जोगिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1962)

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यह लेख Subhashree S द्वारा लिखा गया है। इसमें जोगिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले जो पंजाब शैक्षिक सेवा (प्रांतीयकृत संवर्ग) श्रेणी III नियम, 1961 की संवैधानिक वैधता के बारे में विस्तार से चर्चा की गई है। इसमें तथ्यों, मुद्दों और पक्षों के तर्कों, मामले के महत्व और निर्णय पर चर्चा की गई है। इसमें निर्णय का मुद्दावार विश्लेषण भी प्रस्तुत किया गया है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है। 

Table of Contents

परिचय

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 16 नवंबर, 1962 को जोगिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1962) मामले में पंजाब शैक्षिक सेवा (प्रांतीयकृत संवर्ग) श्रेणी III नियम, 1961 की संवैधानिक वैधता पर विचार करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया। यह मामला पंजाब उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील से उभरा, जहां अदालत ने जोगिंदर सिंह की याचिका को आंशिक रूप से बरकरार रखा, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 16(1) के उल्लंघन का हवाला देते हुए इन नियमों को चुनौती दी गई थी। इस मामले की जांच में सेवा एकीकरण, सरकारी रोजगार में समानता और प्रशासनिक विवेक के जटिल पहलुओं को शामिल किया गया था। इस मामले के मूल प्रश्न इसमें शामिल पक्षों से कहीं आगे तक फैले हुए हैं। इसमें यह बताया गया है कि प्रशासनिक अधिकारों और मौलिक अधिकारों में किस प्रकार संतुलन बनाया जाए। इसके अलावा, न्यायालय का निर्णय न केवल पंजाब में बल्कि पूरे भारत में लोक सेवकों के भाग्य को प्रभावित करता है, क्योंकि यह संविधान में निहित सरकारी नौकरियों में गैर-भेदभाव और समान अवसर की पुष्टि करता है। 

मामले का विवरण

  • मामले का नाम: जोगिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1962)
  • मामला संख्या: सिविल अपील संख्या 388/1962
  • समतुल्य उद्धरण: 1963 एआईआर 913, 1963 एससीआर (2) 169, एआईआर 1963 सर्वोच्च न्यायालय 913
  • अदालत: भारत का सर्वोच्च न्यायालय
  • पीठ: बी.पी.सिन्हा, जे.सी.शाह, के.सुब्बा राव, के.एन. वांचू, और एन. राजगोपाल अयंगर, न्यायाधीश
  • अपीलकर्ता: जोगिंदर सिंह
  • प्रतिवादी: पंजाब राज्य
  • निर्णय की तिथि: 16 नवंबर 1962 

जोगिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1962) के तथ्य

1 नवम्बर 1956 को पंजाब राज्य का पुनर्गठन किया गया था। पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ (भाग ‘B’ राज्य) का पंजाब में विलय कर दिया गया। शैक्षिक और प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए, इस क्षेत्र को शिक्षकों के एक अलग संवर्ग (काडर) के साथ एक अलग प्रभाग के रूप में बनाए रखा गया था। 

प्रतिवादी होशियारपुर के जिला बोर्ड हाई स्कूल में एक “कनिष्ठ (जूनियर) स्थानीय भाषा शिक्षक” था। 27 सितम्बर, 1957 को पंजाब सरकार ने शिक्षा विभाग के सचिव से लेकर सार्वजनिक संस्थानों के निदेशकों को कार्यकारी निर्देश जारी किए, जिसके तहत ऐसे अध्यापकों की स्थिति और सेवा शर्तों में परिवर्तन किया गया, जिसके तहत ये (जिला बोर्ड और नगर निगम कैडर के) अध्यापक राज्य कर्मचारी बन गए। यह 1 अक्टूबर 1957 को प्रभावी हुआ तथा 1959 में पूर्वव्यापी प्रभाव से कानून द्वारा इसका अनुसमर्थन किया गया। 1 अक्टूबर 1957 से पहले पंजाब में (पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ को छोड़कर) दो प्रकार के विद्यालय थे: जिला और नगरपालिका बोर्डों द्वारा संचालित विद्यालय और अन्य राज्य द्वारा संचालित विद्यालय। 

राज्य के विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों की सेवाओं की स्थिति और शर्त संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत तैयार और 30 मई, 1957 को प्रख्यापित “पंजाब शैक्षिक सेवा वर्ग III विद्यालय  कैडर नियम, 1955” द्वारा शासित थी। ये नियम योग्यता, भर्ती प्राधिकार, सेवा शर्तें और वरिष्ठता को नियंत्रित करते थे। नियमों के परिशिष्ट में विभिन्न श्रेणीयो (ग्रेड) में आने वाले शिक्षकों के लिए वेतनमान शामिल थे, जिन्हें वेतन समीक्षा समिति की सिफारिश के तहत सरकार द्वारा 23 जुलाई 1957 को एक आदेश जारी करके संशोधित किया गया था। योजना का परिच्छेद 3 शिक्षा विभाग के कर्मचारियों पर लागू होता है, और शिक्षकों को उनकी योग्यता के आधार पर श्रेणी ‘A’ और ‘B’ में वर्गीकृत किया गया है। तदनुसार, कनिष्ठ शिक्षकों (श्रेणी B) को तीन समूहों में विभाजित किया गया: 

  1. प्रधानाध्यापक: कोई निश्चित संख्या नहीं थी; यह उन विद्यालयों की संख्या पर निर्भर करता था जिनमें वे काम कर सकते थे।
  2. मध्यम वेतनमान: प्रधानाध्यापकों सहित 15% कनिष्ठ अध्यापकों का वेतनमान (पे स्केल), हालांकि इससे भी ऊंचे वेतनमान पर था, 120-5-175 था (जहां 120 मूल वेतन था, 5 वार्षिक वेतन वृद्धि थी, तथा 175 इस वेतनमान में प्राप्त होने वाला अधिकतम वेतन था)। 
  3. निम्न वेतनमान: शेष 85% कनिष्ठ शिक्षक 60-4-80 वेतनमान पर (जहाँ 60 मूल वेतन था, 4 वार्षिक वेतन वृद्धि थी, तथा 80 इस वेतनमान पर प्राप्त होने वाला अधिकतम वेतन था)। 

