सी.आर.पी.सी. और व्यक्तिगत कानूनों के तहत भरण पोषण- एक तुलनात्मक अध्ययन

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An exhaustive overview of types of maintenance

यह लेख रांची के नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ की छात्रा Pragya Rakshita के द्वारा लिखा गया है। इस लेख में वह सीआरपीसी के तहत भरण पोषण (मेंटेनेंस) के प्रावधान पर चर्चा करती है और साथ ही इस प्रावधान की तुलना विभिन्न धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों जैसे हिंदू, मुस्लिम, पारसी आदि से करती है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

भारत एक धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) देश है, लेकिन भारत में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा की समझ, इस शब्द की दुनिया भर में प्रसिद्ध धारणा से अलग है। भारत में, धर्मनिरपेक्षता का मतलब केवल यह नहीं है कि सरकार किसी धर्म को स्वीकार नहीं करती है, इसके बजाय, इसका अर्थ यह है कि यहां राज्य सभी धर्मों को स्वीकार करता है और उनका सम्मान करता है, और सभी को अपने व्यक्तिगत कानूनों का पालन करने की अनुमति देता है।

भरण पोषण को कानूनी रूप से वित्तीय सहायता के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसका भुगतान एक पूर्व पति द्वारा उसकी पत्नी को कानूनी अलगाव (सेपरेशन) या तलाक के अनुसार किया जाता है। यह वित्तीय सहायता पत्नी या तलाकशुदा पत्नी की आजीविका (लाइवलीहुड) के लिए, उसके बच्चों के लिए, संपत्ति के देख भाल के लिए, और यहां तक ​​कि कुछ मामलों में, उसे मुकदमे में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व (रिप्रेजेंट) करने के लिए सक्षम बनाने के लिए दी जाती है।

भरण पोषण से संबंधित प्रावधान अलग-अलग कानूनों के तहत अलग-अलग होते हैं। लेकिन, भरण पोषण का एक धर्मनिरपेक्ष कानून भी है जो दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के तहत दिया गया है। हिंदुओं के लिए उनके भरण पोषण के कानून उनके व्यक्तिगत कानूनों के तहत प्रदान किए गए हैं; मुसलमानों के लिए, इन्हे मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों के तहत दिया गया है; और ईसाइयों और पारसियों के लिए, उनके संबंधित व्यक्तिगत कानूनों के तहत प्रदान किया गया है। साथ ही, सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण का कानून भी प्रदान किया गया है, जो प्रकृति में धर्मनिरपेक्ष है, इसलिए किसी भी व्यक्ति द्वारा, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, इस प्रावधान को लागू किया जा सकता है। अन्य व्यक्तिगत कानूनों की तुलना में सी.आर.पी.सी. में यह एक अनूठी (यूनिक) विशेषता है।

इस लेख में, लेखक के द्वारा व्यक्तिगत कानूनों के साथ-साथ सी.आर.पी.सी. के तहत विभिन्न भरण पोषण कानूनों का पता लगाया जाएगा और उनके बीच की विभिन्नताओं का विश्लेषण भी किया जाएगा। अंत में, लेखक के द्वारा तलाकशुदा महिलाओं के कल्याण के लिए कुछ बेहतर उपाय खोजने का प्रयास किया गया है।

सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण 

सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण के प्रावधान प्रकृति में धर्मनिरपेक्ष है, क्योंकि किसी भी धर्म या आस्था से संबंधित कोई भी महिला इसके तहत न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती है। भरण पोषण का कानून दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125-128 के तहत प्रदान किया गया है, और यह प्रकृति में दीवानी (सिविल) है। इस धारा के तहत, पत्नी, बच्चों और माता-पिता द्वारा भरण पोषण का दावा किया जा सकता है। धारा 125 से 128 उन व्यक्तियों के खिलाफ एक त्वरित (स्पीडी), प्रभावी और सस्ता उपाय प्रदान करती है, जो अपनी आश्रित (डिपेंडेंट) पत्नियों, बच्चों और माता-पिता की उपेक्षा या भरण पोषण करने से इनकार करते हैं।

