भारतीय तलाक अधिनियम 1869

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Indian Divorce Act 1869

यह लेख जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज की छात्रा Upasana Sarkar द्वारा लिखा गया है। यह लेख भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 की विस्तृत समझ प्रदान करता है, और भारत में रहने वाले ईसाई दम्पति तलाक कैसे प्राप्त कर सकते हैं के बारे में बताता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

भारतीय तलाक अधिनियम, 1869, जिसे तलाक अधिनियम, 1869 के रूप में भी जाना जाता है, को भारत में ईसाई दम्पति के लिए तलाक कानूनों को नियंत्रित करने के लिए पेश किया गया था। यह ईसाई समुदाय में एक पुरुष और एक महिला के बीच विवाह के विघटन (डिजोल्यूशन) से संबंधित है। यह एक संहिताबद्ध (कोडीफाइड) भारतीय व्यक्तिगत कानून है। इसमें कहा गया है कि जब पति या पत्नी तलाक के लिए याचिका दायर करते हैं, तो कानून की अदालत इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार अलगाव (सेपरेशन) की अनुमति देती है। इस अधिनियम के प्रावधान तलाक के बाद विभिन्न अधिकारों से संबंधित हैं, जिसमें विवाह के विघटन के आधार, बच्चे की अभिरक्षा (कस्टडीकस्टडी), गुजारा भत्ता (एलिमनी), संपत्ति का वितरण, बच्चे से मिलना और आदि शामिल हैं। यह अदालतों की शक्ति और उन स्थितियों को भी निर्दिष्ट करता है जो डिक्री को रद्द कर सकती हैं। 

भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 की पृष्ठभूमि

भारतीय तलाक अधिनियम, 1869, उन कानूनों में संशोधन करता है जो ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों के तलाक को नियंत्रित करते हैं। अंग्रेजों ने आजादी से पहले इस अधिनियम को लागू किया था। यह अधिनियम 1 अप्रैल, 1869 को प्रभाव में आया, और पूरे भारत में लागू है, हालांकि जम्मू और कश्मीर राज्य को इसमें शामिल नहीं किया गया है। भारत में, हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 द्वारा शासित होते हैं, मुस्लिम विवाह का विघटन मुस्लिम विवाह अधिनियम, 1939 द्वारा शासित होता है, पारसी पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 द्वारा शासित होते हैं और अंतर-समुदाय विशेष विवाह अधिनियम, 1954 द्वारा शासित होते हैं। उसी तरह, ईसाई धर्म को मानने वाले और भारत में रहने वाले दलों को भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 द्वारा प्रशासित किया जाता है।

विवाह के विघटन के लिए आधार 

भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 10 में विवाह के विघटन के विभिन्न आधार शामिल हैं। पत्नी या पति को तलाक के लिए जिला अदालत में याचिका पेश करनी होती है। उस अदालत में याचिका दायर करना भी आवश्यक है जिसके अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिकशन) में उन्होंने अपनी शादी को औपचारिक रूप दिया है या जिसमें वे निवास करते हैं या अंतिम बार एक साथ रहते हैं। 

विभिन्न आधार जिनके तहत एक अदालत तलाक दे सकती है इस प्रकार हैं:

  • यदि दोनों में से कोई भी पक्ष व्यभिचार (एडल्टरी) करते है; या
  • यदि कोई भी पक्ष ईसाई नहीं रहता है; या
  • अगर दोनों में से कोई भी पक्ष दो साल की अवधि के लिए मानसिक रूप से अस्वस्थ है; या
  • यदि कोई भी पक्ष दो वर्ष की अवधि के लिए कुष्ठ रोग (लेप्रोसी) या यौन रोग जैसी बीमारी से पीड़ित है; या
  • यदि दोनों पक्षों में से कोई भी स्वेच्छा से विवाह को पूरा करने से इंकार करता है; या
  • यदि दोनों में से कोई भी पक्ष दूसरे को दो साल या उससे अधिक की अवधि के लिए छोड़ता है; या
  • यदि मामले में कोई भी पक्ष दूसरे के साथ क्रूरता से पेश आता है।

उपरोक्त आधारों के अलावा, एक पत्नी को तलाक के लिए याचिका दायर करने की भी अनुमति है यदि पति उनकी शादी के बाद बलात्कार, पाशविकता (बेस्टियालिटी) आदि करने का दोषी है।

