आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत पुलिस को सूचना

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Criminal Procedure Code
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यह लेख इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ, निरमा विश्वविद्यालय, अहमदाबाद की छात्रा Nivrati Gupta ने लिखा है। यह लेख अपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 154 से 156 के बारे में बताता है जो संज्ञेय (कॉग्निजेबल) और गैर-संज्ञेय (नॉन कॉग्निजेबल) अपराध के बारे में पुलिस को दी गई जानकारी से संबंधित है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

पुलिस बल समाज के सबसे महत्वपूर्ण संगठनों में से एक है। ये शांति और व्यवस्था बनाए रखने के प्रभारी है, जो सरकार के नागरिक निकाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये कानून के उचित प्रवर्तन (एनफोर्समेंट) पर जांच रखने और दुर्भावनापूर्ण या आपराधिक गतिविधियों की जांच और पता लगाने के लिए जिम्मेदार हैं। जरूरत, जोखिम, संकट और कठिनाई के समय में, जब एक नागरिक को यह नहीं पता होता कि क्या करना चाहिए या किससे संपर्क करना चाहिए, तो ऐसे में पुलिस स्टेशन और पुलिस अधिकारी उनके लिए सबसे उपयुक्त और उपलब्ध इकाइयों (यूनिट्स) और व्यक्तियों में से एक हैं। पुलिस का सबसे महत्वपूर्ण कार्य अपराधों और अवैध गतिविधियों की जांच करना है। यह लेख सूचना भाग यानी की जांच के पहले चरण से संबंधित है।

पुलिस को सूचना

पुलिस अधिनियम, 1861 की प्रस्तावना (प्रिएंबल) पुलिस को अपराध की रोकथाम और निरोध (डिटेंशन) के लिए एक कुशल साधन होने की बात करती है। पुलिस दोहरी भूमिका निभाती है क्योंकि यह राज्य की सार्वजनिक व्यवस्था और कानून को बनाए रखती है साथ ही यह अवैध गतिविधियों को नियंत्रित करने, संपत्तियों को बढ़ावा देने, सार्वजनिक व्यवस्था का संरक्षण करने, दुर्भावनापूर्ण और आतंकवादी गतिविधियों को रोकने, सुरक्षा प्रदान करने, कमजोर वर्गों के अधिकारों का संरक्षण करने और शिकायतें दर्ज करने जैसे कार्य भी करती है। 

ऊपर वर्णित प्रत्येक कार्य की कार्रवाई की प्रक्रिया अपराध या किए गए अवैध कार्य की जानकारी से शुरू होती है। एक अपराध को भारतीय दंड संहिता, 1860 (इसके बाद आई.पी.सी. के रूप में संदर्भित है) की धारा 40 और अपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (इसके बाद सी.आर.पी.सी. के रूप में संदर्भित) की धारा 2 (n) में परिभाषित किया गया है। अपराध कोई भी कार्य है जिसे भारतीय दंड संहिता या राज्य के किसी अन्य आपराधिक कानून के तहत दंडनीय या नियमों के विरुद्ध माना जाता है। 

भारतीय आपराधिक कानून के तहत एक अपराध को वर्गीकृत किया गया है-

1. जमानती और गैर-जमानती अपराध

सी.आर.पी.सी. की धारा 2 (a) जमानती अपराध को एक ऐसे अपराध के रूप में परिभाषित करती है “जिसे पहली अनुसूची (शेड्यूल) में जमानती के रूप में दिखाया गया है, या जिसे एक अपराध के रूप में, किसी और राज्य में लागू कानून के द्वारा बनाया गया है। जबकि “गैर-जमानती अपराध” का अर्थ जमानती अपराध के अलावा कोई अन्य अपराध है। जमानती अपराधों के तहत योग्य होने के लिए एक अपराध में तीन साल से कम कारावास या जुर्माना होना चाहिए। 