इस शोध परियोजना (रिसर्च प्रोजेक्ट) में केवल एक व्यक्ति की पत्नी पर होने वाले प्रभाव पर ध्यान दिया गया है। धारा 125 के स्पष्टीकरण (एक्सप्लेनेशन) के भाग (B) के अनुसार, एक “पत्नी” शब्द के तहत एक ऐसी महिला शामिल है, जिसे उसके पति के द्वारा तलाक दे दिया गया है, या उसने उससे तलाक ले लिया है और फिर से विवाह नहीं किया है। तो इस धारा के तहत भरण पोषण का प्रावधान एक तलाकशुदा पत्नी पर भी लागू होता है, न कि केवल यह एक विवाहित पत्नी के लिए ही है।

हालांकि यह कानून धर्मनिरपेक्ष है, लेकिन एक पहलू से देखा जाए तो यह सिर्फ एक ही लिंग पर ध्यान देता है। इस कानून के तहत भरण पोषण का दावा केवल पत्नी के द्वारा ही किया जा सकता है, न कि पति के द्वारा। साथ ही “पत्नी” शब्द की व्याख्या पर भी विचार करने की आवश्यकता है। सविताबेन सोमभाई भाटिया बनाम स्टेट ऑफ़ गुजरात के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार, धारा 125 (1) के तहत, “पत्नी” शब्द की परिभाषा में आने वाली महिला का अर्थ केवल कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है। लेकिन, डी. वेलुसामी बनाम डी. पचैअम्मल और चानमुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार सिंह कुशवाहा के हाल ही के फैसलों में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि ऐसे मामलों में जहां महिला शादी जैसे रिश्ते में थी, लेकिन धारा 125 के तहत उसे कानूनी रूप से विवाहित पत्नी नहीं माना जाता है, तो वह घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत भरण पोषण का दावा कर सकती है।

तो, यदि एक पत्नी पर, कानूनी रूप से विवाहित होने पर इतना जोर दिया जाता है तो जिन धर्मों में, जिन में केवल एकांगी (मोनोगेमस) संबंध बनाने की अनुमति दी जाती है, तो ऐसे में उन धर्मों में दूसरी पत्नी का क्या होता है? इस प्रश्न पर, इस शोध पत्र के अगले अध्यायों में चर्चा की गई है।

हिंदू व्यक्तिगत कानून के तहत भरण पोषण की अवधारणा

हिंदू व्यक्तिगत कानून के तहत, महिलाओं को,  हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और हिंदू दत्तक और भरण पोषण अधिनियम (हिंदू एडॉप्शन एंड मैटेनेंस एक्ट), 1956 के तहत भरण पोषण प्रदान किया जाता है।

हिंदू दत्तक और भरण पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18 के तहत, पति द्वारा पत्नी को भरण पोषण प्रदान करने का प्रावधान है। इस धारा के उद्देश्य के लिए, पत्नी शब्द में तलाकशुदा पत्नी को शामिल नहीं किया गया है। यह धारा केवल विवाहित पत्नी पर ही लागू होती है। पति अपने जीवनकाल के दौरान उसे भरण पोषण प्रदान करने के लिए बाध्य है। वह उसे तब भी भरण पोषण प्रदान करने के लिए बाध्य है, जब वह उससे अलग रह रही हो, लेकिन तभी जब इस तरह के अलगाव को इस विशेष धारा के तहत दिए गए किसी भी कारण से उचित ठहराया जाता है। यह धारा भी सिर्फ एक ही लिंग पर ध्यान देती है।

वहीं दुसरी तरफ, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 के तहत भरण पोषण का प्रावधान एक अलग स्तर पर है। इस धारा के तहत पति या पत्नी में से कोई भी भरण पोषण का दावा कर सकता है। कोई भी पक्ष भरण पोषण के लिए न्यायालय में आवेदन कर सकता है और यह केवल पत्नी तक ही सीमित नहीं है। हालांकि, किसी व्यक्ति को भरण पोषण प्रदान किया जाएगा या नहीं, यह तय करने के लिए मानदंड एक ही लिंग पर जोर देते हैं। इसका मतलब है कि महिलाओं के लिए, पुरुषों की तुलना में अलग मानदंड है।

