भारत के संविधान में मौलिक अधिकार

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Constitution of India

यह लेख इंदौर इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ के छात्र Aditya Dubey द्वारा लिखा गया है। इस लेख में लेखक ने मौलिक अधिकारों की अवधारणा, मौलिक अधिकारों की विशेषताएं, अपवादों के साथ-साथ इसकी उत्पत्ति और महत्व पर चर्चा की है। इस  लेख का अनुवाद  Nisha द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

मौलिक अधिकार भारतीय संविधान के भाग III के तहत प्रतिष्ठापित हैं, जिसे 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया था, लेकिन 26 जनवरी 1950 को उपयोग में लाया गया था। ये मौलिक अधिकार गारंटी देते हैं कि इस देश का प्रत्येक नागरिक भारत के पूरे क्षेत्र में शांति और सद्भाव का जीवन जी सकता है और इन अधिकारों को संविधान में शामिल किया गया क्योंकि इन्हें प्रत्येक व्यक्ति के विकास के लिए आवश्यक माना गया था। सभी नस्ल, धर्म, जाति या लिंग के लोगों को इन अधिकारों को लागू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय में जाने का अधिकार दिया गया है। इन मौलिक अधिकारों को सात श्रेणियों में विभाजित किया गया है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35 तक शामिल हैं।

मौलिक अधिकारों की अवधारणा की उत्पत्ति और विकास

मौलिक अधिकारों को भारत के संविधान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इन अधिकारों की उत्पत्ति फ्रांस के मानव अधिकार विधेयक की घोषणा, इंग्लैंड के अधिकार विधेयक (बिल), साथ ही, संयुक्त राज्य अमेरिका का अधिकार विधेयक, आयरिश संविधान के विकास से हुई है मूल रूप से संविधान ने सात मौलिक अधिकारों का प्रावधान किया है,

  1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18),
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22),
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 और 24),
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28),
  5. सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30),
  6. संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 31),
  7. संवैधानिक उपचारों (रेमेडी) का अधिकार (अनुच्छेद 32)।

लेकिन बाद में, 1978 के 44वें संशोधन अधिनियम द्वारा संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया। इसलिए अब भारत के संविधान में केवल छह मौलिक अधिकार हैं।

मौलिक अधिकारों की विशेषताएं क्या हैं

भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों में कुछ विशेषताएं हैं जो उनकी विशिष्टता स्थापित करती हैं, ये हैं:

  1. कुछ मौलिक अधिकार केवल भारत के नागरिकों के लिए उपलब्ध हैं जबकि कुछ सभी के लिए उपलब्ध हैं जैसे भारतीय नागरिकों, विदेशी नागरिकों या यहां तक ​​कि कंपनियों और निगमों के लिए भी।
  2. राज्य इन अधिकारों पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है, इस प्रकार उन्हें योग्य बना सकता है न कि पूर्ण।
  3. इन मौलिक अधिकारों की रक्षा और गारंटी भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की जाती है, इसलिए इन अधिकारों के उल्लंघन पर पीड़ित पक्ष सीधे सर्वोच्च न्यायालय में जा सकता है।
  4. अनुच्छेद 20 और 21 के तहत परिभाषित अधिकारों को छोड़कर इन अधिकारों को राष्ट्रीय आपातकाल के संचालन के दौरान निलंबित किया जा सकता है।
  5. इन अधिकारों के प्रयोग को तब प्रतिबंधित किया जा सकता है जब व्यवस्था बहाल करने के लिए असामान्य परिस्थितियों में सैन्य शासन लगाया जाता है (अनुच्छेद 34) और यह राष्ट्रीय आपातकाल लगाने से बहुत अलग है।
  6. इन अधिकारों के प्रयोग को संसद द्वारा प्रतिबंधित या निरस्त किया जा सकता है (अनुच्छेद 33), इस अनुच्छेद द्वारा सशस्त्र बलों, पुलिस बलों, खुफिया एजेंसियों आदि के अधिकारों को प्रतिबंधित किया जा सकता है।