जैसे; साधारण क्षति आई.पी.सी. की धारा 337 , रिश्वत आई.पी.सी. की धारा 171E

गैर-जमानती अपराध वे हैं जो प्रकृति में गंभीर हैं जैसे; आई.पी.सी. की धारा 300– हत्या। ऐसे मामले में जमानत विवेक का विषय है, जबकि जमानती अपराधों में यह अधिकार होता है।

2. संज्ञेय और गैर-संज्ञेय अपराध

आई.पी.सी. की धारा 2 (c) “संज्ञेय अपराध” को एक ऐसे कार्य के रूप में परिभाषित करती है जो एक पुलिस अधिकारी के लिए, पहली अनुसूची के अनुसार, या उस समय लागू होने वाले कानून के तहत अपराध के योग्य है। संज्ञेय अपराध में, बिना वारंट के गिरफ्तारी की जा सकती है। संज्ञेय अपराधों में, अपराध गंभीर प्रकृति का होता है, और जांच तुरंत शुरू होती है; पुलिस को अदालत के आदेश का इंतजार नहीं करना पड़ता है।

उदाहरण:

  • आई.पी.सी. की धारा 121 के तहत भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ना या ऐसा करने का प्रयास करना, 
  • आई.पी.सी. की धारा 144 के तहत घातक हथियार से लैस दंगे करना,
  • एक सरकारी कार्य के संबंध में एक सरकारी कर्मचारी होने या होने की उम्मीद और कानूनी पारिश्रमिक के अलावा अन्य संतुष्टि लेना। जैसा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 में कहा गया है ।

धारा 2(l) एक गैर-संज्ञेय अपराध को ऐसे अपराध के रूप में परिभाषित करती है जिसके लिए एक पुलिस अधिकारी को वारंट के बिना गिरफ्तारी का कोई अधिकार नहीं है। ये प्रकृति में गंभीर या जघन्य (हीनियस) नहीं हैं और पुलिस के पास बिना वारंट के गिरफ्तार करने की शक्ति नहीं है और न ही मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना जांच शुरू करने की शक्ति है। गैर-जमानती अपराधों में, पहला चरण एक प्राथमिकी दर्ज करना है और इसके दर्ज होने के बाद जांच शुरू होती है। फिर अदालत में चार्जशीट बनाई जाती है और अंत में विचारण (ट्रायल) शुरू होता है। 

उदाहरण

  • यदि लोक सेवक कोई ऐसा कार्य करता है जो किसी भी व्यक्ति को चोट पहुंचाने के इरादे से कानून की अवज्ञा के रूप में योग्य होगा- आई.पी.सी. की धारा 166
  • चुनाव के संबंध में झूठा बयान- आई.पी.सी. की धारा 171-G
  • न्यायिक कार्यवाही में झूठा साक्ष्य देना- आई.पी.सी. की धारा 193

3. कंपाउंडेबल और नॉन-कंपाउंडेबल अपराध

सी.आर.पी.सी. की धारा 320 के अनुसार कंपाउंडेबल अपराध ऐसे अपराध हैं जहां व्यक्ति को मामला दर्ज करना होता है और उस पक्ष के साथ आपसी सहमति की स्थिति में प्रवेश करना होता है जिसने यह कार्य किया है और वह आरोपों को छोड़ने के लिए सहमत है। आरोपी का अपराध गंभीर प्रकृति का नहीं होना चाहिए, जिससे समझौता स्वीकार्य नहीं होता है। कंपाउंडेबल अपराध ज्यादातर गैर-संज्ञेय होते हैं। कंपाउंडेबल अपराधों में किया गया समझौता “वास्तविक” होना चाहिए। एक बार अपराध के कंपाउंड हो जाने पर आरोपी के आरोप समाप्त हो जाते हैं।

उदाहरण:

  • आपराधिक या गृह-अतिचार (ट्रेसपास)
  • कुछ ऐसा छापना या बोलना जो मानहानि (डिफेमेशन) के योग्य हो (अदालत के विवेक पर कंपाउंड करने योग्य हो)

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि कुछ को कंपाउंडिंग से पहले अदालत की अनुमति की आवश्यकता होती है। 

