मद्रास राज्य बनाम चंपकम: मामले का विश्लेषण

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यह लेख Rashi Sharma द्वारा लिखा गया था और इसे Monesh Mehndiratta द्वारा अद्यतन (अपडेट) किया गया है। वर्तमान लेख एक मामले के संक्षिप्त तथ्य, इसमें शामिल मुद्दे, न्यायालय के फैसले और फैसले के पीछे के तर्क प्रदान करता है। यह मामले में शामिल कानून की भी व्याख्या करता है और इसका महत्वपूर्ण विश्लेषण भी प्रदान करता है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है।

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परिचय

“आरक्षण” जब आप इस शब्द के बारे में सोचते हैं या सुनते हैं तो आपके मन में क्या आता है?

जमीनी हकीकत यह है कि आरक्षित वर्ग के लोग यह सोचकर खुश हो जाएंगे कि उन्हें भी दूसरों की तरह समान अवसर दिए जाएंगे, लेकिन अनारक्षित वर्ग के लोग इसके परिणामों के बारे में सोचकर निराश हो सकते हैं। 

आरक्षण कोई नकारात्मक शब्द नहीं है। इस नीति को सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ लागू किया गया था और इसका उद्देश्य अल्पसंख्यकों (माइनोरिटीज) और उन लोगों की स्थिति को ऊपर उठाना था, जिन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा था, लेकिन इस नीति का सबसे बुरा परिणाम इसका दुरुपयोग होगा। लोग अक्सर अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए आरक्षण की नीति का दुरुपयोग करते हैं जिसके कारण योग्य उम्मीदवारों को नुकसान उठाना पड़ता है और परिणाम भुगतना पड़ता है। ऐसा ही एक मामला मद्रास राज्य बनाम चंपकम (1951) का है, जिसके बारे में हम इस लेख में विस्तार से चर्चा करेंगे जिसमें याचिकाकर्ताओं को सरकार द्वारा संचालित कुछ शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश से वंचित कर दिया गया था क्योंकि वे किसी विशेष वर्ग या श्रेणी से संबंधित नहीं थे। 

इसे उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जिसमें उन्होंने अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए आवेदन दायर किया। उच्च न्यायालय ने उनके आवेदन को स्वीकार कर लिया जिसे विपक्षी पक्ष ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। वर्तमान लेख मामले के संक्षिप्त तथ्य, इसमें शामिल मुद्दे, माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय, निर्णय के पीछे का तर्क और इसका महत्वपूर्ण विश्लेषण भी प्रदान करता है। 

मद्रास राज्य बनाम चंपकम का विवरण

मामले का नाम

मद्रास राज्य बनाम श्रीमति चंपकम दोरैराजन 

उद्धरण

1951 एआईआर 226, 1951 एससीआर 525। 

याचिकाकर्ता का नाम

मद्रास राज्य

प्रतिवादी का नाम

श्रीमती चंपकम दोरैराजन और सी.आर. श्रीनिवासन

फैसले की तारीख

09.04.1951

न्यायालय का नाम

भारत का सर्वोच्च न्यायालय

न्यायपीठ

वर्तमान मामले में फैसला 7-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा सुनाया गया था जिसमें हीरालाल जे. कानिया, सैय्यद फज़ल अली, मेहर चंद महाजन, विवियन बोस, बी.के. मुखर्जी, सुधी रंजन दास और एम.पतंजलि शास्त्री शामिल थे।

शामिल कानून

भारत के संविधान के अनुच्छेद 13, 16(4), 29(2), 46 

मद्रास राज्य बनाम चंपकम की पृष्ठभूमि

भारतीय संविधान अपनी प्रस्तावना (प्रिएंबल) में सभी नागरिकों के लिए समानता का प्रावधान करता है। यह भी उसमें उल्लिखित सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकारों में से एक है। यह नागरिकों को विभिन्न मौलिक अधिकार प्रदान करता है और इनका उल्लंघन किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता है, चाहे वह विधायिका हो, विधानसभा हो या कार्यपालिका हो। हालाँकि, उचित वर्गीकरण के कारण सकारात्मक भेदभाव की अनुमति है। इसका एक परिणाम आरक्षण की नीति है जो देश में अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा के लिए लागू की गई है। हालाँकि, समय के साथ इस नीति का दुरुपयोग किया गया है, विशेषकर राज्य द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के मामलों में दुरुपयोग किया गया है। जिन छात्रों ने प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की और योग्यता के आधार पर प्रवेश में सीटें अर्जित कीं, उन्हें केवल इसलिए प्रवेश से वंचित कर दिया गया क्योंकि वे एक निश्चित जाति या समुदाय से हैं। ऐसे मामले सरासर उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हैं। वर्तमान मामला ऐसा ही एक मामला है और माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं (इस मामले में प्रतिवादियों) के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को सही ढंग से उजागर किया और सरकारी आदेश को अमान्य माना, जिस पर शैक्षणिक संस्थानों ने प्रवेश के लिए भरोसा किया था। 