तथा 15% कनिष्ठ अध्यापकों को वरिष्ठता और योग्यता के आधार पर मध्यम वेतनमान में पदोन्नत किया जाना था, तथा शेष को निम्न वेतनमान पर रखा जाना था। 

1 अक्टूबर, 1957 के सरकारी निर्देश के परिणामस्वरूप प्रांतीयकरण (प्रोविंशियलाइजेशन) (जो वह प्रक्रिया है जिसके तहत पहले स्थानीय निकायों जैसे नगरपालिका और जिला बोर्डों द्वारा प्रबंधित विद्यालयों को राज्य सरकार द्वारा अपने अधीन ले लिया गया था) किया गया, अंबाला और जालंधर संभागों में पहले नगरपालिका और जिला बोर्डों द्वारा संचालित विद्यालयों को पंजाब सरकार, शिक्षा विभाग द्वारा अपने अधीन ले लिया गया। 

जिन विद्यालयों को अधिग्रहित किया गया उनमें 20,709 कनिष्ठ शिक्षक थे। सरकार ने 23 जुलाई 1957 के सरकारी आदेश में राज्य संवर्ग के कनिष्ठ शिक्षकों के लिए प्रयुक्त 15:85 अनुपात (मध्यम से निम्न वेतनमान) को ही लागू किया। परिणामस्वरूप, 3,184 शिक्षकों को मध्यम वेतनमान पर रखा गया तथा शेष 17,525 को न्यूनतम वेतन के साथ निम्न श्रेणी में रखा गया था। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया था कि प्रांतीय स्थानीय निकाय विद्यालयों में कनिष्ठ शिक्षकों को भी सरकारी नौकरी में कार्यरत उनके समकक्षों के समान वेतन और भत्ते प्राप्त हों। 

इस कार्रवाई के बाद सरकार के पास विचार हेतु तीन प्रश्न थे: 

  1. क्या प्रांतीय और राज्य संवर्ग के शिक्षकों को अलग रखा जाना चाहिए या एकीकृत किया जाना चाहिए?
  2. यदि एकीकृत किया गया तो वरिष्ठता का निर्धारण कैसे किया जाएगा?
  3. यदि एकीकृत नहीं किया गया तो दोनों संवर्गों के बीच संबंध क्या होना चाहिए?

इन विचारों पर सरकार का निर्णय 27 जनवरी, 1960 को नीति वक्तव्य के रूप में एक पत्र में सूचित किया गया था। इसका निर्णय इस प्रकार था: 

  1. दो संवर्ग, प्रांतीयकृत और राज्य शिक्षक संवर्ग, अलग-अलग बने रहेंगे।
  2. सरकार प्रत्येक संवर्ग में निम्न से लेकर मध्यम श्रेणी तक पदोन्नति (प्रमोशन) के लिए सिद्धांत तैयार करेगी।

पंजाब सरकार के इस निर्णय के कारण यह मामला सामने आया, जहां प्रतिवादी ने अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर करके निर्णय की वैधता को चुनौती दी, जिसमें कहा गया कि इसमें वैधानिक बल का अभाव है और यह संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत तैयार नहीं किया गया है। आपत्ति का समाधान करने के लिए पंजाब सरकार ने विवादित नियम लागू किये। अंततः, ये नियम संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत औपचारिक आवश्यकता के अनुरूप थे, लेकिन अन्यथा वे 1960 के निर्देशों के समान थे। इस प्रकार, प्रतिवादी की याचिका को सरकार के 1960 के निर्देशों के बजाय विवादित नियमों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने के लिए परिवर्तित कर दिया गया। 

इन नियमों की वैधता को चुनौती देने के समर्थन में उच्च न्यायालय में निम्नलिखित तर्क दिए गए: 

  1. यह तर्क दिया गया कि जब अक्टूबर 1957 में आदेश को क्रियान्वित किया गया था, तो उसने प्रांतीय शिक्षकों को राज्य संवर्ग के शिक्षकों के समान समान श्रेणी, वेतनमान और भत्ते तथा समान अधिकार और शर्तें प्रदान की थीं। इसका तात्पर्य प्रांतीय और राज्य संवर्ग के शिक्षकों का एक ही वर्ग में पूर्ण एकीकरण है। इस प्रकार, कोई भी बाद का आदेश जो दोनों को अलग करता है, संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत भेदभावपूर्ण है। 
  2. नियमों में प्रांतीय शिक्षकों के साथ मध्य वेतनमान में पदोन्नति के मामले में भेदभाव किया गया, जो अनुच्छेद 16(1) का उल्लंघन है। 
  3. तर्कहीन वर्गीकरण के कारण पेंशन में असमानता थी, जिससे संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन हुआ। 

इन नियमों की वैधता को चुनौती देने के विरुद्ध उच्च न्यायालय में निम्नलिखित तर्क दिए गए: 

  1. योग्यता और भर्ती पद्धति में महत्वपूर्ण अंतर है, जहां राज्य संवर्गों के लिए उच्च योग्यता की आवश्यकता होती है और प्रांतीय सेवा के विपरीत, लोक सेवा आयोग द्वारा भर्ती की जाती है। 

माननीय पंजाब उच्च न्यायालय ने दो संवर्ग बनाने के प्रतिवादी के तर्कों से सहमति व्यक्त की तथा माना कि उन्हें एक ही वर्ग के सरकारी कर्मचारी माना जाता है तथा विवादित नियमों के कारण प्रांतीय संवर्ग के शिक्षकों को पदोन्नति के लिए समान अवसर से वंचित होना पड़ता है। इसके अलावा, यह माना गया कि प्रांतीय संवर्ग की रिक्तियों पर भर्ती को राज्य संवर्ग के समान मानना तथा उच्च एवं निम्न वेतनमान वाले शिक्षकों के बीच 15% और 85% का एक समान अनुपात बनाए रखना भेदभावपूर्ण था। इस प्रकार, पंजाब शैक्षिक सेवा (प्रांतीयकृत संवर्ग) श्रेणी III नियम, 1961 के नियम 2 (2 संवर्गों की परिभाषा) और नियम 3 (पदोन्नति पर प्रभाव) को शून्य घोषित कर दिया गया। 

