राष्ट्रपति की विधायी शक्तियां

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Constitution of India

यह लेख बनस्थली विश्वविद्यालय की कानून की छात्रा Shiwangi Singh ने लिखा है। यह लेख मुख्य रूप से राष्ट्रपति की शक्तियों और जिस तरह से वह देश के मुद्दों से निपट सकता है, जिस प्रक्रिया के माध्यम से विभिन्न विधेयक (बिल) पारित होते हैं, और राष्ट्रपति प्रशासन के सुचारू कामकाज को कैसे सुनिश्चित करता है, के बारे में बात करता है। इस लेख का अनुवाद Sameer Choudhary ने किया है।

Table of Contents

परिचय

जब हम राष्ट्रपति की विधायी शक्तियों के बारे में बात करना शुरू करते हैं, तो हमें ‘कानून’ शब्द के महत्व को समझने की जरूरत है। अगर किसी के पास विधायी शक्तियां हैं, तो इसका मतलब है कि उसके पास देश के कानून बनाने और उनका पालन करवाने का अधिकार है। उसके पास देश में प्रचलित परिस्थितियों के अनुसार नए कानून बनाने की सर्वोच्च शक्ति है। संविधान की रक्षा करना राष्ट्रपति का दायित्व है। वह राष्ट्र की एकता, अखंडता (इंटीग्रिटी) और एकजुटता (यूनिटी) का प्रतीक है।

राष्ट्रपति को-

  • भारतीय राज्य का मुखिया।
  • देश का पहला नागरिक।
  • सभी भारतीय सशस्त्र बलों का कमांडर इन चीफ घोषित किया जाता है।

राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल (इलेक्टोरल कॉलेज) द्वारा किया जाता है जिसमें लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य (सांसद), राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों दिल्ली और पुडुचेरी की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य (विधायक) होते हैं।

राष्ट्रपति अपने कार्यालय में प्रवेश करने की तारीख से 5 साल की अवधि के लिए अपना पद धारण करता है।

भारत के राष्ट्रपति की विधायी शक्तियां 

सदन को बुलाने, सत्रावसान (प्रोरोग) करने और भंग करने की राष्ट्रपति की शक्ति

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 85 के अनुसार, भारत का राष्ट्रपति,

  • अनुच्छेद 85(1) – वह संसद के दोनों सदनों को बुलाता है, जिसका अर्थ है कि वह उन्हें एक निश्चित समय और स्थान पर उपस्थित होने का आदेश दे सकता है।
  • अनुच्छेद 85(2)(a) – संसद के दोनों सदनों का सत्रावसान, जिसका अर्थ है कि वह सदनों को भंग किए बिना संसद के सत्र को समाप्त कर सकता है।
  • अनुच्छेद 85 (2)(b) – लोकसभा को उसके पूर्ण कार्यकाल से पहले या कार्यकाल पूरा होने के बाद भंग कर सकता है, दोनों ही मामलों में नए सदस्यों को सदन में नियुक्त करने के लिए नए आम चुनाव होंगे।
  • एडजोर्नमेंट साइन डाइन 

इसका अर्थ है “आगे की बैठक या सुनवाई के लिए एक दिन निर्धारित किए बिना”, राष्ट्रपति सदन को अनियत काल के लिए स्थगित कर सकता है। जिसका अर्थ है कि इसे अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया है और सभा या उपस्थित होने की अगली तारीख की घोषणा नहीं की गई है।

अनुच्छेद 108 के अनुसार,

  • भारत का राष्ट्रपति लोकसभा अध्यक्ष की उपस्थिति में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला सकता है। इस तरह की बैठकें दोनों सदनों के बीच किसी विधेयक को पारित करने को लेकर उत्पन्न होने वाले संघर्ष को दूर करने के लिए आयोजित की जाती हैं।

