के. एम. नानावती बनाम महाराष्ट्र राज्य: मामले  का विश्लेषण

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Indian Penal Code

यह लेख Nimisha Dublish द्वारा लिखा गया था। यह लेख के. एम. नानावती बनाम महाराष्ट्र राज्य के बेहद कुख्यात मामले का विश्लेषण है। इस मामले ने पहले से ही न्यायपालिका के साथ-साथ हमारे फिल्म उद्योग को भी पाठकों को इसकी पेचीदगियां (इंट्रीकेसीज) दिखाने के लिए प्रेरित किया है और बताया है कि कैसे यह मामला भावनाओं, न्याय, मीडिया भूमिकाओं और वास्तविकता का एक दिलचस्प मिश्रण बन गया। इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

इस लेख में हम नौसेना अधिकारी के.एम. नानावती के कुख्यात मामले की जटिलताओं पर चर्चा करेंगे। यह मामला इतना मशहूर हुआ कि इस पर कई टीवी सीरीज और फिल्में बनीं। प्रत्येक टीवी सीरीज और फिल्म प्रत्येक पक्ष की कहानी दर्शाती है। हम मामले की जटिलताओं और भारतीय समाज पर इसके प्रभाव का पता लगाने जा रहे हैं। हम मामले में प्रस्तुत पक्षों के सम्मोहक (कंपेलिंग) आख्यानों (नैरेटिव्स) और उन बहसों से गुजरेंगे जो गंभीर और अचानक उकसावे के संबंध में पूरे देश और न्यायिक प्रणाली में थीं। इस मामले की कहानी आज भी पीढ़ियों तक गूंजती रहती है कि एक मामले में सच्चाई, जुनून और न्याय कैसे टकराते हैं। इस मामले को अभूतपूर्व (अनप्रेसेडेंटेड) मीडिया कवरेज मिला था। यह भारत में जूरी ट्रायल के रूप में सुना जाने वाला आखिरी मामला भी माना जाता है क्योंकि सरकार ने इस मामले के परिणामस्वरूप जूरी प्रणाली को समाप्त कर दिया था। 

के. एम. नानावती बनाम महाराष्ट्र राज्य के तथ्य

कावास मानेकशॉ नानावती (1925-2003) एक पारसी और भारतीय नौसेना में कमांडर थे। वह भारतीय नौसेना के द्वितीय कमान अधिकारी थे और मैसूर में तैनात थे। वह अपनी पत्नी सिल्विया और अपने दो बेटों और एक बेटी के साथ बंबई में बस गए। सिल्विया इंग्लैंड की नागरिक थी।

नानावती की नौकरी की प्रकृति के कारण, उन्हें अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़कर बंबई से विभिन्न हिस्सों की यात्रा करनी पड़ी। बंबई में, नानावती का परिचय प्रेम भगवानदास आहूजा और उनकी बहन मिमी आहूजा से एक नौसैनिक जहाज की खरीद से संबंधित एक खेप (कन्सिग्नमेंट) के कारण हुआ था। समय बीतने के साथ जब नानावती बॉम्बे से दूर रहते थे, सिल्विया और प्रेम आहूजा के बीच रिश्ते मजबूत होते गए और वे व्यभिचारी (एडल्टरस) रिश्ते में बंध गए। 

एक सामान्य दिन, जब नानावती बंबई लौटे, तो उन्होंने अपनी पत्नी के करीब जाने की कोशिश की। मगर, सिल्विया ने उसके करीब जाने से इनकार कर दिया और अभद्र (रुड) व्यवहार करना शुरू कर दिया। नानावती ने पहले तो उसे जाने दिया। परंतु, जब उसने देखा कि यह एक (प्रतिरूप) पैटर्न बन गया है और सिल्विया ने दूर रखने का व्यवहार करना जारी रखा है, तो वह भ्रमित (कन्फ्यूज) हो गया और उसके प्रति उसकी वफादारी पर संदेह करने लगा। 