पेंशन के संबंध में न्यायालय ने दलीलों को खारिज कर दिया और पाया कि इसमें संविधान के अनुच्छेद 14 का कोई उल्लंघन नहीं है। 

इसी निर्णय के विरुद्ध राज्य सरकार ने विशेष अनुमति के साथ अपील की थी। 

जब सर्वोच्च न्यायालय ने इस अपील पर अपनी सुनवाई शुरू की तो प्रतिवादी द्वारा प्रारंभिक आपत्ति उठाई गई। यह तर्क दिया गया कि जोगिंदर सिंह के साथ, माननीय पंजाब उच्च न्यायालय के समक्ष 3 अन्य समान याचिकाएं दायर की गईं, अर्थात्: 

  • दो कनिष्ठ शिक्षक (रिट याचिका 161 और 162, 1961)।
  • संचालक (हेडमास्टर) अमरीक सिंह (रिट याचिका 163/1961)।

सभी चार याचिकाओं का निपटारा एक ही निर्णय द्वारा किया गया, जिसमें सभी याचिकाकर्ताओं को समान राहत प्रदान की गई। राज्य ने केवल जोगिंदर सिंह की याचिका में ही निर्णय के विरुद्ध अपील की, अन्य तीन याचिकाओं में नहीं की थी। इसलिए, प्रतिवादी के वकील श्री अग्रवाल ने तर्क दिया कि इस अपील में अलग राहत देने से असंगत आदेश उत्पन्न होंगे क्योंकि अन्य 3 याचिकाओं के आदेश अंतिम हो चुके हैं। 

हालाँकि, न्यायालय को इस आपत्ति में कोई दम नहीं दिखा और उसने निर्णय दिया कि अपील पर सुनवाई करने पर कोई रोक नहीं है। न्यायालय ने आगे कहा कि यदि इस मामले में राज्य सरकार की अपील सफल होती है तो पंजाब उच्च न्यायालय द्वारा तीनों याचिकाओं पर दिए गए आदेशों की अंतिमता बरकरार रहेगी। और इस प्रकार प्रतिवादी तथा तीनों याचिकाकर्ताओं को छोड़कर अन्य सभी पर लागू सामान्य कानून वही होगा जो इस मामले में न्यायालय द्वारा निर्धारित किया गया है। 

उठाए गए मुद्दे 

  1. क्या 27 सितम्बर, 1957 के आदेश ने प्रभावी रूप से प्रांतीय शिक्षकों को मौजूदा राज्य शैक्षिक सेवा सदस्यों के साथ एकीकृत किया?
  2. क्या आरोपित नियम संविधान के अनुच्छेद 14 और 16(1) का उल्लंघन करते हैं?
  3. क्या प्रांतीय संवर्ग को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का सरकार का निर्णय असंवैधानिक है?

पक्षों के तर्क

अपीलार्थी

  • अपीलार्थी ने तर्क दिया कि सरकार ने प्रांतीय शिक्षकों की सटीक स्थिति और राज्य संवर्ग के शिक्षकों के साथ उनके संबंधों पर सावधानीपूर्वक विचार किया, जिसके परिणामस्वरूप आपत्तिजनक नियमों को लागू किया गया। 
  • इसके अलावा, यह तर्क दिया गया कि सरकार के पास मौजूदा सरकारी कर्मचारियों के संबंध में प्रांतीय शिक्षकों की वरिष्ठता निर्धारित करने के लिए 3 विचार थे और दो सेवाओं को एकीकृत करने के लिए 3 विकल्प थे: 
  1. औपचारिक रूप से समूहीकरण, स्थानीय निकाय शिक्षकों की पूर्ण सेवा को संयुक्त वरिष्ठता सूची में शामिल करना।
  2. दोनों सेवाओं को एकीकृत करना तथा प्रांतीयकरण की तिथि से सेवा समय की गणना करना। 
  3. प्रांतीय कर्मचारियों और मौजूदा सरकारी स्कूल कर्मचारियों के लिए अलग-अलग समूह रखना।

सरकार ने अच्छी शिक्षा नीति सुनिश्चित करने और शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए तीसरा विकल्प चुना था। 

  • यह तर्क दिया गया कि वे प्रांतीयकरण की प्रक्रिया के बाद भी प्रांतीय कर्मचारियों की सेवा शर्तों के संबंध में निर्णय लेने में सक्षम थे। इसका अर्थ यह था कि वरिष्ठता के नियमों सहित सभी सेवा नियम 1 अक्टूबर 1957 को प्रांतीय कर्मचारियों पर स्वचालित रूप से लागू नहीं होते थे। 
  • राज्य संवर्ग और प्रांतीय संवर्ग के बीच उचित वर्गीकरण था, क्योंकि वे पदोन्नति के उद्देश्य से अलग-अलग संवर्ग बनाते हैं और इस प्रकार कोई भेदभाव नहीं होता हैं। 
  • वकील ने ऑल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एंड असिस्टेंट स्टेशन मास्टर्स एसोसिएशन बनाम जनरल मैनेजर (1959) सी.आर.एंड किशोरी मोहनलाल बख्शी बनाम भारत संघ (1961) जैसे पिछले मामलों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित मिसालों पर भरोसा किया, जिसमें स्थापित किया गया था कि अनुच्छेद 16(1) के अनुसार अवसर की समानता केवल कर्मचारियों के एक ही वर्ग के भीतर लागू होती है, विभिन्न वर्गों के बीच नहीं, और तर्क दिया कि प्रांतीय संवर्ग तब नया बनाया गया था जब जिला और नगरपालिका बोर्ड विद्यालयो  को सरकार ने अपने अधीन कर लिया था और यह अलग-अलग रोजगार स्थितियों के साथ अलग श्रेणी बनाता है। इसलिए, अनुच्छेद 16 सरकारी सेवाओं में विभिन्न श्रेणीयो के सृजन (क्रिएशन) पर रोक नहीं लगाता है, और इसलिए विभिन्न श्रेणीयो में पद धारण करने वाले नागरिकों के बीच अवसर की समानता से इनकार नहीं किया गया था। 

