और एक प्रमाण पत्र प्रदान करेगा जिसमें कहा गया हो:

  1. वह कंपनी अधिनियम, 2013 और चार्टर्ड एकाउंटेंट्स अधिनियम 1949 और उनके नियमों जैसे लागू अधिनियमों और विनियमों से अयोग्य नहीं है; 
  2. वह नियुक्ति के लिए पात्र है; 
  3. प्रस्तावित नियुक्ति शर्तों के अनुसार और अधिनियम की सीमाओं के भीतर है; 
  4. प्रस्तावित इकाई के खिलाफ लंबित सभी कार्यवाही की सही सूची।

इन औपचारिकताओं (फॉर्मेलिटी) का विधिवत पालन करने के बाद, लेखा परीक्षक को वार्षिक आम बैठक में एक साधारण संकल्प के माध्यम से नियुक्त किया जाएगा। इस तरह की नियुक्ति के बारे में जानकारी लेखा परीक्षक को एक पत्र के रूप में दी जानी चाहिए, और आरओसी को 15 दिनों के भीतर एक फॉर्म एडीटी-1 भरकर सूचित करना आवश्यक है। 

प्रथम लेखा परीक्षक की नियुक्ति की प्रक्रिया

कंपनी अधिनियम की धारा 139(6) पहले लेखा परीक्षक की नियुक्ति से संबंधित है। यह निर्धारित है कि एक सरकारी कंपनी के अलावा, पहले लेखा परीक्षक को निदेशक मंडल द्वारा पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) के पहले 30 दिनों के भीतर नियुक्त किया जाएगा। यदि ऐसा नहीं होता है, तो कंपनी के सदस्यों को सूचित करने के बाद एक असाधारण आम बैठक में 90 दिनों के भीतर लेखा परीक्षक नियुक्त किया जाएगा। पहले लेखा परीक्षक का कार्यकाल पहली वार्षिक आम बैठक के समापन तक जारी रहेगा। पहली वार्षिक आम बैठक में, एक व्यक्ति या एक फर्म को एक साधारण संकल्प द्वारा लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त किया जाएगा। इस तरह के एक लेखा परीक्षक की नियुक्ति की प्रक्रिया को ऊपर विस्तार से बताया गया है। ऐसा लेखा परीक्षक 5 वर्ष की अवधि (6 वे वार्षिक आम बैठक तक) के लिए पद धारण करेगा। 

निष्कर्ष

लेखा परीक्षक कंपनी के कामकाज में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कंपनी के सभी हितधारक पूरी तरह से लेखा परीक्षक द्वारा दी गई रिपोर्ट पर निर्भर हैं, जो कंपनी की वास्तविकता की पहचान के रूप में कार्य करती है। कंपनी की स्थिरता और विकास इस कारण पर निर्भर है कि वर्तमान और संभावित शेयरधारक तभी निवेश करने को तैयार होंगे जब उन्हें पता होगा कि कंपनी पारदर्शी तरीके से कारोबार कर रही है। लेखा परीक्षक को स्वतंत्र विचार का प्रयोग करना चाहिए और कंपनी के प्रबंधन से प्रभावित नहीं होना चाहिए। लेखा परीक्षकों के कार्य कंपनी के लिए फायदेमंद होते हैं क्योंकि इससे उन्हें निरंतरता बनाए रखने, उनके प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) में त्रुटियों का पता लगाने या धोखाधड़ी का पता लगाने में मदद मिलती है। इस प्रकार यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि लेखा परीक्षकों की स्वतंत्रता को बनाए रखा जाए। यदि नियुक्त किए गए व्यक्ति इस प्रकार के हैं कि उनका शोषण किया जा सकता है या प्रबंधन द्वारा प्रभावित किया जा सकता है, तो रिपोर्ट की अखंडता और पारदर्शिता को बनाए नहीं रखा जाएगा, जिससे शेयरधारकों द्वारा कंपनी में विश्वास का नुकसान होगा। कंपनी अधिनियम 2013 लेखा परीक्षकों की स्वतंत्रता को बनाए रखने में सहायक रहा है। अधिनियम द्वारा निर्धारित योग्यताएं सुनिश्चित करती हैं कि नियुक्त किया गया व्यक्ति एक वित्तीय विशेषज्ञ है और कंपनी के वित्तीय विवरणों की सटीक रिपोर्ट तैयार करने में सक्षम है। निर्धारित अयोग्यताएं यह सुनिश्चित करती हैं कि कोई भी व्यक्ति जिसके पास कंपनी के हित और व्यक्तिगत हित के बीच टकराव की संभावना है, को नियुक्त होने से रोक दिया गया है। अधिनियम में निर्धारित नियुक्ति प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि इसमें किसी प्रकार का पक्षपात शामिल नहीं है और यह कंपनी और इसके हितधारकों के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए किया जाता है। कुल मिलाकर, कंपनी अधिनियम 2013 में लेखा परीक्षक की योग्यता, अयोग्यता और नियुक्ति के संबंध में एक मजबूत तंत्र शामिल है। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

एक लेखा परीक्षक कौन है, और उसकी भूमिका क्या है?

लेखा परीक्षक एक वित्तीय विशेषज्ञ होता है जिसे कंपनी द्वारा कंपनी की वित्तीय रिपोर्ट पर एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए नियुक्त किया जाता है, जिसे लेखा परीक्षक की रिपोर्ट के रूप में जाना जाता है। वे सुनिश्चित करते हैं कि कंपनी के संचालन लागू कानूनों और विनियमों के अनुरूप हैं। इसके अलावा, वे कंपनी को विभिन्न वित्तीय मामलों पर सलाह भी देते हैं।

लेखा परीक्षक के विभिन्न प्रकार क्या हैं?

एक कंपनी में मुख्य रूप से दो प्रकार के लेखा परीक्षक होते हैं- आंतरिक लेखा परीक्षक और बाहरी लेखा परीक्षक। आंतरिक लेखा परीक्षक वे होते हैं जो अपने रोजगार के एक भाग के रूप में आंतरिक लेखा परीक्षा कार्य करते हैं। दूसरी ओर, बाहरी लेखा परीक्षक वे हैं जो स्वतंत्र तृतीय पक्ष हैं जिन्हें कंपनी द्वारा लेखा परीक्षा करने के लिए नियुक्त किया जाता है।

क्या एक ही व्यक्ति को लेखा परीक्षक के रूप में फिर से नियुक्त किया जा सकता है?

एक लेखा परीक्षक को फिर से नियुक्त किया जा सकता है। हालाँकि, किसी व्यक्ति को लगातार 5 वर्षों के एक कार्यकाल से अधिक के लिए लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त नहीं किया जा सकता है। और एक लेखा परीक्षा करने वाली फर्म को लगातार 5 वर्षों की दो से अधिक अवधि के लिए फिर से नियुक्त नहीं किया जा सकता है। 

लेखा परीक्षक को हटाने की प्रक्रिया क्या है?

एक लेखा परीक्षक को उसके कार्यकाल की समाप्ति से पहले हटाने के लिए, एक विशेष प्रस्ताव पारित करने की आवश्यकता होती है, और केंद्र सरकार से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता होती है।

संदर्भ 

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