29 अप्रैल, 1959 को एक दिन नानावती ने इस चुप्पी को तोड़ा और सिल्विया से उसके अजीब व्यवहार के बारे में सवाल किया। तब उसने प्रेम के साथ अपने रिश्ते के बारे में सब कुछ कबूल कर लिया। यह सुनने के बाद, वह अपने परिवार को फिल्म टॉम थंब के लिए मेट्रो सिनेमा ले गए, जहां उन्होंने उन्हें ले जाने का वादा किया था। फिर वह प्रेम का सामना करने के लिए आगे बढ़ा। नानावती नौसैनिक अड्डे पर गए और झूठे बहाने से अपनी बंदूक ले ली। उन्होंने छह गोलियों के साथ पिस्तौल भी ली फिर उन्होंने औपचारिकताएं पूरी कीं और इसके बाद प्रेम आहूजा के कार्यालय की ओर जाने का फैसला किया। उसने अधिकारियों को सूचित किया कि उसे रात में अकेले अहमदनगर जाना है और सुरक्षा उद्देश्यों के लिए उसे पिस्तौल की आवश्यकता होगी, लेकिन उसने अपने असली इरादे का खुलासा नहीं किया। उसने दोनों रिवॉल्वर और छह कारतूस एक भूरे रंग के लिफाफे में रख दिए।

आधिकारिक कर्तव्यों के पूरा होने के बाद, वह आहूजा के कार्यालय की ओर चले गए। वहां उसे न पाकर वह उसके घर गया और उससे नोकझोंक हुई। नानावती ने उनको सिल्विया से शादी करने और उनके बच्चों को स्वीकार करने के लिए कहा। जिस पर प्रेम आहूजा ने नकारात्मक उत्तर दिया, फिर तीन गोलियां चलाई गईं और वह मृत पाए गए। नानावती उस समय भावनात्मक रूप से कमजोर थे और उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के अलावा कुछ नहीं सोचा। उन्हें उम्मीद थी कि प्रेम आहूजा सिल्विया से शादी करने और उनके बच्चों की कस्टडी लेने के लिए सहमत हो सकते हैं, लेकिन जब नानावती ने उनसे सवाल किया, तो उन्होंने कथित तौर पर कहा,  “क्या मुझे हर उस महिला से शादी करनी चाहिए जिसके साथ मैं सोता हूं?” इस पर नानावती भड़क गए और आहूजा के इस बयान ने नानावती को भड़का दिया। यह जानने पर कि प्रेम आहूजा सिल्विया का सम्मान नहीं करता है और उसकी बिल्कुल भी परवाह नहीं करता है, नानावती प्रेम आहूजा से बहस करने लगा। नतीजा यह हुआ कि उनमें हाथापाई हो गई और अंततः गोलियां चल गईं। 

घटना के बाद, नानावती ने पुलिस उपायुक्त के सामने आत्मसमर्पण (सरेंडर) कर दिया। जूरी ने 8:1 का फैसला देते हुए उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी नहीं ठहराया। यह विशेष धारा निर्धारित करती है कि जो कोई भी हत्या करेगा उसे या तो मृत्युदंड, आजीवन कारावास, या जुर्माने से दंडित किया जाएगा । उन्हें जूरी द्वारा 8 वोटों का बहुमत मिला और केवल 1 वोट जूरी के बहुमत के फैसले के खिलाफ था। हालाँकि, न्यायाधीश जूरी के फैसले से संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने आपराधिक प्रक्रिया संहिता, सीआरपीसी की धारा 307 के तहत मामले को बॉम्बे उच्च न्यायालय में भेज दिया। धारा 307 बताती है कि किसी मामले की शुरुआत और निर्णय जारी होने के बीच किसी भी बिंदु पर, न्यायालय किसी भी व्यक्ति को क्षमा (पार्डन) प्रदान कर सकता है जिसके बारे में माना जाता है कि वह विचाराधीन अपराध में प्रत्यक्ष (डायरेक्टली) या अप्रत्यक्ष (इंडिरेक्टली) रूप से शामिल था। 

मामले की समीक्षा (रिवायविंग) करने पर, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने जूरी के फैसले को पलट दिया और नानावती को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत उक्त अपराध के लिए दोषी ठहराया गया। इसके बाद, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक अपील दायर की गई।

के एम नानावती बनाम महाराष्ट्र राज्य में दोनों पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की दलीलें

नानावती के वकील ने अपना तर्क रखा कि नानावती ने सिल्विया द्वारा दिए गए कबूलनामे (कन्फेशन) को सुनने के बाद खुद को मारना चाहा। हालाँकि, सिल्विया उसे शांत करने में कामयाब रही। इसके बाद नानावती ने जानना चाहा कि प्रेम आहूजा उनसे शादी करने के लिए तैयार हैं या नहीं। उसने अपनी पत्नी और बच्चों को मूवी थियेटर में छोड़ा और अपनी कार में जहाज पर चला गया। 