प्रतिवादी

  • नगरपालिका या जिला बोर्ड और राज्य संवर्ग में शिक्षकों के रूप में भर्ती होने के लिए योग्यता में अंतर हो सकता है, लेकिन यह बात अप्रासंगिक हो जाती है कि प्रांतीयकरण कब हुआ, क्योंकि जिन विद्यालयो में वे पहले कार्यरत थे, उन्हें राज्य द्वारा अपने अधीन कर लिया गया था। इसके अलावा, 27 सितम्बर, 1957 के आदेश के तहत, दोनों संवर्ग के शिक्षक एक ही कार्य करते थे और उनका वेतनमान भी एक ही था, तथा पूर्ण रूप से अदला-बदली की स्थिति थी, जहां प्रांतीय शिक्षकों को राजकीय विद्यालयों में स्थानांतरित किया जा सकता था और इसके विपरीत, इस प्रकार पूर्ण एकीकरण का प्रभाव प्रदर्शित होता था। इसके अलावा, इस कथन को पुष्ट करने के लिए 27 सितम्बर, 1957 के ज्ञापन के एक परिच्छेद (पैराग्राफ) का सहारा लिया गया, जिसमें कहा गया था कि प्रांतीय शिक्षकों को वही वेतनमान और भत्ते मिलते हैं जो सरकार द्वारा पहले से ही नियोजित उनके समकक्षों (राज्य संवर्ग शिक्षकों) को मिलते हैं। 
  • यह तर्क दिया गया कि विवादित नियमों के तहत संयुक्त सेवाओं का विभाजन किया गया है, जिसके तहत दो नए संवर्ग बनाए गए हैं, जिनमें सेवाओं के सदस्यों के बीच कोई स्पष्ट अंतर नहीं है, क्योंकि दोनों सेवाओं के बीच समान श्रेणी और वेतनमान तथा लगभग समान सेवा की अन्य शर्तें हैं, इस प्रकार यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। आगे यह तर्क दिया गया कि एक ही कार्य करने वाले कर्मचारियों की दो समानांतर सेवाएं बनाकर या बनाए रखकर अनुच्छेद 14 का उल्लंघन किया गया है, लेकिन उनके वेतन या सेवा की शर्तों में अंतर है। 
  • यह तर्क दिया गया कि अनुच्छेद 16(1) का उल्लंघन किया गया क्योंकि दोनों संवर्ग के शिक्षकों को उच्चतर वेतनमान में पदोन्नति के लिए समान अनुपात (15:85) के अधीन रखा गया, जिसके कारण अनुभवी प्रांतीय शिक्षकों को भी राज्य संवर्ग में शिक्षकों की कम संख्या के कारण नए राज्य संवर्ग के शिक्षकों की तुलना में निचले पदों पर रखा जा सकता है। 1 अक्टूबर 1957 तक राज्य संवर्ग में केवल 107 शिक्षक थे, जिनमें से 15% चयन संवर्ग में थे, जबकि प्रांतीय संवर्ग में 20709 शिक्षक थे, जिनमें से 15% चयन संवर्ग में थे, और जैसे-जैसे वर्ष बीतते गए, प्रांतीय संवर्ग में भर्ती पर रोक लगा दी गई और केवल राज्य संवर्ग में ही भर्ती की जाने लगी, जिससे प्रांतीय संवर्ग के मुकाबले राज्य संवर्ग में पदोन्नति के अवसर बढ़ गए। 

चर्चा किए गए कानून और प्रावधान

पंजाब शैक्षिक सेवा (प्रांतीयकृत संवर्ग) श्रेणी III नियम, 1961:

नियम 2: परिभाषाएँ

खंड (d) में “सेवा” को “पंजाब शैक्षिक (प्रांतीयकृत संवर्ग) श्रेणी III सेवा” के रूप में परिभाषित किया गया है। 

खंड (e) “राज्य संवर्ग” को “पंजाब शैक्षिक (राज्य सेवा) श्रेणी III (विद्यालय संवर्ग)” के रूप में परिभाषित करता है। 

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इन परिभाषाओं को खारिज कर दिया। 

नियम 3: पदों की संख्या और स्वरूप

इस सेवा में परिशिष्ट ‘A’ में सूचीबद्ध पद शामिल थे, लेकिन इनकी संख्या घटती जा रही थी। 

नए पद

किसी भी प्रांतीयकृत विद्यालय के सरकार द्वारा अधिग्रहण (एक्विजिशन) के बाद उसके लिए सृजित पद, प्रांतीयकृत सेवा का नहीं, बल्कि राज्य संवर्ग या समकक्ष शैक्षिक राज्य सेवा का हिस्सा बन जाते हैं। 

मौजूदा रिक्तियां

प्रधानाध्यापक और चयन श्रेणी शिक्षक

1 अक्टूबर 1957 को रिक्त पद प्रांतीय सेवा में ही बने रहे और उन्हें स्थानांतरित नहीं किया गया, जिसका अर्थ है कि वे स्थानीय प्राधिकारियों से लिए गए शिक्षकों के समूह का हिस्सा बने रहे। 

जब साधारण वेतनमान पदों पर कार्यरत शिक्षकों को प्रधानाध्यापक या चयन श्रेणी शिक्षक के रूप में पदोन्नत किया गया, तो साधारण वेतनमान में सृजित रिक्ति को राज्य संवर्ग में स्थानांतरित कर दिया गया।

साधारण वेतनमान पद

1 अक्टूबर 1957 तक साधारण वेतनमान पर जिला या नगरपालिका बोर्ड शिक्षकों के रिक्त पदों को राज्य संवर्ग में स्थानांतरित कर दिया गया। 

प्रांतीयकरण के बाद रिक्तियों को संभालना
  • प्रांतीयकरण के बाद पदोन्नति और सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) के कारण रिक्त पदों को 7 और 6 के संवर्गो में विभाजित करके प्रबंधित किया गया। 
  • 7 रिक्तियों वाले प्रत्येक संवर्ग के लिए, पहली छह रिक्तियों में चयन श्रेणी के पद शामिल थे, और 6 रिक्तियों वाले संवर्ग के लिए, पहली पांच रिक्तियों में चयन श्रेणी के पद शामिल थे। ये चयन श्रेणी पद प्रांतीय सेवा के अंतर्गत ही बने रहे। प्रत्येक संवर्ग में अंतिम रिक्ति को राज्य संवर्ग में स्थानांतरित कर दिया गया। यदि अंतिम रिक्ति चयन श्रेणी पद नहीं थी, तो उसके स्थान पर उस संवर्ग में कोई अन्य चयन श्रेणी पद स्थानांतरित कर दिया गया। यदि यह कार्य उसी ब्लॉक में नहीं किया जा सकता था, तो इसे अगले ब्लॉक में किया जाता था, लेकिन उसके बाद नहीं। 
  • साधारण वेतनमान पद: प्रत्येक ब्लॉक में समान संख्या में साधारण वेतनमान पद राज्य संवर्ग में स्थानांतरित कर दिए गए।