कंचन बनाम कमलेंद्र के मामले के अनुसार, यह माना गया था कि पति अपनी पत्नी से केवल तभी भरण पोषण पाने का हकदार है, जब वह स्वतंत्र आय प्राप्त करने में शारीरिक या मानसिक रूप से सक्षम ना हो। जबकि, मनोकरण बनाम देवकी के मामले के निर्णय के अनुसार, पत्नी को भरण पोषण का हक तब ही प्रदान किया जाता है जब कार्यवाही के दौरान किसी भी समय यह देखा जाता है कि उसके पास पर्याप्त स्वतंत्र आय नहीं है। इसलिए, पत्नी को केवल यह साबित करना होता है कि उसके पास पर्याप्त और स्वतंत्र आय नहीं है। वहीं दूसरी ओर, पति को यह भी साबित करना होता है कि वह कमाई करने में सक्षम नहीं है। साथ ही, चित्रा बनाम ध्रुबा के मामले में, यह निर्णय लिया गया था कि भरण पोषण का मतलब केवल जिंदा रहने के लिए सहारा प्रदान करना नहीं है, बल्कि इसका मतलब यह भी है कि दावेदार को भी पति या पत्नी के समान जिंदगी जीने के बराबर के स्तर पर होना चाहिए। इसलिए, भरण पोषण की मात्रा भी इसी के अनुसार तय की जानी चाहिए।

इसके अलावा, रमेश चंद्र रामप्रतापजी डागा बनाम रामेश्वरी रमेश चंद्र डागा के मामले में, यह माना गया था कि अभिव्यक्ति “किसी भी डिक्री को पारित करने के समय” के तहत, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 से 13 के तहत पास की गई सभी डिक्री शामिल की गई है। इस प्रकार, न्यायालय किसी भी प्रकार की डिक्री, जिसके परिणामस्वरूप विवाह भंग हो सकता है को पास करते समय भरण पोषण प्रदान कर सकता है।

सी.आर.पी.सी. के साथ तुलना

इन दोनों कानूनों के तहत भरण पोषण का कानून बहुत अलग स्तर पर है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अनुसार, पति या पत्नी दोनों भरण पोषण का दावा कर सकते हैं; जबकि सी.आर.पी.सी. के तहत केवल पत्नी ही भरण पोषण का दावा कर सकती है। इसके अलावा, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत भरण पोषण का दावा करने के लिए पत्नी को केवल यह साबित करने की आवश्यकता होती है कि उसके पास पर्याप्त और स्वतंत्र आय नहीं है। जबकि, सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण का दावा करने के लिए, उसे यह भी साबित करना होता है कि उसके पति ने उसे भरण पोषण प्रदान करने से या तो इनकार कर दिया है या फिर प्रदान करने की उपेक्षा की है।

शंभू नाथ पाठक बनाम कांति देवी के मामले में, यह स्पष्ट रूप से तय किया गया था कि पत्नी सी.आर.पी.सी. और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 दोनों के तहत भरण पोषण का लाभ दो बार नहीं ले सकती है। वह इन दोनो कानूनों में से केवल एक के तहत भरण पोषण का दावा कर सकती है।

भरण पोषण के लिए दूसरी पत्नी की स्थिति

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत, अधिनियम की धारा 5 (i) के अनुसार केवल एक विवाह नियम प्रदान किया गया है। साथ ही, इस अधिनियम की धारा 17 ऐसी दूसरी शादी को शून्य घोषित कर देती है, और आई.पी.सी., 1860 की धारा 494 और 495 को संदर्भित करती है, जिसके अनुसार, द्विविवाह एक दंडनीय अपराध है।

जैसा कि भाऊराव शंकर लोखंडे और अन्य बनाम स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र और अन्य के मामले में यह आयोजित किया गया था की, दुसरे विवाह के लिए आई.पी.सी., 1860 की उपर प्रदान की गई धाराओं के तहत, द्विविवाह को दंडित करने के लिए, यह आवश्यक है कि दूसरी शादी का प्रदर्शन वैध रूप से किया जाना चाहिए। लेकिन, भरण पोषण प्रदान करने के प्रश्न के लिए, केवल यह ही महत्वपूर्ण नहीं है कि विवाह का ‘अनुष्ठान (सोलमनाइज)’ कानूनी रूप से किया गया हो, या वैध रूप से किया गया हो, बल्कि महत्वपूर्ण बात यह है कि पत्नी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी होनी चाहिए।

तो, क्या दूसरी पत्नी ऐसी स्थिति में भरण पोषण प्राप्त करने के लिए सक्षम होगी?