जहाज़ प्राधिकारी को सूचित करने के बाद कि उसे छह गोलियों के साथ अपनी रिवॉल्वर चाहिए, वह चला गया। उन्होंने कारण बताया कि उन्हें रात में अहमदनगर अकेले जाना था और अपने असली इरादे का खुलासा नहीं किया। उसने दोनों रिवॉल्वर और छह कारतूस एक भूरे रंग के लिफाफे में रख दिए।

नानावती आहूजा के ऑफिस गए, लेकिन वह वहां नहीं थे, इसलिए वह आहूजा के फ्लैट पर गए। वहां पहुंचने पर, आहूजा के नौकर ने दरवाजा खोल दिया और नानावती सीधे आहूजा के शयनकक्ष (बेडरूम) की ओर चल दिए। उसने अपने पीछे वाला दरवाजा बंद कर लिया और एक लिफाफा भी ले गया जिसमें एक रिवॉल्वर और छह गोलियां थीं। 

जब नानावती ने आहूजा को शयनकक्ष के अंदर देखा, तो उन्होंने उसे गंदा सूअर करार दिया और पूछा कि क्या वह सिल्विया से शादी करेगा और बच्चों की देखभाल करेगा। आहूजा ने भड़कते हुए कहा, “क्या मुझे हर उस महिला से शादी करनी चाहिए जिसके साथ मैं सोता हूं?” इस पर नानावती ने उन्हें पीटने की धमकी दी। जब प्रेम आहूजा ने अचानक लिफाफा छीन लिया, तो नानावती ने अपनी रिवॉल्वर खींच ली और आहूजा को पीछे हटने के लिए कहा। परिणामस्वरूप, उनके बीच हाथापाई हुई और संघर्ष के दौरान गलती से दो गोलियां चल गईं, जिससे प्रेम आहूजा की मौत हो गई।

पूरी घटना घटने के बाद नानावती गाड़ी से पुलिस स्टेशन पहुंचे और खुद को आत्मसमर्पण कर दिया। इसलिए, याचिकाकर्ता द्वारा प्रेम आहूजा पर गोली चलाना गंभीर और अचानक उकसावे का परिणाम था, और वह गैर इरादतन हत्या के लिए उत्तरदायी होगा।  

प्रतिवादी का तर्क

प्रतिवादी की पहली असहमति इस बात पर थी कि प्रेम आहूजा अभी-अभी शॉवर से बाहर निकले थे और उनका तौलिया अभी भी बरकरार था। जब इसकी खोज की गई तब भी यह उसके शरीर पर था। यह गिरी नहीं है, जो काफी हैरानी की बात है क्योंकि नानावती और प्रेम आहूजा के बीच हाथापाई हो गई थी।

सिल्विया द्वारा नानावती के सामने कबूल करने के बाद, वह शांति से उन्हें मूवी थियेटर में ले जाता है और उन्हें वहां छोड़ देता है। इसके बाद वह अपने जहाज पर गया और झांसा देकर रिवॉल्वर ले आया। इससे स्पष्ट रूप से पता चलता है कि उनके पास शांत होने के लिए पर्याप्त समय था और उकसावे न तो गंभीर थे और न ही अचानक थे। नानावती ने रास्ते में ही हत्या की योजना बना ली थी।

अंजनी प्रेम आहूजा का नौकर एक स्वाभाविक गवाह था जो वहां मौजूद था और उसने नानावती के लिए दरवाजा खोला था। उन्होंने कहा कि एक के बाद एक चार गोलियां चलाई गईं और पूरी घटना एक मिनट से भी कम समय में घट गई। इससे पता चलता है कि कोई हाथापाई नहीं हुई थी।

प्रेम आहूजा को गोली मारने के बाद नानावती बगल वाले कमरे में मौजूद आहूजा की बहन को बिना बताए वहां से चले गए। यदि यह एक दुर्घटना थी, तो नानावती ने उन्हें सूचित किया होगा। पुलिस उपायुक्त के बयान के अनुसार, नानावती ने स्वीकार किया कि उसने आहूजा को गोली मारी और यहां तक ​​कि अपना नाम भी सुधार लिया, जो पुलिस रिकॉर्ड में गलत लिखा गया था, जिससे पता चला कि वह उस समय सामान्य रूप से सोचने में सक्षम था।