नियम 4: स्थानांतरण का दायित्व

राज्यवार संवर्ग के सेवा भाग के सदस्यों को राज्य के किसी भी सरकारी या प्रांतीय विद्यालय में तैनात किया जा सकता है, जबकि जिलावार संवर्ग के सेवा भाग के सदस्यों को जिले के भीतर तैनात किया जा सकता है। 

नियम 5: पुष्टि

सेवा के वे सदस्य जो अनंतिमीकरण से पहले ही पुष्टिकृत हो गए थे, उन्हें सेवा में पुष्टिकृत माना गया। 

नियम 8: भर्ती की विधि

  • राज्य संवर्ग में कुछ स्थानांतरण के बाद जो चयन श्रेणी रिक्तियां बची रहीं, उन्हें उसी संवर्ग के विद्यमान निचले श्रेणी में से पदोन्नति के माध्यम से भरा गया। 
  • पदोन्नति के लिए कनिष्ठ शिक्षकों के लिए मैट्रिक पास होना आवश्यक नहीं था; इसके बजाय, पांच वर्ष के शिक्षण अनुभव वाले “कनिष्ठ प्रशिक्षित”, “कनिष्ठ मूलभूत प्रशिक्षित” या “विशेष प्रमाणपत्र शिक्षक” पर्याप्त थे। 
  • पदोन्नति केवल वरिष्ठता पर आधारित नहीं होती; बल्कि यह योग्यता पर भी आधारित होती है। 

नियम 9: वरिष्ठता निर्धारण की विधि

इस नियम में सेवाओं के सदस्यों की वरिष्ठता निर्धारित करने की विधि निर्धारित की गई थी। इसका निर्धारण सेवा में उनकी निरन्तर नियुक्ति की तारीखों के आधार पर किया गया था। 

निर्णय का मुद्दावार विश्लेषण

क्या 27 सितम्बर 1957 के आदेश ने प्रांतीय शिक्षकों को मौजूदा राज्य शैक्षिक सेवा सदस्यों के साथ प्रभावी रूप से एकीकृत किया था?

इस प्रश्न को हल करने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय ने 27 सितम्बर, 1957 के आदेश की शर्तों की सावधानीपूर्वक जांच की, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या आदेश का उद्देश्य पूर्ण एकीकरण करना था या उसे प्राप्त करना था। 

सबसे पहले, न्यायालय ने प्रतिवादी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि 27 सितम्बर, 1957 के ज्ञापन में प्रांतीय और राज्य संवर्ग के शिक्षकों को एकीकृत किया गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि न्यायालय ने राज्य संवर्ग के कर्मचारियों और प्रांतीय संवर्ग के लिए पेंशन के नियमों में अंतर पाया, जहां राज्य संवर्ग पेंशन को कक्षा III विद्यालय संवर्ग नियम, 1955 के पैरा 11 द्वारा नियंत्रित किया जाता था, और यह प्रांतीय शिक्षकों पर लागू नहीं था। यह शिकायत प्रतिवादी द्वारा उच्च न्यायालय के समक्ष भी उठाई गई थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया और प्रतिवादी द्वारा इसके खिलाफ कोई अपील नहीं की गई। इस प्रकार, यह सहमति है कि श्रेणी III विद्यालय संवर्ग नियम, 1955 का परिच्छेद 11, प्रांतीय शिक्षकों को दी जाने वाली पेंशन की शर्तों और राशि पर लागू नहीं होता है। 

दूसरे, कक्षा III विद्यालय संवर्ग नियम, 1955 का नियम 9 दोनों संवर्गों में अंतर दर्शाता है। नियम 9 के अंतर्गत, समान श्रेणी के पद और समान या समरूप वेतन श्रेणी वाले राज्य संवर्ग के सदस्यों के बीच वरिष्ठता ऐसे पदों पर उनकी स्थायीकरण की तिथि से निर्धारित की जाती है। इस प्रकार, इस बात की कोई व्याख्या नहीं की गई कि क्या नियम 9 प्रांतीय शिक्षकों और राज्य संवर्ग के कर्मचारियों के बीच वरिष्ठता निर्धारित करने के लिए लागू है या नहीं है। इसके अलावा, नियम 9 के तहत, सेवा की पुष्टि की तारीख वरिष्ठता निर्धारित करने के लिए प्रासंगिक है; इसलिए, 27 सितम्बर, 1957 के आदेश की व्याख्या इस प्रकार नहीं की जा सकती कि सभी प्रान्तीयकृत अध्यापकों को 1 अक्टूबर, 1957 को राज्य संवर्ग में स्थायी कर दिया गया था, क्योंकि यह सम्भव है कि उनमें से अनेक अध्यापक 1 अक्टूबर, 1957 को अभी भी परिषदीय विद्यालयों में परिवीक्षा पर थे, तथा उन्हें स्थायी नहीं किया गया था, और इस प्रकार राज्य सेवा सदस्यों की वरिष्ठता निर्धारित करने के प्रयोजनार्थ उन्हें राज्य संवर्ग में स्वतः स्थायी नहीं माना जा सकता। 

इसके अलावा, आदेश में ऐसा कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं था जो स्पष्ट रूप से एकीकरण के इरादे को दर्शाता हो; बल्कि, यह निर्दिष्ट करने वाला प्रावधान कि प्रांतीय शिक्षकों को समान वेतन और भत्ते प्राप्त होने चाहिए, यह दर्शाता है कि एकीकरण का कोई इरादा नहीं था, क्योंकि यदि एकीकरण का इरादा होता, तो प्रांतीय शिक्षकों को स्वाभाविक रूप से एकीकरण के कारण समान वेतन और भत्ते प्राप्त होते, जिससे अलग प्रावधान अनावश्यक हो जाते। 

