भारत में घृणास्पद भाषण: आई.पी.सी. की धारा 153 A और 295 A का विश्लेषण

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Indian Penal Code

यह लेख सिम्बायोसिस लॉ स्कूल नोएडा की छात्रा Anushka Singhal ने लिखा है। इस लेख में, वह आई.पी.सी. की धारा 153A और 295A पर चर्चा करती है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

प्रत्येक स्वतंत्रता कुछ प्रतिबंधों के साथ आती है, पूर्ण स्वतंत्रता की कोई अवधारणा नहीं है। हमारा संविधान हमें कई सारे मौलिक अधिकार प्रदान करता है जैसे, भाषण और अभिव्यक्ति (एक्सप्रेशन) की स्वतंत्रता उनमें से एक होने के नाते बहुत कुछ देता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (2) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है लेकिन यह कुछ उचित प्रतिबंधों के साथ आता है। ये उचित प्रतिबंध भारतीय संविधान के तहत परिभाषित नहीं हैं, लेकिन भारतीय दंड संहिता, 1860 (आई.पी.सी.)  जैसे अन्य कानूनों के माध्यम से यह प्रतिबंध निर्धारित किए गए हैं। आई.पी.सी. की धारा 153A और 295A ऐसे प्रतिबंध लगाते हैं, जिनका उद्देश्य धार्मिक शत्रुता फैलाने वालों को दंडित करना है।  

धारा 153 A

भारतीय दंड संहिता की धारा 153 A उन लोगों को दंडित करने का प्रावधान करती है जो –

  1. शब्दों, संकेतों, चित्रों या इसी तरह की अन्य चीजों से विभिन्न जाति, पंथ (क्रिड), धर्म, क्षेत्र, भाषा या एक ही तरह के किसी अन्य समूह के लोगों के बीच असामंजस्य (डिसहार्मनी) फैलाते है। 
  2. सार्वजनिक सद्भाव और शांति को भंग करते है।
  3. किसी विशेष धर्म या समूह के सशस्त्र (आर्म्ड) बलों को किसी अन्य समूह या धर्म के खिलाफ हिंसा भड़काने के उद्देश्य से तैयार करते है।

ऐसे व्यक्तियों को 3 साल तक की कैद की सजा हो सकती है। और यदि उपरोक्त गतिविधियों को किसी धार्मिक संस्था में किया जाता है तो निर्धारित सजा को 5 साल तक की कैद तक बढ़ाया जा सकता है। इस प्रकार कुल मिलाकर, यह धारा हमारे देश की अखंडता (इंटीग्रिटी) को बनाए रखने का संकल्प करती है। भारत में लोगों के एक विविध समूह का निवास है और हम दुनिया में ‘अनेकता में एकता’ वाले देश के रूप में जाने जाते हैं, इस प्रकार जो कोई भी इस सद्भाव को खतरे में डालता है उसे आपराधिक कानून के तहत दंडित किया जाता है। 

यह धारा आजकल विभिन्न मामलों में प्रयोग की जाती है लेकिन यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि एक बार यह संविधान से हटाए जाने के कगार पर थी। तारा सिंह बनाम द स्टेट (1951) के प्रसिद्ध मामले ने इस धारा को यह कहते हुए चुनौती दी कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(2) के उल्लंघन में है। पहले संशोधन के बाद “सार्वजनिक व्यवस्था के हित में” शब्द जोड़े गए, यह धारा कानून के विपरीत घोषित होने के खतरे से बच गई। 

