फेरेरो रॉशर ट्रेड ड्रेस के उल्लंघन का मामला

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Trademark Act
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यह लेख Soha Goyal द्वारा लिखा गया है, जो लॉसिखो से इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी, मीडिया और एंटरटेनमेंट कानूनों में डिप्लोमा कर रही हैं। इस लेख में फेरेरो रॉशर ट्रेड ड्रेस के उल्लंघन के मामले के बारे में चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Archana Chaudhary द्वारा किया गया है।

परिचय (इंट्रोडक्शन)

फेरेरो स्पा द्वारा निर्मित (मैन्युफैक्चर्ड) फेरेरो रोचर दुनिया की शीर्ष चार कन्फेक्शनरी में से एक है। यह चॉकलेट, न केवल अपने स्वादिष्ट स्वाद के लिए बल्कि अपनी आकर्षक रूप (अपीलिंग अपीयरेंस) के लिए भी जानी जाती है, इस प्रकार इसकी पैकेजिंग एक अद्वितीय (यूनिक) बिक्री बनाती है। 2018 में, फेरेरो को फेरेरो रॉशर ट्रेड ड्रेस के उल्लंघन (इंफ्रिंजमेंट) के लिए 1 मिलियन रुपए का हर्जाना (डैमेज) दिया गया था। एक ट्रेड ड्रेस एक प्रकार की इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी है, जो किसी उत्पाद (प्रोडक्ट) की विजुअल उपस्थिति से संबंधित है। बढ़ते उपभोक्तावाद (कंज्यूमरिज्म) और डिजाइन और सौंदर्यशास्त्र (एस्थेटिक्स) के बढ़ते महत्व के साथ, खासकर एक खाद्य उत्पाद (एडिबल प्रोडक्ट) के लिए विशिष्ट (डिस्टिंक्टिव) लेकिन आकर्षक पैकेजिंग और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। जैसा कि सभी रचनात्मकता (क्रिएटिव), आईपीआर के तहत सुरक्षा की मांग करती है, अधिकांश ब्रांडों के लिए ट्रेड ड्रेस आवश्यक हो गया है। इस लेख में हम फेरेरो रॉशर के उल्लंघन के मामले, ट्रेड ड्रेस की अवधारणा (कॉन्सेप्ट) को समझेंगे और यह भी की, यह भारतीय कानूनों और कानूनी व्यवस्था (लीगल सिस्टम) में कहां से आई है। इसके अलावा, हम कैडबरी जेम्स के ट्रेडमार्क उल्लंघन के मामले का भी पता (एक्सप्लोर) लगाएंगे। 

एक ट्रेड ड्रेस क्या है?

एक ट्रेड ड्रेस, एक उत्पाद की  विजुअल उपस्थिति के लिए होता है जिसमें उसका आकार, साइज, डिजाइन, पैटर्न, ग्राफिक्स, पैकेजिंग और रंगों का संयोजन (कॉम्बिनेशन) शामिल हो सकता है, जिसके माध्यम से उत्पाद लोगो ध्यान खींचता (ग्रैब्स अटेंशन) है और जनता द्वारा पहचाना जाता है। अपने प्रतिस्पर्धियों (कंपटीटर) को नकल करने और अपने व्यवसायों (बिजनेस) और सेवाओं (सर्विसेस) के लिए इसका उपयोग करने से रोकने के लिए, एक ट्रेड ड्रेस को पंजीकृत (रजिस्टर्ड) किया जा सकता है। ट्रेड ड्रेस के संरक्षण (प्रोटेक्शन) के पीछे का उद्देश्य, उपभोक्ताओं को असली (ओरिजनल) ब्रांडेड उत्पादों की नकल से बचाना है, जो उन समान दिखने वाले उत्पादों को असली मानते हुए खरीद सकते हैं।

किसी भी ट्रेड ड्रेस उल्लंघन के मामले में, वादी (प्लेंटिफ्फ) को यह स्थापित करना होगा कि उत्पाद या सेवा की विजुअल उपस्थिति या ‘हुलिया (गेटअप)’ वादी के उत्पादों के साथ विशेष रूप से जुड़ा हुआ है और इसकी मान्यता (रिकॉग्निशन) में प्रमुख तत्व (एलिमेंट) बन गया है।

एक ट्रेड ड्रेस की अनिवार्यता (एसेंशियल्स)