न्यायालय के समक्ष मुद्दे

  • क्या उच्च न्यायालय के पास सत्र न्यायाधीश के परामर्श (रेफरल) की योग्यता निर्धारित करने के लिए तथ्यों की जांच करने के लिए सीआरपीसी की धारा 307 के तहत अधिकार क्षेत्र का अभाव है।
  • क्या उच्च न्यायालय के पास सीआरपीसी की धारा 307(3) के तहत आरोप के गलत दिशा-निर्देश के आधार पर जूरी के फैसले को रद्द करने की शक्ति थी।
  • क्या आरोप में कोई गलत निर्देश थे।
  • क्या जूरी का निर्णय ऐसा था कि यह उनके सामने प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर उचित व्यक्तियों के समूह तक पहुंच सकता था।
  • क्या यह कार्य “आवेश में” किया गया था या क्या यह एक पूर्व-निर्धारित हत्या थी?
  • क्या राज्यपाल की क्षमादान (पार्डोनिंग) शक्ति और विशेष अनुमति याचिका को एक साथ जोड़ा जा सकता है?

के. एम. नानावती बनाम महाराष्ट्र राज्य में लागू परीक्षण और नियम

गंभीर और अचानक उकसावे के लिए परीक्षण

परीक्षण में यह सवाल शामिल है कि क्या एक उचित व्यक्ति जो समाज के एक ही वर्ग से है, उसे उसी तरह से कार्य करने के लिए उकसाया जाएगा जैसा कि आरोपी ने उसी स्थिति में किया था। भारत में जब परीक्षण लागू किया जाता है, तो इसमें पीड़ित द्वारा विकसित हावभाव, शब्द और पूर्व मानसिक पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड) भी शामिल होती है। अचानक उकसावे की कार्रवाई होनी चाहिए और घातक झटका उसी का परिणाम होना चाहिए। कर्मों के हिसाब-किताब या किसी पूर्वचिन्तन (प्रिमेडिटेशन) के लिए समय नहीं होना चाहिए। 

नियम लागू हुआ और मामले संदर्भित किये गये

मैनसिनी बनाम लोक अभियोजन निदेशक (1941) में, न्यायालय ने इस मुद्दे को संबोधित किया कि क्या उकसावे से हत्या के आरोप को नरहत्या (मैन स्लॉटर) में बदला जा सकता है। न्यायालय ने देखा कि जब उकसावे में हत्या करने या गंभीर नुकसान पहुंचाने का इरादा होता है, तो हत्या को मानव वध में बदलने के कानूनी सिद्धांत को लागू करने की संभावना शायद ही कभी लागू होती है। इसका मतलब यह है कि यदि कोई व्यक्ति, अचानक और गंभीर उत्तेजना (प्रोवोकेशन) से उत्पन्न जुनून की गर्मी में, हत्या करने या गंभीर शारीरिक नुकसान पहुंचाने का इरादा बनाता है, तो अपराध को नरहत्या नहीं बल्कि हत्या माना जाने की अधिक संभावना है। 

न्यायालय  ने  अभियोजन पक्ष पर सबूत का भार (बर्डन ऑफ प्रुफ) को साबित करने के लिए एट्टीगैल बनाम एम्परर (1936) के मामले का भी उल्लेख किया। दुर्घटना की अनुपस्थिति से संबंधित सबूत के मामले में, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 105 के प्रावधानों के बावजूद, भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 80 का संदर्भ लिया जाना चाहिए। आईपीसी की धारा 80 एक सामान्य अपवाद है, इसमें कहा गया है कि यदि कोई कार्य गलती (एक्सीडेंटली) से या दुर्भाग्य (मिसफोर्चुन) से किया जाता है तो उसे अपराध नहीं माना जा सकता है, बशर्ते कि इसके बारे में कोई आपराधिक इरादा या जागरूकता (अवेयरनेस) न हो। यह कार्य किसी वैध गतिविधि में शामिल होते हुए उचित देखभाल और ध्यान रखते हुए वैध तरीकों से किया जाना चाहिए। यदि कोई अपने कर्तव्यों का विधिपूर्वक पालन करते हुए बिना किसी आपराधिक इरादे के अनजाने में कोई कार्य करता है, तो वह व्यक्ति इस धारा के तहत दंडनीय नहीं होगा। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 105 का अर्थ है कि जब भी किसी आरोपी पर किसी आपराधिक कृत्य का आरोप लगाया जाता है, तो आईपीसी या किसी अन्य विशेष कानून के तहत प्रदान किए गए किसी भी सामान्य अपवाद के तहत सबूत का भार आरोपी पर होता है। दुर्घटना की अनुपस्थिति को साबित करने का भार अभियोजन पक्ष पर है। इसका मतलब यह है कि जब कोई व्यक्ति दावा करता है कि कार्य दुर्घटनावश हुआ था, तो, जैसा कि आईपीसी की धारा 80 के तहत प्रावधान है, यह अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी है कि वह उचित संदेह से परे साबित करे कि अपराध दुर्घटना का परिणाम नहीं था। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि अभियोजन पक्ष सबूत का दायित्व (ओनस ऑफ़ प्रुफ) वहन करता है। यह निर्दोषता (इनोसेंस) की धारणा (प्रिजंप्शन) और न्यायालय द्वारा निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों को कायम रखता है। 

