रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2014) और (2019)

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यह लेख Janani Parvathy J द्वारा लिखा गया है। यह रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का कानूनी विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस लेख में संक्षिप्त तथ्य, उठाए गए मुद्दे, दोनों पक्षों की दलीलें, मामले में शामिल कानूनी प्रावधान, न्यायालय का फैसला और फैसले का संक्षिप्त विश्लेषण शामिल है। इस लेख में मामले का विश्लेषण करने के साथ-साथ आईपीसी, सीआरपीसी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की कुछ धाराओं पर भी चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2019) एक ऐतिहासिक मामला है, जिसने उस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से संबंधित विवाद को सुलझाया, जहां से घरेलू हिंसा की पीड़िता मामला दर्ज करा सकती है। इसने पैतृक घर में न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र के बारे में सभी मौजूदा संदेहों को दूर कर दिया। रूपाली देवी से पहले, इस विषय पर प्रमुख मिसालों को दो ब्लॉकों में वर्गीकृत किया जा सकता है। पहले मामले में ऐसे उदाहरण शामिल थे, जिनमें कहा गया था कि धारा 498A के तहत अपराध कोई सतत अपराध नहीं है, और इसलिए पैतृक घर की अदालतों में अधिकार क्षेत्र का अभाव है। इनमें रमेश एवं अन्य बनाम तमिलनाडु राज्य (2005) और अमरेंदु ज्योति एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य (2006) शामिल हैं। जबकि, दूसरे समूह के उदाहरणों में यह प्रावधान था कि जब पीड़िता पर उसके माता-पिता के घर में भी क्रूरता की जाती है, तो उस क्षेत्र की अदालतें भी घरेलू हिंसा के मामलों की सुनवाई करने के लिए सशक्त हो जाएंगी। इन मामलों में सुजाता मुखर्जी बनाम प्रशांत कुमार मुखर्जी (1997) और सुनीता कुमारी कश्यप बनाम बिहार राज्य एवं अन्य (2001) शामिल हैं। रूपाली देवी मामला भारतीय दंड संहिता, 1860, घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के बीच के अंतर को भी दर्शाता है। इस मामले में ऐतिहासिक रूप से अधिनियम के शब्दों की सख्ती से व्याख्या करने के बजाय अधिनियम के उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करने पर जोर दिया गया। इस मामले में घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम (2005), सीआरपीसी की धारा 174 और 175 तथा दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के उद्देश्य पर विस्तार से चर्चा की गई। 

मामले का विवरण

  • मामले का नाम: रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • समतुल्य उद्धरण: मनु एससी 0499 2019, एआईआर 2019 एससी 1790, 2019 (2) एएलडी (सीआरएल) 325 (एससी), 2019 (108)
  • संबंधित अधिनियम: भारतीय दंड संहिता, 1860 (इसके बाद आईपीसी कहा जाएगा), दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (इसके बाद सीआरपीसी कहा जाएगा), घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (इसके बाद घरेलू हिंसा अधिनियम कहा जाएगा) और दहेज निषेध अधिनियम, 1961
  • महत्वपूर्ण प्रावधान: भारतीय दंड संहिता की धारा 498A, 506, 313 और 494 को दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 तथा सीआरपीसी की धारा 174 और 176 के साथ पढ़ा जाए। 
  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव।
  • याचिकाकर्ता: रूपाली देवी
  • प्रतिवादी: उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य।
  • निर्णय की तिथि: 9 अप्रैल, 2019

रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के तथ्य

जनवरी 2014 में, रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामला दो न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष अपील के लिए आया, जिसने 2019 में मामले को तीन न्यायाधीशों की पीठ को भेज दिया। दोनों पीठ के न्यायाधीशों के समक्ष मामले के तथ्य इस प्रकार हैं: 

रूपाली देवी (अपीलकर्ता) अपने पति (प्रतिवादी 2) और 4 वर्षीय बच्चे के साथ मऊ स्थित अपने वैवाहिक घर में रह रही थी। 

बाद में, उसके पति ने उसे दहेज के लिए परेशान करना शुरू कर दिया, जिसके कारण उसे मऊ में अपना वैवाहिक घर छोड़कर देवरिया में स्थानांतरित होने के लिए मजबूर होना पड़ा। परिणामस्वरूप, रूपाली देवी ने अपने पति और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ धारा 489A, 506, 313, 494 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत शिकायत दर्ज कराई। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, देवरिया ने प्रतिवादियों को सम्मन जारी किया। 

पति ने अधिकार क्षेत्र का अभाव बताते हुए पत्नी द्वारा लगाए गए आरोपों को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष चुनौती दी। पति ने तर्क दिया कि क्रूरता के कथित कार्य मऊ में किए गए थे, देवरिया में नहीं, और इसलिए देवरिया की अदालतों को इस मामले की सुनवाई करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। 