वर्तमान मामला संविधान के भाग III यानी मौलिक अधिकारों के प्रावधानों पर भी प्रकाश डालता है। मामला इस बात पर प्रकाश डालता है कि सभी को उन प्रावधानों का सम्मान करने और उनका पालन करने की आवश्यकता है और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत उन्हें खत्म नहीं कर सकते। वर्तमान मामले में याचिकाकर्ताओं द्वारा कॉलेज अधिकारियों द्वारा उनके मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए मद्रास उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई थी। उन्हें प्रवेश से वंचित कर दिया गया क्योंकि वे एक विशेष जाति या श्रेणी से थे, भले ही उन्होंने प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर ली हो। 

मद्रास राज्य बनाम चम्पकम के संक्षिप्त तथ्य

वर्तमान मामला मद्रास राज्य बनाम श्रीमति चंपकम दोरैराजन (1951) और मद्रास राज्य बनाम सी.आर. श्रीनिवासन (1951) के मामले में मद्रास उच्च न्यायालय के दो निर्णयों के खिलाफ मद्रास राज्य (अपीलकर्ताओं) द्वारा एक अपील है। संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दो अलग-अलग आवेदन दायर किए गए थे लेकिन शिकायतें समान थीं और उत्तरदाताओं के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित थीं। मद्रास राज्य में सरकार द्वारा संचालित चार मेडिकल कॉलेज हैं और उन कॉलेजों में छात्रों के लिए कुल मिलाकर केवल 330 सीटें उपलब्ध हैं। 330 सीटों में से 17 राज्य के बाहर के छात्रों के लिए और 12 राज्य द्वारा विवेकाधीन आवंटन के लिए आरक्षित हैं और उपलब्ध सीटों का शेष राज्य के जिलों के चार अलग-अलग समूहों के बीच विभाजित है। 

इसी प्रकार, मद्रास राज्य द्वारा संचालित चार इंजीनियरिंग कॉलेज हैं और उपलब्ध कुल सीटें केवल 395 हैं, जिनमें से 21 राज्य के बाहर के छात्रों के लिए और 12 विवेकाधीन आवंटन के लिए आरक्षित हैं। सीटों का संतुलन मेडिकल कॉलेजों की तरह ही बांटा जाता है। ये विभाजित सीटें कुछ निर्धारित अनुपातों के अनुसार भरी गईं जिन्हें सांप्रदायिक जी.ओ. कहा जाता है। इस प्रकार, भरी जाने वाली प्रत्येक 14 सीटों के लिए चयनित उम्मीदवारों की संख्या इस प्रकार थी:

  • गैर-ब्राह्मण या हिंदू – 6
  • पिछड़े हिन्दू-2
  • ब्राह्मण – 2
  • हरिजन – 2
  • एंग्लो-इंडियन और भारतीय ईसाई – 1
  • मुसलमान – 1

उम्मीदवारों का चयन शैक्षणिक योग्यता और मेडिकल कॉलेजों में प्राप्त अंकों जैसे कुछ सिद्धांतों के आधार पर किया गया था। प्रत्येक क्षेत्र के लिए अलग-अलग कुल सीटों में से 20% से कम सीटें महिलाओं द्वारा नहीं भरी गईं और चयन समिति योग्यता के आधार पर और प्रवेश के लिए निर्धारित सामान्य सिद्धांतों के अनुसार अधिक महिला उम्मीदवारों को भी प्रवेश दे सकती है। यह अनुपात पुराने सांप्रदायिक जी.ओ. में तय किया गया था, जिसका संविधान लागू होने के बाद भी पालन किया गया था।  श्रीमती चंपकम दोराईराजन द्वारा संविधान के अनुच्छेद 15(1) और 29(2) के तहत मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए मद्रास उच्च न्यायालय में एक आवेदन दायर किया गया था। उन्होंने मद्रास राज्य और अधिकारियों को सांप्रदायिक जी.ओ. को लागू करने, पालन करने, बनाए रखने या उसका पालन करने से रोकने के लिए परमादेश या कोई अन्य रिट जारी करने की भी प्रार्थना की, जिसके माध्यम से मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश मांगा गया था। ऐसा इसलिए क्योंकि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रवेश के बारे में पूछताछ करने पर उसे पता चला कि उसे प्रवेश नहीं दिया जाएगा क्योंकि वह ब्राह्मण है। 