अनुच्छेद 108(1) में कहा गया है कि संयुक्त बैठक तब आयोजित की जा सकती है जब-

  • अनुच्छेद 108 (1)(a) – विधेयक को दूसरे सदन द्वारा खारिज कर दिया जाता है।
  • अनुच्छेद 108(1)(b) – विधेयक में किए गए संशोधनों से सदन असहमत है।
  • अनुच्छेद 108 (1) (c) – यदि किसी सदन द्वारा पारित विधेयक किसी भी सदन में किसी भी मुद्दे के कारण 6 महीने से अधिक समय तक रहता है तो राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुला सकता है। लेकिन यह मनी विधेयक पर लागू नहीं होता है।

सदनों को संबोधित करने की राष्ट्रपति की शक्ति

अनुच्छेद 87 के अनुसार, राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों के दौरान एक विशेष उद्घाटन (ओपनिंग) भाषण देता है:

  • अनुच्छेद 87(1) – दोनों सदनों के प्रत्येक आम चुनाव एवं सभी सदस्यों द्वारा शपथ लेने के बाद और अध्यक्ष चुने जाने के बाद पहला सत्र।
  • हर साल पहले सत्र की शुरुआत जहां दोनों सदन एक साथ उपस्थित होते हैं। इस सत्र में राष्ट्रपति सत्ताधारी सरकार की विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों के बारे में बात करते हैं और पिछले वर्ष में उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों पर भी प्रकाश डालते हैं।

अनुच्छेद 87(2) – राष्ट्रपति द्वारा ऐसे भाषणों में चर्चा के लिए विभिन्न मामलों के लिए समय आवंटित (एलॉटमेंट) करने के बारे में नियम बनाए जाने चाहिए।

संयुक्त बैठक बुलाने की राष्ट्रपति की शक्ति

अनुच्छेद 86(1) के अनुसार ,

  • राष्ट्रपति को संसद के दोनों सदनों को अलग-अलग या किसी भी समय संयुक्त बैठक के लिए बुलाने का अधिकार दिया गया है। यह बैठक उस विशेष उद्घाटन भाषण से अलग है जो वह प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र में और प्रत्येक आम चुनाव के बाद पहले सत्र में करते हैं।

उपरोक्त अधिकार को ‘संबोधन का अधिकार’ कहा जाता है जिसका प्रयोग वह वर्ष के किसी भी समय कर सकता है।

अनुच्छेद 86(2) के अनुसार,

  • राष्ट्रपति को किसी भी मुद्दे के बारे में संसद के दोनों सदनों को संदेश भेजने का अधिकार है, उदाहरण के लिए- एक लंबित विधेयक।

सदनों में रिपोर्ट प्रस्तुत करने की राष्ट्रपति की शक्ति

भारत के राष्ट्रपति को पद पर रहते हुए समय-समय पर संसद के सामने कई रिपोर्टें पेश करनी होती हैं, वे रिपोर्टें हैं-

  1. अनुच्छेद 112(1) के तहत – राष्ट्रपति को दोनों सदनों के सामने रिपोर्ट पेश करनी होती है जिसमें उस वर्ष के लिए भारत सरकार की प्राप्तियों (रिसिप्ट) और व्यय (एक्सपेंडिचर) का विवरण शामिल होता है।

अनुच्छेद 112(2) के अनुसार, इसे अलग-अलग रिपोर्ट दिखानी चाहिए:

  • कुल व्यय का योग जिसे भारत की संचित निधि (कंसोलिडेटेड फंड) से प्रभारित (चार्ज्ड) करने की बात कही गई थी और वास्तविक व्यय किया गया था।
  • भारत की संचित निधि से किए जाने के लिए प्रस्तावित अन्य व्यय को पूरा करने के लिए आवश्यक राशि, और राजस्व (रेवेन्यू) खाते पर व्यय को अन्य व्यय से अलग करेगा।

2. अनुच्छेद 151(1) के अंतर्गत – भारत सरकार की निधियों के व्यय की वार्षिक लेखा (एनुअल ऑडिट), ये रिपोर्ट भारत के महालेखा परीक्षक (कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) द्वारा तैयार की जाती है।