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि धारा 498A के तहत अपराध एक सतत अपराध है और इसलिए यह देवरिया पर भी लागू हो सकता है, जहां वह अपने पति द्वारा उत्पीड़न से बचने के लिए शरण लेने गई थी। इसके विपरीत, सत्र न्यायाधीश ने कहा कि धारा 498A के तहत अपराध कोई सतत अपराध नहीं है, और इसलिए देवरिया की अदालत को इस पर अधिकार नहीं हो सकता, क्योंकि कथित अपराध मऊ में किया गया था। उच्च न्यायालय में की गई अपील के परिणामस्वरूप भी ऐसा ही निर्णय आया। उच्च न्यायालय ने सत्र न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा और मऊ को उचित अधिकार क्षेत्र प्राप्त घोषित किया। 

2014 में, दो न्यायाधीशों की पीठ ने टिप्पणी की थी कि दोनों वकीलों द्वारा उद्धृत उदाहरण न केवल सर्वोच्च न्यायालय की दो न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिए गए निर्णय थे, बल्कि भिन्न-भिन्न राय भी दर्शाते थे। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि वर्तमान प्रश्न, अर्थात् पैतृक घर में न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र, अत्यंत सार्वजनिक महत्व का है। इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने कहा कि यह ऐसा प्रश्न है जिस पर विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि इससे संबंधित कानून अस्पष्ट है। इसलिए, मामले को निर्णय के लिए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (न्यायमूर्ति रंजन गोगोई) सहित तीन न्यायाधीशों की पीठ को भेज दिया गया। 

उठाए गए मुद्दे 

दो न्यायाधीशों वाली पीठ और तीन न्यायाधीशों वाली पीठ के समक्ष उठाए गए मुद्दे एक जैसे थे। मुद्दे उठाए गए थे कि: 

  • क्या एक महिला, जिसे अपने पति की क्रूरता के कारण अपने वैवाहिक घर को छोड़ने के लिए मजबूर किया गया हो, उस स्थान की अदालत में मामला दायर कर सकती है जहां उसे शरण लेने के लिए मजबूर किया गया था? 

रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में पक्षों की दलीलें

दो न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष दोनों पक्षों ने कानूनी प्रावधानों और उदाहरणों के आधार पर तर्क दिए थे। दोनों पक्षों की दलीलें इस प्रकार हैं: 

याचिकाकर्ता

  • अपीलकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि सीआरपीसी की धारा 177 और 178 को उदारतापूर्वक (लिबरली) पढ़ा जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि घरेलू हिंसा या क्रूरता से पीड़ित महिला को न्याय की मांग करने के बिना न छोड़ा जाए। वकील ने आगे तर्क दिया कि यदि धारा 177 और 178, जो यह कहती हैं कि जहां अपराध हुआ था, वहां की अदालतों को मामले की सुनवाई करने का अधिकार क्षेत्र है, की सख्ती से व्याख्या की गई तो इससे धारा 498A का पूरा उद्देश्य ही नष्ट हो जाएगा। वकील ने आगे जोर देकर कहा कि धारा 498A महिलाओं को उनके पतियों द्वारा की जाने वाली घरेलू हिंसा से बचाने के लिए पेश की गई थी। 
  • वकील ने आगे तर्क दिया कि सीआरपीसी की धारा 177 और 178 में ‘सामान्यतः’ शब्द शामिल है, और इस शब्द सामान्यतः का अर्थ है कि इन धाराओं का उपयोग सामान्य रूप से किया जाना था और इसकी सख्ती से व्याख्या नहीं की जा सकती। 
  • वकील ने अदालत के समक्ष इस बात पर जोर दिया कि धारा 498A का उद्देश्य पति द्वारा क्रूरता जैसी बुराइयों को खत्म करना है। वकील ने बताया कि दहेज की मांग करना या पत्नी के साथ धोखा करना पति द्वारा किया गया क्रूरतापूर्ण कार्य एक सतत अपराध है, अर्थात स्थान बदलने के बाद भी अपराध जारी रहता है। वकील ने आगे तर्क दिया कि वर्तमान अपराध के लिए सीआरपीसी की धारा 178 (c) के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए।
  • वकील ने यह भी तर्क दिया कि यह अपराध धारा 178(b) के अंतर्गत भी आ सकता है। जो अपराध आंशिक रूप से एक स्थान पर तथा आंशिक रूप से दूसरे स्थान पर किए गए हों, या विभिन्न स्थानों पर किए गए हों, वे धारा 178(b) के अंतर्गत दंडनीय हैं। चूंकि वर्तमान मामले में अपराध एक सतत अपराध था, इसलिए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह मऊ और देवरिया में किया गया था। 
  • वकील ने गोकक पटेल वोलकार्ट लिमिटेड बनाम दुंडय्या गुरुशिद्दैया हीरेमथ एवं अन्य (1991), अरुण व्यास एवं अन्य बनाम अनीता व्यास (1999), सनापारेड्डी महेशधर शेषगिरी एवं अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य (2007), तथा मध्य प्रदेश राज्य बनाम सुरेश कौशल एवं अन्य (2003) के उदाहरणों का सहारा लेकर यह सिद्ध किया कि धारा 498A के तहत अपराध एक सतत अपराध है और पत्नी राहत प्राप्त करने के लिए अपने माता-पिता के निवास में स्थित न्यायालय में भी जा सकती है। 