इसी तरह की एक अन्य याचिका श्री श्रीनिवासन द्वारा दायर की गई थी जिन्होंने राज्य में सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश के लिए आवेदन किया था। उन्होंने प्रथम श्रेणी में परीक्षा उत्तीर्ण की और 450 में से 369 अंक प्राप्त किये थे। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस तरह से कॉलेज में प्रवेश को विनियमित किया गया वह अनुच्छेद 15(1) और 29(2) के तहत याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। 

मद्रास उच्च न्यायालय का फैसला

मद्रास उच्च न्यायालय ने प्रवेश के लिए मद्रास राज्य द्वारा संचालित मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों द्वारा उपयोग किए जाने वाले सांप्रदायिक सरकारी आदेश द्वारा उनके मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाने वाले याचिकाकर्ताओं के आवेदनों को अनुमति दी। उत्तरदाताओं ने तर्क दिया कि क्रम में जाति का वर्गीकरण केवल जाति पर आधारित नहीं है, बल्कि राज्य में विभिन्न समुदायों और जातियों की संख्यात्मक ताकत, साक्षरता और आर्थिक स्थिति जैसे अन्य कारकों पर आधारित है और इसलिए, यह किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है। 

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि वे उत्तरदाताओं द्वारा दिए गए तर्कों से इनकार करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अनुच्छेद 37 में कहा गया है कि संविधान के भाग IV में दिए गए राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत संविधान के भाग III में दिए गए प्रावधानों को खारिज नहीं कर सकते हैं। न तो कार्यपालिका और न ही विधायिका कानून द्वारा प्रदान किए गए किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन या अतिक्रमण कर सकती है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि वर्तमान मामले में सरकारी सांप्रदायिक आदेश जातिगत भेदभाव पर आधारित था और इसलिए, उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ और उनके साथ अन्याय हुआ। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के संबंध में जाति निर्णायक कारक नहीं होनी चाहिए। याचिकाकर्ताओं द्वारा आगे तर्क दिया गया कि अनुच्छेद 29(2) के तहत दिया गया अधिकार एक व्यक्तिगत अधिकार है और इसे स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है और इस प्रकार, किसी को भी जाति, वर्ग, धर्म या भाषा के आधार पर राज्य द्वारा संचालित किसी भी शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। 

मद्रास उच्च न्यायालय ने वर्तमान मामले में प्रवेश और सीटों के आवंटन में असमानता पाई। यह पाया गया कि इंजीनियरिंग कॉलेज में चयनित चार ब्राह्मण छात्रों को 398-417 के बीच अंक मिले, जबकि हरिजन को केवल 217-231 अंक मिले। इस प्रकार, न्यायालय द्वारा यह देखा गया कि यदि 231 अंक प्राप्त करने वाले हरिजन को सीट आवंटित की जा सकती है, लेकिन 390 अंक प्राप्त करने वाले ब्राह्मण उम्मीदवार को सिर्फ इसलिए सीट आवंटित नहीं की जा सकती क्योंकि वह एक विशेष जाति से संबंधित है, तो यह स्पष्ट असमानता और भेदभाव है। याचिकाकर्ताओं द्वारा किए गए दो आवेदनों को यह कहते हुए अनुमति दी गई थी कि जाति, धर्म या वर्ग के आधार पर प्रवेश से इनकार नहीं किया जाना चाहिए। मद्रास उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाया और उक्त आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया। इसके बाद, प्रतिवादी राज्य ने मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील दायर की। 

मद्रास राज्य बनाम चंपकम में शामिल मुद्दे

  • क्या याचिकाकर्ताओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है?
  • क्या मद्रास राज्य द्वारा जारी किया गया जी.ओ. वैध है?

