प्लेटो का न्याय का सिद्धांत

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यह लेख ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी, देहरादून से बी.ए एल.एल.बी कर रहे छात्र  Monesh Mehndiratta द्वारा लिखा गया है। यह लेख प्लेटो द्वारा दिए गए न्याय के सिद्धांत की व्याख्या करता है। यह लेख आगे प्लेटो के सिद्धांत की आलोचना और सुकरात (सोक्रेटिक) के प्रभाव पर प्रकाश डालता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय 

प्लेटो, कुलीन (नोबेल) माता-पिता के पुत्र थे और 427 ईसा पूर्व में पैदा हुए थे। वह सुकरात से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने अपनी शिक्षा अपने गुरु सुकरात से प्राप्त की थी, और बाद में लोगों के जीवन के तरीकों और सामाजिक और राजनीतिक संरचनाओं (स्ट्रक्चर) का निरीक्षण (ऑब्जर्व) करने के लिए एक यात्रा पर चले गए थे। उनके द्वारा अकादमी या जिमनैजियम नामक संस्था की भी स्थापना की गई थी। उन्होंने सबसे महत्वपूर्ण विषयों पर विभिन्न सिद्धांत दिए और प्रसिद्ध “गणतंत्र” भी लिखा। न्याय की प्रकृति की व्याख्या करते हुए उन्होंने द्वंद्वात्मक पद्धति (डायलेक्टिक मैथड) का पालन किया था। इस पद्धति में, एक व्यक्ति एक विशेषज्ञ के साथ बात करता है और फिर उसके विचारों, धारणाओं और अवधारणाओं को समझने की कोशिश करता है ताकि वह किसी निष्कर्ष पर पहुंच सके और अपनी अवधारणाओं या सिद्धांतों को अपने तरीके से बना सके। प्लेटो लोगों से बातचीत करके और उनके विचारों को समझकर उनके जीवन के तौर-तरीकों को समझने के लिए एक यात्रा पर निकल पड़े थे। प्लेटो द्वारा दिए गए सिद्धांत को सामाजिक न्याय (सोशल जस्टिस) का सिद्धांत भी कहा जाता है क्योंकि प्लेटो ने बताया था कि राज्य पूरे समाज के लिए एक साधन था। प्लेटो ने अपना सिद्धांत देने से पहले अपने समय में प्रचलित न्याय के कुछ सिद्धांतों का मूल्यांकन (इवेलुएट) किया था। 

प्लेटो द्वारा सिद्धांतों का मूल्यांकन

प्लेटो ने न्याय पर कुछ सिद्धांतों का मूल्यांकन किया था जो उनके समय मे प्रचलित थे और प्रत्येक सिद्धांत में कुछ कमियां पाईं और बाद में उन पर अपने विचार प्रस्तुत किए थे। यह सिद्धांत कुछ इस प्रकार हैं:

1. परम्परावाद (ट्रेडिशनलिज्म)

यह सिद्धांत पॉलीमार्कस द्वारा दिया गया था। इस सिद्धांत के अनुसार न्याय का अर्थ है मनुष्य को वह देना जो उसके लिए अच्छा हो। सरल शब्दों में, इसका अर्थ है मित्रों को लाभ और शत्रुओं को बुराई। हालाँकि, प्लेटो ने इस सिद्धांत की इस आधार पर आलोचना की कि मित्र और शत्रु के बीच अंतर करना कठिन है, और इसलिए इस आधार पर हम लोगों के प्रति अपना आचरण तय नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, किसी के साथ वैसा ही व्यवहार करना जैसा वे हमारे साथ करते हैं, यह सिद्धांत कहता है। 

2. मूलसिद्धांत (रेडिकलिज्म)

इस सिद्धांत को सोफिस्टों द्वारा समर्थित किया गया था, और इस सिद्धांत के अनुसार, न्याय मजबूत लोगों के हित में है। व्यक्ति को अपनी क्षमता और शक्ति के अनुसार कार्य करना चाहिए और जो संभव है उसे प्राप्त करना चाहिए। इसका अर्थ यह भी था कि चूंकि राज्य सबसे मजबूत शक्ति है, राज्य द्वारा जो कुछ भी किया जाता है वह न्यायसंगत है, और इस प्रकार यह न्याय शासक की इच्छा है। जिसके पास शक्ति या अधिकार है, वह अपनी मर्जी से न्याय के कार्य कर सकता है। प्लेटो ने तर्क दिया कि:

  • यह सिद्धांत अलग-अलग समय में अलग-अलग शासकों के अलग-अलग व्यवहार और गतिविधियों की व्याख्या नहीं कर सकता है और न्याय की अवधारणा जगह-जगह बदलती रहती है। 
  • यह न्याय का कोई सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) विचार नहीं देता है। 
  • यह तर्कसंगत सिद्धांत नहीं है।  
  • यह उस व्यक्ति का मार्गदर्शन नहीं कर सकता है जो अपने तरीके से न्याय प्राप्त करना चाहता है। 

3. व्यवहारवाद (प्रागमैटिज्म)

यह सिद्धांत ग्लौकॉन ने दिया, इसके बाद हॉब्स और रूसो द्वारा सामाजिक अनुबंध का सिद्धांत दिया गया था। यह सिद्धांत कहता है कि न्याय भय की संतान है और परंपरा से पैदा हुआ है। मजबूत लोगों के हाथों अन्याय सहने वाले लोगों ने सामाजिक अनुबंध के परिणामस्वरूप निर्णय लिया कि वे कभी भी अन्याय नहीं करेंगे और न ही इसे बर्दाश्त करेंगे। उदाहरण के लिए, अपराधी को दंडित करने से उसके मन में भय पैदा होगा और इस प्रकार पीड़ित को न्याय मिलेगा। साथ ही, जिस पीड़ित को नुकसान हुआ है, वह शायद अपराध नहीं करेगा क्योंकि उसने खुद दर्द सहा है। हालाँकि, प्लेटो ने यह कहकर इस सिद्धांत का विरोध किया कि लोगों के बीच कोई भी अनुबंध मौन और निहित है और यदि कोई कानून अनिवार्य है, तो हर कोई इसे स्वीकार करता है क्योंकि यह बल द्वारा नहीं लगाया जाता है। साथ ही, लोग इस भ्रम में थे कि राज्य, शासक और आम जनता के बीच एक सामाजिक अनुबंध का परिणाम है।

4. तर्कबुद्धिवाद (रेशनलिज्म) 

न्याय, जैसा कि सुकरात ने देखा, एक कला है। शासक आम जनता के दोषों को दूर कर न्याय दिलाने का प्रयास करता है। चूँकि प्लेटो सुकरात और उनके विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे, इसलिए उन्होंने गणतंत्र के आदर्श को प्राप्त करने के लिए ‘राजा का शासन’ दिया। सुकरात ने जो कहने की कोशिश की वह यह है कि हर कोई न्याय नहीं कर सकता है। जो लोगों के हितों से निपटना जानता है और कल्याणकारी राज्य में उनके लाभ के लिए काम करता है, वह शासक हो सकता है। 

प्लेटो के न्याय का सिद्धांत

उनका काम, न्याय की अवधारणा, इसकी विशेषताओं और समाज में इसे कैसे वितरित किया जाता है, पर चर्चा करता है। उन्होंने अपने सिद्धांत को एक आदर्श राज्य की कल्पना के आधार पर विकसित किया, न कि किसी विशेष क्षेत्र के किसी वास्तविक सर्वेक्षण (सर्वे) पर, जिससे इसे और दार्शनिक (फिलोसॉफिकल) बना दिया। कई लोगों ने उनके न्याय के विचार की आलोचना की, लेकिन कुछ के लिए, यह इस संबंध में एक मशाल था। 

आत्मा की गुणवत्ता (क्वालिटी)