इस प्रश्न का उत्तर विभिन्न मामलों में दिया गया है जो नीचे दिए गए हैं:

बादशाह बनाम सौ उर्मिला बादशाह गोडसे और अन्य के ऐतिहासिक मामले में यह माना गया था कि कुछ परिस्थितियों में दूसरी पत्नी को भी सी.आर.पी.सी. की धारा 125 के तहत भरण पोषण का हक प्रदान किया जा सकता है। भले ही कोई पुरुष और महिला बिना किसी वैध विवाह के लंबे समय से एक दुसरे के साथ रह रहे हो, इस स्थिति में पत्नी को सी.आर.पी.सी. की धारा 125 के तहत भरण पोषण का अधिकार प्रदान किया जाना चाहिए। यदि दूसरी पत्नी को यह गलत बयान दिया गया था कि वह पुरुष अविवाहित है और इस विवाह में प्रवेश करने के लिए सक्षम है, और यदि महिला को शादी के समय इस बात की जानकारी नहीं थी कि उसके पति की एक जीवित जीवनसाथी है, तो दूसरी पत्नी भरण पोषण की हकदार है।

मल्लिका और अन्य बनाम पी कुलंदी के मामले में, यह माना गया था कि यदि पति ने अपनी पहली पत्नी की मृत्यु को गलत तरीके से प्रस्तुत किया है, तो उसकी दूसरी पत्नी को भरण पोषण का अधिकार होना चाहिए।

राजेश बाई बनाम शांताबाई के मामले में, एक महिला की शादी को, उसके पति के किसी भी पिछले विवाह के अस्तित्व में होने के कारण शून्य घोषित कर दिया गया था, लेकिन यहां अदालत ने माना कि उसे हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण पोषण अधिनियम, 1956 के तहत भरण पोषण का दावा करने का भी अधिकार है। 

इस प्रकार, उपरोक्त निर्णयों से यह स्पष्ट होता है कि दूसरी पत्नी, हालांकि कानूनी पत्नी नहीं है, लेकिन तब भी वह सी.आर.पी.सी. की धारा 125 के तहत भरण पोषण की हकदार है। सी.आर.पी.सी. की धारा 125 के तहत कार्यवाही में शादी के सबूत का मानक (स्टैंडर्ड ऑफ़ प्रूफ) उतना सख्त नहीं होता है जितना कि आई.पी.सी. की धारा 494 के तहत अपराध के मुकदमे में आवश्यक होता है। इस धारा का उद्देश्य सामाजिक तौर पर न्याय प्रदान करना है जिसे ऐसे निर्णयों के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है।

मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत भरण पोषण की अवधारणा

मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत, कानून कहता है कि जिस पति ने अपनी पत्नी को तलाक दिया है, उसे इद्दत की अवधि के दौरान उसके लिए भरण पोषण प्रदान करना होगा। हिदाया भरण पोषण को इस प्रकार परिभाषित करते है: “वे सभी चीजें जो जीवन के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं, जैसे भोजन, कपड़े और रहने की जगह; यह केवल भोजन तक ही सीमित हो सकता है।” फतवा-ए-आलमगिरी इसे इस प्रकार परिभाषित करते है “भरण पोषण के तहत, भोजन, वस्त्र और रहने की जगह आते है, हालांकि आम बोलचाल में यह केवल भोजन तक ही सीमित है”।