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता के तर्क

राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 29 को संविधान के अन्य अनुच्छेदों के साथ पढ़ा जाना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि कमजोर वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना और उन्हें सामाजिक अन्याय और हर प्रकार के शोषण से बचाना राज्य का कर्तव्य है। उन्होंने तर्क दिया कि भले ही यह प्रावधान राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों का हिस्सा है लेकिन देश के शासन के लिए मौलिक है। उन्होंने तर्क दिया कि अनुच्छेद 46 के अनुसार, राज्य को सांप्रदायिक जीओ बनाए रखना होगा और विभिन्न समुदायों के लिए आनुपातिक सीटें तय करनी होंगी और यदि उस आदेश के कारण याचिकाकर्ताओं को कॉलेज में प्रवेश नहीं मिल पाता है, तो इससे उनके मौलिक अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं होता है। श्रीनिवासन के मामले के संबंध में, मद्रास उच्च न्यायालय में राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि कॉलेज में सीटों का आवंटन न केवल जनसंख्या के आधार पर बल्कि संख्यात्मक ताकत, साहित्यिक उपलब्धि और राज्य में विभिन्न समुदायों की आर्थिक स्थिति जैसे अन्य कारकों के आधार पर होता है। उन्होंने आगे दलील दी कि राज्य द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों में उपलब्ध सीटें कम हैं इसलिए बड़ी संख्या में आवेदनों को अस्वीकार करना पड़ता है लेकिन यह इनकार धर्म या जाति के आधार पर नहीं बल्कि अन्य कारकों पर है और इसलिए सरकार का आदेश अवैध और अमान्य नहीं है। अन्य कारक जिनके आधार पर आवेदकों को प्रवेश से वंचित किया जाता है, वे हैं: 

  • सीटों की कमी क्योंकि ब्राह्मणों के लिए निर्धारित सीटों की संख्या पहले ही अधिक मेधावी छात्रों को आवंटित कर दी गई थी, 
  • क्षेत्रीय और भाषाई प्रतिनिधित्व
  • पिछड़े समुदायों के हितों को बढ़ावा देना।

हालाँकि, राज्य की ओर से पेश वकील ने यह भी माना कि वर्तमान मामले में प्रवेश के लिए भरे गए दो आवेदनों को अस्वीकार नहीं किया जाएगा यदि उनका प्रवेश लेने का इरादा था और यदि प्रवेश केवल योग्यता के आधार पर दिया गया था। हालाँकि, उन्होंने आगे कहा कि प्रवेश से इनकार करते समय कई अन्य कारकों को भी ध्यान में रखा गया था। 

प्रतिवादी के तर्क

उत्तरदाताओं ने तर्क दिया कि उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है क्योंकि उन्हें शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश से वंचित कर दिया गया, जबकि वे योग्यता के आधार पर प्रवेश के पात्र थे। उन्होंने आगे कहा कि सांप्रदायिक सरकारी आदेश पूरी तरह से जाति और श्रेणी पर आधारित था, इस प्रकार, यह उन लोगों के अधिकारों का उल्लंघन है जो उल्लिखित जाति या श्रेणी से संबंधित नहीं थे। 

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

निर्णय का औचित्य (रेशियो डिसीडेंडी)

इस मामले में उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के दोनों आवेदनों को स्वीकार कर लिया और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं के आवेदनों पर धर्म, वर्ग या जाति के आधार पर उनके खिलाफ कोई भेदभाव किए बिना विचार किया जाना चाहिए। ये चयन का आधार नहीं हो सकते है। 

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि सांप्रदायिक सरकारी आदेश में वर्गीकरण धर्म, वर्ग और जाति पर आधारित है और संविधान के विपरीत है। यह स्पष्ट रूप से अनुच्छेद 29(2) के तहत नागरिकों को प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। सांप्रदायिक सरकारी आदेश को संविधान के अनुच्छेद 29(2) और भाग III के साथ असंगत माना गया और इस प्रकार, अनुच्छेद 13 के तहत अमान्य माना गया। 

द्विअर्थी (ओबिटर डिक्टा)

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिवादी की दलीलों को खारिज कर दिया और कहा कि राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार अदालत द्वारा अप्रवर्तनीय हैं और इसमें निहित मौलिक अधिकारों को खत्म नहीं किया जा सकता है। आगे यह राय दी गई कि संविधान में निहित मौलिक अधिकार पवित्र हैं और विधायिका या कार्यपालिका के किसी भी अधिनियम या आदेश द्वारा उनका उल्लंघन या हनन नहीं किया जा सकता है। यदि मौलिक अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं है तो राज्य के कार्यों पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती है यदि वे राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर रहे हैं। हालाँकि, उनकी शक्तियाँ संविधान के विभिन्न भागों के तहत प्रदान की गई सीमाओं के अधीन हैं। 

अनुच्छेद 46 पर प्रतिवादी के तर्कों के संबंध में न्यायालय की राय थी कि यदि इन तर्कों को स्वीकार कर लिया गया तो अनुच्छेद 16(4) अनावश्यक और निरर्थक हो जाएगा। न्यायालय ने कहा कि संविधान का इरादा राज्य द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के संबंध में सांप्रदायिक विचार पेश करना नहीं है। आरक्षण की शक्ति राज्य को पिछड़े वर्गों की सुरक्षा के लिए दी गई है और इसके लिए इन वर्गों के लोगों को राज्य सेवाओं में नियुक्त किया जाना चाहिए। हालाँकि, जब शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश की बात आती है तो यह आवश्यक नहीं है। यह भी अनुच्छेद 16(4) की तरह अनुच्छेद 29 में एक समान खंड को हटाने का एक कारण है। 