प्लेटो के अनुसार, एक समाज में विभिन्न वर्गों को वह दिया जाना चाहिए जो उन्हे देय है और किसी भी वर्ग को अन्य वर्गों पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उनके लिए न्याय आत्मा की गुणवत्ता है। यह किसी बाहरी स्रोत या शक्ति पर निर्भर नहीं है और मनुष्य की अंतरात्मा की आवाज है। उन्होंने कहा कि मानव व्यक्तित्व तीन प्रवृत्तियों (टेंडेंसी) का परिणाम है: ज्ञान, शारीरिक प्रवृत्ति और आध्यात्मिक (स्पिरिचुअल) प्रवृत्ति। आत्मा की प्रवृत्ति को अन्य प्रवृत्तियों पर शासन करना चाहिए। एक समाज में, उच्च आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले लोगों को राज्य पर शासन करना चाहिए और तर्क, न्याय, साहस और संयम के आदर्शों का पालन करना चाहिए। न्याय का अर्थ लोगों के बीच और लोगों और समाज के बीच सामंजस्य (हार्मनी) होना है। 

समाज का जैविक (ऑर्गेनिक) सिद्धांत 

प्लेटो न्याय को एक नैतिक अवधारणा मानते है और नैतिकता के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करने पर जोर देते है। समाज के जैविक सिद्धांत के आधार पर न्याय के उनके सिद्धांत के परिणामस्वरूप अधिनायकवाद (टोटलिटेरियनिज्म) हुआ जो एक व्यक्ति की सभी स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है। उनके आदर्श गणतंत्र में, अभिभावकों (गार्जियन) को शासन करने की शक्ति दी गई और लोग उनकी किसी भी तरह से आलोचना नहीं कर सकते थे। हालाँकि, यह अवधारणा लोकतंत्र में स्वतंत्रता के सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने सामाजिक न्याय की मदद से एक आदर्श समाज बनाने की कोशिश की, लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके क्योंकि इसने ऐसी प्रथाओं का निर्माण किया जो उनके विचार का विरोध करती थीं। 

अभिन्न दृष्टिकोण (इंटीग्रल एप्रोच)

प्लेटो ने एक अभिन्न दृष्टिकोण का विकल्प चुना जो एक व्यक्ति के व्यक्तित्व और राजनीतिक शरीर के सभी गुणों का विश्लेषण करता है। इसका उद्देश्य समाज के हर वर्ग के प्रत्येक व्यक्ति के लिए न्याय प्राप्त करना है। भारत में वर्ण व्यवस्था या किसी समाज में एक पदानुक्रम (हायरार्की) के बारे में बात करते हुए, उन्होंने कहा कि यह अवधारणा न्याय के उनके प्रारंभिक विचार के विपरीत थी।

न्याय की विशेषताएं

सामाजिक स्तरीकरण (सोशल स्ट्रेटिफिकेशन) 

  • प्लेटो का न्याय का सिद्धांत उनके द्वारा दी गई सामाजिक स्तरीकरण की विशेषता पर आधारित है। आत्मा के तत्वों के आधार पर उन्होंने तीन सामाजिक स्तरीकरण दिए:
    • अभिभावक 
    • सैनिक
    • सामान्य लोग जैसे कारीगर, किसान आदि। 
  • न्याय का अर्थ, प्रत्येक सामाजिक वर्ग के लोगों के द्वारा दूसरे लोगों के कर्तव्य में हस्तक्षेप किए बिना अपने सभी कर्तव्यों को पूरा करना था। 

सहज प्रवृत्ति (इन्नेट टेंडेंसी)

  • प्लेटो के अनुसार न्याय सहज होता है।
  • यह आत्मा की गुणवत्ता और किसी की अंतरात्मा की आवाज है। 

कार्यात्मक विशेषज्ञता (फंक्शनल स्पेशलाइजेशन)

  • उनके द्वारा समाज को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया था:
    • संज्ञानात्मक (कॉग्निटिव) का प्रतिनिधित्व अभिभावकों द्वारा किया जाता है
    • क्रियात्मक (कॉनेटिव) का प्रतिनिधित्व सैनिकों द्वारा किया जाता है। 
    • प्रभावशाली जिसका प्रतिनिधित्व आम जनता द्वारा किया जाता है। 

दार्शनिक (फिलोसॉफर) राजा  

  • उनका मानना ​​था कि न्याय तभी संभव हो सकता है जब राज्य पर एक दार्शनिक का शासन हो। 
  • वह दार्शनिकों को सबसे बुद्धिमान मानते थे। 