तलाक लेने के अलग-अलग तरीके

पक्षों की आपसी सहमति से तलाक

जब पक्ष भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 10A के तहत तलाक के लिए याचिका पेश करने के लिए परस्पर सहमत होते हैं, तो अदालत इसे आपसी सहमति से तलाक मान लेगी। इस शीर्षक के तहत तलाक लेने के लिए, याचिका दाखिल करने वाले पक्ष कम से कम दो साल से अलग रह रहे हों। अन्यथा, अदालत याचिका को स्वीकार नहीं करेगी। दम्पति को निम्नलिखित कारकों को सिद्ध करना है, जो इस प्रकार हैं-

  • वे कम से कम दो साल से अलग रह रहे हैं, यानी पति और पत्नी के रूप में नहीं।
  • कुछ कारणों से वे एक-दूसरे के साथ नहीं रह पाते हैं।
  • वे बिना किसी विवाद के बच्चों की अभिरक्षा, संपत्ति और भरण पोषण के संबंध में उन अधिकारों को साझा करने के लिए पारस्परिक रूप से सहमत हुए हैं।

भरण पोषण के संबंध में अधिकार

अगर आपसी सहमति से तलाक की याचिका दायर करने वाले दंपति भरण पोषण या गुजारा भत्ता के मुद्दे पर सहमति बना लेते है, तो वे आसानी से अदालत से तलाक प्राप्त कर सकते हैं। रखरखाव के लिए कोई अधिकतम या न्यूनतम सीमा निर्धारित नहीं है। 

बच्चों की अभिरक्षा के संबंध में अधिकार

आपसी सहमति से होने वाले तलाक के लिए बच्चों की अभिरक्षा से संबंधित अधिकारों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। पति-पत्नी अपनी आपसी समझ से बच्चों की संयुक्त, साझा या अनन्य (एक्सक्लूसिव) अभिरक्षा रख सकते हैं।

संपत्ति के संबंध में अधिकार 

दंपति को अपनी आपसी समझ से यह तय करना होगा कि संपत्ति के किस हिस्से का कौन आनंद उठाएगा। संपत्ति में चल और अचल संपत्ति शामिल है। 

तलाक जो आपसी सहमति से न हो 

इस अधिनियम के तहत कोई भी पक्ष तलाक के लिए याचिका दायर कर सकता है। वे विभिन्न परिस्थितियाँ जिनके लिए वे विवाह के विघटन के लिए दायर कर सकते हैं, इस प्रकार हैं-

पति की ओर से दायर याचिका

एक पति जिला अदालत या उच्च न्यायालय में तलाक के लिए एक याचिका दायर कर सकता है, अदालत से उनकी शादी को विघटित करने का अनुरोध कर सकता है क्योंकि उसकी पत्नी उनकी शादी के बाद से व्यभिचार की दोषी रही है। 

पत्नी की ओर से दायर याचिका

एक पत्नी जिला अदालत या उच्च न्यायालय में तलाक के लिए एक याचिका प्रस्तुत कर सकती है, और अदालत से उनकी शादी को निम्नलिखित आधारों पर विघटित करने की दलील दे सकती है-

  • यदि उसके पति ने पेशे के उद्देश्य से किसी अन्य धर्म में परिवर्तित होकर एक अलग धर्म को स्वीकार किया है।
  • अगर उसके पति ने सभी रीति-रिवाजों का पालन करते हुए दूसरी महिला से शादी कर ली है।
  • यदि उसका पति उनकी शादी के बाद से लगातार अवधि के लिए व्यभिचार का दोषी रहा है।
  • यदि वह व्यभिचार के साथ द्विविवाह का दोषी है।
  • यदि उसने व्यभिचार सहित किसी अन्य स्त्री से विवाह कर लिया हो।
  • यदि वह बलात्कार, सोडोमी या पाशविकता का दोषी है।
  • यदि वह क्रूरता के साथ-साथ व्यभिचार का दोषी है, जैसा कि उस मामले में जहां वह व्यभिचार का दोषी नहीं था, तो भी वह एक ऐसे तलाक की हकदार होगी जहां विवाह का पूर्ण विघटन नही होता।
  • यदि वह दो साल या उससे अधिक की अवधि के लिए बिना किसी पर्याप्त और उचित कारण के परित्याग के साथ-साथ व्यभिचार का दोषी है।