3. अनुच्छेद 323(1) के तहत- संघ लोक सेवा आयोग की वार्षिक रिपोर्ट, इन रिपोर्टों में उस वर्ष यूपीएससी द्वारा किए गए कार्यों के बारे में विवरण और हर साल आयोजित होने वाली सिविल परीक्षाओं के बारे में कुछ रोचक तथ्य उदाहरण के लिए, परीक्षा में बैठने वाले विषय के विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित उम्मीदवारों की कुल संख्या शामिल हैं। 

4. अनुच्छेद 281– आयोग द्वारा की गई कार्रवाइयों के बारे में लिखित रूप में विवरण की व्याख्या करते हुए वित्त आयोग की रिपोर्ट।

वित्त आयोग केंद्र और राज्य सरकारों के वित्त की स्थिति का मूल्यांकन करता है।

  • अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के विशेष अधिकारियों की रिपोर्ट।
  • भाषाई अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्गों के विशेष अधिकारियों की रिपोर्ट।

विशेष नियम बनाने की राष्ट्रपति की शक्ति

अनुच्छेद 239 के तहत, राष्ट्रपति के पास केंद्र शासित प्रदेशों के लिए विशेष नियम बनाने की शक्ति है।

  • कुछ परिस्थितियों में, राष्ट्रपति अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप, दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव और पुडुचेरी के केंद्र शासित प्रदेशों की शांति, प्रगति और सुशासन के लिए नियम बना सकते हैं।
  • पुडुचेरी के मामले में, राष्ट्रपति केवल तभी नियम बना सकते हैं जब विधानसभा भंग और निलंबित हो।
  • वह लोकसभा के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति और उपसभापति की नियुक्ति करता है।
  • वह सांसदों की अयोग्यता के प्रश्नों पर भारत के चुनाव आयोग से परामर्श करता है।

राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियां

  • वह सभी भारतीय सशस्त्र बलों के कमांडर इन चीफ हैं।
  • उनके पास मंत्रियों और प्रधान मंत्री की सलाह पर किसी भी राष्ट्र के साथ युद्ध की घोषणा करने या शांति बनाए रखने की शक्ति है।
  • राष्ट्र के राष्ट्रपति के नाम पर अन्य राष्ट्रों के साथ सभी प्रकार की संधियों पर हस्ताक्षर किए जाते हैं।

विधेयकों को स्वीकृति देने की राष्ट्रपति की शक्ति

एक विधेयक एक विधायी मसौदा (ड्राफ्ट) है जिसमें किसी देश के सुचारू कामकाज के लिए उपाय या नियम शामिल होते हैं। यदि कोई विधेयक संसद के सदस्यों द्वारा सफलतापूर्वक सहमत और पारित हो जाता है, तो इसके बाद राष्ट्रपति सहमत होते हैं और उस पर अपनी सहमति देते हैं और फिर यह एक अधिनियम बन जाता है।

विधेयक को लेकर संसद में कड़ा चिंतन किया जाता है, क्योंकि अंततः यह भारतीय संविधान का निर्माण खंड (बिल्डिंग ब्लॉक) बनने जाता है।

अनुच्छेद 111 के अनुसार, जब कोई विधेयक सदनों द्वारा पारित किया जाता है तो उसे राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए, वह या तो विधेयक पर अपनी सहमति देगा या अपनी सहमति को रोक देगा बशर्ते कि राष्ट्रपति जितनी जल्दी हो सके विधेयक को संशोधन किए बिना फिर से विचार के लिए सदन के पास वापस भेज सकता है। जब विधेयक सदन में आता है और यदि सदन उस विधेयक को संशोधन करके या न करके फिर से भेजता है, तो राष्ट्रपति को उस पर अपनी सहमति देनी होगी।

साधारण विधेयकों के मामले में, राष्ट्रपति विधेयक की शर्तों से सहमत हो सकता है, अपनी सहमति रोक सकता है या आवश्यक परिवर्तन करने के लिए इसे संसद को वापस भेज सकता है।

धन विधेयकों के मामले में, वह या तो अपनी सहमति दे सकता है या अपनी सहमति रोक सकता है, वह इसे पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकता है।

संविधान संशोधन विधेयकों के मामले में, उसे विधेयक से सहमत होना होता है, वह न तो असहमत हो सकता है और न ही उसे वापस सदन में भेज सकता है।