महारानी बनाम खोगायी (1879) के मामले में, न्यायालय  ने माना कि अपमानजनक (एब्यूजिव) भाषा का उपयोग किसी व्यक्ति को आत्म-नियंत्रण से वंचित करने के लिए पर्याप्त उत्तेजना है। यह निर्णय, मौखिक उकसावे के कारण (रीज़न) और प्रभाव (इफेक्ट) पर महत्वपूर्ण रूप से प्रकाश डालता है और कैसे अपमानजनक भाषा का उपयोग किसी व्यक्ति को आवेगपूर्ण (इंपल्सिव) या हिंसक कार्य करने के लिए प्रेरित कर सकता है। यह मौखिक और शारीरिक दोनों तरह के उकसावे के तहत उकसावे की व्यापक समझ पर प्रकाश डालता है। 

जूरी ट्रायल का परीक्षण

इस मामले में हुई सबसे उल्लेखनीय घटनाओं में से एक जूरी परीक्षणों का उपयोग था। यह ब्रिटिश कानूनी प्रणाली से विरासत में मिला था। जूरी मुकदमे में, नागरिकों का एक समूह होता है, जिनकी संख्या आम तौर पर 12 होती है, और उन पर अभियुक्त के अपराध का निर्धारण करने की जिम्मेदारी होती है। मुकदमा एक सामान्य कार्यवाही की तरह आगे बढ़ता है, जैसे सबूत और दलीलें पेश करना। हालाँकि, इस मामले में, हमने भारत में जूरी ट्रायल की ताकत और कमजोरियाँ दोनों देखीं। मुकदमे की निष्पक्षता और वैधता को बढ़ावा देने के लिए जूरी ने इस मामले में विविध राय प्रदान की। दूसरी ओर, इस मामले ने जनता का अत्यधिक ध्यान और मीडिया जांच को आकर्षित किया। पक्षों और जूरी की हर हरकत मीडिया में कैद हो रही थी। इस मामले ने मीडिया में खूब सुर्खियां बटोरीं। इसे जूरी पर प्रभाव माना गया। मामले की जटिलता और इसकी भावनात्मक प्रकृति ने जूरी के लिए निर्णय पर पहुंचने में कई चुनौतियां पेश कीं ।

बरी करने के लिए 8:1 वोट के बहुमत के फैसले के बावजूद, पीठासीन न्यायाधीश, माननीय श्री न्यायमूर्ति रतिलाल भाईचंद मेहता ने मामले को आगे की समीक्षा के लिए उच्च न्यायालय में भेज दिया। इस मामले ने भारत में जूरी ट्रायल प्रणाली की प्रभावकारिता के लिए लिटमस टेस्ट के रूप में कार्य किया।    

नियम लागू हुआ और मामले संदर्भित किये गये

रामानुग्रह सिंह बनाम किंग एम्परर (1946) के मामले में, न्यायालय  ने ‘न्याय के अंत’ शब्दों पर प्रकाश डाला, इसका मतलब था कि न्यायाधीश को आश्वस्त होना चाहिए कि जूरी द्वारा दिया गया फैसला ऐसा है कि इसे तर्कसंगत रूप से एक समझदार आदमी द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता है। न्यायाधीश को जूरी के निर्णय का मूल्यांकन करना चाहिए और जांचना चाहिए कि यह न्याय और तर्कसंगतता के सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं। 