जिन आधारों पर याचिका खारिज की जा सकती है

याचिका को न्यायालय द्वारा निम्नलिखित परिस्थितियों में खारिज किया जा सकता है-

  • यदि न्यायालय में उचित साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जाता है, और न्यायालय साक्ष्य से संतुष्ट नहीं है, या याचिकाकर्ता का मामला साबित नहीं हुआ है, या
  • यदि अदालत याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य से संतुष्ट नहीं है, जो यह साबित करता है कि कथित तौर पर विवाह के बाद से व्यभिचार किया गया था, या
  • यदि याचिका को प्रतिवादियों में से किसी की मिलीभगत से लाया गया है या मुकदमा चलाया गया है, या 
  • किसी अन्य मामले में भी, याचिका अदालत द्वारा खारिज कर दी जाएगी।

यदि कोई जिला अदालत इस अधिनियम के तहत तलाक की याचिका को खारिज कर देती है, तो इसी तरह की याचिका उच्च न्यायालय में पेश की जा सकती है।

विवाह विघटन की डिक्री

यदि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य साबित हो जाते है, और अदालत सबूतों से संतुष्ट है, तो अदालत यह कहकर अपना फैसला सुना देगी कि विवाह विघटित हो गया है। न्यायालय निम्नलिखित परिस्थितियों में अपना निर्णय सुनाने के लिए बाध्य नहीं होगा-

  • मामले में याचिकाकर्ता व्यभिचार का दोषी पाया गया है, या
  • अगर अदालत को पता चलता है कि याचिकाकर्ता ने ऐसी याचिका पेश करने या मुकदमा चलाने में अनुचित रूप से देरी की है, या
  • यदि अदालत को पता चलता है कि याचिकाकर्ता ने किसी अन्य पक्ष के साथ क्रूरता का व्यवहार किया है, या
  • यदि याचिकाकर्ता ने यह साबित होने से पहले कि दूसरा पक्ष व्यभिचार का दोषी है और उचित बहाने के बिना खुद को दूसरे पति या पत्नी से स्वेच्छा से छोड़ दिया है या खुद को अलग कर लिया है, या
  • यदि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर दूसरे पक्ष की उपेक्षा की या दूसरे पक्ष के प्रति कोई दुर्व्यवहार किया, जिसके कारण दूसरे पक्ष ने व्यभिचार किया।

विवाह विघटन की पुष्टि

जिला अदालत द्वारा विवाह के विघटन के लिए दिए गए किसी भी डिक्री या फैसले की पुष्टि उच्च न्यायालय द्वारा की जानी चाहिए।

उच्च न्यायालय द्वारा डिक्री का सत्यापन (वेरिफिकेशन) 

विवाह विघटन के लिए जिला न्यायालय द्वारा पारित डिक्री को उच्च न्यायालय द्वारा सत्यापित किया जाएगा। यदि पैनल में तीन न्यायाधीश होते हैं, तो बहुमत की राय को बरकरार रखा जाएगा। वहीं अगर पैनल में दो न्यायाधीश हैं तो वरिष्ठ न्यायाधीश की राय को ध्यान में रखा जाएगा। यदि उच्च न्यायालय और पूछताछ करना चाहता है या अतिरिक्त साक्ष्य प्राप्त करना चाहता है, तो वह अपनी संतुष्टि के अनुसार ऐसा कर सकता है। जिला अदालत द्वारा उच्च न्यायालय को उपलब्ध कराए गए सभी साक्ष्यों की पूछताछ और जांच के बाद, उच्च न्यायालय विवाह के विघटन की डिक्री की पुष्टि करते हुए एक डिक्री पारित करेगा।

विवाह की शून्यता का निर्णय

भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 19 के तहत एक विवाह को शून्य घोषित किया जा सकता है। विवाह के विघटन के अलावा, इस अधिनियम में विवाह की शून्यता के संबंध में भी प्रावधान हैं। पति-पत्नी में से कोई भी जिला न्यायालय या उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है कि अदालत उसकी शादी को शून्य घोषित करे। निम्नलिखित में से किसी भी आधार पर विवाह को शून्य घोषित किया जा सकता है-