धन और वित्त विधेयक 

धन विधेयक और वित्त विधेयक दोनों को पेश करने से पहले राष्ट्रपति की सहमति की आवश्यकता होती है, हालांकि, वित्त विधेयक एक साधारण विधेयक होता है जबकि धन विधेयक एक सरकारी विधेयक होता है।

अनुच्छेद 110(1) के अनुसार किसी भी विधेयक को डीम्ड धन विधेयक कहा जाता है यदि उसमें निम्नलिखित में से किसी एक का उल्लेख हो-

  • किसी भी कर का उन्मूलन (एबोलिशन), परिवर्तन, छूट या विनियमन।
  • भारत सरकार द्वारा किया गया धन उधार या भारत सरकार द्वारा प्रदान की गई किसी भी प्रकार की गारंटी।
  • भारत सरकार द्वारा किए गए या भारत सरकार द्वारा उठाए जाने वाले वित्तीय दायित्वों में संशोधन।
  • भारत की संचित निधि या आकस्मिकता निधि (कंटिंजेंसी फंड), ऐसे किसी भी निधि में धन का भुगतान या उससे धन की निकासी।
  • भारत की संचित निधि से धन का विनियोग (अप्रोप्रिएशन)।
  • भारत की संचित निधि द्वारा किया गया व्यय।
  • भारत की संचित निधि या भारत के सार्वजनिक खाते में धन की प्राप्ति
  • इस तरह के पैसे की हिरासत या जारी करना और संघ और राज्य के खातों की लेखा।

अनुच्छेद 110(2) के अनुसार, किसी विधेयक को केवल इसलिए धन विधेयक नहीं कहा जाएगा क्योंकि यह स्थानीय निकायों द्वारा जुर्माना लगाने, आर्थिक दंड, लाइसेंस के लिए शुल्क, सेवाओं के लिए शुल्क या किसी भी कर के उन्मूलन, छूट, परिवर्तन या विनियमन से संबंधित है। 

एक वित्तीय विधेयक राजस्व और व्यय के प्रावधानों जैसे मौजूदा कर संरचना में बदलाव, नए करों को लागू करना और पुरानी कर प्रणालियों को जारी रखना से संबंधित है।

लोकसभा को भंग करने की राष्ट्रपति की शक्ति

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 83 के तहत, भारत के राष्ट्रपति के पास लोकसभा को भंग करने की शक्ति है। लोकसभा को निम्नलिखित परिस्थितियों में भंग किया जा सकता है-

  • आम तौर पर, राष्ट्रपति लोकसभा में फिर से बहुमत हासिल करने के लिए, 5 साल के कार्यकाल के पूरा होने के बाद प्रधान मंत्री की सलाह पर लोकसभा को भंग कर देता है।
  • यदि प्रधानमंत्री बहुमत खोने पर राष्ट्रपति को सलाह देता है, तो वह लोकसभा को भंग कर सकता है।
  • राष्ट्रपति संसद को सुन सकता है और लोकसभा को भंग कर सकता है यदि वह पाता है कि सत्तारूढ़ दल के भीतर संघर्ष है, और दल की स्थिति भ्रमित करने वाली है।
  • वह लोकसभा को भंग कर सकता है यदि वह पाता है कि प्रधान मंत्री असंवैधानिक रूप से कार्य कर रहा है, सदन में अपनी शक्तियों और बहुमत का दुरुपयोग कर रहा है। यहां राष्ट्रपति के इस कृत्य को संवैधानिक माना जाएगा।

