गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य (1980): मामला विश्लेषण

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Criminal Procedure Code

यह लेख गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले का आलोचनात्मक विश्लेषण करना चाहता है। इस मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत देने के लिए एक आवेदन पर विचार करते हुए कई दिशानिर्देश निर्धारित किए थे। ये दिशानिर्देश यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं कि अग्रिम जमानत का उपयोग कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता है और ऐसे आवेदनों से निपटने वाली न्यायालयों को पर्याप्त विवेक प्रदान किया जा सकता है। इस लेख का अनुवाद Shubham Choube द्वारा किया गया है।

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परिचय

अक्सर कहा जाता है कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद है‘। इसका मूल रूप से तात्पर्य यह है कि जिस व्यक्ति पर किसी अपराध का आरोप है, उसे जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए, जब तक कि ऐसी आशंका न हो कि ऐसा व्यक्ति हिरासत में नहीं लिया गया या गिरफ्तार नहीं किया गया तो वह फरार हो सकता है। गिरफ्तारी या हिरासत का प्राथमिक उद्देश्य कानूनी कार्यवाही के सुचारू संचालन और कार्यवाही के दौरान जब भी आवश्यक हो अभियुक्त(अक्यूज़्ड) की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। हालाँकि, अक्सर, हमने ऐसे कई उदाहरण देखे हैं जहाँ लोगों को केवल परेशान करने या कोई अनुचित प्रभाव डालने के लिए गिरफ्तार या हिरासत में लिया जा सकता है। उसी के संदर्भ में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने आपराधिक न्याय प्रणाली में अभियुक्तों के साथ-साथ अभियोजन पक्ष के हितों को संतुलित करने के लिए अग्रिम जमानत देने के लिए कुछ दिशानिर्देश निर्धारित किए है। प्रासंगिक कानूनी प्रावधानों और न्यायिक मिसालों के आलोक में, इस मामले पर वर्तमान लेख में विस्तृत चर्चा की गई है।

अग्रिम जमानत की अवधारणा

मामले की गहराई में जाने से पहले, अग्रिम जमानत की अवधारणा को समझना उचित है। अपराध की गंभीरता के आधार पर, किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकता है या जमानत दी जा सकती है। तदनुसार, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (‘सीआरपीसी’ या ‘संहिता’) अपराधों को जमानती और गैर-जमानती अपराधों में वर्गीकृत करती है। संहिता की धारा 2(a) में प्रावधान है कि जमानती अपराध वे अपराध हैं जिनका उल्लेख पहली अनुसूची या उस समय लागू किसी अन्य कानून के तहत जमानती के रूप में किया गया है। अन्य सभी शेष अपराधों को गैर-जमानती अपराध के रूप में वर्गीकृत किया गया है। पहले में आमतौर पर ऐसे अपराध शामिल होते हैं जो प्रकृति में कम गंभीर होते हैं, जबकि बाद में आमतौर पर बहुत अधिक गंभीर अपराध शामिल होते हैं।

किसी को यह समझना चाहिए कि कोई भी अपराधी जिस पर जमानती अपराध का आरोप लगाया गया है, वह ज्यादातर जमानत के लिए पात्र है, सिवाय इसके कि जब ऐसा व्यक्ति जमानत बॉन्ड की शर्तों का पालन करने में विफल रहता है, जैसा कि सीआरपीसी की धारा 436 (2) के तहत प्रदान किया गया है। गैर-जमानती अपराध के मामले में जमानत या अग्रिम जमानत देने का सवाल उठता है।

सीआरपीसी की धारा 438 

संहिता में ‘अग्रिम जमानत’ शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। हालाँकि, संहिता की धारा 438 विशेष रूप से अग्रिम जमानत देने के दायरे और शर्तों से संबंधित है।

41वें विधि आयोग की रिपोर्ट का संदर्भ देना भी जरूरी है, जिसमें इस प्रावधान को शामिल करने के वास्तविक उद्देश्य पर जोर दिया गया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि “अग्रिम जमानत देने की आवश्यकता मुख्य रूप से इसलिए उत्पन्न होती है क्योंकि कभी-कभी प्रभावशाली व्यक्ति अपने प्रतिद्वंद्वियों को अपमानित करने के उद्देश्य से या अन्य उद्देश्यों के लिए कुछ दिनों के लिए जेल में बंद करके झूठे कारणों में फंसाने की कोशिश करते हैं”।