पक्षों के बीच समझौते पर नॉन कंपाउंडेबल अपराधों को कंपाउंड नहीं किया जा सकता है, अपराध की प्रकृति इतनी गंभीर और आपराधिक होती है कि आरोपी को बिना सजा के जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। नॉन कंपाउंडेबल अपराध वे हैं जिनके आपराधिक दायित्व को केवल पक्षों के बीच समझौते से भंग नहीं किया जा सकता है। 

उदाहरण: 

  • घातक हथियारों से स्वेच्छा से चोट पहुँचाना 
  • शील (मोडेस्टी) भंग करने के इरादे से किसी महिला पर हमला या आपराधिक बल का इस्तेमाल करना
  • 3 दिनों से अधिक के लिए किसी व्यक्ति को गलत तरीके से बंदी बनाना। 

किए गए अपराध पर प्रक्रियात्मक विचारण या जांच करने के नियमों को अपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत देखा जाता है। भारतीय दंड संहिता अपराध के मुकदमे से संबंधित कोई भी हिस्सा प्रदान नहीं करती है। सी.आर.पी.सी. चरण दर चरण प्रक्रिया प्रदान करता है जो सूचना, परीक्षण जांच और अपराध के परीक्षण से शुरू होती है। 

पुलिस द्वारा किसी भी अपराध की जांच करने के लिए पहला कदम सूचना है, जैसा कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता के अध्याय XII में उल्लेख किया गया है, जो पुलिस को सूचना प्रदान करने की प्रक्रिया और जांच करने के लिए पुलिस की शक्तियों से संबंधित है। 

इस अध्याय को दो भागों में विभाजित किया गया है: पहला- सूचना प्रक्रिया से निपटना और दूसरा भाग- सूचना के बाद आने वाले अगले चरण से संबंधित है, जो सूचना के आधार पर अपराध की जांच या गलत का संदेह है।

संज्ञेय अपराधों में सूचना

संज्ञान, जैसा कि पहले ही ऊपर उल्लेख किया गया है, एक ऐसा अपराध है जिसमें किसी व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार किया जाता है। संज्ञेय अपराध के संबंध में दी जाने वाली जानकारी पर अपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 154 में चर्चा की गई है जिसमें लिखा है- 

खंड (क्लॉज) (1) 

संज्ञेय अपराध के संबंध में सूचना, प्रभारी अधिकारी को मौखिक रूप से दी जाती है। ऐसी सूचना को अधिकारी द्वारा लिखित किया जाता है। लिखित सूचना को सूचना देने वाले के सामने पढ़ा जाता है। ऐसी हर जानकारी, जो लिखित रूप में है या जिसे लिखित रूप किया गया है, उसे देने वाले व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित किया जाता है। मामले को ऐसे अधिकारी द्वारा रखी जाने वाली पुस्तक में, राज्य सरकार द्वारा निर्धारित तरीके से दर्ज किया जाता है।

सामान्य डायरी

  1. संज्ञेय अपराध से संबंधित सभी जानकारी, चाहे वह केवल प्राथमिकी की जांच हो उसे सामान्य डायरी में दर्ज किया जाता है और प्रारंभिक जांच का परिणाम भी सामान्य डायरी में दर्ज किया जाता है। मामला- यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (ए.आई.आर. 2016 एस.सी. 4136)
  2. प्रभारी अधिकारी द्वारा दर्ज की गई जानकारी की एक प्रति सूचना देने वाले को मुफ्त में देनी होगी। 
  3. यदि कोई व्यक्ति प्रभारी अधिकारी द्वारा शिकायत दर्ज करने से इनकार करने से व्यथित है, तो उस स्थिति में, ऐसा व्यक्ति संबंधित पुलिस अधीक्षक को लिखित रूप में ऐसी जानकारी (शिकायत दर्ज करने से इनकार) भेज सकता है और यदि एस.पी. संतुष्ट है कि ऐसी जानकारी संज्ञेय अपराध से संबंधित है, तो वह या तो स्वयं मामले की जांच करेगा या अपने अधीनस्थ (सबोर्डिनेट) किसी पुलिस अधिकारी को जांच करने का निर्देश देगा।

प्राथमिकी/प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफ.आई.आर.)