तीसरा, राज्य संवर्ग के शिक्षकों के लिए चयन श्रेणी में पदोन्नति के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता मैट्रिक पास तथा पांच वर्ष का शिक्षण अनुभव आवश्यक था, जबकि 20,000 प्रांतीय शिक्षकों में से लगभग 12,000-13,000 ने मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की थी। इस प्रकार, इन अयोग्य शिक्षकों पर राज्य संवर्ग नियम लागू करने से काफी कठिनाई उत्पन्न हो जाती; इसलिए, यह कठिनाई और योग्यता आवश्यकताओं में अंतर यह सुझाव देता है कि पूर्ण एकीकरण का इरादा नहीं था या इसे हासिल नहीं किया गया। 

इस प्रकार, 27 सितम्बर, 1957 का आदेश, वेतन और श्रेणी में समानता साबित करने के अलावा, प्रांतीय शिक्षकों को राज्य सेवा में और अधिक एकीकृत करने का कोई इरादा या प्रावधान नहीं करता है। 

इसके अलावा, न्यायालय ने माना कि अपीलकर्ता के इस तर्क में प्रबलता थी कि जब प्रांतीयकरण किया गया था, तो राज्य संवर्ग के शिक्षकों की तुलना में प्रांतीयकृत शिक्षकों की स्थिति और वरिष्ठता के बारे में प्रश्न उठा था। इसलिए, सावधानीपूर्वक विचार-विमर्श के बाद, सरकार ने नियम 3 को शामिल किया, जिसके तहत प्रांतीय कर्मचारियों और सरकारी विद्यालयों के कर्मचारियों के लिए अलग-अलग संवर्ग बनाए रखने की बात कही गई, जिससे दोनों समूहों के हितों में संतुलन बना रहेगा और उन्हें अलग भी रखा जा सकेगा। यह विचार 1957 से जनवरी 1960 तक किया गया था, और प्रतिवादी ने इस विचार से इनकार नहीं किया, भले ही उन्होंने नियम की वैधता पर सवाल उठाया था। 

इसलिए, दोनों सेवाओं का एकीकरण नहीं हुआ, और एकीकरण तब तक अर्थहीन होता जब तक कि यह पूर्ण न हो; आंशिक एकीकरण अस्तित्व में नहीं था। इसके अलावा, यह विवादित नियम नहीं थे जिन्होंने भेद पैदा किया; बल्कि, यह भेद विवादित नियमों से स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में था।

क्या आरोपित नियमों ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 16(1) का उल्लंघन किया है?

इस मुद्दे का उत्तर देने के लिए, न्यायालय ने पाया कि प्रतिवादी द्वारा उच्च न्यायालय में यह तर्क दिया गया था कि क्या समान वेतन और शर्तों वाली दो सेवाएं अनुच्छेद 14 के तहत भेदभावपूर्ण थीं, जिसका अपीलकर्ता द्वारा प्रतिवाद किया गया था। अपीलकर्ता ने दोनों समूहों के बीच योग्यता और भर्ती पद्धति में महत्वपूर्ण अंतर को उजागर किया तथा कहा कि राज्य संवर्ग के पदों के लिए उच्च योग्यता की आवश्यकता होती है तथा प्रांतीय शिक्षकों के विपरीत, इनकी भर्ती लोक सेवा आयोग द्वारा की जाती है। इस तर्क का प्रतिवादी द्वारा खंडन नहीं किया गया। इस प्रकार, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि महत्वपूर्ण अंतर मौजूद थे, जिससे समूहों के साथ अलग-अलग व्यवहार करने के लिए अनुच्छेद 14 के तहत भेदभाव का दावा करने का कोई आधार नहीं मिलता। 

इसके अलावा, यह तर्क दो विचारों पर आधारित था: 

  1. समान कार्य के लिए समान वेतन मिलना चाहिए, तथा
  2. यदि वेतन और कार्य में समानता है, तो सेवा की शर्तें भी समान होनी चाहिए।

न्यायालय ने कहा कि पहले विचार को इस न्यायालय ने किशोरी मोहन लाल बनाम भारत संघ, 1961 के मामले में खारिज कर दिया था, जहां यह स्पष्ट किया गया था कि समान कार्य करने वाले अधिकारियों के लिए अलग-अलग वेतनमान रखना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करता है, क्योंकि सेवा अवधि के आधार पर वृद्धिशील वेतनमान की अनुमति है, और अमूर्त विचार अनुच्छेद 14 पर लागू नहीं होता है। इसके अलावा, न्यायालय ने कहा कि, उसकी राय में, दूसरा विचार अनुचित था। उदाहरण के लिए, सरकार द्वारा एक ही कार्य के लिए अलग-अलग पदोन्नति संभावनाओं के साथ एक नई सेवा बनाना असंवैधानिक नहीं है। ऐसा इसलिए था क्योंकि सरकार को अपने कार्यबल को प्रभावी ढंग से संगठित करने के लिए स्वतंत्रता की आवश्यकता होती है। ऐसे उदाहरण हो सकते हैं जहां अस्थायी या आपातकालीन कर्मचारियों की आवश्यकता हो, जो स्थायी कर्मचारियों के समान कार्य करते हों और समान वेतन प्राप्त करते हों, लेकिन रोजगार की परिस्थितियां भिन्न हों। इससे इनकार करने से प्रशासन पर अनावश्यक प्रतिबंध लगेंगे। 

निष्कर्ष देते हुए न्यायालय ने कहा कि दोनों सेवाएं महत्वपूर्ण अंतरों के साथ स्वतंत्र रूप से शुरू हुईं तथा 27 सितम्बर, 1957 के सरकारी आदेश ने उन्हें एक सेवा में एकीकृत नहीं किया। चूंकि वे एकीकृत नहीं थे, इसलिए दोनों सेवाओं के बीच पदोन्नति के लिए पारस्परिक वरिष्ठता या तुलना का कोई मुद्दा नहीं था। दोनों सेवाओं के बीच व्यवहार में असमानता समान अवसर से वंचित नहीं करती है, और प्रत्येक समूह के भीतर, संविधान के अनुच्छेद 14 और 16(1) के तहत गारंटीकृत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया गया था। इसलिए, उच्च न्यायालय का यह निर्णय कि नियमों ने एक ही वर्ग से दो वर्ग बना दिए और भेदभाव को जन्म दिया, का कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है। 