वे कौन से कानून हैं जो मौलिक अधिकारों से असंगत हैं

  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 13 के तहत यह परिभाषित किया गया है कि भाग III के तहत निहित किसी भी मौलिक अधिकार के साथ असंगत सभी कानून शून्य होंगे। भारत का सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय किसी भी मौलिक अधिकार के उल्लंघन के आधार पर किसी कानून को असंवैधानिक और अमान्य घोषित कर सकते हैं।
  • अनुच्छेद 13 यह भी घोषित करता है कि संवैधानिक संशोधन एक कानून नहीं है और इसे अदालतों में चुनौती नहीं दी जा सकती है, लेकिन केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले के दौरान यह स्थापित किया गया था कि किसी संवैधानिक संशोधन को इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है जो भारत के संविधान की ‘बुनियादी संरचना’ का हिस्सा है और इसे शून्य घोषित किया जा सकता है।

भारत के संविधान के तहत परिभाषित मौलिक अधिकार क्या हैं

समानता का अधिकार

  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 14 घोषित करता है कि राज्य भारत के क्षेत्र के भीतर किसी को भी कानून के समक्ष समानता या कानूनों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। यह अधिकार विदेशियों और यहां तक ​​कि निगम या कंपनी जैसे कानूनी व्यक्तियों सहित सभी को प्रदान किया गया है।
  • ‘कानून के समक्ष समानता’ की यह अवधारणा ब्रिटिश मूल की है जबकि ‘कानूनों के समान संरक्षण’ की अवधारणा अमेरिकी मूल की है (इसे अमेरिकी संविधान से लिया गया है)।
  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 15 घोषित करता है कि राज्य भारत के किसी भी नागरिक के खिलाफ धर्म, जाति, लिंग या उनके जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।
  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 16 उन मामलों में भारतीय नागरिकों के लिए अवसर की समानता की घोषणा करता है जिनमें राज्य के तहत किसी कार्यालय में रोजगार या नियुक्ति शामिल है। इसलिए, भारत के किसी भी नागरिक के साथ धर्म, जाति, जन्म स्थान या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा या राज्य के तहत किसी भी रोजगार के लिए अयोग्य घोषित नहीं किया जाएगा।
  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 17 ‘अस्पृश्यता’ (अनटचेबिलिटी)  की अवधारणा को समाप्त करता है और किसी भी आकार या रूप में इसके अभ्यास पर प्रतिबंध लगाता है।
  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 18 ‘उपाधि’ की अवधारणा को समाप्त करता है और घोषणा करता है कि:
    • राज्य द्वारा कोई उपाधि (सैन्य और शैक्षणिक उपाधियों को छोड़कर) प्रदान नहीं की जाएगी।
    • भारत के नागरिकों को किसी भी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार करने पर प्रतिबंध है।
    • कोई भी विदेशी व्यक्ति (जबकि वह राज्य के अधीन लाभ या विश्वास का कोई पद धारण करता है) भारत के राष्ट्रपति की सहमति के बिना किसी भी विदेशी राज्य से कोई भी पद, किसी भी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता है।
    • कोई भी भारतीय नागरिक या विदेशी जो राज्य के अधीन लाभ या विश्वास का पद धारण कर रहा है, भारत के राष्ट्रपति की सहमति के बिना किसी विदेशी राज्य से या उसके अधीन कोई उपहार या पद स्वीकार नहीं कर सकता है।

स्वतंत्रता का अधिकार

  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 सभी भारतीय नागरिकों को छह अधिकारों की गारंटी देता है, इस अनुच्छेद के तहत परिभाषित ये अधिकार हैं:

भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(a))

  • भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का तात्पर्य यह है कि भारत के प्रत्येक नागरिक को मौखिक रूप से बोले गए शब्दों के माध्यम से, या लिखकर, मुद्रण (प्रिंटिंग)द्वारा, या किसी भी तरीके के चित्रांकन के माध्यम से अपने विचार, राय और विश्वास को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने का कानूनी अधिकार है। यह संसद द्वारा उचित प्रतिबंधों के अधीन है।

इकट्ठा होने का अधिकार (शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के) (अनुच्छेद 19(1)(b))