“एक प्राथमिकी (प्रथम सूचना रिपोर्ट) एक संज्ञेय अपराध के प्रभारी पुलिस अधिकारी द्वारा दी गई सबसे प्रारंभिक रूप और पहली सूचना है।” यह पुलिस प्रभारी द्वारा तैयार किया गया एक लिखित कार्य है, जब वे पहली बार संज्ञेय अपराध के संबंध में सूचना प्राप्त करते हैं। सी.आर.पी.सी. में प्राथमिकी का कोई जिक्र नहीं है। प्राथमिकी का उद्देश्य कार्यवाही में प्रक्रिया निर्धारित करना है।

संहिता की धारा 154 के संदर्भ में प्राथमिकी की सामग्री:

  1. जो बताया गया है वह एक अपराध की जानकारी होना चाहिए। 
  2. संज्ञेय अपराध करने के संबंध में दी गई जानकारी होनी चाहिए।

प्राथमिकी का मूल्य– प्राथमिकी का मूल्य मामले की परिस्थितियों और तथ्यों पर निर्भर करता है। इसे अदालत द्वारा वास्तविक स्वीकार्य साक्ष्य के एक हिस्से के रूप में नहीं माना जाता है। इसका उपयोग गवाह का खंडन (कॉन्ट्रेडिक्ट) करने के लिए नहीं किया जा सकता है। धर्म राम भागे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1973 एआईआर 476)। प्राथमिकी केवल कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया को गति में लाने के लिए एक शिकायत है। 

शिकायत करने वाले को प्रभारी पुलिस अधिकारी द्वारा, सी.आर.पी.सी. की धारा 207 के तहत निर्धारित प्राथमिकी की एक प्रति प्रदान की जाती है ।

प्राथमिकी दर्ज करने में समय अवधि

प्राथमिकी तुरंत दर्ज की जानी चाहिए। शिकायत दर्ज करके कानून को गति में लाने में देरी को अदालतों द्वारा संदिग्ध के रूप में देखा जाता है क्योंकि इससे साक्ष्य को मन गढ़ंत बनाने और अलंकरण (एंबिलिशमेंट) करने की संभावना बढ़ जाती है। 

दामोदर बनाम राजस्थान राज्य (एआईआर 2003 एससी 4414) में यह कहा गया था कि पुलिस को टेलीफोन के माध्यम से दी गई कोई भी जानकारी प्राथमिकी नहीं होगी, भले ही सूचना में संज्ञेय अपराध का खुलासा हुआ हो।

गैर संज्ञेय अपराधों में सूचना

चर्चा के अनुसार गैर संज्ञेय अपराध ऐसे अपराध हैं जो जघन्य प्रकृति के हैं और पुलिस को आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए वारंट की आवश्यकता नहीं होती है। 

सी.आर.पी.सी. की धारा 155 गैर-संज्ञेय मामलों से संबंधित सूचना और ऐसे मामलों की जांच के बारे में बात करती है। धारा 155 इस प्रकार है:

  1. जब किसी गैर संज्ञेय अपराध के लिए प्रभारी अधिकारी को ऐसे स्टेशन की सीमा के भीतर गैर संज्ञेय अपराध के संबंध में सूचना दी जाती है, तो वह जानकारी को ऐसे अधिकारी द्वारा रखी जाने वाली पुस्तक में ऐसे रूप में दर्ज करेगा जैसा कि राज्य सरकार इस संबंध में निर्धारित कर सकती है, और सूचना देने वाले को मजिस्ट्रेट के पास भेज देगा।
  2. कोई भी पुलिस अधिकारी ऐसे मामलों को विचारण करने की शक्ति और अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना गैर संज्ञेय मामले की जांच नहीं करेगा।

