बनाए गए सबूतों के बारे में कानून के प्रावधान

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Indian Evidence Act

यह लेख उन्नत अनुबंध प्रारूपण, बातचीत और विवाद समाधान में डिप्लोमा कर रहे Rishbha Rishu द्वारा लिखा गया है और इसे Oishika Banerji (टीम लॉसीखो) द्वारा संपादित किया गया है।  यह लेख बनाए गए सबूत के बारे में बात करते हुए इससे जुड़े कानूनी प्रावधान के बारे के भी जानकारी प्रदान करता है। इस लेख का अनुवाद Revati Magaonkar द्वारा किया गया है।

परिचय 

शब्द ‘साक्ष्य’ जिसे अंग्रेजी में ‘एविडेंस’ कहा जाता है, इसे लैटिन शब्द ‘एविडेंट’ या ‘एविडेरे’  से लिया गया है, जिसका अर्थ स्पष्ट रूप से दिखाना, खोजना, पता लगाना या सिद्ध करना है। भारतीय सबूत अधिनियम, 1872 परिस्थितिजन्य (सरकमस्टेंशियल) तथ्यों, आंकड़ों, डेटा, संचार आदि से संबंधित है, जिनका उपयोग न्यायालय में न्यायाधीश के समक्ष रखने के लिए किया जाता है ताकि प्रभावी ढंग से न्याय दिया जा सके। बनाया गया (प्लांटेड) सबूत एक प्रकार का सबूत है जिसे बदल दिया गया है, या एक दृश्य में स्थापित किया गया है, ताकि यह अभियुक्त पक्ष से संबंधित प्रतीत हो। उदाहरण के लिए, अपराध स्थल पर रक्त या लार के नमूने लगाए जा सकते हैं, जिससे निर्दोष को गलत तरीके से दोषी ठहराया जा सकता है और दोषी को बरी किया जा सकता है। आदर्श रूप से, बनाए गए सबूत कई न्यायालयों में स्वीकार्य नहीं है। इस प्रकार के सबूत से जुड़े कई ऐसे पहलू हैं जिन्हें हम इस लेख के माध्यम से जान सकते हैं। 

बनाए हुए सबूत/प्लांटेड सबूत

प्रोफेसर मेलिसा हिल्पर्ट के अनुसार, “बनाए हुए सबूत एक वस्तु या सूचना है जिसे स्थानांतरित किया गया है, या एक जगह इस्तेमाल किया गया है, जिससे वह आरोपी पक्ष से संबंधित प्रतीत होता है, लेकिन यह अमेरिकी आपराधिक न्यायालयों सहित कई न्यायालयों में स्वीकार्य नहीं है।” बनाए गए सबूत को एक गंभीर अपराध माना जाता है जिसमें लॉस एंजिल्स में 6 महीने की आपराधिक सजा और 1,000 डॉलर का जुर्माना शामिल है। ऐसे कई कारक हैं जो बनाए गए सबूत के मूल कारण के रूप में कार्य करते हैं। इनमें से कुछ हैं:

  1. चश्मदीद गवाह द्वारा गलत पहचान
  2. ईर्ष्या/द्वेष आदि
  3. पुलिस का दुव्र्यवहार
  4. धमकी/हिंसा/दबाव/अपहरण आदि के तहत झूठा स्वीकारोक्ति 
  5.  बचाव पक्ष के वकील कमजोर होना
  6. अभियोजक (प्रॉसिक्यूटर) कदाचार
  7. राजनीतिक कारक
  8. गलत बयानी / कपटपूर्ण फोरेंसिक रिपोर्ट 
  9. आर्थिक स्थिति
  10. नशा

एक सर्वेक्षण के अनुसार, बनाए गए सबूत के मामले अब दैनिक आधार पर बढ़ रहे हैं क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका में, लगभग 75% डीएनए दोषमुक्ति (एक्सॉनरेशन) के मामले ऐसे सबूतों का परिणाम हैं। इससे समाज में कानून और व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा हुआ है, विश्वास में गिरावट के साथ-साथ मानवता भी कम हो गई है। भारत में बनाए गए सबूत के मामले दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं। एक और सर्वेक्षण से पता चला है कि 30% मामलों में, किसी व्यक्ति की सजा इस आधार पर तय की गई है कि वह या तो सामाजिक रूप से निम्न स्तर का है या आर्थिक रूप से स्वस्थ नहीं है या अनाथ, विकलांग आदि है, या उसे मार डालने का डर दिखाना ताकि झूठा आरोप लगाकर उस व्यक्ति को दोषी ठहराया जा सके। बनाए गए सबूत के माध्यम से व्यक्तिगत स्वतंत्रता का पूर्वाग्रह (प्रेजुडाइसिंग) करने का एक विशिष्ट उदाहरण संयुक्त राज्य अमेरिका में एक मामला है, जहां एक पुलिस अधिकारी द्वारा दुराचार किया गया था जिसके परिणामस्वरूप दो किशोरों की मौत हो गई। पुलिस अधिकारी ड्रग्स और हथियारों के सबूत बनाने में शामिल था, जिससे किशोरों को गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई। अभियोजक किशोरों का बचाव करने में सफल रहा, जिससे उनकी मृत्यु के लिए न्याय प्राप्त हुआ, क्योंकि न्यायालय बनाए गए सबूतों से अनभिज्ञ (इग्नोरेंट) था। लेकिन, क्या गलत बयानी और फर्जी फोरेंसिक रिपोर्ट धोखे से न्याय पाने के लिए जगह बना सकती है, यह प्रश्न अभी भी हमारे सामने खुला रहता है। 