साम्यवाद (कम्युनिज्म)

  • उन्होंने अभिभावकों और सैनिकों के बीच महिलाओं और संपत्ति के साम्यवाद का सुझाव दिया था। 
  • ऐसा उन्हें किसी भी तरह की भावनाओं, चिंताओं और ईर्ष्या से दूर रखने के लिए किया गया था। 

सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) 

  • उन्होंने न्याय के सिद्धांत को सार्वभौमिक माना था। 
  • यह किसी भी स्थान या समाज में किसी भी समय सभी के लिए समान है। 

नैतिक अवधारणा 

  • न्याय की उनकी अवधारणा न्यायिक नहीं बल्कि नैतिक है। 
  • न्याय प्राप्त करते समय नैतिक दायित्वों को पूरा करना अनिवार्य है न कि न्यायिक कर्तव्यों को पूरा करना। 

महिलाओं की स्वतंत्रता और न्याय के लिए शिक्षा  

  • उन्होंने कहा कि न्याय प्राप्त करने के लिए महिलाओं को स्वतंत्रता प्रदान करना आवश्यक है। 
  • उन्हें पुरुषों के रूप में भाग लेने का समान अधिकार दिया जाना चाहिए। 
  • उन्होंने लोगों को न्याय के महत्व को समझने में मदद करने के लिए शिक्षा की एक उन्नत योजना का सुझाव दिया था। 

न्याय के प्रकार 

प्लेटो के द्वारा न्याय को 2 प्रकारों में वर्गीकृत किया गया था, जो एक दूसरे से काफी हद तक संबंधित थे। 

  • व्यक्तिगत न्याय 
  • सामाजिक न्याय 

व्यक्तिगत न्याय 

  • उनके अनुसार न्याय वह भावना है जो व्यक्ति को उसके कर्तव्यों को पूरा करने में मदद करती है। 
  • मानव मन में तीन तत्व होते हैं:
    • औवित्य (रीजन)
    • आत्मा
    • भूख 
  • बुद्धि औवित्य का एक गुण है; आत्मा का साहस; और संयम, जो भूख का है। 
  • न्याय तीनों के बीच सामंजस्य बनाए रखता है। 
  • उनका मानना ​​था कि मानव मन के प्रत्येक भाग को संतुष्ट करना चाहिए ताकि प्रत्येक भाग में सामंजस्य हो सके। 
  • जो लोग सामंजस्यपूर्ण हैं वे एक सामंजस्यपूर्ण और शांतिपूर्ण राज्य बना सकते हैं। 
  • उनके अनुसार, जब कोई व्यक्ति अपने गुण, आत्मा और भूख के अनुसार अपनी सभी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हो जाता है, तो वह संतुष्ट होता है। उदाहरण के लिए, समकालीन (कंटेंपरेरी) दुनिया में एक व्यक्ति की बुनियादी जरूरतें अच्छी तनख्वाह के साथ एक स्थिर नौकरी, एक घर और एक परिवार का मालिक होना है। यह सब कुछ होने पर वह संतुष्ट होगा और एक सभ्य जीवन जीएगा। 