इसलिए, सामान्य व्यवहार में, भरण पोषण में केवल पत्नी को भोजन उपलब्ध कराने का खर्च शामिल होता है। मुस्लिम व्यक्तिगत कानून यह कहते है कि पति को केवल अपनी पत्नी को ही भरण पोषण प्रदान करना चाहिए, न कि तलाकशुदा पत्नी को। तलाक के बाद, उसे केवल इद्दत अवधि के लिए भरन पोषण प्रदान करने की आवश्यकता होती है। आमतौर पर देखा जाए तो, दहेज के भुगतान को पत्नी के लिए पर्याप्त भरण पोषण माना जाता है।

मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में भरण पोषण का कानून विभिन्न मामलों के माध्यम से निम्नलिखित तरीके से विकसित हुआ है-

बाई ताहिरा बनाम अली हुसैन के मामले में, यह माना गया था कि चूंकि दहेज की राशि सी.आर.पी.सी. की धारा 127(3)(B) के तहत दी गई ‘देय राशि’ शब्द के अर्थ के अंतर्गत आती है, इसलिए एक महिला जो इसे पहले ही प्राप्त कर चुकी है, वह सी.आर.पी.सी. की धारा 125 के तहत आगे के भरण पोषण की हकदार नहीं है।

फ़ुज़लुनबी बनाम के. खादर वली के अगले मामले में, यह निर्णय लिया गया था कि मेहर की पर्याप्तता को देखते हुए ही पति को कोई और भुगतान करने से मुक्त किया जाना चाहिए।

फिर, मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम के ऐतिहासिक मामले के आलोक में, अंततः यह साफ हो गया था कि मेहर धारा 127(3)(B) के तहत नहीं आती है, क्योंकि यह पति पर एक दायित्व है, और पत्नी के सम्मान के रूप में भुगतान किया जाता है, न कि तलाक पर पत्नी को देय राशि के रूप में।

उसके बाद, मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 पास किया गया था, जहां न्यायोचित और उचित प्रावधान किया जाना चाहिए और इद्दत की अवधि के भीतर भरण पोषण का भुगतान किया जाना चाहिए।

डेनियल लतीफी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले को तब उपरोक्त अधिनियम की वैधता को चुनौती देते हुए दायर किया गया था, जहां यह माना गया था कि यह संवैधानिक रूप से वैध था, और हालांकि भरण पोषण का भुगतान इद्दत की अवधि के भीतर किया जाना था, और इसलिए यह उसे अपने पूरे जीवन के लिए बनाए रखने के लिए पर्याप्त होना चाहिए।

अंत में, अब्दुल लतीफ मंडल बनाम अनुवारा खातून के मामले में, यह चर्चा की गई थी कि चूंकि सी.आर.पी.सी. की धारा 125 का उद्देश्य महिला को बेसहारा होने से रोकना था, और चूंकि यह तेज है, इसलिए मुस्लिम महिलाएं अभी भी सी.आर.पी.सी. की धारा 125 के तहत भरण पोषण का दावा कर सकती हैं।

सी.आर.पी.सी. के साथ तुलना

मुस्लिम महिलाएं भी सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण का दावा कर सकती हैं। मुस्लिम व्यक्तिगत कानून की तुलना में, सी.आर.पी.सी. के तहत तलाकशुदा महिलाओं को भी भरण पोषण का अधिकार दिया जाता है। यह एक विवाद और कानून का सवाल था कि क्या मुस्लिम में तलाकशुदा महिलाएं दहेज प्राप्त करने के बाद भी सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण के अधिकार का दावा कर सकती हैं या नहीं। यह विवाद ऊपर सूचीबद्ध मामलों के माध्यम से हमेशा के लिए सुलझा लिया गया है।

इसके अलावा, मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 5 में यह भी प्रावधान दिया गया है कि दोनों पक्ष मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के बजाय सी.आर.पी.सी. की धारा 125 से 128 के तहत धर्मनिरपेक्ष कानून द्वारा शासित होने का विकल्प चुन सकते हैं। इस प्रकार, महिलाएं सी.आर.पी.सी. या मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत भरण पोषण का दावा कर सकती हैं।