प्रावधान की उपधारा 1 में कहा गया है कि कोई व्यक्ति सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय के समक्ष अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है यदि उसके पास ‘विश्वास करने का कारण’ या ‘आशंका’ है कि उसे गैर-जमानती अपराध के लिए झूठा फंसाए जाने पर गिरफ्तार किया जा सकता है। इसमें आगे कहा गया है कि यदि ऐसी न्यायालय उचित समझती है, तो वह निर्देश दे सकती है कि गिरफ्तारी के मामले में आवेदक को जमानत दी जाए।

उपधारा 2 कुछ शर्तें प्रदान करती है जिन्हें न्यायालय अग्रिम जमानत का निर्देश देते समय लगा सकती है। ये शर्तें, हालांकि संपूर्ण नहीं हैं, इसमें निम्नलिखित शामिल हैं:

  • आवश्यकता पड़ने पर वह व्यक्ति पुलिस द्वारा पूछताछ के लिए तुरंत उपलब्ध रहेगा।
  • वह व्यक्ति किसी भी व्यक्ति या गवाह को पुलिस अधिकारी या न्यायालय के समक्ष किसी भी प्रासंगिक जानकारी का खुलासा करने से अक्षम करने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से धमकी नहीं देगा या प्रभावित नहीं करेगा।
  • व्यक्ति संबंधित न्यायालय की उचित अनुमति के बिना विदेश यात्रा नहीं कर सकता है।
  • कोई अन्य शर्त जो न्यायालय द्वारा संहिता की धारा 437(3) के तहत लगाई जा सकती है।

उपधारा 3 उस प्रक्रिया का प्रावधान करती है जिसका पालन तब किया जाना चाहिए जब किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया हो या हिरासत में लिया गया हो, भले ही न्यायालय ने अग्रिम जमानत का निर्देश दिया हो। इसमें कहा गया है कि जहां पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार करता है या हिरासत में रहते हुए वारंट तैयार करता है, तो उस व्यक्ति को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए। दूसरा, जहां एक मजिस्ट्रेट ऐसे अपराध का संज्ञान लेता है और निर्णय लेता है कि वारंट जारी किया जाना चाहिए, अग्रिम जमानत का निर्देश देने वाली न्यायालय के निर्देशों के अनुसार एक जमानती वारंट जारी किया जाना चाहिए।

अंत में, आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 के माध्यम से 2018 में उप-धारा 4 को जोड़ा गया। संशोधन भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 376(3), 376AB, 376DA और 376DB के तहत निर्धारित बारह या सोलह वर्ष से कम उम्र की नाबालिग महिला के साथ बलात्कार या सामूहिक बलात्कार के अपराधों में न्यायालयों को अग्रिम जमानत देने से रोकता है। 

गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य (1980) का विवरण

  • मामले का नाम: गुरबख्श सिंह सिब्बिया और अन्य बनाम पंजाब राज्य
  • समतुल्य उद्धरण: (1980) 2 एससीसी 565, 1980 एससीसी (सीआरआई) 465, 1980 सीआरआई एलजे 1125, एआईआर 1980 एससी 1632
  • न्यायालय: भारत का माननीय सर्वोच्च न्यायालय
  • खंडपीठ : न्यायमूर्ति वाई.वी. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती, न्यायमूर्ति एन.एल. ऊंटवालिया, न्यायमूर्ति आर.एस. पाठक, और न्यायमूर्ति ओ. चिन्नाप्पा रेड्डी
  • अपीलकर्ता: गुरबख्श सिंह सिब्बिया, सरबजीत सिंह
  • प्रतिवादी: पंजाब राज्य
  • फैसले की तारीख: 09 अप्रैल, 1980
  • कानूनी प्रावधान शामिल: दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 438

गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य (1980) के तथ्य

मामला पंजाब सरकार के सिंचाई और बिजली मंत्री गुरबख्श सिंह सिब्बिया से जुड़ा है। उन पर अन्य मंत्रियों के साथ गंभीर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया था। अपनी गिरफ्तारी की आशंका से, मंत्रियों ने सीआरपीसी की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत के लिए माननीय पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष आवेदन दायर किया। मामले की महत्ता को समझते हुए एकल न्यायाधीश ने मामले को उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ को सौंप दिया। उच्च न्यायालय ने इस आधार पर आवेदन खारिज कर दिया कि अग्रिम जमानत देने की उच्च न्यायालय की शक्तियां सीमित थीं और उसे सीआरपीसी की धारा 437 द्वारा निर्देशित किया जाना था। इन शक्तियों का प्रयोग केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में ही किया जा सकता था। उच्च न्यायालय के निर्णय से व्यथित होकर, आवेदकों ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक विशेष अनुमति याचिका के माध्यम से अपील की।

