आपराधिक न्यास भंग

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Indian Penal Code

यह लेख कोलकाता के जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज की छात्रा Ashiya Rehman द्वारा लिखा गया है। यह लेख भारतीय दंड संहिता की धारा 405 यानी आपराधिक न्यास भंग (क्रिमिनल ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट) के बारे में बात करता है। लेख में विशेष रूप से आईपीसी की धारा 405, धारा 405 और धारा 403 के बीच अंतर और इससे संबंधित मामलो पर चर्चा की गई है।  इस लेख का अनुवाद Revati Magaonkar द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय 

भारतीय दंड संहिता, 1860 (“आईपीसी”) का अध्याय XVII (धारा 378 से 462) संपत्ति के खिलाफ अपराधों से संबंधित है। आपराधिक न्यास भंग को आईपीसी की धारा 405 के तहत परिभाषित किया गया है और धारा 406 उसी की सजा से संबंधित है। आईपीसी की धारा 407, 408 और 409 क्रमश: वाहक आदि द्वारा आपराधिक न्यास भंग;  लिपिक या नौकर द्वारा आपराधिक न्यास भंग, लोक सेवक या बैंकर, व्यापारी या एजेंट द्वारा आपराधिक न्यास भंग। मुहावरे को तोड़ने पर हमें तीन अलग-अलग शब्द मिलते हैं। आइए प्रत्येक शब्द का अर्थ समझें। 

“अपराध” का अर्थ कुछ ऐसा है जो कानून के तहत निषिद्ध है- जिसकी कानून अनुमति नहीं देता है या जो नैतिक रूप से गलत है।

“भंग” को किसी चीज़ के उल्लंघन के रूप में समझा जा सकता है। यह एक वादा, आचार संहिता (कोड ऑफ कंडक्ट) या हमारे मामले में, न्यास हो सकता है।

“न्यास” को किसी के चरित्र, क्षमता, शक्ति या सच्चाई में विश्वास या भरोसा के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसे एक प्रकार के प्रत्ययी (फिडुशियरी) संबंध के रूप में समझाया जा सकता है।

आपराधिक न्यास भंग क्या है

आम शब्दो में, एक आपराधिक न्यास भंग में एक संपत्ति के बारे में न्यास शामिल होता है जिसे एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति (अर्थात् आरोपी) को सौंपता है और वह इसे बेईमान इरादे से तोड़ता या उल्लंघन करता है और परिणामस्वरूप, यह एक आपराधिक कार्य बन जाता है। उदाहरण के लिए, A ने अपनी साइकिल B को इसकी मरम्मत करने के लिए सौंपी लेकिन वह इसका उपयोग अपने उद्देश्य के लिए करता है। यहाँ, B के ऊपर A का न्यास B द्वारा भंग किया गया है और यह एक बेईमान इरादे से किया गया है इसलिए इसे आपराधिक न्यास भंग कहा जाएगा।

यहां, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि धारा केवल ‘संपत्ति’ के बारे में बात करती है, इसलिए यह चल संपत्ति या अचल संपत्ति हो सकती है। आर के डालमिया बनाम दिल्ली प्रशासन (1962) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आईपीसी की धारा 405 में ‘संपत्ति’ शब्द का इस्तेमाल अलग-अलग अर्थों में किया गया है। इसकी व्यापक व्याख्या है। संपत्ति शब्द का प्रयोग केवल चल या अचल संपत्ति तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसमें दोनों शामिल हैं।

इस धारा में ‘सौंपा’ शब्द का अत्यधिक महत्व है। इसका अर्थ है कि कुछ विशिष्ट कारणों से किसी अन्य व्यक्ति को संपत्ति सौंपना लेकिन यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि सौंपने से दूसरे व्यक्ति को केवल सीमित अधिकार मिलते हैं, यह उन्हें मालिकाना अधिकार या संपत्ति पर स्वामित्व का अधिकार नहीं देता है। संपत्ति पर उनका महत्वपूर्ण नियंत्रण या प्रभुत्व है लेकिन किसी भी मायने में वे उक्त संपत्ति के वैध स्वामी नहीं बन सकते हैं। विचाराधीन संपत्ति का दुरुपयोग, रूपांतरण, उपयोग या निपटान किया जा सकता है।

आईपीसी की धारा 405 किसी व्यक्ति द्वारा किसी संपत्ति के संबंध मे आपराधिक न्यास भंग के बारे में बात करती है, चाहे वह चल या अचल हो, जिसे उसे सौंपा गया है या जिस पर उसका प्रभुत्व है और वह बेईमानी से अपने उद्देश्य के लिए ऐसी संपत्ति का उपयोग करता है या उसका दुरुपयोग करता है या उस संपत्ति का निपटान करता है जो कानून के किसी भी निर्देश के उल्लंघन में है जिस तरीके से इस तरह के न्यास का पालन किया जाना है, या किसी भी कानूनी अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट), व्यक्त या निहित (इंप्लाइड), जिसे उसने इस तरह के विश्वास के निर्वहन (डिस्चार्ज) के संबंध में बनाया है, या जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति को ऐसा करने के लिए मजबूर किया है, इसे आपराधिक न्यास भंग कहा जाता है।