  • यह अधिकार भारत के नागरिकों को शांतिपूर्वक और हथियारों, गोला-बारूद जैसे हथियारों, या हाथापाई हथियारों आदि के बिना इकट्ठा होने का अधिकार देता है।
  • इस स्वतंत्रता का प्रयोग केवल सार्वजनिक भूमि पर ही किया जा सकता है और सभा शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के  होनी चाहिए।
  • इस अधिकार में हड़ताल करने का अधिकार शामिल नहीं है।

संघ या सहकारी समितियाँ बनाने का अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(c))

  • भारत के सभी नागरिकों को संघ या सहकारी समितियाँ बनाने का अधिकार दिया गया है, इसमें राजनीतिक दलों, कंपनियों, साझेदारी फर्मों, क्लबों आदि के गठन का अधिकार शामिल है।

पूरे भारतीय क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(d))

  • यह अधिकार घूमने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है और भारत के प्रत्येक नागरिक को पूरे भारत में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार देता है। भारत के प्रत्येक नागरिक को देश के एक राज्य से दूसरे राज्य में स्वतंत्र रूप से जाने का अधिकार दिया गया है। इसका उद्देश्य देश के नागरिकों में राष्ट्रीय भावना को बढ़ावा देना है।

भारतीय क्षेत्र के किसी भी हिस्से में निवास करने और बसने का अधिकार (अनुच्छेद 35A के अनुसार जम्मू और कश्मीर राज्य को छोड़कर) (अनुच्छेद 19(1)(e))

  • यह अधिकार भारत के प्रत्येक नागरिक को जम्मू और कश्मीर राज्य जिसे अनुच्छेद 370 के अनुसार एक विशेष दर्जा दिया गया है जो अनुच्छेद 35A को सशक्त बनाता है जिसमें एक खंड है जो अन्य राज्यों के निवासियों को जम्मू-कश्मीर राज्य में निवास करने की अनुमति नहीं देता है, को छोड़कर भारत के किसी भी हिस्से में निवास करने और बसने का अधिकार देता है।
  • जम्मू-कश्मीर को छोड़कर सभी नागरिकों को भारत के किसी भी अन्य राज्य में रहने और बसने का अधिकार है। लेकिन यह अनुच्छेद  भी उचित प्रतिबंधों के अधीन है।

किसी भी प्रकार का पेशा या व्यवसाय, व्यापार करने का अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(g))

  • भारत के सभी नागरिकों को अपनी इच्छानुसार कोई भी पेशा अपनाने या कोई व्यवसाय या व्यापार करने का अधिकार दिया गया है। लेकिन इस अधिकार में कोई ऐसा पेशा या व्यवसाय करने का अधिकार शामिल नहीं है जिसमें ऐसी कोई भी चीज़ शामिल हो जो अनैतिक हो (जैसे तस्करी) या खतरनाक प्रकृति की हो (ड्रग्स या विस्फोटक)।
  • पहले, अनुच्छेद 19 में सात अधिकार शामिल थे लेकिन बाद में 1978 के संशोधन अधिनियम द्वारा संपत्ति के अधिग्रहण (एक्वीजीशन), धारण और निपटान के अधिकार को हटा दिया गया था।
  • राज्य इन अधिकारों के प्रयोग पर उचित प्रतिबंध भी लगा सकता है जिसका उल्लेख अनुच्छेद 19 में ही किया गया है।

भारत के संविधान का अनुच्छेद 20 किसी आरोपी व्यक्ति को अनुचित और अत्यधिक सजा के खिलाफ सुरक्षा की अनुमति देता है, चाहे वह भारत का नागरिक हो या किसी विदेशी राष्ट्र का नागरिक या यहां तक ​​कि कंपनी या निगम जैसा कानूनी व्यक्ति भी हो। इस अनुच्छेद में आगे तीन प्रावधान शामिल हैं:

कोई कार्योत्तर कानून (एक्स पोस्ट फेक्टो) नहीं

  • इसका मतलब यह है कि किसी को भी किसी भी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जाएगा, सिवाय कार्य के किए जाने के समय लागू कानून के उल्लंघन के, जो कुछ दायित्व के बराबर हो सकता है।

कोई दोहरा ख़तरा नहीं

  • इसका मतलब यह है कि किसी को भी एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार दोषी नहीं ठहराया जाएगा। किसी भी व्यक्ति को एक बार किए गए अपराध के लिए एक से अधिक बार दोषी नहीं ठहराया जाएगा।