सुदर्शन बनाम कर्नाटक राज्य (1979) (2 कर्नाटका एलजे 449) में, यह माना गया था कि गैर-संज्ञेय अपराध की कोई भी जांच, जो मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना की जाती है, उसे अवैध माना जाएगा और उसे बाद में किसी अधिकारी की अनुमति के बाद कानूनी नहीं माना जाएगा। 

आपराधिक प्रक्रिया संहिता, धारा 155 के तहत, कोई भी पुलिस अधिकारी ऐसे मामले की जांच नहीं कर सकता है जो संबंधित मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना पहचान योग्य नहीं है। जब कोई पुलिसकर्मी मजिस्ट्रेट से अनुमति मांगता है, तो उसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह स्वतः ही अनुमति दे दे। इन मामलों में, मजिस्ट्रेट के पास या तो अनुमति देने या अनुमति देने से इनकार करने के लिए अधिकार है, लेकिन उच्च न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) के समक्ष एक मुकदमे में अपने निर्णय के कारणों की पेशकश करनी चाहिए।

  1. कोई भी पुलिस अधिकारी इस तरह के निर्दिष्ट आदेश को प्राप्त करने के बाद जांच के संबंध में (वारंट के बिना गिरफ्तारी की शक्ति को छोड़कर) एक संज्ञेय मामले में एक पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी के समान शक्तियों का प्रयोग करने की शक्ति रखता है।
  2. जहां कोई मामला दो या दो से अधिक अपराधों के अंतर्गत आता है, जिनमें से कम से कम एक अपराध संज्ञेय प्रकृति का है, तो ऐसे में मामले को संज्ञेय मामला माना जाएगा, भले ही अन्य अपराध गैर-संज्ञेय हों।

यदि कोई व्यक्ति पुलिस प्रभारी को गैर संज्ञेय अपराध की सूचना देता है तो अधिकारी ऐसी सूचना राज्य सरकार द्वारा निर्धारित पुस्तक में दर्ज करेगा। 

गैर-संज्ञेय अपराधों को निजी गलत माना जाता है और इसलिए, संहिता मानती है कि यह महत्वपूर्ण है कि मजिस्ट्रेट द्वारा जांच का आदेश दिया जाए। यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ऐसे मामलों में जहां किसी व्यक्ति ने दो या दो से अधिक अपराध किए हैं जिनमें से एक अपराध संज्ञेय अपराध के अंतर्गत आता है, तो ऐसे मामले में संयुक्त मामले को संज्ञेय अपराध के रूप में माना जाता है और उसे संज्ञेय अपराध को प्रक्रिया के तहत विचार किया जाता है। 

संज्ञेय अपराधों की जांच के लिए पुलिस की शक्तियां

सी.आर.पी.सी. की धारा 156, संज्ञेय अपराधों के मामलों में पुलिस को कानून द्वारा दी गई शक्तियां प्रदान करती है। संज्ञेय मामलों की जांच करने के लिए पुलिस अधिकारी की शक्ति निम्नलिखित है:

  1. किसी पुलिस थाने का प्रभारी अधिकारी, बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के, ऐसे मामले की जांच करता है जिसमें उस थाने के अधिकार क्षेत्र के भीतर स्थानीय क्षेत्र वाले न्यायालय को ऐसे मामले की जांच करने या अध्याय XIII के प्रावधानों के तहत मुकदमा चलाने का अधिकार होगा। 
  2. किसी पुलिस अधिकारी द्वारा की गई किसी भी कार्यवाही पर किसी भी स्तर पर केवल इस आधार पर प्रश्न नहीं उठाया जाएगा कि मामला वह था जिसकी जांच करने के लिए उस अधिकारी को इस धारा के तहत अधिकार नहीं था।
  3. सी.आर.पी.सी. की धारा 190 के तहत अधिकार प्राप्त कोई भी मजिस्ट्रेट ऊपर वर्णित इस तरह की जांच का आदेश दे सकता है।