प्रतिवादी

  • प्रतिवादी, यानी पति के वकील ने अब्राहम अजीत एवं अन्य बनाम पुलिस निरीक्षक चेन्नई एवं अन्य (2004) और मनीष रतन एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य (2006) का हवाला दिया। 
  • वकील ने अदालत के समक्ष बताया कि इन मामलों में यह देखा गया कि जब उस स्थान पर जहां पत्नी ने शरण ली थी, पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता का कोई स्पष्ट कार्य नहीं किया गया था, तो उसी अदालत को इस मामले की सुनवाई करने का अधिकार नहीं हो सकता, क्योंकि यहां कोई अपराध नहीं किया गया था।
  • वकील ने आगे दलील दी कि उपर्युक्त मामलों में निर्णयों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि केवल उन अदालतों को ही मामले की सुनवाई और जांच करने का अधिकार क्षेत्र होगा जहां अपराध किया गया था।

रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में चर्चित कानून

 आईपीसी की धारा 498A

धारा 498A पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा पत्नी पर की गई क्रूरता के बारे में बात करती है। इस धारा के अंतर्गत क्रूरता की परिभाषा में ऐसा कोई भी कार्य शामिल है जो किसी महिला के जीवन, अंग, तथा मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। इस धारा के अंतर्गत क्रूरता में ऐसे कार्य भी शामिल हैं जो किसी महिला को आत्महत्या के लिए उकसाते हैं। धारा 498A किसी महिला को उसके पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा संपत्ति, सामान या धन की किसी भी अवैध मांग की पूर्ति न करने पर परेशान करने पर भी दंडनीय है। सर्वोच्च न्यायालय ने मंजू राम कलिता बनाम असम राज्य (2009) मामले में माना है कि धारा 498A के तहत क्रूरता का अर्थ परिस्थितियों के आधार पर देखा जाना चाहिए और छोटे-मोटे झगड़े क्रूरता नहीं माने जा सकते। इस धारा के तहत तीन साल तक की सजा और जुर्माना भी दिया जा सकता है। 

आईपीसी की धारा धारा 506

भारतीय दंड संहिता की धारा 506 आपराधिक धमकी के अपराध के लिए दंड का प्रावधान करती है। भारतीय दंड संहिता की धारा 503 के अनुसार आपराधिक धमकी एक ऐसा कार्य है जिसमें एक व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के शरीर, संपत्ति या प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की धमकी देता है, जिसका उद्देश्य दूसरे व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने तथा ऐसा कार्य करने के लिए मजबूर करना है जिसे करने के लिए वह कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। आपराधिक धमकी के लिए सजा 2 वर्ष का कारावास, जुर्माना या दोनों हो सकती है। हत्या, गंभीर चोट पहुंचाने या महिलाओं की शीलभंग करने की धमकी देने पर सजा को जुर्माने के साथ या उसके बिना 7 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। 

आईपीसी की धारा 313

भारतीय दंड संहिता की धारा 313 में महिला की सहमति के बिना गर्भपात कराने पर सजा का प्रावधान है। जो कोई भी महिला का गर्भपात बुरी नीयत से और उसकी सहमति के बिना कराता है, उसे आजीवन कारावास या 10 वर्ष के कारावास और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।

आईपीसी की धारा 494

धारा 494 द्विविवाह के कार्य को स्पष्ट करती है। द्विविवाह वह अपराध है जब कोई व्यक्ति पहले से मौजूद पत्नी या पति के होते हुए पुनर्विवाह करता है। ऐसा विवाह अमान्य है। जो भी व्यक्ति यह अपराध करेगा उसे जुर्माने के साथ-साथ 7 वर्ष तक के कारावास की सजा दी जाएगी। धारा 494 में कुछ अपवाद भी शामिल हैं, जो इस प्रकार हैं:

  • जब पति या पत्नी में से किसी एक का विवाह न्यायालय द्वारा पहले ही शून्य घोषित कर दिया गया हो, तो धारा 494 लागू नहीं होगी।
  • जब पति या पत्नी ईमानदारी से यह मानकर पुनर्विवाह कर लेते हैं कि पहला साथी मर चुका है, तो आईपीसी की धारा 494 के तहत कोई अपराध नहीं होता। इस अपवाद को लागू करने के लिए यह आवश्यक है कि पहले पति या पत्नी की मृत्यु को कम से कम सात वर्ष बीत चुके हों। 