धारा 295

आई.पी.सी. की धारा 295 उन मामलों में सजा का प्रावधान करती है जिसमें दुर्भावनापूर्ण इरादे से कोई व्यक्ति किसी धार्मिक प्रतीक या आदर्श या किसी ऐसी चीज को नुकसान पहुंचाता है, नष्ट करता है या अपवित्र करता है जिसे लोगों के समूह द्वारा पवित्र माना जाता है। उपर्युक्त चीजों में से किसी एक को करने वाले व्यक्ति को 2 साल तक की अवधि के लिए कैद किया जाएगा या जुर्माना लगाया जाएगा या जुर्माना और कारावास दोनों से दंडित किया जाएगा। इस अधिनियम के तहत अनजाने में किए गए कार्य शामिल नहीं हैं। जान मोहम्मद बनाम नारायण दास (1883) एक ऐसा मामला है, जिसमें एक व्यक्ति ने नफरत फैलाने के मेन्स रीआ के बिना, एक पुरानी मस्जिद से कुछ पत्थर हटा दिए और उसे उत्तरदायी नहीं ठहराया गया। लेकिन ऐसे मामलों में जहां कोई कार्य जानबूझकर किया गया है, जैसे सैदुल्ला खान बनाम भोपाल राज्य (1995) में, जहां एक व्यक्ति इस तथ्य से अवगत था कि वस्तु पवित्र है, तो वहां उसे उत्तरदायी ठहराया जाता है। 

धारा 295 A

आई.पी.सी. की धारा 295A शब्दों, इशारों या समान चीजों से लोगों के समूह के धर्म या धार्मिक भावनाओं का दुर्भावना से अपमान करने या अपमान करने का प्रयास करने वाले लोगों के लिए 3 साल तक के कारावास, जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान करती है। धारा 295-A के तहत अपराध गैर-जमानती और गैर-शमनीय (नॉन कंपाउंडेबल) है और पुलिस आसानी से दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) की धारा 41 को लागू कर सकती है। ये दोनों धाराएं अर्थात् 153A और 295 A धर्म से संबंधित हैं, इनमे अंतर यह है कि पहली धारा दो समूहों के बीच शत्रुता पैदा करने से संबंधित है और दूसरी उन लोगों के लिए प्रावधान करती है जो किसी समूह या धर्म का अपमान करते हैं। 

भारत में धार्मिक दुश्मनी

भारत अपनी विविधता के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन जैसा कि ठीक ही कहा गया है, “बहुत सारे सिर, कई सारे सिरदर्द।” भारत में धार्मिक शत्रुता के कई उदाहरण हैं और बढ़ती असहिष्णुता (इनटोलरेंस) के साथ, घटनाएं बढ़ रही हैं। इस तरह की पहली धार्मिक दुश्मनी विभाजन के दौरान देखी गई थी और उसके बाद से गोधरा दंगों, बंगाल दंगों , मुजफ्फरनगर दंगों आदि जैसे दंगों के साथ देखी गई थी। धार्मिक दुश्मनी ने जनता में अपनी उपस्थिति दिखाई है। वोट बैंक की राजनीति ने नफरत भरे भाषणों के माध्यम से देश में हिंसा को भड़काया है जिससे कर्फ्यू लगा है और कई लोगों की जान भी गई है। कुख्यात बॉम्बे दंगों पर रिपोर्ट करने के लिए गठित श्री कृष्ण समिति ने माना कि दंगा ‘सामना’ और ‘नवकाल’ जैसे समाचार पत्रों में कुछ लेखों के कारण हुआ था। इस रिपोर्ट ने, लोगों के बीच हिंसा भड़काने के लिए एक विशेष राजनीतिक समूह को जिम्मेदार ठहराया। प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजी) के आने से, पहले से ही जल रही आग को और बढ़ावा मिला और अब हमारे पास ट्वीट और व्हाट्सएप मैसेज हैं, जो असामंजस्य की ओर ले जाते हैं। बंगाल में बदुरिया दंगों को ग्यारहवीं कक्षा के एक छात्र के ऐसे ही एक ट्वीट से उकसाया गया था जिसने पैगंबर मोहम्मद की आपत्तिजनक पोस्ट डाली थी। इसी तरह, अफवाहों के कारण मॉब लिंचिंग हुई है, जैसे अखलाक की घटना में, जहां पीड़िता को केवल संदेह के आधार पर मार दिया गया था। विभिन्न धर्मों के बीच शत्रुता को रोकने के लिए 153A जैसी धाराएं आवश्यक हैं। घृणास्पद भाषणों (हेट स्पीच), ग्रंथों और फिल्मों ने पहले से ही खराब स्थिति को बढ़ा दिया है और अपने स्वार्थ के लिए हिंसा फैलाने का लक्ष्य रखने वालों को इन धाराओं के तहत दंडित किया जाता है।