सर्वोच्च न्यायालय के सामने उठाया गया मुद्दा

सर्वोच्च न्यायालय के सामने मुद्दा यह था कि क्या सीआरपीसी की धारा 438 पर सीधा फॉर्मूला लागू किया जा सकता है, जिसका पालन न्यायालय को अग्रिम जमानत देते समय करना होगा।

गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य (1980) में पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से पहला तर्क यह था कि किसी ऐसे व्यक्ति को जमानत देने से इनकार करना जिसे किसी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया गया है, उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करना है। इस प्रकार, न्यायालय को सीआरपीसी की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत देने पर लगाई जाने वाली अनावश्यक शर्तों की ओर झुकाव नहीं करना चाहिए। आगे यह तर्क दिया गया कि धारा 438 के पीछे विधायी मंशा कोई अनावश्यक प्रतिबंध लगाना नहीं था।

अपीलकर्ताओं द्वारा उठाया गया एक और महत्वपूर्ण तर्क यह था कि अगर सीआरपीसी की धारा 438 के तहत कोई प्रतिबंध लगाया गया था, तो भी इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन मानते हुए रद्द कर दिया जाएगा। जमानत देने की शक्ति पर कोई भी अनुचित प्रतिबंध जमानत चाहने वाले व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा। ऐसे व्यक्ति को दोषी साबित होने तक निर्दोष माना जाना चाहिए।

प्रतिवादियों की ओर से तर्क

प्रतिवादियों की ओर से प्राथमिक तर्क यह था कि असाधारण मामलों में अग्रिम जमानत दी जानी चाहिए, जहां आवेदक यह साबित करने में सक्षम है कि गिरफ्तारी तुच्छ या दुर्भावनापूर्ण आधार पर अपेक्षित है। आगे यह तर्क दिया गया कि अग्रिम जमानत एक असाधारण उपाय है, और इसलिए, जब भी ऐसा लगे कि प्रस्तावित आरोप प्रथम दृष्टया विश्वसनीय हैं, तो गिरफ्तार होने के बाद आवेदक को सीआरपीसी की धारा 437 या धारा 439 के तहत जमानत के लिए आवेदन करने के सामान्य उपाय पर छोड़ दिया जाना चाहिए।

उच्च न्यायालय का फैसला

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने सीआरपीसी की धारा 438 के प्रावधानों का सारांश देने के बाद अपीलकर्ताओं के आवेदन को खारिज कर दिया। सारांश निम्नलिखित तरीके से प्रदान किया गया था:

  1. अग्रिम जमानत देने की शक्ति असाधारण प्रकृति की है और इसका उपयोग शायद ही कभी किया जाना चाहिए;
  2. सीआरपीसी का कोई भी प्रावधान न्यायालय को उन सभी अपराधों के खिलाफ पूर्ण जमानत देने का अधिकार नहीं देता है जो किए ही नहीं गए हैं या जिनके लिए व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगाए गए हैं;
  3. सीआरपीसी की धारा 437 के तहत लगाई गई सभी सीमाओं को धारा 438 में पढ़ा जाना चाहिए;
  4. इन सीमाओं के अलावा, आवेदक को अग्रिम जमानत देने के लिए एक विशेष मामला साबित करना होगा;
  5. यदि सीआरपीसी की धारा 167(2) के तहत अभियुक्त को पुलिस हिरासत या जांच प्राधिकारी की हिरासत में भेजने का पर्याप्त मामला बनता है, तो धारा 438 के तहत शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता है या भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 27 के तहत अभियुक्त से आपत्तिजनक सामग्री एकत्र करने का उचित मामला बनाया गया है;
  6. धारा 438 के तहत विवेक का प्रयोग मौत या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराधों के संबंध में नहीं किया जा सकता है जब तक कि न्यायालय उसी स्तर पर संतुष्ट न हो जाए कि ऐसा आरोप झूठा या आधारहीन प्रतीत होता है;
  7. धारा 438 के तहत विवेक का प्रयोग राजनीतिक शक्तियों का उपयोग करके भ्रष्टाचार जैसे सार्वजनिक महत्व के मामलों में भी नहीं किया जाएगा; और
  8. धारा 438 के तहत प्रदत्त विवेक का प्रयोग करने के लिए न्यायालय इस बात से संतुष्ट होगा कि आवेदक के खिलाफ लगाए गए आरोप दुर्भावनापूर्ण हैं।