सामाजिक न्याय

  • यह व्यक्तिगत न्याय पर निर्भर करता है। जिस समाज में व्यक्तिगत न्याय होता है वह सामाजिक न्याय प्राप्त कर सकता है। 
  • जैसे की एक व्यक्ति में तीन तत्वों होते है उसी तरह, समाज में भी तीन प्रकार के पुरुष होते हैं:
    • तर्कसंगत (रेशनल): इन पुरुषों के मजबूत औवित्य या तर्क हैं। 
    • आध्यात्मिक: ये आत्मा में मजबूत और सक्रिय (एक्टिव) हैं। 
    • भावुक: यह न तो औवित्य में मजबूत और न ही आत्मा में मजबूत होते है और यह अन्य दो द्वारा नियंत्रित होते हैं। 
  • उन्होंने समाज में लोगों को वर्गीकृत किया और तीन गुना कार्यात्मक सामाजिक स्तरीकरण दिया। 
    • दार्शनिक 
    • सैनिक 
    • कारीगर, किसान आदि। 
  • उनका मानना ​​​​था कि मनुष्य को एक ऐसा कार्य करना करना चाहिए जो उसके लिए सबसे उपयुक्त हो। 
  • जहां एक समाज में, प्रत्येक वर्ग के लोग दूसरे वर्ग के लोगों को परेशान और उनके कामों में हस्तक्षेप किए बिना ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, उन्हें ही सामाजिक न्याय प्राप्त होता है। 
  • उन्होंने सिफारिश की कि दार्शनिकों को राज्य पर शासन करना चाहिए क्योंकि वे सबसे बुद्धिमान हैं और ज्ञान एक शासक का गुण है और न्याय बुद्धिमानों का गुण है। 
  • वह व्यक्तियों को एक जटिल इकाई (यूनिट) नहीं बल्कि एक समग्र (होल) इकाई मानते थे। उसका उद्देश्य व्यक्तिगत सुख नहीं होना चाहिए बल्कि संतुष्टि के महत्व का एहसास होना चाहिए जिसके परिणामस्वरूप उसके सभी अंगों में सामंजस्य स्थापित हो सकता है। 
  • इस सिद्धांत को भारत में जाति व्यवस्था से आसानी से जोड़ा जा सकता है। पहले के समय में, भारत में लोग मानते थे कि ब्राह्मण का पुत्र ब्राह्मण होना चाहिए और क्षत्रिय के पुत्र को केवल देश के लिए लड़ना चाहिए। इसलिए, यदि इसका विश्लेषण किया जाए तो यह सिद्धांत कहता है कि यदि विभिन्न जातियों के लोग किसी अन्य जाति के व्यक्ति के काम में हस्तक्षेप किए बिना अपना कार्य करते हैं, तो सामाजिक न्याय प्राप्त होता है।

प्लेटो के न्याय के सिद्धांत की आलोचना

  • प्लेटो के द्वारा, समाज में लोगों को प्राप्त अधिकारों के बजाय उनके कर्तव्यों पर अधिक जोर दिया गया है। अधिकार समाज को एकजुट रखते हैं और लोगों के बीच एकजुटता लाते हैं। इस प्रकार, एक राज्य में अधिकार और कर्तव्य दोनों महत्वपूर्ण और परस्पर रूप से जुड़े हुए हैं। 
  • उन्होंने दार्शनिक-राजा को बहुत सारी शक्तियाँ दी लेकिन वे इस सिद्धांत को महसूस करने में असफल रहे, कि पूर्ण शक्ति एक व्यक्ति को पूर्ण रूप से भ्रष्ट करती है। इस प्रकार, यदि पूर्ण शक्तियाँ दी जाएँ तो सबसे बुद्धिमान राजा भी भ्रष्ट हो सकता है। 
  • उन्होंने व्यक्तित्व की प्रवृत्तियों के आधार पर समाज को विभाजित किया है। लेकिन आनुवंशिकता (हेरेडिटी) केवल व्यक्तित्व लक्षणों के लिए जिम्मेदार नहीं है। जिसके परिणामस्वरूप, उन्होंने समाज में ऐसी शिक्षा प्रणाली की नींव रखी है जो एकतरफा व्यक्तित्व विकसित करती है और पर्यावरण को कोई भी महत्व नहीं देती है जो कि एक व्यक्ति के व्यक्तित्व के लिए जिम्मेदार एक और महत्वपूर्ण विशेषता है। 
  • प्लेटो द्वारा दिया गया सिद्धांत फासीवाद (फेसिज्म) की नींव रखता है जिसके अनुसार, प्रत्येक नागरिक से यह उम्मीद रखी जाती है की वह अपने राज्य के प्रति वफादारी दिखाएगा। दूसरी ओर, आधुनिक विचारकों के द्वारा दिया गया सुझाव यह है कि राज्य को पूर्ण शक्तियाँ नहीं दी जानी चाहिए जो किसी समाज में लोगों के अधिकारों और स्वतंत्रता पर भी अंकुश लगा सकती हैं। 
  • वह अभिभावकों को कानून से ऊपर मानते थे। प्लेटो जिसे न्याय कहते है, वह राज्य में अभिभावकों का आदेश है। उनका सिद्धांत कानून के लिए उचित आधार प्रदान नहीं करता है और न्याय व्यक्तिगत इच्छा और विवेक पर निर्भर नहीं हो सकता है। उन्होंने नैतिक और कानूनी दायित्वों के बीच अंतर करने की भी उपेक्षा की थी। 
  • न्याय की उनकी अवधारणा निष्क्रिय (पैसिव) है और वह न्यायिक विनियमन (रेगुलेशन) का आधार नहीं बन सकती है। यदि इच्छा और कर्तव्य या कर्तव्यों और अधिकारों के बीच कोई विवाद होते है तो वह इस संबंध में कोई समाधान नहीं प्रदान करते है।  
  • उन्होंने राज्य की एकता पर बहुत अधिक जोर दिया है और उन्होंने इस प्रकार, महिलाओं के साम्यवाद और विवाह और परिवार के उन्मूलन (एबोलीशन) के संबंध में बेतुके विचार दिए है। 