कोई आत्म-दोषारोपण नहीं

  • इसका मतलब यह है कि किसी भी अपराध के अभियुक्त किसी भी व्यक्ति को अपने खिलाफ गवाह बनने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

अनुच्छेद 21 सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकारों में से एक है जो सबसे महत्वपूर्ण अधिकार जीवन के अधिकार की घोषणा करता है। इसमें कहा गया है कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा। यह अधिकार भारत के नागरिकों और भारत में विदेशी देशों के नागरिकों दोनों के लिए उपलब्ध है।

इसके अलावा अनुच्छेद 21A घोषित करता है कि राज्य को छह से चौदह वर्ष की आयु के सभी बच्चों या नाबालिगों को राज्य द्वारा निर्धारित किसी भी तरीके से मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करनी चाहिए।

अनुच्छेद 22 गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान करता है।

शोषण के विरुद्ध अधिकार

  • मानव तस्करी, जबरन श्रम और किसी भी अन्य प्रकार के जबरन श्रम को भारत के संविधान के अनुच्छेद 23 द्वारा प्रतिबंधित किया गया है जो इन्हें दंडनीय अपराध घोषित करता है और यह अधिकार भारत के नागरिकों के साथ-साथ विदेशी राष्ट्र के नागरिक जो भारत में हैं दोनों को उपलब्ध करता है । 
  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 24 किसी भी कारखाने, खदान या किसी अन्य खतरनाक गतिविधियों जैसे निर्माण कार्य या रेलवे में 14 वर्ष से कम उम्र के नाबालिग/बच्चों के रोजगार पर रोक लगाता है। लेकिन यह अनुच्छेद  किसी भी हानिरहित या निर्दोष कार्य वातावरण में बच्चों/नाबालिगों के रोजगार को प्रतिबंधित नहीं करता है।

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 घोषित करता है कि हर कोई अंतरात्मा (कनसाइंस) की स्वतंत्रता और किसी भी धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, अभ्यास करने और प्रचार करने का समान रूप से हकदार है। ये अधिकार सभी के लिए उपलब्ध हैं, भारत के नागरिकों के साथ-साथ वर्तमान में भारत में रहने वाले किसी भी विदेशी राष्ट्र के नागरिकों के लिए भी।
  • धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता भारत के संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत बताई गई है जो प्रत्येक व्यक्ति के धार्मिक संप्रदायों (डिनॉमिनेशन) के अधिकारों की घोषणा करता है, दूसरे शब्दों में, अनुच्छेद 26 धर्म की सामूहिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
  • अनुच्छेद 25 और 26 के तहत बताए गए अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य दोनों के अधीन हैं, लेकिन वे मौलिक अधिकारों से संबंधित अन्य प्रावधानों के अधीन नहीं हैं।
  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 27 के तहत धर्म के प्रचार के लिए कराधान से मुक्ति निहित है, जिसमें कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी धर्म या धार्मिक संप्रदाय के प्रचार या रखरखाव के लिए कोई कर देने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा, दूसरे शब्दों में, सरकार को किसी भी धर्म के प्रचार या रखरखाव के लिए कर के माध्यम से एकत्र किए गए सार्वजनिक धन को खर्च नहीं  करना  चाहिए ।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 28 घोषित करता है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान में कोई धार्मिक निर्देश प्रदान नहीं किया जाएगा जो पूरी तरह से राज्य निधि द्वारा संचालित है। लेकिन यह प्रावधान राज्य द्वारा प्रशासित संस्थानों लेकिन किसी ट्रस्ट या बंदोबस्ती (एंडोमेंट) के तहत स्थापित होते हैं और उन्हें धार्मिक निर्देश देने की आवश्यकता होती है, पर लागू नहीं होता है।

सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार

  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 29 में कहा गया है कि भारत के क्षेत्र में कहीं भी रहने वाले नागरिकों के किसी भी वर्ग की अपनी विशिष्ट भाषा, संस्कृति है, उन्हें इसे संरक्षित करने का अधिकार होगा।
  • इसके अलावा अनुच्छेद 29 में घोषणा की गई है कि भारत के किसी भी नागरिक को पंथ, धर्म, जाति या भाषा के आधार पर राज्य द्वारा संचालित या राज्य से धन प्राप्त करने वाले किसी भी शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश से इनकार नहीं किया जाएगा। यह धार्मिक अल्पसंख्यकों (माइनॉरिटीज)के साथ-साथ भाषाई अल्पसंख्यकों दोनों को सुरक्षा प्रदान करता है।
  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों (भाषाई या धार्मिक) को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने का अधिकार देता है। इस अधिकार में अपने बच्चों को अपनी भाषा में शिक्षा प्रदान करने का अधिकार भी शामिल है।

संवैधानिक उपचारों का अधिकार.

  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 32 पीड़ित भारत के नागरिक के मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए उपचार का अधिकार देता है। यह मौलिक अधिकारों को अदालत में लागू करने योग्य बनाता है।
  • ऊपर बताए गए कारण से ही डॉ. बीआर अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को भारत के संविधान का सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद कहा और इसे भारतीय संविधान का हृदय और आत्मा कहा। यह अनुच्छेद 32 है जो अन्य सभी अधिकारों को वैध प्रकृति का बनाता है।
  • सर्वोच्च न्यायलय ने भी अनुच्छेद 32 को भारत के संविधान की मूल विशेषता बताया है। इसमें आगे चार प्रावधान शामिल हैं:
    • मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय में जाने का अधिकार।
    • इन मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए निर्देश, आदेश या रिट जारी करने की सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति। जो रिट जारी की जा सकती हैं वे हैं बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस), परमादेश (मैनडामस) , निषेध (प्रोहिबिशन), उत्प्रेषण (सर्टियोररी), और अधिकार पृच्छा (क्वो वारंटो) 
    • संसद किसी अन्य न्यायालय को सभी प्रकार के निर्देश, आदेश और रिट जारी करने का अधिकार दे सकती है। इस धारा के तहत उच्च न्यायालयों को किसी अन्य न्यायालय में शामिल नहीं किया गया है क्योंकि उन्हें भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत पहले से ही ये शक्तियां प्रदान की गई हैं।
    • भारत के सर्वोच्च न्यायालय में जाने का अधिकार तब तक निलंबित नहीं किया जाएगा जब तक कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अन्यथा प्रदान न किया गया हो।

अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत कौन-सी रिट उपलब्ध हैं

  • सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकारों को लागू करने के लिए कुछ रिट जारी कर सकते हैं, इन्हें भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मामले में अनुच्छेद 32 के तहत और उच्च न्यायालयों के मामले में अनुच्छेद 226 के तहत परिभाषित किया गया है। पाँच प्रकार की रिटें जारी की जा सकती हैं, ये हैं:

बन्दी प्रत्यक्षीकरण

  • यह एक लैटिन वाक्यांश है जिसका शाब्दिक अर्थ है शरीर को प्रस्तुत करना। यह एक आदेश है जो अदालत किसी ऐसे व्यक्ति के लिए जारी करती है जिसे किसी अन्य व्यक्ति द्वारा हिरासत में लिया गया है, हिरासत में लिए गए व्यक्ति के शरीर को पेश करने के लिए। जिस व्यक्ति को हिरासत में लिया गया है वह स्वतंत्र होगा यदि उसे गलत तरीके से हिरासत में लिया गया है।

परमादेश 

  • यह भी एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अनुवाद ‘हम आदेश देते है’ होता है। यह एक आदेश है जो न्यायालय द्वारा एक सार्वजनिक अधिकारी को जारी किया जाता है जो उस व्यक्ति को अपना कर्तव्य निभाने के लिए कहता है जिसमें वे विफल रहे हैं या ऐसा करने से इनकार कर दिया है।

निषेध

  • इस रिट का उद्देश्य ‘मना करना’ है। यह उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालत या न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) को उनके अधिकार क्षेत्र जो उनके पास नहीं है, से बाहर जाने से रोकने के लिए जारी की जाती है।