  1. कुछ भी जो उत्पाद का समग्र रूप (ओवरऑल लुक) और ब्रांड के लिए एक छवि (इमेज) बनाता है।
  2. उत्पाद की रूप, विशिष्ट विशेषता (डिस्टिंग्विशिंग फीचर) है जो इसे समान क्षेत्र में दूसरों से अलग बनाती है।
  3. आकार, रंग और ग्राफिक्स का संयोजन ट्रेड ड्रेस को मिलाकर उत्पाद की पहचान के अलावा उपभोक्ताओं के लिए कोई अन्य उपयोगिता नहीं प्रदान करेगा।
  4. एक ट्रेड ड्रेस के पंजीकरण के लिए वैधानिक आवश्यकता (स्टेच्यूटरी रिक्वायरमेंट) एक शब्द या एक लोगो के समान है।

सॉफ्ट ड्रिंक्स की बोतल के आकार यानी कोका-कोला की बोतल से लेकर कार के डिजाइन यानी रोल्स रॉयस की फ्रंट ग्रिल से लेकर यहां तक ​​कि एक शोरूम के इंटीरियर और लेआउट यानी एप्पल शोरूम तक कई तरह के सामानों पर ट्रेड ड्रेस को सुरक्षित किया जा सकता है।

ट्रेड ड्रेस का न्यायशास्त्र (ज्यूरिस्प्रूडेंस)

  • यूनाइटेड स्टेट्स में ट्रेड ड्रेस का न्यायशास्त्र

ट्रेड ड्रेस की अवधारणा को यूनाइटेड स्टेट्स के लेजिस्लेशन से अपनाया गया है, जिसे आमतौर पर 1946 के लैनहम एक्ट के रूप में जाना जाता है, जिसमें एक अपंजीकृत (अनरजिस्टर्ड) ट्रेड ड्रेस को भी नकल (इमिटेशन) के खिलाफ संरक्षित किया जा सकता है।

वॉल-मार्ट स्टोर्स बनाम समारा ब्रदर्स 529 यू.एस. 205, 120 एस. सीटी 1339 (2000) के प्रसिद्ध मामले में एक ट्रेड ड्रेस को एक वर्गीकरण (क्लासिफिकेशन) के रूप में परिभाषित किया गया है जिसमें शुरू में केवल किसी उत्पाद की पैकेजिंग या ड्रेसिंग शामिल थी लेकिन हाल के परिदृश्य (सिनेरियो) ने इसके क्षितिज (होराइजन) का विस्तार किया है, जिसमें उत्पाद का डिज़ाइन भी शामिल है।

  • भारत में ट्रेड ड्रेस का न्यायशास्त्र

यूनाइटेड स्टेट्स के विपरीत, जो लैनहम एक्ट की धारा 43 (a) के तहत ट्रेड ड्रेस की अवधारणा को मान्यता देता है, भारतीय कानून में ट्रेड मार्क एक्ट, 1999 के मौजूदा कानून (एक्सिस्टिंग लेजिस्लेशन) के तहत ट्रेड ड्रेस के लिए अलग से कोई प्रावधान (प्रोविजन) नहीं है।

ट्रेड मार्क एक्ट, 1999 सितंबर 2003 में लागू हुआ और यह प्रमुख रूप से अंग्रेजी ट्रेड मार्क एक्ट, 1994 पर आधारित है। ट्रेड ड्रेस के लिए इसकी कोई विशेष परिभाषा नहीं है, लेकिन इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स पर न्यायशास्त्र के विकास के साथ, भारत अब अंतरराष्ट्रीय मानकों (इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स) को पकड़ रहा है। इस प्रकार, 2010 के अमेंडमेंट द्वारा भारतीय कानून के तहत ट्रेडमार्क की नई परिभाषा में यूएस कानून के तहत ट्रेड ड्रेस के सभी तत्व शामिल हैं। भारतीय कोर्ट्स, 2003 से पहले से ही ट्रेड ड्रेस की अवधारणा को मान्यता देते रहे हैं।