सदस्यों को नियुक्त करने की राष्ट्रपति की शक्ति 

  • अनुच्छेद 80(1) के अनुसार, राष्ट्रपति राज्यसभा में 12 सदस्यों को नियुक्त कर सकता है, जिन्हें कला, साहित्य, विज्ञान और सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र में व्यावहारिक अनुभव और पर्याप्त ज्ञान है।
  • अनुच्छेद 331 में दिया गया है कि यदि राष्ट्रपति को लगता है कि लोकसभा में एंग्लो-इंडियन समुदाय का अच्छी तरह से प्रतिनिधित्व नहीं है, तो वह एंग्लो-इंडियन समुदाय से 2 से अधिक सदस्यों को नियुक्त नहीं कर सकता है। लेकिन जनवरी 2020 में, संसद और राज्य विधानसभाओं में आरक्षित इन सीटों को 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 द्वारा बंद कर दिया गया।
  • वह भारत के अटॉर्नी जनरल की नियुक्ति करता है और उसका पारिश्रमिक (रिम्यूनरेशन) निर्धारित करता है।
  • वह भारत के चुनाव आयोग और वित्त आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति करता है।
  • वह भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति करता है।
  • वह भारत के संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति करता है।
  • वह केंद्र शासित प्रदेशों और राज्य परिषद के प्रशासकों की नियुक्ति करता है।
  • वह भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करता है।

राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियां

राष्ट्रपति निम्नलिखित मामलों में आपातकालीन शक्तियों का प्रयोग कर सकते हैं –

  1. राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352 (1)) – मंत्रियों के मंत्रिमंडल द्वारा किए गए अनुरोध पर, राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं यदि उन्हें यह विश्वास हो जाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा या देश के किसी भी हिस्से को युद्ध या बाहरी आक्रमण, या सशस्त्र विद्रोह से खतरा है।
  2. राज्य आपातकाल (अनुच्छेद 356 और अनुच्छेद 365) – इसे राष्ट्रपति शासन के रूप में भी जाना जाता है। यदि किसी कारण से राज्य का प्रशासनिक निकाय (एडमिनिस्ट्रेटिव बॉडी) ध्वस्त हो जाता है या यह पाया जाता है कि राज्य सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार राज्य पर शासन नहीं कर सकती है, तो राष्ट्रपति आपातकाल की घोषणा कर सकता है।
  3. वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) – यह राष्ट्रपति द्वारा लगाया जाता है यदि उन्हें लगता है कि देश की वित्तीय स्थिरता खतरे में है। वित्तीय आपातकाल की घोषणा करने वाली उद्घोषणा को उसके जारी होने की तारीख से 2 महीने के भीतर दोनों सदनों द्वारा अनुमोदित (अप्रूव्ड) किया जाना चाहिए।

राष्ट्रपति की अध्यादेश (ऑर्डिनेंस) बनाने की शक्तियां

राष्ट्रपति के पास अध्यादेश बनाने की शक्तियां हैं जो केवल उन मामलों पर जारी की जा सकती हैं जिन पर संसद कानून बना सकती है। राष्ट्रपति अध्यादेश जारी करके संसद के किसी अधिनियम में संशोधन या निरसन (रिपील) कर सकता है, लेकिन यह केवल थोड़े समय के लिए ही प्रचलित होगा, क्योंकि अध्यादेश कम अवधि के लिए ही जारी किए जाते हैं।

संशोधन

  1. 38वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1975

अनुच्छेद 123 में एक नया खंड (4) पेश किया गया था जिसमें कहा गया था कि यदि राष्ट्रपति संतुष्ट हैं और अध्यादेश जारी करने से सहमत हैं, तो न्यायिक समीक्षा (ज्यूडिशियल रिव्यू) के लिए उस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है।

2. 44वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1978

अनुच्छेद 123 में सम्मिलित खंड (4) को हटा दिया गया और इसने अध्यादेश को पूछताछ और न्यायिक समीक्षा के लिए खोल दिया।

प्रासंगिक मामला:

एके रॉय बनाम भारत संघ, 1981 – यह निर्णय लिया गया कि राष्ट्रपति के निर्णय की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है, लेकिन केवल सार्थक आधार पर और “हर लापरवाह और आकस्मिक चुनौती” पर नहीं की जा सकती है।

भारत की संसद के पास राष्ट्रपति की तुलना में किसी भी कानून में संशोधन करने की अधिक शक्तियां हैं, राष्ट्रपति केवल अध्यादेशों की सहायता से संशोधन कर सकता है।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार , संसद को संशोधन करने की शक्ति है-