सीआरपीसी की धारा 174

धारा 174 आत्महत्या या अप्राकृतिक मृत्यु की खोज के बाद पुलिस अधिकारी द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को निर्दिष्ट करती है। इसमें कहा गया है कि: 

  • आत्महत्या या अप्राकृतिक हत्या का पता चलने पर, प्रभारी पुलिस अधिकारी को स्थानीय न्यायाधीश (जिला या उप-न्यायालय) को सूचित करना होता है। 
  • इसके बाद प्रभागीय न्यायाधीश जांच शुरू करेंगे और फिर मौत के कारण और तरीके तथा शरीर पर चोटों और घावों के बारे में रिपोर्ट तैयार करेंगे।
  • यदि मृत्यु के कारण के बारे में कोई संदेह है, यदि मामला किसी महिला की मृत्यु के सात वर्ष के भीतर आत्महत्या से संबंधित है, या यदि इसमें महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु शामिल है, तो ऐसे सभी मामलों में, प्रभारी अधिकारी, यदि वह उचित समझे, तो शव को आगे के विश्लेषण के लिए सिविल सर्जन के पास भेज सकता है।
  • यह धारा उन मजिस्ट्रेटों को भी निर्दिष्ट करती है जिन्हें जांच करने की अनुमति है।

सीआरपीसी की धारा 176

  • धारा 176 मजिस्ट्रेट को अप्राकृतिक मृत्यु के मामलों में मृत्यु का कारण जानने के लिए जांच करने का अधिकार देती है। 
  • मजिस्ट्रेट द्वारा जांच तब की जा सकती है जब कोई महिला लापता हो जाती है या बलात्कार का अपराध घटित होता है। 
  • यह धारा उस प्रक्रिया के बारे में भी बताती है जिसका पालन उस स्थिति में किया जाना चाहिए जब शव का अंतिम संस्कार हो चुका हो।
  • उप-खण्ड 5 में पुलिस अधिकारी को शव को निकटतम सर्जन के पास भेजने का भी आदेश दिया गया है।

सीआरपीसी की धारा 177

सीआरपीसी की धारा 177 मामलों की सुनवाई के लिए अदालतों के सामान्य अधिकार क्षेत्र को निर्दिष्ट करती है। इसमें कहा गया है कि सामान्यतः, जिस स्थान पर अपराध हुआ है, वहां की अदालतों को मामलों की सुनवाई, विचारण और जांच करने का अधिकार होगा। 

सीआरपीसी की धारा 178

सीआरपीसी की धारा 177 के तहत उल्लिखित नियम में कुछ अपवाद निर्दिष्ट किए गए हैं। कुछ मामलों में, अपराध जिस न्यायालय में हुआ है उसके अलावा किसी अन्य न्यायालय को अधिकार क्षेत्र दिया जा सकता है, धारा 178 इस अपवाद को निर्धारित करती है। यह निर्दिष्ट करती है कि 

  • जब अपराध का विशिष्ट क्षेत्र अस्पष्ट हो या जब अपराध निरंतर जारी रहने वाला अपराध हो और अपराध का अन्य स्थान पर जारी रहना;
  • जब अपराध अलग-अलग क्षेत्रों में किया गया हो;
  • उपरोक्त परिस्थितियों में, स्थानीय क्षेत्र के न्यायालय के अलावा किसी अन्य न्यायालय को मामलों की सुनवाई, जांच और मुकदमा चलाने का अधिकार दिया जा सकता है।

सीआरपीसी की धारा 179

धारा 179, सीआरपीसी की धारा 177 में निर्धारित नियम के लिए एक और अपवाद प्रदान करती है। इसमें कहा गया है कि यदि एक स्थान पर किए गए अपराध के परिणाम दूसरे स्थान पर भी जारी रहते हैं, तो दूसरे क्षेत्र की अदालतों को भी मामलों की सुनवाई और जांच करने का अधिकार दिया जा सकता है। 

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005

घरेलू दुर्व्यवहार के मामलों की बढ़ती संख्या से निपटने के लिए, 2005 का घरेलू हिंसा अधिनियम बनाया गया। इस अधिनियम में पाँच अध्याय और सैंतीस धाराएँ हैं। अधिनियम की धारा 3 में घरेलू हिंसा को ऐसे कार्य के रूप में परिभाषित किया गया है जो घरेलू परिवार में किसी महिला के जीवन, अंग, सुरक्षा और कल्याण को नुकसान पहुँचाता है, घायल करता है या चोट पहुँचाने की धमकी देता है। इसमें ऐसा कोई भी कार्य भी शामिल है जो महिला को मानसिक, शारीरिक या भावनात्मक कष्ट या हानि पहुंचाता हो। घरेलू हिंसा अधिनियम ऐसी पीड़ित महिलाओं के लिए निवारण का मार्ग है। एक महिला को शिकायत के 60 दिनों के भीतर सिविल उपचार प्राप्त करने का अधिकार है। घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 17 पीड़ित महिलाओं को हिंसा मुक्त वातावरण में और अपने वैवाहिक घर से दूर रहने का अधिकार देती है। इस अधिनियम का दायरा महिलाओं के भावनात्मक और मानसिक उत्पीड़न को मान्यता देने के लिए भी व्यापक है, तथा यह घरेलू संबंध के दायरे में विवाह और लिव-इन संबंधों दोनों को शामिल करता है। अधिनियम में पीड़ित के लिए आर्थिक क्षतिपूर्ति, बच्चे की अभिरक्षा तथा विवाह समाप्ति का दावा करने की प्रक्रिया भी निर्धारित की गई है। 