इस खंड के अनुसार, मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना, एक पुलिस अधिकारी को संज्ञेय अपराधों की जांच करने की अनुमति है। यह प्रावधान किसी भी कार्यवाही पर प्रश्न करने पर प्रतिबंध लगाकर पुलिस अधिकारी को प्रतिरक्षित (इम्यून) भी करता है, ऐसा इस आधार पर होता है कि किसी पुलिस अधिकारी ने उस नियंत्रण का प्रयोग किया है जिससे उसे रोका गया था। 

धारा 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट की शक्ति 

जैसा कि ऊपर धारा 154 के तहत चर्चा की गई है, कि अगर किसी व्यक्ति की शिकायत है कि पुलिस प्रभारी ने प्राथमिकी दर्ज नहीं की है, तो ऐसा व्यक्ति धारा 154 (3) के तहत पुलिस अधीक्षक (एसपी) से संपर्क कर सकता है । यदि अभी भी कोई कार्रवाई नहीं की गई है तो ऐसे व्यक्ति धारा 156 (3) के तहत मजिस्ट्रेट से संपर्क कर सकते हैं। यदि एसपी भी प्राथमिकी दर्ज नहीं करते हैं, या प्राथमिकी दर्ज होने के बावजूद उचित जांच नहीं की जाती है, तो पीड़ित व्यक्ति सी.आर.पी.सी. की धारा 156 (3) के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट से संपर्क कर सकता है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई और अन्य बनाम राजेश गांधी और अन्य 1997 में यह माना था कि “कोई भी इस बात पर जोर नहीं दे सकता कि किसी विशेष एजेंसी द्वारा अपराध की जांच की जाए”। साकिरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य के मामले में, यह माना गया था कि अगर किसी सूचना देने वाले की शिकायत है कि पुलिस प्रभारी धारा 154 के तहत उसकी प्राथमिकी दर्ज नहीं कर रहा है, तो उस मामले में, वह एक लिखित आवेदन के माध्यम से धारा 154 (3) के तहत एसपी से संपर्क कर सकता है। यदि फिर भी कोई कार्रवाई नहीं की जाती है, तो पीड़ित पक्ष सी.आर.पी.सी. की धारा 156 (3) के तहत अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दायर कर सकता है। धारा 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष एक आवेदन दायर किया जाता है जिसे वह प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दे सकता है और प्रभारी अधिकारी द्वारा जांच करने का निर्देश भी दे सकता है। 

ऐतिहासिक निर्णय

  • डी.के बासु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य

इस मामले में, सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत एक गैर-राजनीतिक संगठन, कानूनी सहायता सेवाओं के अध्यक्ष श्री डीके बासु ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर पुलिस हिरासत और लॉक-अप में हाल की मौतों और दुर्व्यवहार के बारे में सवाल उठाया। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दायर किए जाने पर पत्र को एक रिट याचिका के रूप में माना गया था।

डी.के. बासु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के मामले में, अदालत ने अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 22(1) का पालन करते हुए 11 दिशानिर्देश निर्धारित किए, जिनका कठोरता से पालन करने की आवश्यकता है, अन्यथा अधिकारी पर अदालत की अवमानना (कंटेंप्ट) के लिए जुर्माना लगाया जाएगा ​​और उसके खिलाफ कार्यवाही स्थापित की जाएगी।