लोग गलत सबूत कब बनाते हैं 

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि एक अपराधी निम्नलिखित में से किसी भी मामले में गलत सबूत बनाकर आपको फसा सकता है:

  1. यदि आप अपराध के स्थान पर हैं। 
  2. अगर वे इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि गलत तरीके से आपको मामले में फसाने  के बाद भी, वे आसानी से इससे दूर हो सकते हैं।
  3. वे इस तथ्य को भी मान सकते हैं कि आप उनके गलत कामों का फल भुगतने को तैयार हैं। 

ऐसे व्यक्तियों से जल्द से जल्द प्रतिकार (फाइट बैक) करना आपके लिए आवश्यक है, क्योंकि आमतौर पर लोग अपराध करने के तुरंत बाद ही उससे छुटकारा पाने के लिए सबूत बना देते हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति ने किसी संपत्ति की चोरी की है, तो वे आपके स्थान पर इसे छिपाने का प्रयास कर सकते हैं, यदि उपरोक्त आधारों का पालन करते हुए, इस प्रकार इसके लिए आप पर दोषारोपण करते हैं। चीजें इस तरह से भी हो सकती हैं कि वे आपको सच्चाई बताए बिना आपके परिसर में कुछ रखने के लिए कहें, जिससे आप बाद में परेशानी में पड़ जाएं। आपके लिए यह आवश्यक है कि आप इस तरह के लाभ लेने की अनुमति न दें और यदि संदेह उत्पन्न होता है, तो आपको इसकी सूचना देनी चाहिए। 

अगर पुलिस आपके खिलाफ आरोप दायर करती है तो वकील आपकी मदद कैसे कर सकता है? 

सीधे शब्दों में कहें, अगर जांच अधिकारी को आपके परिसर या सामान से आपके संबंध में कोई सबूत मिलता है, तो आप पर उस अपराध के लिए आरोप लगाया जाएगा जिसकी वह जांच कर रहा है। यह सलाह दी जाती है कि पुलिस अधिकारियों के प्रश्नों को हमेशा वकील की सहायता से हल करें, क्योंकि इससे हेराफेरी का आप पर कम प्रभाव पड़ेगा। पुलिस अधिकारियों से गलत संचार और अत्यधिक संचार आपके लिए चीजों को बिगाड़ सकता है क्योंकि अधिकारियों का प्राथमिक लक्ष्य मामले की जांच पूरी करना है। पुलिस अधिकारी को अपराध से जुड़े बिना आप पर अपराध का बोझ डालने से रोकने के लिए एक आपराधिक बचाव करना ही एक वकील की भूमिका है। वे यह भी सुनिश्चित करते हैं कि अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत किए गए सवालों के जवाब देने में आपका मार्गदर्शन किया जाए और आपको दोषी न ठहराया जाए। 

क्या होगा अगर गलत सबूत की वजह से आरोपी ठहराए गए व्यक्ति को मुकदमे से गुजरना पड़े 

यदि आपको किसी ऐसे अपराध के संबंध में मुकदमे से गुजरना है जो आपने किया नहीं है लेकिन आप पर आरोप लगाया गया है, तो एक आपराधिक बचाव वकील की आवश्यकता अपरिहार्य (इंडिस्पेंसिबल) है। यह हमेशा सलाह दी जाती है कि एक बचाव पक्ष के वकील को एक सार्वजनिक रक्षक के साथ भ्रमित न करें, क्योंकि बचाव पक्ष की भूमिका हमारे लिए स्पष्ट है, सार्वजनिक रक्षक आम तौर पर अत्यधिक बोझ के कारण उसके पास आने वाले प्रत्येक मामले को अलग-अलग मामले प्रदान करने में विफल रहता है। आपको एक वकील की आवश्यकता क्यों है इसका सामान्य उद्देश्य यह है कि आपके मौलिक अधिकारों को परीक्षण के दौरान भी संरक्षित करने की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, वकील आपको उन सवालों का सामना करने में मदद करता है जो अभियोजन पक्ष द्वारा लगाए गए सबूत के मामलों में आपके प्रति अधिक निर्देशित होते हैं। इसलिए, गलत तरीके से बनाए गए सबूत के मामले में अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए एक मजबूत बचाव, पेश करने के लिए एक वकील की आवश्यकता होती है। 