उपरोक्त आधार पर, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत की अर्जी खारिज कर दी।

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिवादियों द्वारा उठाए गए तर्कों के साथ-साथ पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित शर्तों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसे उसने धारा 438 का सही अर्थ माना।

यह माना गया कि यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि धारा 438 के प्रावधान का मसौदा तैयार करते समय कोई विधायी निरीक्षण हुआ था, क्योंकि यह कानून का कोई सामान्य प्रावधान नहीं है। इसमें किसी व्यक्ति के सबसे महत्वपूर्ण अधिकारों में से एक, दोषी साबित होने तक निर्दोष माने जाने का अधिकार शामिल है। यदि विधायिका का इरादा अग्रिम जमानत देने की शक्ति पर कोई प्रतिबंध लगाने का था, तो उसने इसे प्रावधान के तहत ही शामिल किया होता।

इसके अलावा, यह कहा गया कि विधायिका इस प्रावधान को साफ स्लेट पर नहीं लिख रही थी। धारा 438 का मसौदा तैयार करते समय इसने धारा 437 और धारा 439 पर भरोसा किया। इसके अलावा, संसद ने 41वें विधि आयोग की रिपोर्ट पर भी भरोसा किया, जिसमें अग्रिम जमानत देने की न्यायालय की शक्ति पर विधिवत विचार किया गया था। रिपोर्ट इस अर्थ के साथ समाप्त हुई कि न्यायालय के पास अग्रिम जमानत देने की विवेकाधीन शक्ति होनी चाहिए और उसे अनावश्यक शर्तों से नहीं बांधा जाना चाहिए।

न्यायालय के अनुसार, विधायिका ने दो कारणों से सत्र न्यायालयों और उच्च न्यायालयों को अग्रिम जमानत देने की व्यापक शक्तियाँ प्रदान कीं। सबसे पहले, अग्रिम जमानत देने के लिए न्यायालयों द्वारा अपनाई जाने वाली निश्चित शर्तें निर्धारित करना बहुत मुश्किल होगा। दूसरे, न्यायालयों  को ऐसी शक्ति का प्रयोग करने के लिए पर्याप्त विवेक देना।

न्यायालय ने यह भी माना कि अग्रिम जमानत सीआरपीसी की धारा 437 के तहत जमानत से अलग है। किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उसकी बेगुनाही की धारणा की रक्षा के लिए जमानत महत्वपूर्ण है। अग्रिम जमानत गिरफ्तारी के समय स्वतंत्रता की रक्षा करती है, जबकि धारा 437 के तहत जमानत गिरफ्तारी होने और न्यायालय को डेटा प्रदान किए जाने के बाद दी जा सकती है। इस डेटा के आधार पर ही न्यायालय गैर-जमानती अपराध के लिए जमानत की अर्जी को स्वीकार या खारिज कर सकती है। जबकि अग्रिम जमानत के मामले में, न्यायालय के पास गिरफ्तारी की स्थिति में किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने की शक्ति होती है।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा नहीं है कि बिना कोई शर्त लगाए अग्रिम जमानत दी जाए। सीआरपीसी की धारा 438(2) न्यायालयों  को अग्रिम जमानत देते समय ऐसी शर्तें लगाने की शक्ति देती है जो वे आवश्यक समझे।

इस प्रकार, सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया और धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत देते समय उच्च न्यायालयों और सत्र न्यायालयों द्वारा पालन किए जाने वाले कुछ दिशानिर्देश प्रदान किए, जिनकी चर्चा यहां की गई है।

न्यायालय द्वारा जारी किये दिशा-निर्देश

सर्वोच्च न्यायालय ने सीआरपीसी की धारा 438 के तहत शक्तियों के दायरे के संबंध में कुछ दिशानिर्देश जारी किए। दिशानिर्देशों को संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है:

  1. अस्पष्ट आरोपों पर सीआरपीसी की धारा 438 लागू नहीं की जा सकती। प्रावधान केवल तभी लागू किया जा सकता है जब आवेदक के पास ‘विश्वास करने का कारण’ हो कि उसे गिरफ्तार किया जा सकता है। महज डर को आवेदक के विश्वास से नहीं जोड़ा जा सकता। इस प्रकार, आवेदक को यह ध्यान में रखना चाहिए कि जिन आधारों पर अग्रिम जमानत की प्रार्थना की गई है, वे ऐसी प्रकृति के हैं जिनका न्यायालय द्वारा निष्पक्ष रूप से विश्लेषण किया जा सकता है। बिना उचित कारण के केवल आरोप लगाने से कोई व्यक्ति अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करने का हकदार नहीं हो सकता।
  2. धारा 438 का उद्देश्य, जैसा भी मामला हो, उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय को विवेकाधीन शक्तियां प्रदान करना है। इस प्रकार, ऐसी न्यायालय सीआरपीसी की धारा 437 के तहत निर्धारित प्रश्न को मजिस्ट्रेट द्वारा तय करने के लिए नहीं छोड़ सकती है। ऐसी कार्रवाई प्रावधान के मूल उद्देश्य को विफल कर देगी।
  3. अग्रिम जमानत के लिए आवेदन से पहले एफआईआर दर्ज करना कोई शर्त नहीं है। इसे तब भी लागू किया जा सकता है, जब आवेदक के पास गिरफ्तारी की आशंका के ठोस कारण हों।
  4. अगर ऐसे व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, तब भी उसे अग्रिम जमानत दी जा सकती है, बशर्ते कि उसे गिरफ्तार न किया गया हो।
  5. यदि व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया गया है, तो वह अग्रिम जमानत पाने का हकदार नहीं है। ऐसे मामले में, व्यक्ति को सीआरपीसी की धारा 437 या धारा 439, जैसा भी मामला हो, के तहत जमानत के लिए आवेदन करना होगा।
  6. इन दिशानिर्देशों के अलावा, सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के एक दृष्टिकोण को स्वीकार किया, यानी, ऐसे मामलों में पूर्ण अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती, जहां व्यक्ति के पास गिरफ्तारी पर विश्वास करने या उसकी आशंका करने का कोई उचित कारण नहीं है। व्यापक अग्रिम जमानत का मतलब एक ऐसा आदेश है जो किसी भी अपराध के लिए गिरफ्तारी के खिलाफ व्यापक सुरक्षा के रूप में कार्य करता है। इस तरह के आदेश से जांच एजेंसी की शक्ति के साथ गंभीर अन्याय होगा और इसलिए, यह सार्वजनिक हित के खिलाफ होगा। अत: पूर्ण अग्रिम जमानत जारी नहीं की जा सकती।

विश्लेषण

उपर्युक्त मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित दिशानिर्देश विचार के लिए कुछ प्रश्न उठाते हैं, जिन पर आगे चर्चा की गई है।

न्यायालय का विवेक

यह उल्लेखनीय है कि धारा 438 की उप-धारा 1 में स्पष्ट रूप से ‘यदि न्यायालय उचित समझे’ वाक्यांश का उपयोग करती है, जिससे अग्रिम जमानत देने में सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय के व्यापक विवेक का संकेत मिलता है। न्यायालय की राय में संबंधित न्यायालय के पास व्यापक विवेकाधिकार है और यदि स्थिति जरूरी हो तो वह अग्रिम जमानत के आवेदन को खारिज कर सकती है। जहां न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि आवेदक जरूरत पड़ने पर मुकदमे के दौरान फरार हो सकता है या उसके फरार होने का पिछला इतिहास रहा है, तो न्यायालय ऐसे मामले में जमानत देने की अनुमति नहीं दे सकती है।

हालाँकि इस संबंध में न्यायालयों  को व्यापक विवेकाधिकार दिया गया है, फिर भी वे आवेदन पर निर्णय लेते समय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करने के लिए मजबूर हैं। महाराष्ट्र राज्य बनाम विश्वास श्रीपति पाटिल (1978) के मामले में, माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय ने माना है कि न्यायालय को अग्रिम जमानत देते समय लिखित रूप में कारण दर्ज करना चाहिए। इस दृष्टिकोण की पुष्टि महाराष्ट्र राज्य बनाम धनेंद्र श्रीराम भुरले (2009) मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी की गई है।