2007 में कैडबरी इंडिया लिमिटेड ने नीरज फ़ूड प्रोडक्ट्स के खिलाफ उनके पंजीकृत ट्रेडमार्क ‘जेम्स’ के अनधिकृत उपयोग (अनऑथराइज्ड यूसेज) का आरोप लगाते हुए एक मामला दर्ज किया। दिल्ली हाई कोर्ट ने कैडबरी के पक्ष में आदेश दिया और माना कि प्रतिवादी (डिफेंडेंट) के उत्पाद का नाम ‘जेम्स बॉन्ड’ वास्तव में भौतिक रूप (फिजिकली) से और ध्वन्यात्मक रूप (फोनेटिकली) से वादी (प्लेंटिफ) के ट्रेडमार्क ‘जेम्स’ के समान था। इसके अलावा, प्रतिवादी के उत्पाद की पैकेजिंग भ्रामक (डिसेप्टिवली) रूप से वादी के प्रसिद्ध उत्पाद के समान थी और यह वादी के ट्रेडमार्क का उल्लंघन था और इस प्रकार कोर्ट ने प्रतिवादी को वादी के समान उक्त ट्रेडमार्क और पैकेजिंग का उपयोग करने से रोक दिया।

फेरेरो रॉशर ट्रेड ड्रेस का मुद्दा

वादी, फेरेरो स्पा एक इटेलियन कंफेक्शनरी एंटरप्राइज है जो 1946 में स्थापित फेरेरो समूह का एक खंड (सेगमेंट) है। फोर्ब्स मैगज़ीन की रिपोर्ट के अनुसार 2017 के रेप्यूटेशन सर्वे द्वारा वादी को दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित (रिप्यूटेबल) कंपनियों में से एक के रूप में स्थान दिया गया था। 

हालांकि फेरेरो के उत्पाद, भारत में लंबे समय से बेचे जा रहे थे, लेकिन कंपनी ने भारत में अपना आधिकारिक वाणिज्यिक परिचालन (ऑफिशियल कमर्शियल ऑपरेशन) 2008 में फेरेरो रॉशर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के नाम से शुरू किया था। वादी ने खुद को प्रीमियम चॉकलेट और कन्फेक्शनरी उत्पादों में एक शक्तिशाली खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया है और एक विशाल उपभोक्ता आधार (एनॉर्मोस कंज्यूमर बेस) का आनंद लेता हैं, “जो चॉकलेट के स्वाद की विशिष्टता (यूनिकनेस) के साथ-साथ उनकी विशिष्ट विजुअल अपील की कसम खाते हैं”।

वादी, ट्रेडमार्क और ट्रेड ड्रेस जैसी कंपनी की इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी की रक्षा करने में अत्यधिक सतर्क (इमेंसिवली विजिलेंट) रहा है। वादी ने फेरेरो रॉशर चिह्न (मार्क) बनाने वाले तत्वों के लिए भारत और दुनिया भर में विभिन्न ट्रेडमार्क सुरक्षित किए हैं, यानी नाम और ट्रेड ड्रेस। परिणामस्वरूप, भारत सहित दुनिया भर के न्यायिक मंचों (ज्यूडिशियल फोरम) ने भी वादी के इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स को मान्यता दी है और कई तीसरे पक्ष के उल्लंघन के मामलों में राहत भी दी है।

पहला प्रतिवादी, रुचि इंटरनेशनल, जो चॉकलेट का इंपोर्टर और ट्रेडर था और भारत में गोल्डन पैशन के ब्रांड नाम के तहत अपनी चॉकलेट बेजता था, जो वादी फेरेरो रॉशर नामक चॉकलेट के हुबहु समान थी और जिसे फेरेरो रॉशर मार्क और ट्रेड ड्रेस के तहत बेचा जाता था। दूसरे प्रतिवादी द्वारा गोल्डन पैशन ब्रांड नाम के तहत चीन से चॉकलेट का निर्माण और निर्यात (एक्सपोर्ट) किया जाता था। जब मुकदमा स्वतंत्र था, तो पहले प्रतिवादी ने वादी के साथ मामले को सौहार्दपूर्ण (एमिकेबली) ढंग से सुलझाया, जिसके कारण दिल्ली हाई कोर्ट ने 26 मई, 2016 को एक आदेश में समझौता (डिक्री ऑफ कॉम्प्रोमाइज) करने का आदेश पास किया और मुकदमा दूसरे प्रतिवादी के खिलाफ एकतरफा (एक्सपार्टे) रूप से आगे बढ़ा था।

वादी का तर्क यह था कि प्रतिवादी द्वारा गोल्डन पैशन के नाम से बेची गई चॉकलेट, वादी के फेरेरो रोचर के ब्रांड नाम के तहत बेची गई चॉकलेट के समान थी। वादी की ट्रेड ड्रेस, जिसमें कवर, लेबल, रंग और डिज़ाइन शामिल हैं, इसके उत्पादों की पैकेजिंग में विशिष्ट विशेषताएं हैं और इस प्रकार ट्रेड मार्क एक्ट, 1999 की धारा 11(6) के तहत मान्यता प्राप्त होनी चाहिए।