उत्प्रेषण

  • उत्प्रेषण शब्द का अनुवाद ‘प्रमाणित होना’ या ‘किसी चीज़ के संबंध में निश्चित होना’ या ‘सूचित होना’ है। यह उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालत या न्यायाधिकरण को वहां लंबित मामले को अपने पास स्थानांतरित (ट्राँसफर) करने या मामले के संबंध में निचली अदालत या न्यायाधिकरण द्वारा दिए गए आदेश को रद्द करने के लिए जारी की जाती है।

अधिकार पृछा

  • अधिकार पृछा शब्द का अनुवाद ‘किस अधिकार या वारंट द्वारा’ या ‘किस अधिकार या वारंट पर? है’ यह किसी सार्वजनिक पद पर किसी व्यक्ति के दावे की वैधता की जांच करने के लिए अदालत द्वारा जारी की गई एक रिट है।

मौलिक अधिकारों के अपवाद क्या हैं

सम्पदा के अधिग्रहण का प्रावधान करने वाले कानूनों की व्यावृत्ति (सेविंग्स)

भारत के संविधान के अनुच्छेद 31A के तहत, संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दिए जाने से कानूनों की पांच श्रेणियों को परिभाषित किया गया है। ये श्रेणियां संबंधित हैं

  • राज्य द्वारा सम्पदा और उससे संबंधित अधिकारों का अधिग्रहण।
  • विभिन्न निगमों का एक समामेलन (अमलगमेशन)।
  • खनन पट्टों (लीज) में संशोधन या शमन (एक्सटिंगगुइश्मेंट) भी।
  • संपत्तियों का प्रबंधन राज्य द्वारा अपने हाथ में लेना।
  • विभिन्न निगमों के निदेशकों (डायरेक्टर) के अधिकारों में संशोधन।

कुछ निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने वाले कानूनों की  व्यावृत्ति

अनुच्छेद 31C (जिसे 1971 के 25वें संशोधन अधिनियम द्वारा डाला गया था) के तहत दो प्रावधान शामिल किए गए हैं, ये हैं:

  • इसमें कहा गया है कि यदि कोई कानून है जो अनुच्छेद 39(b) या 39(c) के तहत परिभाषित समाजवादी निर्देशक सिद्धांतों को लागू करना चाहता है तो इसे अनुच्छेद 14 और  अनुच्छेद 19 के तहत परिभाषित मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर शून्य घोषित नहीं किया जाएगा। और, यदि कोई कानून है जिसमें ऐसी नीति को प्रभावी करने की घोषणा शामिल है तो उस पर अदालत में सवाल नहीं उठाया जाएगा।

कुछ अधिनियमों और विनियमों का सत्यापन

  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 31B  के तहत, नौवीं अनुसूची में शामिल अधिनियमों और विनियमों को मौलिक अधिकार के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दिए जाने से संरक्षित किया गया है। अनुच्छेद 31B  नौवीं अनुसूची में शामिल किसी भी कानून को सभी मौलिक अधिकारों से मुक्त करता है और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि नौवीं अनुसूची में शामिल कोई भी कानून अनुच्छेद 31A  के तहत परिभाषित पांच श्रेणियों में से किसी एक के अंतर्गत आता है।

मौलिक अधिकारों की आलोचना

मौलिक अधिकारों की कई कारणों से आलोचना की गई है, उनमें से कुछ नीचे सूचीबद्ध हैं:

अत्यधिक सीमाएँ

  • संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार उचित प्रतिबंधों के साथ-साथ अपवादों के अधीन हैं, इसलिए इस टिप्पणी पर उनकी आलोचना की गई है।

सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों का अभाव

  • मौलिक अधिकारों की सूची में मुख्य रूप से राजनीतिक अधिकार शामिल हैं। ऐसे कोई प्रावधान नहीं हैं जो महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक अधिकार बनाते हैं जैसे कि सामाजिक सुरक्षा का अधिकार, काम करने का अधिकार, रोजगार का अधिकार इत्यादि। जबकि चीन जैसे अन्य देशों के संविधान ऐसे अधिकारों का प्रावधान करते हैं।

स्पष्टता का अभाव

  • विभिन्न मौलिक अधिकारों की परिभाषाओं के अंतर्गत प्रयुक्त कई वाक्यांश और शब्द स्पष्ट या अस्पष्ट नहीं पाए जाते हैं क्योंकि उनकी व्याख्या भारत के संविधान में कहीं भी नहीं दी गई है। ‘सार्वजनिक व्यवस्था’, ‘अल्पसंख्यक’, उचित प्रतिबंध’ आदि शब्द इसी श्रेणी में आते हैं।