  • अनुच्छेद में बताई गई उचित प्रक्रिया का पालन करके संसद संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन या बदलाव ला सकती है।
  • किसी भी प्रकार के संशोधन की शुरुआत एक विधेयक को पेश करने से होती है जिसे अपनी स्वीकृति का स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने के लिए दोनों सदनों में पारित करना होता है और फिर राष्ट्रपति को उसकी सहमति के लिए भेजा जाता है, उसके बाद निम्नलिखित संशोधन कार्रवाई में आते हैं।
  • अनुच्छेद 13 की कोई बात इस अनुच्छेद के अधीन किए गए किसी संशोधन पर लागू नहीं होगी।
  • इस अनुच्छेद के तहत संविधान के प्रावधानों को जोड़कर, बदलाव या निरस्त करके किसी भी कानून में संशोधन करने की कोई सीमा नहीं है।

अध्यादेश बनाना

अध्यादेश एक प्रकार का कानून है जो राष्ट्रपति द्वारा तब प्रचारित किया जाता है जब दोनों सदन सत्र में नहीं होते हैं या जब उनमें से कोई भी सत्र में नहीं होता है। अध्यादेश के प्रचार-प्रसार के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश जरूरी है। अध्यादेश केवल उन्हीं मामलों पर जारी किया जा सकता है जिन पर संसद कानून बना सकती है।

राष्ट्रपति एक अध्यादेश जारी करता है जब वह किसी भी स्थिति के बारे में आश्वस्त होता है जिसके लिए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता होती है और यह आश्वस्त होता है कि स्थिति संसद के सत्र में आने की प्रतीक्षा नहीं कर सकती है।

एक अध्यादेश को सक्रिय होने के लिए, इसे 6 सप्ताह के भीतर संसद द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए या वे काम करना बंद कर देंगे। भले ही दोनों सदन इससे असहमत हों, अध्यादेश कार्य करना बंद कर देगा। संसद को अध्यादेश की घोषणा के 6 सप्ताह के भीतर बैठना आवश्यक है।

अनुच्छेद 123 राष्ट्रपति की अध्यादेश बनाने की शक्तियों से संबंधित है, जिसे एक बहुत ही महत्वपूर्ण विधायी शक्ति माना जाता है। 

निष्कर्ष 

भारत के राष्ट्रपति वास्तव में हमारे देश के प्रशासन में एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं। संसद के सत्र को संबोधित करने से लेकर अध्यादेश जारी करने तक, उन्हें प्रमुख भूमिकाएँ निभानी हैं। राष्ट्रपति एक ठोस व्यक्ति की तरह खड़ा होता है जो हर मामले को देखता है और उसके प्रति या उसके खिलाफ अपनी इच्छा देता है, इस तरह उसे देश में होने वाली हर चीज से अवगत रखा जाता है। राष्ट्रपति के बिना, राजनीतिक दलों, संसद के सदनों के लिए राजनीतिक मामलों पर अपने गतिरोध को हल करना मुश्किल होगा जो निश्चित रूप से भारत जैसे देश में सुचारू प्रशासनिक कामकाज को कम करेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू) 

क्या राज्यसभा के बिना विधेयक पास हो सकता है?

केवल धन विधेयक को राज्य सभा के अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है अन्यथा अन्य सभी विधेयकों को राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करने से पहले दोनों सदनों से अनुमोदन की आवश्यकता होती है।

भारत के राष्ट्रपति की वीटो शक्ति क्या है?

राष्ट्रपति के पास 3 प्रकार की वीटो शक्ति होती है:

  • पूर्ण वीटो- वह विधेयक से पूरी तरह असहमत होता है, उसे वहीं समाप्त कर देता है और यह कभी भी अधिनियम नहीं बनता है।
  • निरोधात्मक (सस्पेंसिव) वीटो- वह विधेयक को विचार के साथ या बिना संसद में वापस लौटाता है।
  • पॉकेट वीटो- वह कोई राय नहीं देता और किसी भी मामले में तटस्थ (न्यूट्रल) रहता है।

अध्यादेश की अधिकतम आयु कितनी होती है?

6 महीने और 6 सप्ताह

संदर्भ 

 

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