प्लेटो पर सुकरात का प्रभाव 

सुकरात प्लेटो के शिक्षक और गुरु थे। प्लेटो के दिमाग से उनकी छवि कभी फीकी नहीं पड़ी है और वे अपने गुरु से अत्यधिक प्रभावित थे, इतना अधिक कि यह उनके काम से भी परिलक्षित (रिफ्लेक्ट) होता है। सुकरात के विचारों को प्लेटो के विचारों और उनकी सोच से आसानी से निर्धारित किया जा सकता है। 

गुण ही ज्ञान है

सुकरात ने गुण और ज्ञान को एक दूसरे का पर्याय माना था। उनके अनुसार, यदि ज्ञान का किसी व्यक्ति के आचरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, तो वह बेकार और अर्थहीन है। सुकरात के विचारों पर प्लेटो ने गणतंत्र में एक दार्शनिक-राजा की अपनी अवधारणा विकसित की थी। इस प्रकार, प्लेटो और सुकरात दोनों नैतिकता और राजनीति के बीच अंतर नहीं करते हैं। 

वास्तविकता का सिद्धांत 

सुकरात का मानना ​​​​था कि किसी चीज का गुण उसके अस्तित्व में नहीं बल्कि उसकी पूर्ति में होता है। इस आधार पर प्लेटो ने यह विचार दिया कि विचारों की दुनिया चीजों की दुनिया से ज्यादा वास्तविक होती है। 

ज्ञान का सिद्धांत 

सुकरात के द्वारा ज्ञान को 2 प्रकारों में विभाजित किया गया था: आकस्मिक (कैजुअल) और सत्य ज्ञान। बाद वाला ज्ञान यानी की सत्य ज्ञान, आत्म-ज्ञान है और एक व्यक्ति के आचरण और चरित्र से संबंधित है और एक व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। 

दार्शनिक विधि 

सुकरात ने दार्शनिक चर्चा के लिए प्रश्न-उत्तर के तरीके का आविष्कार किया था, जिसके बाद प्लेटो ने अपने संवाद तैयार किए थे। इस तरीके से, एक व्यक्ति विचारकों से प्रश्न पूछता है और फिर उनकी विचार प्रक्रियाओं का विश्लेषण करता है, और फिर रचनात्मक आलोचना की मदद से किसी निष्कर्ष पर पहुंचता है। 

सरकार की कला 

सुकरात शासक को दार्शनिक मानते थे। हालाँकि, यह सोफिस्ट के विश्वास से अलग था। 

  • सोफिस्ट के अनुसार, दुनिया यांत्रिक (मैकेनिकल) है, लेकिन सुकरात के लिए यह उद्देश्यपूर्ण है। 
  • सोफिस्ट मानते थे कि अच्छाई एक कला है और इसे विशेष ज्ञान से प्राप्त किया जा सकता है लेकिन सुकरात ने इसे मनुष्य की सहज शक्ति माना था। 
  • सुकरात द्वारा प्रस्तुत किया गया ज्ञान का सिद्धांत, सोफिस्ट के दिए गए सिद्धांत से बहुत अलग था। 
  • सोफिस्ट मानते थे कि सामाजिक नियम प्राकृतिक कानून पर आधारित नहीं हैं और मनुष्य द्वारा बनाया गया है, जबकि सुकरात ने पारंपरिक कानूनों को मनुष्य से ऊपर रखा था। 