कोई स्थायित्व नहीं

  • संसद मौलिक अधिकारों को कम या समाप्त कर सकती है। इसका एक उदाहरण संपत्ति के मौलिक अधिकार को ख़त्म करना है। संसद में बहुमत का समर्थन रखने वाले राजनेताओं के हाथों में खेलने का उपकरण बनने के लिए उनकी आलोचना की गई है। अतः उनमें स्थायित्व का अभाव है।

आपातकाल के दौरान निलंबित हो जाते है

  • राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान उनके अस्थायी निलंबन के आधार पर मौलिक अधिकारों की आलोचना की जाती है (अनुच्छेद 20 और 21 के तहत परिभाषित मौलिक अधिकारों को छोड़कर) आपातकाल के दौरान सभी मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए जाते हैं।

निवारक निरोध

  • निवारक निरोध की अवधारणा के प्रावधानों की कई लोगों द्वारा आलोचना की जाती है और इसका कारण यह बताया जाता है कि यह मौलिक अधिकारों की भावना और सार को छीन लेता है क्योंकि यह राज्य को मनमानी शक्तियां प्रदान करता है।

महँगा उपाय

  • न्यायिक प्रक्रियाएँ बहुत महंगी हैं और आम आदमी को अदालतों में अपने अधिकारों को लागू करने से रोकती हैं क्योंकि हर व्यक्ति के पास ऐसी कार्यवाही का खर्च उठाने के लिए पैसा या समय भी नहीं होता है।

मौलिक अधिकारों का महत्व

  • ये व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षात्मक दीवार बनाते हैं।
  • ये अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करते हैं।
  • वेये व्यक्तियों की गरिमा और सम्मान सुनिश्चित करते हैं।
  • ये देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार हैं।
  • ये भारतीय राज्य के धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) ताने-बाने को मजबूत करते हैं।

निष्कर्ष

  • मौलिक अधिकारों को संविधान में शामिल किया गया है क्योंकि उन्हें प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक माना गया था और वे मानवीय गरिमा और सम्मान को बनाए रखने के लिए हैं। इनमें से अधिकांश अधिकार अपनी भाषा के माध्यम से राज्य के विरुद्ध लागू किए जा सकते हैं, जबकि इनमें से कुछ अधिकार राज्य के साथ-साथ एक निजी व्यक्ति दोनों के विरुद्ध सीधे लागू किए जा सकते हैं।
  • मौलिक अधिकारों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह न्यायपालिका को स्पष्ट मानदंड देता है कि नागरिकों और सरकार के बीच संबंधों का विनियमन कैसे होगा।
  • इन अधिकारों के अस्तित्व और अदालत में उनकी प्रवर्तनीयता के कारण लोग स्वतंत्र रूप से अपने जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का आनंद ले सकते हैं, वे देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जा सकते हैं, वे शांतिपूर्वक इकट्ठा हो सकते हैं, आदि। हालांकि, इन मौलिक अधिकारों की आलोचना भी की जाती है। इन मौलिक अधिकारों को परिभाषित करने में उपयोग किए गए कुछ शब्द या वाक्यांश कई लोगों द्वारा अस्पष्ट पाए जाते हैं या उनका अर्थ भारत के संविधान में कहीं और परिभाषित नहीं किया गया है। शब्द या वाक्यांश जैसे, ‘सार्वजनिक व्यवस्था’, ‘अल्पसंख्यक’, आदि इसी श्रेणी में आते हैं।
  • मौलिक अधिकारों का एक और सकारात्मक पहलू यह है कि ये हमारे देश के छोटे बच्चों को सशक्त बनाते हैं क्योंकि उन्हें 14 वर्ष की आयु तक मुफ्त शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार दिया जाता है। मौलिक अधिकारों में खामियां हो सकती हैं लेकिन अधिकांश दोषों की तुलना में राष्ट्र के नागरिकों को अधिक सुरक्षा प्रदान करता है। 

 

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