इस परिदृश्य (सिनेरियो) में सी.आर.पी.सी. एक अधिक उपयुक्त उपाय है क्योंकि यह व्यक्तिगत कानून की तुलना में विवाहित और तलाकशुदा दोनों पत्नियों के लिए भरण पोषण का प्रावधान करता है। साथ ही, धर्मनिरपेक्ष कानून के तहत भरण पोषण की मात्रा अधिक उचित है, जबकि व्यक्तिगत कानून के तहत सिर्फ मेहर के भुगतान को ही पर्याप्त माना जाता है। इसके अलावा, सी.आर.पी.सी. के तहत, भरण पोषण पूरे जीवन के लिए है, जबकि व्यक्तिगत कानून के तहत, यह इद्दत की अवधि तक के लिए है।

ईसाई और पारसी व्यक्तिगत कानून और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत भरण पोषण

पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 की धारा 40 के तहत पारसियों के लिए भरण पोषण का कानून प्रदान किया गया है। यह धारा बिल्कुल हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 की तरह ही है। इसके अनुसार भी पति या पत्नी दोनों ही भरण पोषण का दावा कर सकते हैं। 

भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 37 विवाह के विघटन (डिसोल्यूशन) या न्यायिक अलगाव की डिक्री प्राप्त होने की स्थिति में पति द्वारा पत्नी के भरण पोषण का प्रावधान करती है। इसके अनुसार केवल पत्नी ही भरण पोषण का दावा कर सकती है।

भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 38 और पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 की धारा 41 में समान प्रावधान हैं। इन धाराओं में प्रावधान है कि भरण पोषण की राशि का भुगतान या तो स्वयं पत्नी को या उसके ट्रस्टियों को किया जा सकता है।

अंतर-धार्मिक विवाह विशेष विवाह अधिनियम, 1954 द्वारा शासित होते हैं। इस अधिनियम की धारा 37 भरण पोषण के पहलू से संबंधित है। इस धारा के तहत, केवल पत्नी ही भरण पोषण का दावा कर सकती है, और इसलिए, यह एक विशिष्ट लिंग पर ध्यान देती है।

सी.आर.पी.सी. के साथ तुलना

पारसी विवाह और तलाक अधिनियम की तुलना में, सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण का प्रावधान केवल पत्नी तक सीमित है। इसके अलावा, सी.आर.पी.सी. सभी धर्मों तक फैली हुई है। लेकिन पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 केवल पारसियों को नियंत्रित करता है, और भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 केवल ईसाइयों को नियंत्रित करता है, और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 अंतर-धार्मिक विवाह के मामलों में लागू होता है।

निष्कर्ष

विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के साथ-साथ सी.आर.पी.सी. के धर्मनिरपेक्ष कानून में दिए गए भरण पोषण के कानूनों में विभिन्न अंतर हैं।

हिंदू कानूनों के तहत, पुरुष भी भरण पोषण प्राप्त करने के पात्र हैं। लेकिन दूसरी शादी के मामलों में, दूसरी पत्नियों को केवल सी.आर.पी.सी. की धारा 125 में भरण पोषण मिल सकता है। इसलिए, भरण पोषण प्राप्त करने के लिए हिंदू व्यक्तिगत कानून की तुलना में सी.आर.पी.सी. एक बेहतर सहारा है।

मुस्लिम महिलाओं के मामले में, उनके लिए यह निश्चित रूप से अधिक फायदेमंद है कि वे अपने व्यक्तिगत कानून के बजाय सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण का दावा करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाए। सी.आर.पी.सी. उचित मात्रा में भरण पोषण प्रदान करती है। साथ ही, यह मुस्लिम व्यक्तिगत कानून, जो केवल इद्दत की अवधि तक भरण पोषण का प्रावधान करता है, के विपरीत तलाकशुदा महिलाओं पर भी लागू होता है। यह मुस्लिम कानून के विपरीत आजीवन भरण पोषण का भी प्रावधान करता है ।

इस प्रकार, पूरी चर्चा और तुलना के माध्यम से, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सी.आर.पी.सी., एक धर्मनिरपेक्ष, न्यायसंगत, प्रभावी, सस्ती और तेज विधि होने के कारण, तलाकशुदा महिलाओं द्वारा भरण पोषण प्राप्त करने के लिए सबसे अनुकूल (फेवरेबल) विकल्प है।

संदर्भ

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