सुकरात के इन विचारों ने प्लेटो को इतना प्रभावित किया कि उनका काम पूरी तरह से अपने गुरु सुकरात की सोच और शिक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमता है। 

प्लेटो के न्याय के सिद्धांत का विश्लेषण

प्लेटो पहले एक दार्शनिक और फिर एक राजनीतिक विचारक थे। उनका राजनीतिक दर्शन ज्यादातर सामाजिक दर्शन पर आधारित है। हालांकि, वह राज्य में कानून के लिए कोई उचित और न्यायसंगत आधार प्रदान नहीं करते है। वह मुख्य रूप से अपने सिद्धांत को वैधता के बजाय नैतिकता से जोड़ते है। उनका मानना ​​​​था कि न्याय तभी प्राप्त किया जा सकता है जब विभिन्न सामाजिक तबके (स्ट्रेटा) के सभी लोग समाज में अपनी भूमिकाओं और कर्तव्यों को पूरा करें। हालाँकि, प्लेटो ने जिस समाज के बारे में बात की वह कानूनी नहीं है क्योंकि यह व्यक्तियों के कानूनी अधिकारों पर आधारित नहीं है। उनके अनुसार न्याय मनुष्य को उसके कर्त्तव्यों की पूर्ति में मार्गदर्शन करता है। यह अवधारणा व्यक्ति के आत्म-नियंत्रण से बहुत निकटता से संबंधित है। 

यह सिद्धांत वर्तमान समाज में अपना अस्तित्व नहीं पाता है। समाज आज कानूनी अधिकारों और कर्तव्यों से प्रेरित है। लोग अपनी शक्ति, अधिकार और कर्तव्यों से अवगत हैं। ज्यादातर देश, सरकार की लोकतांत्रिक प्रणाली का पालन करते हैं जहां सरकार बनाने वाले प्रतिनिधियों को चुनने के लिए वास्तविक शक्ति नागरिकों के पास निहित होती है। प्लेटो के शब्दों में राष्ट्रपति या शासक को पूर्ण शक्ति नहीं दी जाती है और न ही वह दर्शनशास्त्र के विशेषज्ञ है। प्रत्येक देश मे, समाज में जाँच और संतुलन बनाए रखने की एक प्रणाली है जो उस देश के संविधान द्वारा दी गई है, जो उसका सर्वोच्च कानून है। प्लेटो द्वारा दिया गया न्याय का विचार, वर्तमान समाज में देखे जाने वाले न्याय के विचार से बहुत अलग है। 

प्रत्येक क्षेत्र के लिए कानून हैं और जो कोई कानून द्वारा निषिद्ध कुछ कार्य करके अपराध करता है उसे राज्य द्वारा कानून के अनुसार दंडित किया जाता है और कानूनों और संविधान में प्रक्रिया दी गई है। एक राज्य के नागरिक मौलिक अधिकारों का आनंद लेते हैं जो पूर्ण नहीं हैं और उचित प्रतिबंध के साथ प्रदान किया जाते हैं। प्लेटो द्वारा दिए गए लोगों के वर्गीकरण के विपरीत, व्यक्तित्व लक्षणों या प्रवृत्तियों के आधार पर समाज में ऐसा कोई वर्गीकरण नहीं है। हर व्यक्ति कोई भी काम कर सकता है या कोई भी पेशा चुन सकता है। इस प्रकार, प्लेटो द्वारा दिया गया न्याय का विचार और अवधारणा अब समाज में मौजूद नहीं है और यह अप्रचलित हो गया है। 

निष्कर्ष 

यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्लेटो अपने शिक्षक सुकरात से अत्यधिक प्रभावित थे, जो उनके काम में साफ दिखाई देता है। उन्होंने विभिन्न विषयों पर विभिन्न सिद्धांत दिए। न्याय का उनका सिद्धांत एक आदर्श निकाय राजनीतिक या राज्य की अपनी कल्पना पर आधारित है, जो वास्तविक दुनिया में काल्पनिक और कठिन है। इस प्रकार, जब आज के समाज के साथ तुलना की जाती है, तो न्याय का उनका विचार प्रबल नहीं होता है। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफ.ए.क्यू.)