धर्म-विशिष्ट कानूनों की आवश्यकता 

अंग्रेजों ने भारतीय दंड संहिता की धारा 153 A पहले ही बना ली थी लेकिन धारा 295 A एक प्रसिद्ध घटना के बाद अस्तित्व में आई। 1927 में, ‘रंगीला रसूल’ नामक एक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसमें पैगंबर मोहम्मद के वैवाहिक और यौन जीवन की बात की गई थी। इस किताब को इस्लाम के अनुयायियों (फॉलोअर) से बहुत नफरत मिली। प्रकाशक (पब्लिशर) को पहले गिरफ्तार किया गया और फिर उसे बरी कर दिया गया। जब प्रकाशक जेल से बाहर आया, तो उसे इल्म-उद-दीन नामक एक व्यक्ति ने मार डाला। देश के मुसलमानों ने एक ऐसे कानून की मांग की जो धर्म या धार्मिक प्रतीकों का अपमान करने वाले को दंडित करे। इस प्रकार आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 1927 के साथ आई.पी.सी. की धारा 295 A आई। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक अनिवार्य अधिकार है। यहां तक ​​कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (यूनिवर्स डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स) के माध्यम से इस अधिकार को आम लोगों की सर्वोच्च आकांक्षा मानते हैं। अमेरिकी संविधान में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करें तो यह बहुत उदार (लिबरल) है। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, जब लोगों ने महसूस किया कि नस्लवादी प्रचार (प्रोपेगेंडा) और प्रलय (होलोकॉस्ट) के बीच एक स्पष्ट संबंध था, तो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने घृणास्पद भाषण को पहचानना शुरू कर दिया। यहां तक ​​कि अमेरिका ने भी घृणास्पद भाषण को संवैधानिक रूप से संरक्षित अभिव्यक्ति से हटा दिया है। धर्म-विशिष्ट कानूनों की अत्यधिक आवश्यकता है क्योंकि धर्म एक संवेदनशील मुद्दा होने के कारण समुदायों के बीच घृणा के बीज आसानी से बो सकता है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में, लोग घृणा का प्रचार न करें, धर्म-विशिष्ट कानूनों की आवश्यकता उत्पन्न हुई थी। हमारे पास आई.पी.सी. की धारा 124A के तहत देशद्रोह (सेडिशन) का कानून था लेकिन यह महसूस किया गया कि यह कानून अलगाववादी प्रवृत्तियों (सेपरेटिस्ट टेंडेंसी) को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं था और इस तरह धारा 153-A, 153-AA और 153-B अधिनियमित की गई थी।

भावनाओं को ठेस पहुँचाने के “इरादे” की प्रासंगिकता (रिलेवेंस)

इनमें से किसी एक धारा यानी 153 A और 295 A के तहत किसी पर आरोप लगाने के लिए ‘मेन्स रीआ’ यानी मंशा साबित करने की जरूरत होती है। इन धाराओं के तहत किए गए अपराध अनजाने में नहीं होने चाहिए। जब ‘इरादे’ की बात आती है तो रामजी लाल मोदी बनाम यूपी राज्य (1957) एक महत्त्वपूर्ण मामला है।

आइए इस मामले को अच्छे से समझते हैं

रामजी लाल मोदी बनाम यूपी राज्य (1957)

तथ्य

‘अमृता पत्रिका’ नाम के हिंदी दैनिक में एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें एक गधे के बारे में उत्तर प्रदेश के मुसलमानों ने विरोध प्रदर्शन किया था। शुरू में उन पर आरोप लगाया गया था लेकिन बाद में उन्हें बरी कर दिया गया था। एक और पत्रिका भी थी जिसे ‘गौरक्षक’ कहा जाता था। इसने एक लेख भी प्रकाशित किया जिसके लिए धारा 153-A और 295-A के तहत आरोप लगाया गया था। अंतत: उन पर केवल 295-A का आरोप लगाया गया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह धारा अधिकारहीन है और अनुच्छेद 19(2) के खिलाफ जाती है।