लगाए गए सबूत की न्यायिक अंतर्दृष्टि (ज्यूडिशियल इनसाइट)

जैसा कि हम बनाए गए सबूत की मूल बातें जान चुके हैं, अब घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनाए गए सबूत पर न्यायालय द्वारा उठाए गए कदम के बारे में जानना आवश्यक है। 

धापू देवी बनाम राजस्थान राज्य (2013)

इस मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय के समक्ष एक झूठी और मनगढ़ंत रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी, जिसका अभियोजक द्वारा पुन: विश्लेषण किया गया था और इसमें शामिल अधिकारियों द्वारा विस्तार से विश्लेषण करके मूल फोरेंसिक रिपोर्ट प्राप्त की गई थी। इस प्रकार, बनाए गए झूठे सबूत की मान्यता, निहित रूप से, न्यायालय द्वारा अस्वीकार कर दी गई थी जिससे अभियुक्तों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा हुई। 

भीमा-कोरेगांव अभियोजन मामला (2022)

भीमा-कोरेगांव हिंसा मामला जनवरी 2018 का है और तब से इस मामले को 45 महीने से अधिक हो गए हैं और फिर भी जांच जारी है। यह नोट करना आवश्यक है कि इस मामले में शामिल स्वतंत्र फोरेंसिक विशेषज्ञों ने वर्तमान मामले में बनाए जा रहे झूठे सबूतों पर चिंता जताई है और दिलचस्प बात यह है कि भारत में न्यायालय द्वारा इस पर ध्यान नहीं दिया गया है। यही कारण है कि इस मामले को हमारे चर्चित शीर्षक के तहत उल्लेख करने की आवश्यकता है। यह नोट करना आवश्यक है कि कठोर आपराधिक प्रक्रिया, जिसका भारत घर बना हुआ है, स्पष्ट रूप से अभियुक्त व्यक्तियों के न्यायालय के समक्ष नई चीजें पेश करने के अधिकार को प्रतिबंधित करती है। यह स्व-तथ्य (इप्सो फैक्टो) उन प्रमुख आधारों में से एक है जो झूठ में फंसाए गए अभियुक्तों को न्याय से वंचित करने के लिए बनाए गए झूठे सबूत के लिए जगह बनाता है। 

भारत में समन जारी करने के बाद अगर कोई सबसे कम कठोर परीक्षा है तो वह संज्ञान (कॉग्नाइजेंस) है, उसके बाद आरोप लगाया जाता है और आरोप लगने के बाद ही सुनवाई शुरू की जाती है। वह परीक्षण होता है जहां किसी मामले को उचित संदेह से परे साबित करने की आवश्यकता होती है। संज्ञान एवं समन जारी करने के स्तर पर अभियुक्त को सुनवाई का अवसर नहीं दिया जाता है। इस चल रहे मामले से जुड़े बहुत सारे सबूत डिजिटल हैं, और इसलिए इसके निर्माण की गुंजाइश हमेशा तेज गति से होती है। अभियुक्तों द्वारा यह भी दावा किया गया है कि दुर्भावनापूर्ण सॉफ़्टवेयर ने झूठे सबूत बनाने में भूमिका निभाई है, जिससे उन्हें अभियुक्तों के विरुद्ध स्थापित किया गया है। 

लिनेट व्हाइट मर्डर केस (1988)

1988 में लिनेट व्हाइट की हत्या कर दी गई थी और तीन लोगों को बनाए गए सबूतों के आधार पर गलत तरीके से दोषी ठहराया गया था। 2002 के बाद, इस मामले में उन्नत विज्ञान की मदद से, डीएनए परीक्षण फिर से किया गया था और युवक के चाचा जिसका डीएनए पहले मिला था, उसने पहले सबूत गढ़ने के अपने अपराध को कबूल कर लिया था और जिससे उसे 2003 में आजीवन कारावास की सजा दी गई थी।

निष्कर्ष 

जैसा कि हम इस लेख के अंत में आते हैं, हम कह सकते हैं कि बनाए गए सबूत ने समाज में न्याय वितरण प्रणाली को बाधित कर दिया है। पुलिस अधिकारियों या अभियोजकों के साथ-साथ निकट और प्रिय लोगों पर भरोसा करना भी मुश्किल है जो हमारे खिलाफ जवाब देना चाहते हो या सकते हैं। आरोपी को ऐसे वकील को नियुक्त करने का प्रयास करना चाहिए जो पेशेवर रूप से योग्य हो और कदाचार में शामिल न रहे हो, तभी झूठे बनाए गए सबूत से दोषी बताए गए व्यक्ति को न्याय मिल सकता है।

संदर्भ

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