प्लेटो के प्रसिद्ध कार्य क्या है ?

गणतंत्र प्लेटो का सबसे प्रसिद्ध कार्य है। उनकी इस पुस्तक का विचार, उनके गुरु सुकरात के सिद्धांत और शिक्षा पर आधारित है, कि गुण ही ज्ञान है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्लेटो अपने गुरु से अत्यधिक प्रभावित थे और उनकी शिक्षाओं का पालन करते थे। उनके नाम के तहत 35 संवाद और 13 पत्र हैं जो ज्यादातर दार्शनिक हैं। प्लेटो के सभी लेखन इंगित करते हैं कि वह एक दार्शनिक और द्वंद्ववादी (डायलेक्टीशियन) थे और उन्होंने काव्यात्मक (पोएटिक) कल्पना और गहरी भावनाओं के माध्यम से अमूर्त (एब्सट्रैक्ट) विचार के साथ-साथ तार्किक (लॉजिकल) विश्लेषण की शक्ति का प्रदर्शन किया है। 

प्लेटो ने न्याय को किन प्रकारों में विभाजित किया है?

उन्होंने न्याय को 2 प्रकारों में विभाजित किया है:

  • व्यक्तिगत न्याय – उनके अनुसार, जब कोई व्यक्ति अपने गुण, आत्मा और भूख के अनुसार अपनी सभी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होता है, तो वह संतुष्ट होता है। उदाहरण के लिए, समकालीन दुनिया में एक व्यक्ति की बुनियादी जरूरतों के लिए अच्छे वेतन के साथ एक स्थिर नौकरी, एक घर और एक परिवार है, तो वह संतुष्ट होता है और एक सभ्य जीवन जीता है। 
  • सामाजिक न्याय – उनका मानना ​​था कि मनुष्य को वह कार्य करना चाहिए जो उसके लिए सबसे उपयुक्त हो। जहां एक समाज में, प्रत्येक वर्ग या वर्गों के लोग या समाज में जो भी विभाजन होता है, उसके लोग दूसरे वर्ग के लोगों को परेशान और उनके कार्यों मे हस्तक्षेप किए बिना ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करते है, तो सामाजिक न्याय प्राप्त होता है। 

प्लेटो द्वारा समाज में लोगों का वर्गीकरण क्या है?

उन्होंने समाज में लोगों को वर्गीकृत किया और तीन कार्यात्मक सामाजिक स्तरीकरण दिए, जो इस प्रकार हैं: 

  • दार्शनिक – ये ज्ञान के विशेषज्ञ होते हैं और आसानी से राज्य पर शासन कर सकते हैं। प्लेटो के अनुसार ये सबसे बुद्धिमान हैं।  
  • सैनिक – ये शारीरिक रूप से मजबूत और भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से स्थिर होते हैं और इन्हें देश की रक्षा करनी चाहिए। 
  • कारीगर, किसान, आदि – उपरोक्त दो श्रेणियों में वर्गीकृत करने के बाद छोड़े गए लोगों को इस श्रेणी में रखा जाता है और इनके पास कला, संस्कृति, खेती और कई अन्य गतिविधियों से संबंधित प्रतिभा होती है। 

मानव मन के 3 तत्व कौन से हैं?

  • औवित्य – इसका अर्थ है मजबूत तर्क शक्ति होना और इसे प्लेटो के द्वारा तर्कसंगत कहा गया है।
  • आत्मा – इसका मतलब है कि जिन लोगों में आत्मा तत्व के रूप में है वे आध्यात्मिक रूप से मजबूत होते हैं और इस प्रकार, सक्रिय होते हैं। 
  • भूख – अधिकांश लोग न तो मानसिक रूप से और न ही शारीरिक रूप से मजबूत होते हैं, लेकिन उनमें जुनून और प्रतिभा होती है। प्लेटो के अनुसार, ऐसे लोगों को अन्य दो श्रेणियों के लोगों के द्वारा नियंत्रित किया जाता है। 

संदर्भ 

 

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