दहेज निषेध अधिनियम,1961

यह अधिनियम दहेज देने, लेने या मांगने की प्रथा को समाप्त करने के लिए लाया गया था। इस अधिनियम में दस धाराएं हैं, जिनके माध्यम से दहेज मांगने पर पति या पत्नी या उनके रिश्तेदारों को दंडित किया जा सकता है। धारा 2 दहेज को विवाह के समय एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष को दी गई संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति (सिक्योरिटी) के रूप में परिभाषित करती है। अधिनियम की धारा 3 में दहेज लेने, देने या किसी को दहेज लेने या देने के लिए उकसाने पर दंड का प्रावधान है। धारा 3 के अनुसार न्यूनतम पांच वर्ष का कारावास तथा कम से कम पंद्रह हजार रुपए जुर्माना या प्रतिकर (कंपनसेशन) राशि, जो भी अधिक हो, दी जा सकती है। अधिनियम की धारा 4 दहेज मांगने के कार्य को दंडित करती है। जीवनसाथी, माता-पिता या रिश्तेदारों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दहेज की मांग करने पर छह महीने से दो साल तक की कैद और दस हजार रुपये का जुर्माना हो सकता है। 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113A

धारा 113A पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के संबंध में अनुमान निर्दिष्ट करती है। धारा 113A के घटक इस प्रकार हैं:

  • पत्नी ने विवाह के सात वर्ष के भीतर आत्महत्या कर ली हो।
  • आत्महत्या से कुछ समय पहले पत्नी को पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता का सामना करना पड़ा होगा।

धारा 113A में कहा गया है कि यदि उपरोक्त शर्तें पूरी होती हैं, तो यह माना जा सकता है कि पति या उसके रिश्तेदार ने पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाया था। 

रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में निर्णय

अदालत के समक्ष मुद्दा यह था कि क्या घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला अपने पति के खिलाफ वैवाहिक घर जहां अपराध हुआ था के बजाय अपने मायके में अदालत के समक्ष मामला दर्ज करा सकती है। न्यायमूर्ति टी.एस. ठाकुर और न्यायमूर्ति सी. नागप्पन की दो न्यायाधीशों वाली पीठ के विचार विभाजित थे; इसलिए, मामला तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई रंजन गोगोई) वाली तीन न्यायाधीशों वाली पीठ को भेज दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय की तीन पीठों ने सकारात्मक फैसला सुनाया और पीड़ित महिलाओं को राहत प्रदान की। 

इस निर्णय के पीछे तर्क

सर्वोच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने: वाई. अब्राहम अजीत और अन्य बनाम पुलिस निरीक्षक, चेन्नई और अन्य (2004), रमेश और अन्य बनाम तमिलनाडु राज्य (2005), मनीष रतन और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य (2006), और अमरेंदु ज्योति और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य (2006) का विस्तार से विश्लेषण किया। न्यायालय ने पाया कि उपर्युक्त मामलों में, मायके में स्थानांतरित होने के बाद पत्नी की ओर से घरेलू हिंसा का कोई आरोप नहीं लगाया गया। न्यायालय ने कहा कि इन विशेष परिस्थितियों के कारण ही इन निर्णयों में यह माना गया कि पत्नी को परेशान करने का अपराध पैतृक घर में जारी नहीं रहेगा तथा पैतृक घर स्थित न्यायालयों के पास धारा 498A के तहत मामलों की सुनवाई करने का अधिकार नहीं है। 