उचित होने की आशंका

इस बात पर पहले ही पर्याप्त जोर दिया जा चुका है कि सीआरपीसी की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करने से पहले आवेदक को आशंका का उचित विश्वास होना चाहिए। गिरफ्तारी की उचित आशंका या प्रत्याशा होनी चाहिए, न कि आवेदक की ओर से केवल डर। प्रत्याशा की तर्कसंगतता को न्यायालयों द्वारा निर्धारित किया जाना आवश्यक है। फिर भी, एक टिप्पणी जो न्यायालय के दिशानिर्देशों के साथ-साथ सुरेश वासुदेव बनाम राज्य (1977) सहित विभिन्न अन्य मामलों से की जा सकती है, वह यह है कि गिरफ्तारी की आशंका पैदा करने के लिए पुलिस में मामले को एफआईआर के रूप में औपचारिक रूप से दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है। ऐसी आशंका, यदि उचित हो, तो एफआईआर दर्ज होने से पहले भी हो सकती है।

अग्रिम जमानत देने की अवधि

एक बार जब संबंधित न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत दे दी जाती है, तो न्यायालय का निर्देश मुकदमे के समापन तक प्रभावी रहता है। हाल ही में, ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जिनमें न्यायालयों  ने माना है कि जमानत सीमित अवधि के लिए नहीं होनी चाहिए। इस दृष्टिकोण की पुष्टि सिद्धराम सतलिंगप्पा म्हेत्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2010) के साथ-साथ सुशीला अग्रवाल बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) (2020) में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई है। सुशीला अग्रवाल मामले में पांच न्यायाधीशों की पीठ ने इस मुद्दे की जांच की और गुरबख्श सिंह मामले के अनुरूप विचार दिए। हालाँकि, इसने सिद्धराम सतलिंगप्पा म्हेत्रे मामले को इस बिंदु पर खारिज कर दिया कि कोई प्रतिबंधात्मक शर्तें नहीं लगाई जा सकतीं क्योंकि यह प्रावधान का उल्लंघन था।

जमानत देने का कोई सटीक निर्देश नहीं

अग्रिम जमानत देने के लिए न्यायालयों  द्वारा कोई पूर्ण निर्देश नहीं दिया जा सकता। श्रीकांत उपाध्याय बनाम बिहार राज्य (2024) में, न्यायालय ने कहा, “हालांकि कई मामलों में यह माना गया कि जमानत को एक नियम कहा जाता है, लेकिन किसी भी तरह से यह नहीं कहा जा सकता कि अग्रिम जमानत एक नियम है।” न्यायालय ने यह बयान एक आवेदक के संदर्भ में दिया, जो न्यायालय के आदेशों की अवहेलना कर रहा था, जिससे मुकदमे की प्रक्रिया प्रभावित हो रही थी। विभिन्न निर्णयों के माध्यम से यह पहले ही तय हो चुका है कि न्यायालयों को अग्रिम जमानत चाहने वाले आवेदकों को व्यापक सुरक्षा देने से बचना चाहिए। इसलिए, कोई यह अनुमान लगा सकता है कि न्यायालय की यह राय गुरबख्श सिंह सिब्बिया के मामले के अनुरूप है।

निष्कर्ष

भारत जैसे देश में जहां राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की कोई सीमा नहीं है, अग्रिम जमानत का प्रावधान उन निर्दोष लोगों के बचाव के रूप में आता है जिन्हें समाज के प्रभावशाली सदस्यों द्वारा परेशान किया जा सकता है। फिर भी, साथ ही, यह भी जरूरी है कि गंभीर अपराध करने वाले और कानून की उचित प्रक्रिया से बचने वाले वास्तविक अपराधियों द्वारा प्रावधान का दुरुपयोग न किया जाए। इस अर्थ में, मामले में निर्धारित दिशानिर्देश न्याय वितरण प्रणाली में महत्वपूर्ण हो जाते हैं और अग्रिम जमानत के लिए आवेदन की जांच करते समय न्यायिक अधिकारियों के लिए मार्गदर्शक के रूप में कार्य करते हैं। यह न्यायालयों  को निरर्थक शिकायतों के शिकार निर्दोष आवेदकों और इस प्रावधान की आड़ में भागने की कोशिश करने वाले अपराधियों के हितों को संतुलित करने में सक्षम बनाता है। इन दिशानिर्देशों पर न्यायालयों द्वारा बार-बार जोर दिया गया है, लागू किया गया है और पुष्टि की गई है, जैसा कि विभिन्न न्यायिक घोषणाओं के माध्यम से ऊपर चर्चा की गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

अग्रिम जमानत क्या है?