  • प्रतिवादी विवाह के संपन्न होने के समय और कार्यवाही शुरू करने के समय नपुंसक था; या
  • विवाह के पक्ष सगोत्रता (कंसैनगुइनिटी) या आत्मीयता (एफिनिटी) की निषिद्ध डिग्री के भीतर हैं; या
  • यदि पति-पत्नी में से कोई एक उस समय मानसिक रूप से अस्वस्थ था जब विवाह संपन्न हुआ था; या
  • यदि, विवाह के समय, पति-पत्नी में से किसी एक का पिछला विवाह प्रभाव में था या विवाह के समय किसी भी पक्ष का पूर्व पति या पत्नी जीवित था।

उच्च न्यायालय उन मामलों में विवाह की शून्यता का आदेश पारित कर सकता है जहां विवाह के लिए किसी भी पक्ष की सहमति बल या धोखाधड़ी से प्राप्त की गई थी।

न्यायिक अलगाव

न्यायिक अलगाव अदालत द्वारा दिया जा सकता है जब पति या पत्नी कानूनी अलगाव के लिए याचिका दायर करते हैं। न्यायिक अलगाव एक ऐसी स्थिति है जब पक्षों के बीच विवाह का विघटन नहीं होता है। विवाह का अस्तित्व बना रहता है, और वे पुनर्विवाह करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं। निम्नलिखित में से किसी भी आधार पर पति-पत्नी में से कोई भी न्यायिक अलगाव के लिए आवेदन कर सकता है-

  • व्यभिचार; या
  • क्रूरता; या
  • यदि बिना किसी उचित बहाने के दूसरे पक्ष को दो साल के लिए छोड़ दिया गया हो।

यदि जिला न्यायालय या उच्च न्यायालय जिसके अधिकार क्षेत्र में याचिका दायर की गई है, संतुष्ट है कि याचिका में दिए गए बयान सत्य हैं, तो वह इस अधिनियम के तहत न्यायिक अलगाव के लिए डिक्री प्रदान करेगा।

बच्चों की अभिरक्षा 

जब पक्षों की आपसी सहमति के बिना तलाक होता है, तो अदालत बच्चे को माता-पिता के रूप में पिता या माता की क्षमताओं की जांच करने के बाद बच्चे की अभिरक्षा देगी। अधिकांश परिवारों में, जहाँ माँ एक गृहिणी होती है, बच्चे की अभिरक्षा उसे दी जाती है, और पिता को वित्तीय सहायता और कभी-कभार मिलने का निर्देश दिया जाता है।

गुजारा भत्ता या रखरखाव

गुजारा भत्ता का भुगतान करने की जरूरत तय करते समय अदालत पति की कमाई क्षमता को ध्यान में रखती है। अदालत यह देखती है कि पति के पास अपने भाग्य और अपने कर्तव्यों और देनदारियों को पुन: उत्पन्न करने की क्षमता है या नहीं। अगर पत्नी आर्थिक रूप से आश्रित है तो संपत्ति उसे दी जाती है। गुजारा भत्ता जीवनसाथी, आश्रित बच्चों और बूढ़े माता-पिता को दिया जाता है।  

न्यायिक घोषणाएं 

  • मेजर फ्रैंक राल्स्टन सैमुअल राज बनाम केजिया पद्मिनी स्वर्ण पांडियन (2016) के मामले में, पति ने याचिकाकर्ता, उसकी पत्नी के खिलाफ अपील पेश की, जिसने वैवाहिक अधिकारों की बहाली (रेस्टिट्यूशन) के लिए मुकदमा दायर किया था। मद्रास उच्च न्यायालय ने पाया कि पक्ष पन्द्रह वर्षों से अधिक समय से अलग रह रहे थे, इसलिए उनके बीच कोई भावनात्मक लगाव नहीं था। पत्नी ने विवाह पूरा करने से मना कर दिया था। अदालत ने कहा कि भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 10 के तहत एक विवाह का विघटन किया जा सकता है। यदि विवाह संपन्न होने के बाद कोई भी पक्ष विवाह को पूरा करने में सहयोग नहीं करता है और इसलिए विवाह संपन्न नहीं हुआ है, तो दूसरा पक्ष तलाक लेने का हकदार है।
  • टॉमी जोसेफ बनाम स्मिता टॉमी (2018) के मामले में, दंपति ने आपसी सहमति से परिवार अदालत में तलाक की याचिका दायर की। अदालत ने याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया कि भारतीय तलाक अधिनियम की धारा 10A के तहत विवाह के विघटन के लिए याचिका दायर करने के लिए छह महीने की अवधि की छूट देने का कोई प्रावधान नहीं है। इस दंपति ने केरल उच्च न्यायालय में अपील की जहां अदालत ने कहा कि आपसी सहमति से तलाक प्रकृति में धर्मनिरपेक्ष है। धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। उच्च न्यायालय ने एक ईसाई दंपति के लिए विवाह विघटन के लिए ‘कूलिंग ऑफ’ की समय सीमा को माफ कर दिया।