वादी ने तर्क दिया कि समान/भ्रामक रूप से समान ट्रेडमार्क या ट्रेड ड्रेस के ऐसे अनधिकृत उपयोग से उल्लंघन होता है और उपभोक्ताओं के मन में यह गलत धारणा (मिसइंप्रेशन) पैदा हो जाती है कि प्रतिवादी के उत्पाद किसी तरह वादी के साथ जुड़े हुए हैं। ये कार्य भ्रम और धोखे का कारण बनने के लिए बाध्य थे, इसलिए पासिंग ऑफ थी। दूसरे प्रतिवादी द्वारा इस तरह के एक अच्छी तरह से मान्यता प्राप्त चिह्न को अनधिकृत रूप से अपनाना गलत नीयत था, जिसकी गणना (कैलकुलेट) वादी के चिह्न और ट्रेड ड्रेस द्वारा अर्जित (अर्न्ड) प्रतिष्ठा और सद्भावना (गुडविल) का लाभ उठाने के लिए की गई थी। 

प्रतिवादी ने मुकदमा नहीं लड़ा और कोर्ट मामले को एकतरफा तय करने के लिए आगे बढ़ा।

दिल्ली हाई कोर्ट ने, वादी द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों (एविडेंस) को ध्यान में रखते हुए, एक्ट के तहत फेरेरो रॉशर के चिह्न और ट्रेड ड्रेस को प्रसिद्ध ट्रेडमार्क के रूप में मान्यता देते हुए एक आदेश पास किया। कोर्ट ने यह भी घोषित (डिक्लेयर) किया कि वादी की तरह भ्रामक रूप से एक चिह्न और ट्रेड ड्रेस वाले उत्पादों की बिक्री उल्लंघन थी क्योंकि वादी द्वारा कोई प्राधिकरण (ऑथोराइजेशन) प्रदान नहीं किया गया था। कोर्ट ने प्रतिवादियों के खिलाफ एक स्थायी (परमानेंट) इंजंक्शन भी दिया, जिसमें उनके साथी और सहयोगी व्यक्ति शामिल हैं, जिसमे उन्हें ऐसे उत्पादों में किसी भी तरह से व्यवहार करने से प्रतिबंधित (रेस्ट्रिक्ट) किया गया, जो वादी के फेरेरो रॉशर चॉकलेट की जैसी है जो किसी भी तरह से वादी के चिह्न और ट्रेड ड्रेस का उल्लंघन होगा।

इसके अलावा, फेरेरो रॉशर को सूट दायर करने की तारीख से वसूली की तारीख (रियलाइजेशन डेट) तक 10% प्रति वर्ष के ब्याज के साथ मौद्रिक क्षति (मॉनेटरी डैमेज) के रूप में 1 मिलियन रुपए प्रदान किए गए थे और वादी के पंजीकृत चिह्न और ट्रेड ड्रेस और अंतरिम आदेश (इंटेरिम ऑर्डर) के उल्लंघन के लिए दूसरे प्रतिवादी के खिलाफ आदेश पास की गई थी। 

निष्कर्ष (कंक्लूज़न)

मार्केटिंग के बढ़ते प्रभाव और सौंदर्य उत्पादों की मांग के साथ ट्रेड ड्रेस, एक कंपनी और उसके ब्रांड की इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। यद्यपि भारत में ट्रेड ड्रेस के प्रति समर्पित (डेडीकेटेड) कानून में कोई विशिष्ट प्रावधान (प्रोविजन) नहीं है, भारत में कोर्ट्स ने इस अवधारणा को उल्लेखनीय रूप से अपनाया है, जिसे इसके पूर्ववर्ती (प्रेसीडेंशियल) न्यायशास्त्र में देखा जा सकता है। जबकि ट्रेड ड्रेस के सिद्धांत (प्रिंसिपल्स) अभी भी देश में प्रारंभिक चरण (नैसेंट स्टेज) में हैं, फेरेरो रॉशर का मामला कोर्ट्स के बढ़ते महत्व की ओर इशारा करता है जो ट्रेडमार्क या एक ब्रांड नाम के समान आधार पर ट्रेड ड्रेस सुरक्षा को मान्यता देते हैं जिसने समय के साथ एक से अधिक विशिष्टता और यूनीकनेस हासिल की है।

संदर्भ (रेफरेंसेस)

 

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