जबकि, न्यायालय ने पाया कि सुजाता मुखर्जी बनाम प्रशांत कुमार मुखर्जी (1997), सुनीता कुमारी कश्यप बनाम बिहार राज्य एवं अन्य (2011), तथा मध्य प्रदेश राज्य बनाम सुरेश कौशल एवं अन्य (2003) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भिन्न दृष्टिकोण अपनाया गया था। हालाँकि, अदालत ने प्रत्येक मामले के अलग-अलग तथ्यों और परिस्थितियों को भी स्वीकार किया। सुजाता मुखर्जी मामले में, यह देखा गया कि पति ने पैतृक घर पर भी क्रूरता का अपराध जारी रखा था, और इसलिए, यहां यह माना गया कि घरेलू हिंसा सीआरपीसी की धारा 178 (c) के तहत एक सतत कार्य था। सुनीता कुमारी मामले में पति ने पत्नी के साथ बुरा व्यवहार किया, उसे पैतृक घर पर छोड़ दिया, तथा किसी भी तरह से उसकी जानकारी नहीं ली, यहां तक कि उसके फोन का जवाब देने से भी इनकार कर दिया। इन विशेष परिस्थितियों के कारण ही न्यायालय ने सुनीता कुमारी मामले में माना कि अपराध पैतृक घर पर भी हुआ था और वहां की अदालत को भी पर्याप्त अधिकार क्षेत्र प्राप्त होगा। सुरेश कौशल मामले में, ससुराल में पति द्वारा प्रताड़ित किये जाने के परिणामस्वरूप पत्नी का गर्भपात उसके मायके में हो गया था। इसलिए, न्यायालय ने कहा कि पैतृक घर संबंधी न्यायालय को अधिकार क्षेत्र प्राप्त होगा। 

दो न्यायाधीशों की पीठ द्वारा संदर्भित इन दो अलग-अलग मामलों का विश्लेषण करने के बाद, तीन न्यायाधीशों की पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि वर्तमान मामले के तथ्य और परिस्थितियां अलग-अलग थीं और संदर्भित मामलों का उपयोग केवल उन विशेष परिस्थितियों में किया जा सकता है जिनके तहत उन्हें मंजूरी दी गई थी। न्यायालय ने कहा कि वर्तमान मामला ऐसा है, जहां हिंसा की घटना वैवाहिक घर में हुई, लेकिन उसके बाद पैतृक घर में सतत नहीं रहीं, बल्कि कानूनी कार्यवाही पैतृक घर से शुरू की गई। 

इसके अलावा, अदालत ने कहा कि सीआरपीसी के अध्याय 3 को पढ़ने की आवश्यकता है, जो जांच और सुनवाई में आपराधिक अदालतों के अधिकार क्षेत्र से संबंधित है। 

न्यायालय ने सीआरपीसी की धारा 177 का विश्लेषण करने के बाद बताया कि सामान्य परिस्थितियों में, जिस क्षेत्र में अपराध किया गया था, उस क्षेत्र की अदालत को मुकदमे की सुनवाई करने का अपेक्षित अधिकार क्षेत्र होगा। इसके अलावा, न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 178 और 179, अर्थात् धारा 177 के अंतर्गत सामान्य नियम के अपवादों की व्याख्या की, तथा कहा कि सामान्य नियम को शिथिल करके उस न्यायालय के अलावा अन्य न्यायालय को अधिकार क्षेत्र प्रदान किया जा सकता है, जहां अपराध किया गया था, जब अपराध आंशिक रूप से एक क्षेत्र में और आंशिक रूप से दूसरे क्षेत्र में किया गया था, जब अपराध जारी है, या जब एक स्थान पर किए गए अपराध के परिणामस्वरूप दूसरे स्थान पर अपराध किया गया हो। 

निरंतर जारी रहने वाले अपराध को समझने के लिए, न्यायालय ने बिहार राज्य बनाम देवकरण नेन्शी (1972) मामले पर चर्चा की, जहां यह देखा गया कि निरंतर जारी रहने वाले अपराध को एक बार किए गए अपराध से अलग करने की आवश्यकता है। यह देखा गया कि सतत अपराध तब होता है जब किसी नियम या उसकी आवश्यकता का पालन करने में विफलता होती है। यहां, अपराध तब तक जारी रहता है या बार-बार होता रहता है जब तक कि इस नियम या आवश्यकता का अनुपालन नहीं किया जाता। 

तीन न्यायाधीशों की पीठ ने आगे कहा कि वर्तमान मामले का धारा 178, जो कि पहला अपवाद है, से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि यह निर्धारित करना आवश्यक है कि क्या इस मामले में धारा 179 के तहत दूसरे अपवाद को लागू किया जा सकता है। इसका उत्तर देने के लिए, न्यायालय ने आपराधिक कानून (द्वितीय संशोधन) अधिनियम, 1983 के उद्देश्यों और कारणों के कथन का विश्लेषण किया, जिसके द्वारा धारा 498A डाली गई थी। सरल शब्दों में कहें तो वे धारा 498A लागू करने के उद्देश्य को समझना चाहते थे। 