  1. गिरफ्तारी की प्रक्रिया को अंजाम देने वाले और गिरफ्तार व्यक्ति की पूछताछ प्रक्रिया को संभालने वाले पुलिस कर्मियों के पदनामों (डेसिग्नेशन) के साथ उनके नाम की स्पष्ट पहचान होनी चाहिए।
  2. गिरफ्तारी करने वाले पुलिस कर्मियों को गिरफ्तारी के समय एक मेमो बनाना होगा।
  3. जिस व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है, वह एक दोस्त, रिश्तेदार या ऐसे किसी अन्य व्यक्ति को बताने का हकदार होगा जिसे वह जानता है, कि उसे विशेष स्थान पर गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया है।
  4. गिरफ्तार व्यक्ति की गिरफ्तारी का समय, स्थान और हिरासत का स्थान पुलिस द्वारा अधिसूचित किया जाना चाहिए और जहां गिरफ्तार व्यक्ति का दोस्त या रिश्तेदार शहर से बाहर रहता है, वहां गिरफ्तारी के बाद 8 से 12 घंटे की अवधि के अंदर उसे, जिले में स्थित कानूनी सहायता संगठन और संबंधित क्षेत्र के पुलिस थाने द्वारा सहायता प्रदान की जानी चाहिए। 
  5. गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी गिरफ्तारी के बारे में किसी को सूचित करने के अपने अधिकार के बारे में पता होना चाहिए।
  6. हिरासत के स्थान और हिरासत में लिए गए व्यक्ति के नाम पर एक प्रविष्टि (एंट्री) की जानी चाहिए। हिरासत में लिए गए व्यक्ति के एक मित्र को सूचित किया जाना चाहिए और रिपोर्ट के भीतर पुलिस अधिकारियों का विवरण जोड़ा जाना चाहिए। 
  7. गिरफ्तारी के समय गिरफ्तार व्यक्ति की जांच की जानी चाहिए और उसके शरीर पर किसी भी चोट को दर्ज किया जाना चाहिए। निरीक्षण मेमो पर गिरफ्तार व्यक्ति और संबंधित पुलिस अधिकारी दोनों के हस्ताक्षर होने चाहिए और एक प्रति गिरफ्तार व्यक्ति को प्रदान की जानी चाहिए।
  8. गिरफ्तार व्यक्ति को हिरासत में रखने के दौरान हर 48 घंटे में एक प्रशिक्षित (ट्रेंड) डॉक्टर द्वारा चिकित्सकीय जांच की जानी चाहिए।
  9. गिरफ्तारी के मेमो सहित सभी दस्तावेजों की प्रतियां मजिस्ट्रेट को उनके रिकॉर्ड के लिए भेजी जानी चाहिए।
  10. गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान अपने वकील से मिलने की अनुमति दी जानी चाहिए, लेकिन पूरी पूछताछ के दौरान नहीं।
  11. सभी जिला और राज्य मुख्यालयों में एक पुलिस नियंत्रण कक्ष बनाया जाना चाहिए। गिरफ्तार अधिकारी द्वारा इन केंद्रों में गिरफ्तार व्यक्ति की गिरफ्तारी और हिरासत के स्थान की सूचना दी जानी चाहिए। इसे गिरफ्तारी के 12 घंटे के अंदर पुलिस नियंत्रण कक्ष के नोटिस बोर्ड पर दिखाना होगा।

इस प्रकार, इस मामले ने एक ऐतिहासिक निर्णय दिया जिसमें किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के संबंध में दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए थे अन्यथा न्याय करने के नाम पर और अधिक अपराध किए जाएंगे। यह हिरासत के दौरान किसी व्यक्ति के अधिकारों के उल्लंघन को रोकता है, और इस प्रकार कुछ कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से सभी नागरिकों की रक्षा करता है।

  • मोहम्मद यूसुफ बनाम श्रीमती अफाक जहान और अनरी

मोहम्मद यूसुफ बनाम श्रीमती अफाक जहां और अन्य में कहा गया कि कोई भी न्यायिक मजिस्ट्रेट अपराध की जानकारी होने से पहले संहिता की धारा 156(3) के तहत जांच का आदेश दे सकता है। यदि वह ऐसा करता है, तो वह शपथ पर वादी का परीक्षण नहीं करने जा रहा है क्योंकि उसने इसमें किसी अपराध को मान्यता नहीं दी है। पुलिस को जांच शुरू करने में सक्षम बनाने के लिए पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने के लिए मजिस्ट्रेट के पास अधिकार है। ऐसा करने में कुछ भी अवैध नहीं है। प्राथमिकी पंजीकरण में पुलिस थाना अधिकारी द्वारा रखी गई पुस्तक को दर्ज करने की प्रक्रिया शामिल है, जैसा कि संहिता की धारा 154 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि संज्ञेय अपराध से संबंधित जानकारी का सार है।