निर्णय

न्यायालय ने याचिकाकर्ता को जिम्मेदार ठहराया। इसने यह भी कहा कि यह धारा अधिकार से बाहर नहीं है और यह सभी कार्यों के लिए नहीं बल्कि उन कार्यों के लिए दंडित करने का संकल्प करती है जो जानबूझकर दुर्भावनापूर्ण इरादे से किए गए हैं।

महेंद्र सिंह धोनी बनाम येरागुंटला श्याममदार और अन्य (2017)

तथ्य

इस मामले में, याचिकाकर्ता पर धारा 295-A के तहत आरोप लगाया गया था और उसकी शिकायत अनंतपुर, आंध्र प्रदेश के अतिरिक्त जिला प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित (पेंडिंग) थी। उनकी तस्वीर एक पत्रिका पर छपी थी और देवताओं के कुछ प्रतीकों के साथ ‘बड़े सौदों के देवता’ शब्द लिखे गए थे। उनके और प्रकाशक के खिलाफ भी शिकायत दर्ज कराई गई थी।

निर्णय

माननीय न्यायालय ने प्राथमिकी (एफआईआर) रद्द कर दी क्योंकि मामला 295-A की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता था क्योंकि याचिकाकर्ता की ओर से कोई इरादा नहीं था।

अदालतों ने न केवल मंशा बल्कि तार्किकता (रीजनेबलनेस) को भी अपनाया है। न्यायालय ने रमेश बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1988) में उचित आचरण की बात की।

रमेश बनाम यूनियन ऑफ इंडिया  (1988)

तथ्य

इसमें (1988) टेलीविजन पर ‘तमस’ नाम की फिल्म दिखाई जा रही थी। यह फिल्म एक प्रसिद्ध अकादमी पुरस्कार विजेता लेखक के उपन्यास पर आधारित थी जिसे लंबे समय से विश्वविद्यालयों में पढ़ा जा रहा था। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि फिल्म की स्क्रीनिंग धारा 153-A के खिलाफ होगी।

निर्णय

न्यायालय ने उत्तरदाताओं को उत्तरदायी नहीं ठहराया और कहा कि एक फिल्म, टीवी शो आदि के प्रभावों को एक उचित व्यक्ति के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए और जैसा कि अंग्रेजी मामलों में निर्धारित किया गया है, एक उचित व्यक्ति ‘क्लैफम ऑम्निबस पर’ होता है।

धर्म के नाम पर तुच्छ मामलों से बचने की आवश्यकता

इन दोनों धाराओं के तहत आवेदनों के दाखिल होना आम रहा है। यहां तक ​​कि बहुत साधारण आलोचनाओं और टिप्पणियों पर भी आई.पी.सी. की धारा 153-A और धारा 295-A के तहत आरोप लगाए जाते हैं। अपने अनुयायियों को संतुष्ट करने के लिए, राजनीतिक नेता धर्म के नाम पर मामले दर्ज करते हैं। बढ़ती असहिष्णुता और सोशल मीडिया के आने से ऐसे मामलों में वृद्धि हुई है और चिंता यह है कि 295-A एक गैर-जमानती अपराध है और एक बार इस धारा के तहत मामला दर्ज होने के बाद आरोपित व्यक्ति के लिए स्थिति बहुत मुश्किल हो जाती है। पिछले साल नवंबर-दिसंबर के दौरान, एक मंदिर में एक कथित चुंबन दृश्य पर ‘ए सूटेबल बॉय’ नामक फिल्म के निर्माताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इस तरह की प्राथमिकी हम सभी के लिए चौका देने वाली होती है। इस तरह के तुच्छ मुद्दों से बचने की जरूरत है और उनके लिए कठोर वर्गों का उपयोग करने से बचना चाहिए। कई संगीतकार और गायक द्वारा की गई आलोचनाओं जैसे विशाल ददलानी को अच्छी भावना से लिया जाना चाहिए और हर ट्वीट या टिप्पणी को अपमानजनक नहीं माना जाना चाहिए। आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (टेररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट), 1987 (टाडा) से संबंधित एक मामले मे माननीय न्यायालय ने अस्पष्ट कानूनों के खिलाफ चेतावनी दी कि जो न्यायिक मजिस्ट्रेटों और पुलिस कर्मियों को अत्यधिक अधिकार देते हैं और इस प्रकार निर्दोषों को पीड़ित करते हैं। इसलिए धारा 153-A और 295 के तहत मामला दर्ज करने से पहले संतुलन बनाने की कोशिश करनी चाहिए। एक व्यक्ति के आक्रोश को सामूहिक रूप से एक समूह की भावनाओं से अलग करने की जरूरत है और किसी चीज को आपत्तिजनक मानने या न मानने के लिए इसे समग्र रूप से दर्शकों के विवेक पर छोड़ देना चाहिए।