भारतीय तलाक (संशोधन) अधिनियम, 2001

भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 में संशोधन किया गया और नया अधिनियम पेश किया गया। इस अधिनियम को निरस्त (रिपील) कर दिया गया था, और भारतीय तलाक (संशोधन) अधिनियम, 2001 को 24 सितंबर, 2001 को राष्ट्रपति की सहमति से अधिनियमित किया गया था। इस संशोधित अधिनियम ने न केवल ईसाई तलाक कानूनों में क्रांति ला दी, बल्कि एक समान तलाक कानून के लक्ष्य के प्रति सकारात्मक प्रभाव भी डाला। भारत के सभी नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता बनाने के लिए अधिनियम में संशोधन किया गया था। विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों में सुधार करके इस उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकता है। 

निष्कर्ष

भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 को पुराना और कठोर माना जाता था। इसलिए इसे निरस्त कर दिया गया क्योंकि यह लिंग और धर्म के आधार पर भेदभाव करता है। यह भारत के संविधान के लिए अधिकारातीत (अल्ट्रा वायरस) था, क्योंकि यह समानता के अधिकार के खिलाफ है। इस सारे भेदभाव को दूर करने और एकरूपता के लक्ष्य की दिशा में एक बड़ा कदम प्रदान करने के लिए भारतीय तलाक (संशोधन) अधिनियम, 2001 पेश किया गया था। इसका उद्देश्य पूरे देश के लिए एक समान तलाक कानून प्रदान करना है। यह लेख अधिनियम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और यह भारत में ईसाई दंपतियों पर कैसे लागू होता है, पर प्रकाश डालता है। हालांकि, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 को निरस्त कर दिया गया है और इसे व्यक्तिगत कानून (संशोधन) अधिनियम, 2019 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है, जो 1 अगस्त, 2019 को लागू हुआ। इसलिए, भारतीय तलाक अधिनियम, 1869, अब भारत में तलाक लेने वाले ईसाई दंपतियों के लिए लागू नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

व्यभिचार क्या है?

व्यभिचार किसी भी तरह के यौन संबंधों में लिप्त होने का एक कार्य है, जिसमें विवाह के बाहर किसी अन्य व्यक्ति के साथ संभोग शामिल है। व्यभिचार को पहले एक अपराध माना जाता था। लेकिन भारतीय दंड संहिता के तहत व्यभिचार की आपराधिकता को सर्वोच्च न्यायालय ने 27 सितंबर, 2018 को रद्द कर दिया था। लेकिन व्यभिचार का कार्य तलाक के लिए याचिका दायर करने का आधार हो सकता है।

क्रूरता क्या है?

क्रूरता में मानसिक और शारीरिक चोट दोनों शामिल हैं जो जीवन, स्वास्थ्य और अंग के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं। मानसिक क्रूरता अमूर्त (इंटेंजिबल) प्रकृति की होती है जिसका आकलन अनेक घटनाओं को देखकर किया जाता है। मानसिक प्रताड़ना में खाना न देना, दहेज के लिए लगातार प्रताड़ित करना आदि शामिल हैं। पति द्वारा शारीरिक प्रताड़ना में मारपीट, यौन शोषण आदि शामिल हैं।

यौन रोग क्या है?

एक पति या पत्नी तलाक के लिए दायर कर सकते हैं यदि दूसरा पक्ष किसी प्रकार की गंभीर बीमारी से पीड़ित है जो प्रकृति में संचारी (कम्युनिकेबल) है। एड्स (एक्वायर्ड इम्युनोडेफिशिएंसी सिंड्रोम) एक यौन संचारित रोग है जिसे यौन रोग माना जाता है।

संदर्भ

 

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