सी.आर. श्रीनिवासन के मामले के संबंध में, यह राय दी गई कि उन्होंने कई गैर-ब्राह्मण उम्मीदवारों की तुलना में बहुत अधिक अंक प्राप्त किए, लेकिन उन्हें प्रवेश नहीं दिया जाएगा, बल्कि उन गैर-ब्राह्मण उम्मीदवारों को, जिन्होंने कम अंक प्राप्त किए थे, प्रवेश दिया जाएगा। उन्हें प्रवेश न देने का एकमात्र कारण जो मन में आता है वह यह है कि वह एक ब्राह्मण है और गैर-ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि इस तरह का खंडन केवल जाति के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार, सांप्रदायिक सरकारी आदेश में वर्गीकरण धर्म, जाति और वर्ग के आधार पर किया जाता है और इसलिए, याचिकाकर्ताओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। 

मद्रास राज्य बनाम चंपकम में शामिल कानून

संविधान का अनुच्छेद 29

संविधान का अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की रक्षा करता है। हालाँकि, यह जाति, धर्म, नस्ल या भाषा के आधार पर शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में भेदभाव पर भी रोक लगाता है। अनुच्छेद 29(2) में प्रावधान है कि किसी नागरिक को केवल जाति, धर्म, या भाषा के आधार पर राज्य द्वारा संचालित किसी भी शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश से वंचित नहीं किया जाएगा। 

टी.एम.ए.पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002), के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह माना गया था कि अल्पसंख्यक अपनी पहचान को संरक्षित करने के लिए अपने स्वयं के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन कर सकते हैं। इसके अलावा, सेंट स्टीफंस कॉलेज बनाम दिल्ली विश्वविद्यालय (1991) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित और प्रशासित शैक्षणिक संस्थानों में अन्य समुदायों के छात्रों के लिए सीटों के आरक्षण के मुद्दे पर निपटारा किया। यह माना गया कि ऐसी सीटें आरक्षित की जा सकती हैं लेकिन प्रवेश प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए। 

संविधान का अनुच्छेद 16

अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में नागरिकों के लिए अवसर की समानता से संबंधित है। इसमें प्रावधान है कि किसी नागरिक के साथ धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या निवास स्थान के आधार पर राज्य के अधीन किसी भी कार्यालय में भेदभाव नहीं किया जाएगा या उसे रोजगार से वंचित नहीं किया जाएगा। हालाँकि, इसमें यह भी प्रावधान है कि राज्य नियुक्तियों में उन पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान कर सकता है जिनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। इंद्रा साहनी और अन्य बनाम भारत संघ (1992) के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 16(4) के तहत दिया गया नियुक्ति आरक्षण केवल प्रारंभिक नियुक्तियों तक ही सीमित है और इसे नियुक्ति के मामलों में लागू नहीं किया जा सकता है। 

संविधान का अनुच्छेद 46

अनुच्छेद 46 संविधान के भाग IV के तहत दिए गए राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का एक हिस्सा है। यह राज्य को शिक्षा और आर्थिक हितों के संबंध में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे कमजोर वर्गों के लोगों के हितों को बढ़ावा देने और उन्हें सामाजिक अन्याय और शोषण से बचाने का कर्तव्य प्रदान करता है। 

मद्रास राज्य बनाम चंपकम के परिणाम

वर्तमान मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के परिणामस्वरूप भारत के संविधान में पहला संशोधन पेश किया गया था। संवैधानिक (प्रथम संशोधन), 1951, कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन लाया जिनमें शामिल थे: 

  • भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध।
  • सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों और जातियों के लिए विशेष प्रावधानों की आवश्यकता पर बल दिया गया।
  • भूमि सुधारों की शुरुआत की गई।