न्यायालय ने बताया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498A को आपराधिक कानून (द्वितीय संशोधन अधिनियम, 1983) के माध्यम से पेश किया गया था। इसने इस बात पर भी जोर दिया कि द्वितीय संशोधन अधिनियम के माध्यम से धारा 174, अर्थात् आत्महत्याओं के संबंध में पुलिस की जांच, तथा सीआरपीसी की धारा 176, अर्थात् द्वितीय संशोधन अधिनियम, 1983 के तहत जांच, में भी संशोधन किया गया। इसके अतिरिक्त, द्वितीय संशोधन अधिनियम के माध्यम से सीआरपीसी की धारा 198A भी जोड़ी गई। इसके अलावा, घरेलू हिंसा के अपराध को गैर-जमानती और संज्ञेय (कॉग्निजेबल) बनाने के लिए सीआरपीसी में संशोधन किया गया। इसके बाद, धारा 113A को भारतीय साक्ष्य अधिनियम में जोड़ा गया, जिसके तहत यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अगर पत्नी ने शादी के सात साल के भीतर आत्महत्या की है तो उसके साथ क्रूरता की गई है। 

न्यायालय ने कहा कि धारा 113A को जोड़ने के पीछे की मंशा न केवल बढ़ती आत्महत्याओं या क्रूरता के कारण गंभीर चोटों से निपटना था, बल्कि संपत्ति या किसी अन्य प्रतिभूति की मांग करके पत्नी या उसके रिश्तेदारों पर दबाव डालने से निपटना भी था। न्यायालय ने कहा कि वर्तमान स्थिति में इस उद्देश्य या लक्ष्य पर विचार करना बहुत महत्वपूर्ण है, तथा न्यायालय ने कहा कि न्यायपालिका का उद्देश्य आपराधिक कानून (द्वितीय संशोधन अधिनियम) को अधिक प्रभावी और कुशल बनाना होना चाहिए। 

इसके अलावा, न्यायालय ने कहा कि ‘क्रूरता’ धारा 498A का मूल विषय है। न्यायालय ने क्रूरता की ब्लैक लॉ डिक्शनरी की परिभाषा का हवाला दिया, जिसमें क्रूरता को किसी भी जीवित प्राणी के साथ असम्मानजनक और अपमानजनक व्यवहार तथा मानसिक या शारीरिक पीड़ा पहुंचाने के रूप में परिभाषित किया गया है। क्रूरता में महिलाओं द्वारा झेली जाने वाली शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की यातनाएं शामिल हैं। न्यायालय ने कहा कि महिला को दिया गया मानसिक आघात, उसे वैवाहिक घर छोड़ने के लिए मजबूर करना और दुर्व्यवहार के डर से वापस न लौटना, धारा 498A के तहत ‘क्रूरता’ का एक अनिवार्य हिस्सा है। 

न्यायालय ने सही कहा कि पति द्वारा की गई हिंसा के कारण पत्नी को जो मानसिक, भावनात्मक या मनोवैज्ञानिक आघात झेलना पड़ेगा, वह वैवाहिक घर छोड़कर माता-पिता के घर में जाने के बाद भी बना रहेगा। न्यायालय ने आगे कहा कि माता-पिता के घर में क्रूरता के स्पष्ट कार्य के अभाव में भी, पति के साथ शारीरिक और मौखिक आदान-प्रदान से उत्पन्न मानसिक आघात, पीड़िता को उसके माता-पिता के घर में स्थानांतरित होने के बाद भी मानसिक रूप से प्रभावित करता रहेगा। न्यायालय ने घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के उद्देश्य का भी विश्लेषण किया। इस अधिनियम का उद्देश्य घरेलू हिंसा के पीड़ितों के लिए आपराधिक कानूनी उपाय के बजाय सिविल उपाय उपलब्ध कराना था, जैसा कि धारा 498A के तहत पहले से ही प्रावधान है। न्यायालय ने कहा कि धारा 498A और घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत घरेलू हिंसा की परिभाषा में महिला का मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक उत्पीड़न शामिल है। आगे यह भी कहा गया कि एक महिला की चुप्पी भी भावनात्मक संकट का कारण बन सकती है। 

अंत में, निष्कर्ष में, न्यायालय ने कहा कि घरेलू हिंसा की पीड़िता की मानसिक पीड़ा उसके माता-पिता के घर पर भी बनी रहती है, और ये पीड़ाएं उसके पति द्वारा वैवाहिक घर में उस पर की गई क्रूरता का परिणाम हैं। न्यायालय ने कहा कि वैवाहिक घर में किए गए कार्यों के परिणामस्वरूप माता-पिता के घर में पीड़िता को होने वाली मानसिक पीड़ा एक अलग अपराध है, जो धारा 498A के तहत क्रूरता के अंतर्गत आती है। न्यायालय ने यह भी कहा कि वैवाहिक घर में की गई घरेलू हिंसा के परिणामस्वरूप, सीआरपीसी की धारा 179 के तहत, माता-पिता के घर में भी अपराध घटित होता है। इसलिए, तीन न्यायाधीशों की पीठ ने ऐतिहासिक रूप से माना कि जिन स्थानों पर पत्नी वैवाहिक घर में उसके साथ हुई घरेलू हिंसा के कारण शरण लेती है, वहां की अदालतों को परिस्थितियों के आधार पर धारा 498A के तहत मामलों की सुनवाई करने का अधिकार होगा। इस प्रकार, इस मामले पर सभी मौजूदा संदेह दूर हो गए। 

रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का विश्लेषण

रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एक ऐसा मामला है जिसने धारा 498A से संबंधित अधिकार क्षेत्र संबंधी मुद्दों को स्पष्ट करके इतिहास रच दिया। इसने इस प्रश्न का उत्तर सकारात्मक रूप से दिया कि क्या पीड़ित महिला धारा 498A के तहत अपने माता-पिता के घर पर अदालत के समक्ष कानूनी कार्यवाही कर सकती है। इस मामले में न्यायालय ने घरेलू हिंसा अधिनियम और धारा 498A के तहत घरेलू हिंसा के अर्थ की व्याख्या करते हुए कहा कि इसमें किसी महिला को पहुंचाई गई मानसिक, शारीरिक या भावनात्मक क्षति या परेशानी भी शामिल है। इस मामले में न्यायालयों ने पूर्व उदाहरणों को लागू करने से पहले परिस्थितिजन्य और तथ्यात्मक विश्लेषण करने के महत्व को दर्शाया। 

न्यायालय ने यहां टिप्पणी की कि दोनों पीठों के न्यायाधीशों द्वारा यहां संदर्भित कोई भी मिसाल लागू नहीं होगी, क्योंकि वे सभी विशिष्ट तथ्यों से संबंधित हैं। न्यायालय ने सीआरपीसी की धारा 178 और 179 का भी विस्तार से विश्लेषण और व्याख्या की। यह मामला न केवल धारा 498A और घरेलू हिंसा अधिनियम के बीच संबंध का विश्लेषण करता है, बल्कि आपराधिक कानून (द्वितीय संशोधन), 1983 के उद्देश्य को भी स्पष्ट करता है। इस मामले में न्यायालय का विश्लेषण इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि इसमें कानूनी प्रावधानों के उद्देश्य और लक्ष्य को महत्व दिया गया है। यह मामला घरेलू हिंसा अधिनियम और धारा 498A के उद्देश्य का विस्तार से विश्लेषण करता है, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि मानसिक उत्पीड़न क्रूरता का एक हिस्सा है, और यह माता-पिता के घर में स्थानांतरित होने के बाद भी जारी रहता है। इस मामले में यह निर्धारित किया गया कि प्रत्येक क़ानून के उद्देश्य और कारण का कथन, क़ानून की व्याख्या करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसने यह दर्शाया कि किसी अधिनियम के उद्देश्य कथन न्यायिक व्याख्याओं को निर्देशित करने में क्या भूमिका निभाते हैं। 

निष्कर्ष

घरेलू हिंसा भारतीय समाज के सामने सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। धारा 498A और घरेलू हिंसा अधिनियम 2005, पीड़ित को क्रमशः आपराधिक और सिविल उपचार प्राप्त करने का अधिकार देते हैं। हालाँकि, रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में यह माना गया कि परिस्थितियों के आधार पर, वैवाहिक स्थान या आश्रय स्थल की अदालत से कानूनी उपचार मांगा जा सकता है। रूपाली देवी मामले में पीड़ितों की चिंताओं को दूर करने में घरेलू हिंसा रोकथाम कानूनों के उद्देश्य को विस्तार से समझाया गया है। रूपाली देवी मामले में न केवल आईपीसी के प्रावधानों का विश्लेषण किया गया है, बल्कि सीआरपीसी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों का भी विश्लेषण किया गया है। यह भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत पैतृक घर से संबंधित न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र पर मौजूदा भिन्न-भिन्न राय को सुलझाने के लिए उद्देश्य और कारण कथन को पढ़ने के एक अलग दृष्टिकोण का उपयोग करता है। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या घरेलू हिंसा का मामला माता-पिता के घर पर दर्ज किया जा सकता है?

हां, माता-पिता के घर पर भी कानूनी कार्यवाही की जा सकती है, लेकिन यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है। रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में भी यही निर्णय दिया गया था। 

क्या धारा 498A में मानसिक उत्पीड़न भी शामिल है?

हां, आईपीसी की धारा 498A, जो घरेलू हिंसा से संबंधित है, में पत्नी को पहुंचाई गई शारीरिक, मानसिक या मनोवैज्ञानिक चोट या नुकसान शामिल है। 

न्यायिक निर्णय लेने में किसी क़ानून के उद्देश्य का क्या महत्व है?

इनकी व्याख्या करने में क़ानून महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे न्यायाधीशों को निष्पक्ष निर्णय लेने में मार्गदर्शन करने में मदद करते हैं। रूपाली देवी मामले में भी यही देखा जा सकता है। 

संदर्भ

 

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