जे.सी. शाह द्वारा दिए गए असहमतिपूर्ण निर्णय पर ध्यान देना प्रासंगिक है, जहां न्यायालय ने राज्य संवर्ग के विरुद्ध पदोन्नति में प्रांतीय शिक्षकों द्वारा अनुभव किए गए भेदभाव पर प्रतिवादी के तर्क पर प्रकाश डाला, कि उच्चतर वेतनमानों में पदोन्नति के लिए एक समान अनुपात के कारण, कुछ प्रांतीय शिक्षकों को लगातार कनिष्ठ पद पर रखा जाता था, यहां तक कि राज्य संवर्ग में नए प्रवेशकों को भी। अदालत ने कहा कि नियमों के अनुपालन से ऐसी स्थिति उत्पन्न होगी, जहां राज्य सेवा में नए प्रवेशकों को उच्चतर वेतनमान में पदोन्नत किया जा सकेगा, जबकि कई अनुभवी प्रांतीय शिक्षक वरिष्ठ होने और पदोन्नति के लिए योग्य होने के बावजूद निचले वेतनमान में ही बने रहेंगे। इसके अलावा, अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले महाधिवक्ता ने इस बात पर विवाद नहीं किया कि योजना का पालन करने का यही परिणाम होगा, भले ही प्रांतीय शिक्षकों को नए राज्य कैडर के शिक्षकों की तुलना में निचले पदों पर रखा जा सकता है। 

न्यायालय ने अपीलकर्ता द्वारा दी गई इस दलील पर भी जोर दिया कि अनुच्छेद 16 विभिन्न वर्गों के बीच लागू नहीं होता; बल्कि यह केवल कर्मचारियों के एक ही वर्ग पर लागू होता है। इसने माना कि पदोन्नति के संबंध में राज्य संवर्ग और प्रांतीय संवर्ग के सदस्यों के बीच वर्गीकरण का कोई वैध आधार नहीं था, जब दोनों संवर्ग समान वेतन प्राप्त करते थे, समान कर्तव्य निभाते थे और समान पदों पर आसीन थे। यह माना गया कि अखिल भारतीय स्टेशन मास्टर के मामले में, रेलवे कर्मचारियों को अलग-अलग कर्तव्यों और भर्ती, वेतन और पदोन्नति के लिए अलग नियमों के कारण एक अलग वर्ग माना जाता था। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अनुच्छेद 16(1) का उल्लंघन किए बिना पदोन्नति के संबंध में दो संवर्गों के सदस्यों के साथ अलग-अलग व्यवहार करने का पर्याप्त औचित्य नहीं था। इसके अलावा, किशोरी मोहनलाल बख्शी के मामले पर प्रकाश डालते हुए, जहां आयकर सेवाओं का पुनर्गठन किया गया, जिसके परिणामस्वरूप अधिकारियों की दो श्रेणियां बनीं, जो समान कार्य करते थे, लेकिन उनके वेतनमान अलग-अलग थे। अदालत ने पाया कि, हालांकि, वर्तमान मामले में, दोनों संवर्ग अलग-अलग श्रेणी में नहीं थे। हालांकि सेवा में भर्ती के दौरान दक्षता की उपाधि में भिन्नता हो सकती है, लेकिन वे एक एकीकृत शैक्षिक सेवा का हिस्सा हैं। इसके अलावा, दोनों संवर्गों में पदोन्नति के लिए समान शर्तें हैं, अर्थात शिक्षकों को मैट्रिक पास होना चाहिए तथा शिक्षा विभाग में पांच वर्ष की सेवा करनी चाहिए। अंत में, न्यायालय ने टिप्पणी की कि सरकार ने शुरू में प्रांतीय शिक्षकों को रोजगार की एक ही इकाई में भर्ती किया और फिर पूर्वव्यापी नियमों के माध्यम से दो वर्गों के बीच विभेदकारी व्यवहार शुरू कर दिया, जिससे अनुच्छेद 16 का उल्लंघन हुआ। इसलिए, पदोन्नति के मामले में उल्लंघन हुआ है, और इसलिए अपील को अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए। 

क्या प्रांतीय संवर्ग को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का सरकार का निर्णय असंवैधानिक है?

यह मुद्दा इसलिए उठता है क्योंकि विवादित नियमों के नियम 3 में कहा गया है कि प्रांतीय संवर्ग में रिक्तियां उस संवर्ग में प्रवेश करने वालों द्वारा नहीं भरी जाएंगी, बल्कि उन्हें राज्य संवर्ग में प्रवेश करने वालों के रूप में माना जाएगा। इसके परिणामस्वरूप लगभग 30 वर्षों में प्रांतीय संवर्ग धीरे-धीरे कम होते जाते हैं, जबकि राज्य संवर्ग का विस्तार होता जाता है। न्यायालय ने कहा कि यह मुद्दा पूर्वाग्रह का स्रोत था। 

न्यायालय ने कहा कि इस मुद्दे का उत्तर इस मुद्दे पर विचार करके दिया जा सकता है कि क्या शिक्षकों को अपने संवर्ग की संख्या को मूल स्तर पर बनाए रखने का मौलिक अधिकार है। न्यायालय ने इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देते हुए कहा कि उनके पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है। यदि चयन पदों की कमी के परिणामस्वरूप संवर्ग संख्या स्वाभाविक रूप से कम हो जाती है, तो चयन पदों का पूर्व निर्धारित अनुपात (15%) भी कम होना चाहिए। इस प्रकार, प्रतिवादी का यह दावा कि प्रांतीय संवर्ग को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का सरकार का निर्णय असंवैधानिक है, स्पष्ट रूप से अनुचित है और इसका समर्थन नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रतिवादी को यह साबित करना होगा कि सरकार प्रांतीय संवर्ग में प्रत्येक रिक्ति को भरने के लिए कानून द्वारा बाध्य थी, ताकि शिक्षकों की संख्या 1957 के समान ही रहे। इसलिए, संवर्ग की संख्या कम करने का सरकार का निर्णय असंवैधानिक नहीं था। 

जोगिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1962) में निर्णय

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने बहुमत की राय को ध्यान में रखते हुए अपील को स्वीकार कर लिया और पदोन्नति के संबंध में पंजाब शैक्षिक सेवा (प्रांतीयकृत संवर्ग) श्रेणी III नियम, 1961 के नियम 2(d) और (e) तथा नियम 3 को रद्द करने के उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया। 

इस निर्णय के पीछे के तर्क

बहुमत की राय के पीछे कारण यह था कि दोनों सेवाएं स्वतंत्र रूप से शुरू हुईं, स्वतंत्र रूप से जारी रहीं, तथा कभी भी एक सेवा में एकीकृत नहीं हुईं। इस प्रकार, उनके व्यवहार में असमानता का अर्थ समान अवसर से वंचित करना नहीं था। 

असहमति के पीछे कारण यह है कि उनका मानना था कि नियम, पदोन्नति के मामले में दोनों संवर्गों के बीच विभेदकारी व्यवहार प्रदान करते हैं, जो असंवैधानिक है। 

वर्तमान में मामले का महत्व

यह मामला प्रशासनिक कानून और सार्वजनिक रोजगार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है। न्यायालय के निर्णय ने राज्य के अपने कार्यबल को वर्गीकृत करने और प्रबंधित करने के अधिकार के संबंध में स्पष्ट सीमाएं स्थापित कीं थी। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि जब महत्वपूर्ण अंतर हों, तो उचित वर्गीकरण स्वीकार्य है, जो कि प्रशासनिक कानून का एक मौलिक सिद्धांत है, जो राज्य को प्रासंगिक मानदंडों के आधार पर अपने कार्यबल को वर्गीकृत करने की अनुमति देता है, तथा यह सुनिश्चित करता है कि संविधान में निहित समानता के अधिकार का उल्लंघन न हो। यह सिद्धांत प्रशासनिक विवेक की रक्षा करता है, जो अधिकारियों को कानून को लागू करने के लिए दिया गया लचीलापन है, यह सुनिश्चित करके कि कानून, कानून की सीमाओं के भीतर लागू किया जाता है। 

समकालीन समय में, यह निर्णय इस बात पर बल देता है कि समान कार्य के लिए समान वेतन अनुच्छेद 14 के अंतर्गत एक पूर्ण सिद्धांत नहीं है, जब विभिन्न श्रेणी और सेवा शर्तें न्यायोचित हों। इसके अलावा, यह इस बात की स्पष्ट समझ प्रदान करता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के रोजगार के संबंध में राज्य की नीतियों को दक्षता और समानता के बीच संतुलन बनाने के लिए किस प्रकार तैयार किया जा सकता है। 

इसके अलावा, इसने सरकारी नीतियों की जांच करने और मनमानी रोकने तथा संवैधानिक अधिकारों को कायम रखने में न्यायपालिका की भूमिका पर प्रकाश डाला। असहमतिपूर्ण राय विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि यह पदोन्नति में विभेदकारी व्यवहार से उत्पन्न होने वाली संभावित असमानताओं को प्रकाश में लाती है, और यह पहलू समकालीन समय में प्रणालीगत पूर्वाग्रहों से सुरक्षा के लिए सतर्क न्यायिक निगरानी की आवश्यकता पर बल देता है। 

निष्कर्ष

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में सेवा एकीकरण, वर्गीकरण और सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की जांच की गई। बहुमत ने प्रांतीय और राज्य संवर्ग शिक्षकों के लिए अलग-अलग संवर्ग बनाए रखने के राज्य के विवेक को बरकरार रखा, तथा अलग-अलग भर्ती और योग्यता मानदंडों के आधार पर विभेदकारी व्यवहार को उचित ठहराया। हालाँकि, असहमतिपूर्ण राय पदोन्नति नीतियों की अनुचितता को उजागर करती है जो प्रांतीय संवर्ग के शिक्षकों की सेवा और अनुभव की उपेक्षा करती है। 

इस प्रकार, यह मामला प्रशासनिक विवेकाधिकार को समानता के साथ संतुलित करता है, तथा निष्पक्ष सार्वजनिक क्षेत्र की रोजगार नीतियों के लिए अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। इसके अलावा, अनुच्छेद 14 का वह पहलू, जिसके उल्लंघन का दावा केवल तभी किया जा सकता है जब वर्ग के भीतर विभेदकारी व्यवहार किया जाता है, अन्यथा नहीं, स्पष्ट रूप से स्थापित किया गया है। इस मामले में यह सिद्धांत भी स्पष्ट रूप से स्थापित किया गया कि समान कार्य के लिए समान वेतन मिलना चाहिए तथा सेवा की समान शर्तें अनुच्छेद 14 का आवश्यक तत्व नहीं हैं। इसके बाद, न्यायपालिका ने व्यक्तियों के लिए न्याय, समानता और स्वतंत्रता की व्यापकता सुनिश्चित की थी। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

जोगिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले में केंद्रीय मुद्दा क्या था?

मुख्य मुद्दा यह था कि क्या प्रांतीय और राज्य संवर्ग शिक्षकों के लिए अलग-अलग भर्ती और योग्यता मानदंडों के साथ अलग-अलग संवर्ग बनाए रखने का राज्य का निर्णय अनुच्छेद 14 और 16(1) का उल्लंघन है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने शिक्षकों के दो संवर्गों के बीच विभेदकारी व्यवहार को किस प्रकार उचित ठहराया?

न्यायालय ने प्रत्येक संवर्ग के लिए अलग-अलग भर्ती और योग्यता मानदंडों के साथ विभेदकारी व्यवहार को उचित ठहराया तथा अलग-अलग संवर्ग बनाए रखने के राज्य के विवेकाधिकार को बरकरार रखा था। 

निर्णय के संबंध में असहमति व्यक्त करने वालों की मुख्य चिंता क्या थी?

यह पदोन्नति नीतियों की अनुचितता के बारे में था, जिसमें विभिन्न संवर्गों के कर्मचारियों की सेवा और अनुभव पर पर्याप्त रूप से विचार नहीं किया गया था। यह लोक प्रशासन में भेदभावपूर्ण प्रथाओं को रोकने में न्यायपालिका की भूमिका पर जोर देता है। 

 

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