संशोधन ने संविधान के अनुच्छेद 15 में एक महत्वपूर्ण खंड, अनुच्छेद 15(4) पेश किया। यह राज्य को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ऐसे अन्य समूहों जैसे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए कानून बनाने की शक्ति प्रदान करता है। अनुच्छेद 15 में प्रावधान है कि नस्ल, जाति, धर्म, पंथ, रंग, लिंग या भाषा के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा और यहां तक कि राज्य भी ऐसा नहीं कर सकता है। हालाँकि, अनुच्छेद 15(4) इस नियम का अपवाद प्रदान करता है। इसमें प्रावधान है कि राज्य निम्न और सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति और उत्थान के लिए कानून बना सकता है। एम.आर. बालाजी और अन्य बनाम मैसूर राज्य (1962) के मामले में अदालत ने माना कि अनुच्छेद 15(4) में प्रयुक्त ‘पिछड़ा’ शब्द में सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन दोनों शामिल हैं जो व्यवसाय, निवास और जाति के अलावा अन्य कारकों के कारण हो सकते हैं। इसके अलावा, आर चित्रलेखा और अन्य बनाम मैसूर राज्य (1964) के मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि लोगों की आर्थिक स्थिति और व्यवसाय वह आधार हैं जिसके आधार पर लोगों को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। इंद्रा साहनी के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि एक पूरी जाति सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी है, तो उसके पक्ष में आरक्षण दिया जा सकता है। हालाँकि, यह माना गया कि सरकार को ऐसे आरक्षण से नवोन्नत वर्ग (क्रीमी लेयर) को बाहर करना चाहिए। इस नवोन्नत वर्ग में वे नागरिक शामिल हैं जिन्होंने सामाजिक और शैक्षिक जीवन के संबंध में एक निश्चित स्तर की उन्नति प्राप्त की है। 

वर्तमान मामले के बाद एक और बड़ा बदलाव जो हुआ वह न्यायपालिका द्वारा राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों की व्याख्या थी। वर्तमान मामले के बाद, न्यायपालिका ने डीपीएसपी और मौलिक अधिकारों के बीच संबंधों के प्रति अपने विचार बदल दिए हैं। इसने विभिन्न मामलों में इन सिद्धांतों की व्याख्या की है और ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं। रे केरल शिक्षा विधेयक, (1957) के मामले में, राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (डीपीएसपी) की व्याख्या करने और मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी के बीच किसी भी भ्रम और संघर्ष से बचने के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत को पेश और कार्यान्वित किया गया था। यह माना गया कि यदि दोनों के बीच कोई संघर्ष है, तो उनकी व्याख्या सामंजस्यपूर्ण ढंग से की जानी चाहिए। इसके अलावा, पथुम्मा बनाम केरल राज्य (1978) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि डीपीएसपी का उद्देश्य कुछ विशेष लक्ष्यों को प्राप्त करना है और संविधान का उद्देश्य निर्देशक सिद्धांतों और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना है। 

केरल राज्य बनाम एन.एम.थॉमस (1976) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी माना था कि डीपीएसपी और मौलिक अधिकारों का सह-अस्तित्व होना चाहिए और दोनों के बीच किसी भी प्रकार के संघर्ष को हल करने के प्रयास किए जाने चाहिए। इसके अलावा, दोनों को एक-दूसरे का अनुपूरक (सप्लीमेंट्री) और पूरक (कंप्लीमेंट्री) माना गया। सुरेश कुमार और अन्य डालमिया सीमेंट बनाम भारत संघ (1996) के मामले में, अदालत ने यह भी कहा कि ये दोनों एक ही रथ के दो पहियों की तरह हैं और कोई भी दूसरे से कम महत्वपूर्ण नहीं है। इन्हें मिलकर संविधान की आत्मा माना जाता है और ये सामाजिक क्रांति ला सकते हैं। 

मद्रास राज्य बनाम चंपकम का आलोचनात्मक विश्लेषण

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष वर्तमान अपील में अपीलकर्ता द्वारा प्रस्तुत प्रमुख तर्कों में से एक संविधान के अनुच्छेद 46 से संबंधित था जो समाज के कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने के लिए राज्य का कर्तव्य प्रदान करता है और जो अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे अन्य पिछड़े वर्गों से संबंधित हैं। उनके अनुसार, विचाराधीन सांप्रदायिक सरकारी आदेश इस अनुच्छेद के अनुरूप था और इन समुदायों को आवश्यक आरक्षण प्रदान करता था और इसलिए, उत्तरदाताओं के किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता था। इस पर, उत्तरदाताओं ने तर्क दिया कि उपर्युक्त तर्क मान्य नहीं है क्योंकि अनुच्छेद 37 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि संविधान के भाग IV में निहित प्रावधान अदालतों द्वारा लागू नहीं किए जा सकते हैं और राज्य द्वारा कोई भी कानून बनाते समय इसे सिद्धांतों के रूप में लागू किया जाएगा। 