सम्राट बनाम रामाधार कुर्मी (1946) के मामले में , जूरी के निर्णय में हस्तक्षेप करने के उच्च न्यायालय के अधिकार पर सवाल उठाया गया था। उच्च न्यायालय के पास मामलों में हस्तक्षेप करने की अंतर्निहित (इन्हेरेंट) शक्ति तभी होती है जब जूरी का निर्णय गंभीर गलत दिशा-निर्देशों के आधार पर होता है। इसका तात्पर्य यह है कि यदि जूरी का निर्णय ऐसी त्रुटियों और गलतफहमियों से प्रभावित होता है, तो उच्च न्यायालय के पास जूरी के फैसले की समीक्षा करने और उसे पलटने का अधिकार क्षेत्र है। यह न्यायिक कार्यवाही की अखंडता की रक्षा करने और यह सुनिश्चित करने के लिए है कि न्याय दिया जाए और विधिवत न्याय दिया जाए। 

उच्च न्यायालय का फैसला

बॉम्बे उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ में शेलाट और नाइक, जेजे शामिल थे, जिन्होंने मामले की सुनवाई की। हालाँकि, दोनों जजों ने मामले पर अलग-अलग फैसले दिए, लेकिन बाद में दोनों इस बात पर सहमत हुए कि आरोपी भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी है। उसे आजीवन कारावास की सजा होनी चाहिए। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि जूरी को गुमराह किया गया था, और न्यायाधीशों ने पूरे सबूतों का मूल्यांकन करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि नानावती हत्या का दोषी था। उन्होंने यह भी सोचा कि जूरी और उनके निष्कर्ष विकृत (पर्वर्स) और तर्कहीन (इरेशनल) थे। वे, कभी-कभी, सबूतों के महत्व के विपरीत भी थे।

हालाँकि, न्यायमूर्ति नाइक की राय थी कि लोगों का कोई भी उचित समूह उस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकता था जिस पर जूरी पहुँची थी। न्यायाधीश इस बात पर सहमत हुए कि अपराध को हत्या से गैर इरादतन हत्या में बदलने का कोई मामला नहीं बनाया गया है। वर्तमान अपील उक्त दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ दायर की गई है।

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला 

सर्वोच्च न्यायालय मामले की गहरी जटिलताओं और लागू कानूनी सिद्धांतों पर विचार करता है जो आपराधिक प्रक्रिया संहिता, भारतीय दंड संहिता और भारत के संविधान के तहत दिए गए हैं । न्यायालय  ने सबसे पहले सीआरपीसी की धारा 307 के पैराग्राफ 1 की जांच की। न्यायालय ने जूरी से असहमति के विषय में मामले को उच्च न्यायालय में भेजने के लिए न्यायालय की विवेकाधीन शक्तियों का उल्लेख किया। हालाँकि, उक्त शक्ति कुछ शर्तों तक सीमित है, अर्थात, न्यायालय को जूरी के फैसले को अस्वीकार करना चाहिए और आश्वस्त (कन्विंस्ड) होना चाहिए कि कोई भी उचित व्यक्ति ऐसे मामले में जूरी के फैसले पर नहीं पहुंच सकता है। 

न्यायालय ने योग्यता की आवश्यकता को दोहराने के लिए अखलाकली हयातल्ली बनाम बॉम्बे राज्य (1953) और रामानुग्रह सिंह बनाम सम्राट (1946) जैसे मामलों का हवाला दिया। यह कहा गया था कि “उपधारा 1 के तहत, एक संदर्भ को सही ठहराने के लिए दो शर्तों की आवश्यकता होती है। पहला, कि न्यायाधीश को जूरी के फैसले से असहमत होना चाहिए, और उन्हें कोई टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह किसी भी वरीयता (प्रिफरेंस) का आधार है। दूसरा, “कि न्यायाधीश को स्पष्ट रूप से यह राय होनी चाहिए कि ‘न्याय के उद्देश्यों द्वारा मामले को प्रस्तुत करना चाहिए’ और उनमें लॉर्डशिप्स की राय होना चाहिए यह भी महत्वपूर्ण है, ‘धारा की व्याख्या’ के लिए एक कुंजी प्रदान करती है।