इन धाराओं की आलोचना

इन धाराओं ने भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का प्रयोग करने में एक बाधा के रूप में काम किया है। उनके अत्यधिक उपयोग ने उनके महत्व को कम कर दिया है और उन पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि हमें भारतीय दंड संहिता की धारा 124-A पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। न्यायालय ने कहा कि यह औपनिवेशिक (कोलोनियल) काल का कानून है और इसलिए इस पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। उपर्युक्त कथन के आलोक में, कोई व्यक्ति धारा 153-A और 295-A में कुछ संशोधनों की भी मांग कर सकता है। पुलिस या न्यायिक मजिस्ट्रेट के लिए यह तय करना आवश्यक होना चाहिए कि शिकायत तर्कसंगतता (रीजनेबिलिटी) परीक्षा पास करती है या नहीं। पर्याप्त प्रावधानों के अभाव में, कानून का खुलेआम दुरुपयोग किया जा रहा है और गंभीर रूप से असलियत यह है कि अभिनेताओं, लेखकों और कलाकारों सहित विभिन्न क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोगों ने इस कठोर प्रावधान का खामियाजा उठाया है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण हास्य या चतुर आलोचना को भी सेंसर से हटाया जा रहा है क्योंकि यह शालीनता और नैतिकता (मॉरलिटी) के पहले से ही निर्धारित मानकों (स्टैंडर्ड) को पूरा नहीं करता है। वेंडी डोनिगर की पुस्तक ‘द हिंदू: एन अल्टरनेट हिस्ट्री’ एक अच्छा उदाहरण है, जिसमें पेंगुइन इंडिया को भारत में पुस्तक का रिलीज नहीं करने का निर्णय लेना पड़ा, जब पुस्तक को धारा 295-A के मामले का सामना करना पड़ा। प्रकाशकों ने तब अदालत के बाहर समझौता करने का फैसला किया। सरकार कानून आयोग और टीके विश्वनाथन की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति द्वारा आई.पी.सी. में धारा 153-C और 505-C जोड़ने पर की गई सिफारिशों को अमल में लाने की भी योजना बना रही है। लेकिन इन दो प्रावधानों को जोड़ने से पहले सरकार को उन खामियों को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए जो आई.पी.सी. की धारा 153-A और 295-A से जुड़ी हैं।

निष्कर्ष

हमारी प्रस्तावना में कहा गया है कि भारत एक संप्रभु (सॉवरेन), समाजवादी (सोशलिस्ट), धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) और गणतंत्र देश है। इस प्रकार, हमारी प्रस्तावना की भावना पर खरा उतरने के लिए और यह सुनिश्चित करने के लिए कि हमारी संप्रभुता और धर्मनिरपेक्षता बनी रहे, किसी को भी दूसरे के धर्म का अपमान करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। जैसा कि ठीक ही कहा गया है कि हर अधिकार एक कर्तव्य और प्रतिबंध के साथ आता है, भाषणभाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भी कर्तव्यों और प्रतिबंधों से प्रभावित होता है। आलोचना और टिप्पणी करनी चाहिए लेकिन ऐसा दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने की कीमत पर नहीं होना चाहिए। इन धाराओं के माध्यम से भारतीय दंड संहिता यह सुनिश्चित करती है कि हम सद्भाव से रहें और ‘जियो और जीने दो’ की गांधीवादी विचारधारा का पालन करें।

संदर्भ

 

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