मुझे लगता है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना सही था कि संविधान के भाग III में दिए गए प्रावधानों यानी मौलिक अधिकारों का किसी भी प्राधिकारी द्वारा उल्लंघन या अनदेखी नहीं की जा सकती है। राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत इन प्रावधानों को खत्म नहीं कर सकते। यदि हम अनुच्छेद 16 पर गौर करें तो यह सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता भी प्रदान करता है और जाति, पंथ, लिंग, धर्म, रंग या भाषा के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता है। प्रत्येक मनुष्य को दूसरों के साथ सम्मान और गरिमा के साथ व्यवहार करना चाहिए। वर्तमान फैसले में न्यायाधीशों के दृष्टिकोण ने मद्रास में राज्य द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश पाने में छात्रों द्वारा सामना किए जाने वाले भेदभाव को स्पष्ट रूप से उजागर किया था। 

भारत में अदालतें देश में आरक्षण से संबंधित समान मुद्दों वाले कई मामलों से निपटती हैं। उनमें से एक इनामदार और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (2005) का मामला है, जिसमें आगे प्रावधान है कि आरक्षण की नीति के तहत आरक्षण का प्रतिशत कोई भी राज्य अपने आप तय नहीं कर सकता है। यह केवल कानून द्वारा निर्धारित किया जाएगा और प्रत्येक राज्य को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों के आरक्षण के लिए ऐसे प्रतिशत का पालन करना होगा। इस मामले में अदालत के फैसले ने अनुच्छेद 19(1)(g) के महत्व को और अधिक प्रदान किया कि किसी को भी किसी भी व्यवसाय, व्यापार या काम को करने से वंचित नहीं किया जाएगा। यह अधिकार अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्गों तक भी फैला हुआ है। इसके अलावा, अदालत ने यह भी प्रावधान किया कि आरक्षण नीति मेधावी और अंकों के मानदंडों को पूरा करने वाले छात्र की तुलना में कम अंक प्राप्त करने वाले छात्र का पक्ष नहीं लेती है। इसका मतलब यह है कि आरक्षण नीति का उद्देश्य उन लोगों को प्रवेश से वंचित करना नहीं है जो योग्यता के आधार पर इसके हकदार हैं। इस संबंध में एक और समान मामला ओलिवर एल ब्राउन बनाम द बोर्ड ऑफ एजुकेशन ऑफ (टोपेका) (1954) है। यह अमेरिकी संविधान से जुड़ा एक ऐतिहासिक मामला है और इसने अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन को भी प्रतिबंधित कर दिया है। इस मामले में प्रावधान किया गया कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में प्रवेश के संबंध में उम्मीदवारों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा और सीट उसी को दी जाएगी जो योग्य है और योग्यता के आधार पर प्रवेश के मानदंडों को पूरा करता है। इस प्रकार, सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका प्रस्तुत करने वाले छात्रों के पक्ष में वर्तमान निर्णय देकर इसे सही किया है। यह मामला किसी भी आगामी ऐसे मामले के लिए एक मिसाल कायम करता है जहां किसी छात्र को आरक्षण के नाम पर भेदभाव के आधार पर प्रवेश से वंचित कर दिया जाता है। 

भारत में शिक्षा और रोजगार में आरक्षण

संविधान का अनुच्छेद 14 भारत के नागरिकों को समानता का अधिकार देता है। इसके अलावा, अनुच्छेद 15 में प्रावधान है कि नस्ल, जाति, धर्म, लिंग, भाषा आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। हालाँकि, उचित वर्गीकरण के सिद्धांत के परिणामस्वरूप सकारात्मक भेदभाव की अनुमति है। यह सिद्धांत प्रदान करता है कि राज्य द्वारा तर्कसंगत गठजोड़ या प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्य के साथ समझदार अंतर (उचित आधार पर वर्गीकरण) के आधार पर सकारात्मक भेदभाव किया जा सकता है। इसे ध्यान में रखते हुए, सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान और उन्हें अन्य वर्गों और समुदायों के साथ एक ही पृष्ठ पर लाने के लिए आरक्षण की नीति शुरू की गई थी। 

आरक्षण हमारे देश के लिए कोई नई बात नहीं है। यह घटना प्राचीन काल से ही अस्तित्व में है। यह नीति सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों और जातियों को भेदभाव और अत्याचार से बचाने और उन्हें अन्य जातियों और श्रेणियों के बराबर समान अवसर प्रदान करने के लिए लागू की गई थी। राज्य ने अस्पृश्यता (अनटचैबिलिटी) (संविधान का अनुच्छेद 17) की प्रथा पर भी रोक लगा दी, जो निचली जातियों के लोगों द्वारा सामना किया जाने वाला एक प्रकार का भेदभाव था। आरक्षण की नीति देश में पिछड़ी जातियों और वर्गों के खिलाफ भेदभाव को खत्म करने और उनके उत्थान के उपाय के रूप में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर द्वारा शुरू की गई थी। हालाँकि, शुरुआत में इसे 10 साल के लिए लागू किया गया था लेकिन बाद में इसे बढ़ा दिया गया। 