यदि कोई मजिस्ट्रेट संहिता की धारा 156(3) के तहत जांच का निर्देश देते समय यह नहीं कहता कि प्राथमिकी दर्ज की जाए, तो थाने के प्रभारी अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह शिकायत द्वारा प्रकट किए गए संज्ञेय अपराध के संबंध में प्राथमिकी दर्ज करें क्योंकि वह पुलिस अधिकारी केवल बाद में संहिता के अध्याय XII में विचार किए गए आगे के कदम उठा सकता है।

दिलावर सिंह बनाम दिल्ली राज्य में भी यही कहा गया था।

  • ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य

ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की एक संविधान पीठ ने माना कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के तहत प्राथमिकी का पंजीकरण अनिवार्य है, बशर्ते कि जानकारी एक संज्ञेय अपराध का खुलासा करती है, ऐसे में कोई प्रारंभिक जांच की अनुमति नहीं है। यदि प्राप्त जानकारी एक संज्ञेय अपराध का खुलासा नहीं करती है, लेकिन एक जांच की तत्काल आवश्यकता को इंगित करती है, तो एक संज्ञेय अपराध का खुलासा किया गया है या नहीं, यह निर्धारित करने के लिए एक प्रारंभिक जांच की जा सकती है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने प्राथमिकी दर्ज करने के लिए निम्नलिखित दिशानिर्देश जारी किए:

  • संहिता की धारा 154 के तहत, यदि सूचना संज्ञेय अपराध के होने का खुलासा करती है तो प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य है और ऐसी स्थिति में किसी भी प्रारंभिक जांच की अनुमति नहीं है।
  • प्राप्त जानकारी एक संज्ञेय अपराध का खुलासा नहीं करती है, लेकिन एक जांच की आवश्यकता को इंगित करती है, फिर एक प्रारंभिक जांच केवल यह निर्धारित करने के लिए की जा सकती है कि एक संज्ञेय अपराध की पहचान की गई है या नहीं।
  • यदि जांच में संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है तो प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए। ऐसे मामलों में जहां शिकायत की समाप्ति के साथ प्रारंभिक जांच समाप्त हो जाती है, ऐसी समापन प्रविष्टि की एक प्रति पहले सूचना देने वाले को तुरंत प्रदान की जानी चाहिए और समय अवधि एक सप्ताह से अधिक नहीं होनी चाहिए। उसे शिकायत को संक्षेप में करने और आगे की कार्यवाही न करने के कारणों को बताना चाहिए।
  • सामान्य डायरी या स्टेशन डायरी एक पुलिस थाने में प्राप्त सभी सूचनाओं का रिकॉर्ड है, संज्ञेय अपराधों से संबंधित सभी जानकारी, चाहे वह एक प्राथमिकी दर्ज की गई हो या एक जांच के लिए, इसे अनिवार्य रूप से और सावधानी से सामान्य डायरी में दर्शाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

सूचना आम जनता और पुलिस के बीच संचार की कुंजी है। यह किसी भी जांच प्रक्रिया में पहला चरण है। पुलिस का कार्य अत्यंत ईमानदारी का कार्य है और इसे बिना पक्षपात और भेदभाव के किया जाना चाहिए। प्रभारी अधिकारी को अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किए बिना इस प्रक्रिया को अत्यंत धैर्य, परिश्रम और निष्पक्षता के साथ संभालना चाहिए। हम ऐसे मामलों के बारे में सुनते रहते हैं जहां पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर देती है क्योंकि यह किसी हाई प्रोफाइल व्यक्ति के खिलाफ है, या कोई व्यक्ति, किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ केवल कुछ पैसे के लिए फर्जी प्राथमिकी लिखता है। पुलिस जनता और सरकार के बीच एक बंधनकारी भूमिका निभाती है, अगर पुलिस तंत्र गलत आचरण करना शुरू कर देता है तो अराजकता होगी और सरकार विफल हो जाएगी।

 

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