सीआरपीसी के तहत धारा 307 के पैराग्राफ 3 में, मामले को संप्रेषण (रेफरल) के बाद उच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। यह साक्ष्य के व्यापक मूल्यांकन पर जोर देता है, और इस पर जूरी और न्यायाधीश दोनों द्वारा विचार किया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित करने के लिए आरोपियों के कार्यों की आगे जांच की कि क्या वे अचानक और गंभीर उकसावे का नतीजा थे या पूर्व नियोजित थे। यह पाया गया कि उत्तेजीत (ट्रिगर) करने वाली घटना और अपराध के बीच आरोपी को शांत होने के लिए पर्याप्त समय था, जिससे पता चलता है कि अपराध की योजना बनाई गई थी, न कि आवेग में हुआ था। सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि नानावती का आचरण उनके द्वारा किए गए बचाव के साथ असंगत था, यानी, मृतक को दुर्घटनावश गोली लगी थी। यह स्थापित किया गया था कि वह मानसिक रूप से तैयार था और उसकी मानसिकता किसी ऐसे व्यक्ति की थी जिसने प्रतिशोध की योजना बनाई थी और गणना की थी। जब नानावती रिवॉल्वर और छह गोलियां ले रहे थे, तब वह पहले से ही अपने दिमाग में कुछ योजना बना रहे थे। जिस तरह से वह सीधे आहूजा के शयनकक्ष की ओर बढ़े उससे उनके इरादे बिल्कुल स्पष्ट थे। मुकदमे तक उसे यह स्वीकार करने के लिए कई अवसर दिए गए कि गोली दुर्घटनावश चली थी, लेकिन उसने मुकदमे तक कबूल नहीं किया। साथ ही मृतक के शरीर पर जो चोटें पाई गईं, वह जानबूझकर गोली मारने का नतीजा लग रही हैं। साथ ही, जूरी के फैसले को वैध नहीं माना गया, क्योंकि न्यायालय का मानना ​​था कि व्यक्तियों का कोई भी उचित समूह साक्ष्य के आधार पर जूरी के समान निर्णय तक नहीं पहुंच सकता था।

सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद, न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि आरोपी ने आत्म-नियंत्रण विकसित कर लिया है और वह अपने परिवार के भविष्य के बारे में सोच रहा है। सिल्विया के कबूलनामे के बाद, उसके पास अपनी भावनात्मक स्थिरता हासिल करने और खुद को शांत करने के लिए काफी समय था। उनके कार्य पूर्व-निर्धारित और जानबूझकर सोचे-समझे थे। इसलिए, गंभीर और अचानक उकसावे का बचाव उनके लिए मान्य नहीं था और इस कृत्य को पूर्व-निर्धारित हत्या माना गया था। 

न्यायालय ने अनुच्छेद 161 के तहत क्षमा करने की राज्यपाल की शक्ति, जो राज्यपाल को दोषी की सजा को माफ करने या कम करने का अधिकार देता है, और भारत के संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत विशेष अनुमति याचिका एसएलपी, भारत में किसी भी न्यायालय या न्यायाधिकरण द्वारा विशेष अपील करने की अनुमति देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को विवेकाधीन अधिकार देता हैं। न्यायालय ने इस तथ्य को और स्पष्ट किया कि इन शक्तियों का उपयोग एक साथ नहीं किया जा सकता है, यदि एक का उपयोग किया जाता है, तो दूसरा अनुपलब्ध हो जाता है । 

न्यायालय ने आरोपी को दोषी ठहराने के उच्च न्यायालय  के फैसले से सहमति जताई और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई। यह पाया गया कि साक्ष्य निर्णयों का समर्थन करते थे, और इसमें हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। 

के. एम. नानावती की फैसले के बाद की यात्रा

फैसले के बाद कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं। नानावती के हमेशा नेहरू-गांधी परिवार के साथ प्रभावशाली संबंध थे। उन्हें पारसी समुदाय का भी भारी समर्थन प्राप्त था। इस मामले में सांप्रदायिक नज़रिए ने भी अहम भूमिका निभाई। आरके करंजिया ब्लिट्ज़ अखबार के मालिक थे। वह भी एक पारसी थे और उन्होंने अपने समर्थन के लिए नानावती की कहानी प्रकाशित की। नानावती को एक निर्दोष और वफादार पति के रूप में चित्रित किया गया था जिसे उसकी पत्नी ने धोखा दिया था। उनकी छवि एक ईमानदार अधिकारी के रूप में बनी जिसको उनके दोस्त और पत्नी दोनों ने धोखा दिया। प्रेम आहूजा को हमेशा एक बिगड़ैल लड़के के रूप में चित्रित किया गया और पारसी और सिंधी समुदायों में ध्रुवीकरण पैदा किया गया। 