आजादी के बाद आरक्षित वर्गों को रोजगार और शिक्षा में समान अवसर प्रदान करने के लिए आरक्षण से संबंधित विभिन्न प्रावधान लागू किये गये। 1951 में वर्तमान मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद, अनुच्छेद 15 में संशोधन किया गया और संरक्षण के संबंध में विभिन्न खंड जोड़े गए। इसके अलावा, संविधान (93वां संशोधन) अधिनियम 2005 सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों और जातियों के आरक्षण और सुरक्षा से संबंधित संविधान में विभिन्न परिवर्तन और संशोधन लाया गया। 

टी.एम.पाई और पी.ए इनामदार के मामले इस संबंध में प्रमुख मामले हैं और इंद्रा साहनी का मामला जो एक और ऐतिहासिक मामला है, आरक्षण का सटीक प्रतिशत प्रदान करता है जो 50% है। प्रतिशत की इस पट्टी को कोई भी पार नहीं कर सकता और अंततः, संविधान में अनुच्छेद 16 (4-A) और 16 (4-B) जोड़े गए जो क्रमशः पदोन्नति और रिक्तियों को भरने के मामलों में आरक्षण के लिए कानून बनाने की राज्य की शक्ति से संबंधित हैं। 

निष्कर्ष

भारत सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और विविधतापूर्ण देश है। इसमें कई धर्म और परंपराएं हैं और यहां रहने वाले लोगों के विचारों, मतों और जीवन जीने के तरीकों में विविधता है। ऐसे में सरकार के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह विभिन्न धर्मों, जातियों, संस्कृतियों और परंपराओं से जुड़े लोगों को पहचाने और उनकी रक्षा करे। राज्य का कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को किसी भी प्रकार के भेदभाव और अत्याचार से बचाए और उनके कल्याण के लिए भी जिम्मेदार रहे। इसके बदले में आरक्षण की नीति लागू की गई। यह देश के सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की रक्षा के लिए किया गया था। राज्य ने नस्ल, जाति, पंथ, रंग, लिंग, धर्म या भाषा के आधार पर अस्पृश्यता और भेदभाव को भी समाप्त कर दिया। आरक्षण की नीति का उद्देश्य देश में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों जैसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को अन्य वर्गों और जातियों की तरह समान अवसर प्रदान करना है। 

संविधान अल्पसंख्यकों को अपने स्वयं के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का भी अधिकार देता है। राज्य द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों में भी उनके लिए सीटें आरक्षित की जाती हैं, लेकिन इसका उद्देश्य उन छात्रों के साथ भेदभाव करना कभी नहीं था जिन्होंने योग्यता के माध्यम से सीटें हासिल कीं। हालाँकि, अब इस आरक्षण नीति का दुरुपयोग किया जाता है और छात्रों के साथ उनके धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव किया जाता है। यह समझना आवश्यक है कि इस नीति को एक सकारात्मक उद्देश्य के साथ पेश किया गया था और यदि वह उद्देश्य प्राप्त हो जाता है, तो व्यक्तिगत लाभ के लिए इसका दुरुपयोग करने से बेहतर है कि इसे वापस ले लिया जाए। इस प्रकार, सरकार के लिए आरक्षण नीति और उसके परिणामों को नजरअंदाज करना और इस संबंध में नियम बनाना आवश्यक हो जाता है ताकि कोई भी योग्य छात्र प्रवेश या अन्य अवसरों के लिए अस्वीकार न किया जाए। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

वर्तमान मामले में अपीलकर्ता का प्रतिनिधित्व किसने किया?

वी.के.टी. चारी, मद्रास राज्य के महाधिवक्ता ने आर. गणपति अय्यर के साथ इस मामले में मद्रास राज्य का प्रतिनिधित्व किया था। 

वर्तमान मामले में प्रतिवादी का प्रतिनिधित्व किसने किया?

उत्तरदाताओं का प्रतिनिधित्व अल्लादी कुप्पुस्वामी अय्यर के साथ अधिवक्ता अलियादी कृष्णास्वामी अय्यर ने किया। 

वर्तमान मामले में मद्रास उच्च न्यायालय का निर्णय क्या था?

मद्रास उच्च न्यायालय ने सांप्रदायिक सरकारी आदेश को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित कर दिया कि इसने याचिकाकर्ता (इस मामले में प्रतिवादी) के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया है। 

संदर्भ

  • Reservation Policies in India, 2023 SCC OnLine Blog LME 6 

 

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