अग्रिम जमानत वह जमानत है जो आवेदक की गिरफ्तारी से पहले उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय द्वारा दी जा सकती है। अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करने के लिए आवेदक को गैर-जमानती मामले में गिरफ्तारी की आशंका को साबित करना होगा। यह व्यक्ति की गिरफ्तारी की स्थिति में ही प्रभावी होगा, उससे पहले नहीं। यह ध्यान रखना उचित है कि ऐसा आवेदन केवल गिरफ्तारी से पहले ही किया जा सकता है, क्योंकि निचली अदालत और मजिस्ट्रेट को व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद जमानत देने की शक्ति प्रदान की गई है।

संहिता की धारा 437 और धारा 438 के तहत जमानत के लिए आवेदन के बीच क्या अंतर है?

सीआरपीसी की धारा 437 गैर-जमानती अपराध के मामले में उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय के अलावा अन्य न्यायालयों  को जमानत देने की शक्ति प्रदान करती है। सीआरपीसी की धारा 438 उन मामलों में अग्रिम जमानत देने के लिए उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय की शक्ति से संबंधित है जहां आवेदक को गिरफ्तारी की आशंका है।

धारा 437 के तहत जमानत आवेदक की गिरफ्तारी के बाद ही दी जा सकती है, उससे पहले नहीं। हालाँकि, धारा 438 के तहत जमानत व्यक्ति की गिरफ्तारी से पहले ही दी जा सकती है, हालाँकि जमानत केवल गिरफ्तारी की स्थिति पर ही प्रभावी होगी।

सर्वोच्च न्यायालय में गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य मामले की प्रासंगिकता क्या है?

सर्वोच्च न्यायालय ने गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य के मामले में संहिता की धारा 438 की स्थिति स्पष्ट की। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत देने की न्यायालय की शक्ति पर कुछ सीमाएँ तय की थीं, जिन्हें विधायिका द्वारा शामिल नहीं किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इन सीमाओं को खारिज कर दिया और माना कि उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय के पास अग्रिम जमानत देने की व्यापक विवेकाधीन शक्ति है, क्योंकि दोषी साबित होने तक किसी व्यक्ति को निर्दोष माना जाना एक आवश्यक अधिकार है। इसके अलावा, सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी शक्ति का प्रयोग करते समय न्यायालयों  द्वारा पालन किए जाने वाले कुछ दिशानिर्देश भी जारी किए।

क्या अग्रिम जमानत के आवेदन पर विचार करने के लिए सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय के पास समवर्ती (कॉन्कररेंट) अधिकार क्षेत्र है?

सीआरपीसी की धारा 438 उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय दोनों को अग्रिम जमानत के लिए आवेदन पर विचार करने का अधिकार क्षेत्र देती है। हालाँकि, पहले सत्र न्यायालय के समक्ष आवेदन दाखिल करना और बाद में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना अनिवार्य नहीं है। ओंकार नाथ अग्रवाल बनाम राज्य (1976) में माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना है कि आवेदक को या तो उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय जिसके क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र में मामला आता है, से संपर्क करने की अनुमति है।

अग्रिम जमानत के लिए आवेदन पर विचार करने का क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र किस स्थान पर है?

अग्रिम जमानत के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र को लेकर अक्सर भ्रम होता है कि क्या इसे उस स्थान पर दायर किया जाना चाहिए जहां एफआईआर दर्ज की गई है या जहां गिरफ्तारी की आशंका है। स्थिति को प्रीतम सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) के मामले में तय किया गया है, जिसमें माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने माना था कि इसे वहां भी दायर किया जा सकता है जहां गिरफ्तारी की आशंका हो, भले ही एफआईआर किसी अन्य अधिकार क्षेत्र में दर्ज की गई हो।

संदर्भ

  • आर.वी. केलकर की आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 7वां संस्करण (2021)।
  • डी.डी. बसु, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973, छठा संस्करण (2017)।

 

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