पारसी और सिंधी के पूरे विवाद के बीच सिल्विया की कहानी अनसुनी रह गई। सिल्विया की मुलाकात नानावती से उसके गृहनगर इंग्लैंड में हुई। नानावती अपने नौसैनिक प्रशिक्षण के लिए वहां गए थे। दोनों को प्यार हो गया और उन्होंने शादी करने का फैसला किया। 1940 के दशक में उनकी शादी बॉम्बे में हुई। उन्होंने अपनी गलती स्वीकार की और पूरे मुकदमे के दौरान नानावती के साथ खड़ी रहीं। उनकी पूरी कठिन परीक्षा के दौरान पारसी समुदाय ने उनके समर्थन में रैलियाँ आयोजित कीं। उन्हें एक समर्पित और सम्मानित अधिकारी के रूप में चित्रित किया गया था। वह अन्यायपूर्वक अपनी पत्नी और अपने घनिष्ठ मित्र के विश्वासघात और धोखे में फंस गया। इन संबंधों ने उन्हें अपनी कथा को आकार देने में मदद की और कनाडा में उनके बाद के प्रवास (माइग्रेशन) को भी संभव बनाया। 

8 सितंबर 1960 को उन्हें नौसैनिक हिरासत से नागरिक जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। 3 साल जेल में बिताने के बाद, उन्हें स्वास्थ्य आधार पर पैरोल दी गई। इसके बाद वह एक पहाड़ी रिसॉर्ट में एक बंगले में रहने लगे। लंबी बहसों और विवादों से दूर, सांत्वना (सोलेस) और एक नई शुरुआत की तलाश में, नानावती ने 1968 में कनाडा जाने का फैसला किया। वह अपने परिवार के साथ कनाडा चले गए और 2003 में अपने निधन तक निजी जीवन व्यतीत किया।

हालाँकि, नानावती के व्यक्तिगत संबंधों और सामुदायिक समर्थन ने उन्हें मुकदमे से गुजरने और उसके बाद एक नई यात्रा शुरू करने में मदद की। 

निष्कर्ष 

नानावती का मामला भारतीय कानूनी प्रणाली के इतिहास में एक ऐतिहासिक मामला है और इसके बाद जूरी परीक्षणों को समाप्त किया गया। इसने शुरुआत से ही सुर्खियां बटोरीं, फिर जूरी के एक आश्चर्यजनक फैसले के बाद सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के साथ इसका अंत हुआ। मामले ने शुरुआत से ही मीडिया का ध्यान खींचा, जिसने बदले में पूरे देश का ध्यान खींचा। कई मीडिया बहसें हुईं जहां नानावती के समर्थक और विरोधी दोनों आए। 

इस मामले में विभिन्न प्रकार की हत्याओं और जूरी की सीमाओं के बीच अंतर का पता लगाया गया। फैसले ने भारतीय कानूनी प्रणाली की कार्यप्रणाली और मीडिया जूरी के फैसले को कैसे प्रभावित करने में कामयाब रहा, इस बारे में बड़ी अंतर्दृष्टि (इनसाइट्स) प्रदान की। इसने कार्यवाही में स्पष्टता और पारदर्शिता का आधार तैयार किया। यह मामला जटिल कानूनी मामलों से निपटने के लिए न्यायालय में सक्षम और अनुभवी न्यायाधीशों की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालता है। मामले का निर्णय हमेशा उन तर्कों और सबूतों के आधार पर किया जाना चाहिए जो न्यायालय में प्रस्तुत किए जाते हैं, न कि जिसे मीडिया और जनता सच मानती है।  

मामले की विरासत भारतीय न्यायशास्त्र (लिगल सिस्टम) की पीढ़ियों तक गूंजती रहती है। इस मामले ने कानूनी पेशेवरों और विद्वानों की भावी पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य किया ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

केएम नानावती का क्या हुआ?

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने नानावती को प्रेम आहूजा की हत्या का दोषी पाया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। हालाँकि, सजा को बॉम्बे के राज्यपाल ने निलंबित कर दिया था। महीनों बाद, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल के आदेश को निलंबित कर दिया, और नानावती को जेल भेज दिया गया।

नानावती मामले में राम जेठमलानी की क्या भूमिका थी?

स्वर्गीय राम जेठमलानी ने नानावती मामले में अभियोजन पक्ष की सहायता की। 

के. एम. नानावती के मामले में सबूत का भार किस पर था?

यह साबित करने की जिम्मेदारी नानावती पर थी कि यह एक दुर्घटना थी न कि पूर्व नियोजित हत्या। वह यह साबित करने के लिए ज़िम्मेदार था कि यह उचित संदेह से परे एक दुर्घटना थी। 

संदर्भ

 

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