चित्रण (इलस्ट्रेशन)

  • A एक ऐसा अधिकारी है जिसे जनता का पैसा सौंपा गया है। वह बेईमानी से अपने उद्देश्य के लिए इसका इस्तेमाल करता है। इस प्रकार, A ने आपराधिक न्यास भंग किया है।
  • A जब यात्रा पर होता है तब अपना फर्नीचर B को मरम्मत के लिए सौंपता है, जिसकी एक फर्नीचर की दुकान है, लेकिन B बेईमानी से फर्नीचर बेच देता है। इसलिए, B ने आपराधिक न्यास भंग किया है।

आईपीसी की धारा 405 के तहत आपराधिक न्यास भंग के अपराध के लिए कानून के तहत सजा

आपराधिक न्यास भंग की सजा 3 साल की कैद और जुर्माना, या दोनों है। यह गैर-जमानती और संज्ञेय (कॉग्नीजेबल) अपराध है और प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय (ट्रायबल) है।

आईपीसी की धारा 407 

धारा 407 वाहक, घाट या गोदाम-संरक्षक द्वारा आपराधिक न्यास भंग के बारे में बात करता है। इसमें कहा गया है कि यदि वाहक, घाट या गोदाम-संरक्षक को संपत्ति सौंपी जाती है और वे ऐसी संपत्ति के संबंध में आपराधिक न्यास भंग करते हैं, तो उन्हें 7 साल तक के कारावास की सजा दी जाएगी, जो जुर्माने के साथ हो सकती है।

आईपीसी की धारा 408 

धारा 408 एक लिपिक, नौकर के रूप में कार्यरत किसी व्यक्ति द्वारा संपत्ति के आपराधिक न्यास भंग के बारे में बात करती है जिसे किसी भी तरह से संपत्ति या ऐसी संपत्ति पर प्रभुत्व सौंपा गया है। ऐसे मामले में, उन्हें कारावास की सजा दी जाएगी जो 7 साल तक की हो सकती है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

आईपीसी की धारा 409 

धारा 409 एक लोक सेवक द्वारा या एक बैंकर, व्यापारी, कारक (फैक्टर), दलाल, वकील, या एजेंट के रूप में अपने व्यवसाय के रास्ते में आपराधिक न्यास भंग से संबंधित है, जिसे संपत्ति या ऐसी संपत्ति पर प्रभुत्व सौंपा गया है। उन्हें आजीवन कारावास या दस साल की सजा के साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

आपराधिक न्यास भंग की अनिवार्यताएं

आपराधिक न्यास भंग होने के लिए कुछ आवश्यक अनिवार्यताए हैं जिन्हें पूरा किया जाना चाहिए। वे इस प्रकार हैं:

  • आरोपी को संपत्ति सौंपना अनिवार्य है।
  • कि वह व्यक्ति बेईमानी से ऐसी संपत्ति का दुरुपयोग कर रहा हो या अपने स्वयं के उपयोग के लिए उसको परिवर्तित कर रहा हो या जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति को ऐसी संपत्ति का उपयोग करने दे रहा हो।
  • आरोपी द्वारा कानून, अनुबंध, या सौंपे गए न्यास का उल्लंघन होना चाहिए।

आपराधिक न्यास भंग और आपराधिक दुर्विनियोजन (मिसएप्रोप्रीएशन) के बीच अंतर

आपराधिक न्यास भंग और आपराधिक दुर्विनियोजन के बीच अंतर नीचे सूचीबद्ध हैं:

  1. आपराधिक दुर्विनियोजन को आईपीसी धारा 403 और आपराधिक न्यास भंग को धारा 405 में परिभाषित किया गया है जैसा कि हमने ऊपर पढ़ा है। आपराधिक दुर्विनियोजन को आईपीसी की धारा 403 में परिभाषित किया गया है: “जो कोई भी बेईमानी से किसी भी चल संपत्ति का दुर्विनियोजन करता है या अपने स्वयं के उपयोग में परिवर्तित करता है, उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा दी जाएगी जो दो साल तक बढ़ सकती है, या जुर्माना या दोनों हो सकते है। ”
  2. आपराधिक न्यास भंग में दोनों पक्षों के बीच एक संविदात्मक संबंध (कॉन्ट्रैक्चुअल रिलेशन) मौजूद होता है लेकिन आपराधिक दुर्विनियोजन के मामले में ऐसा अनुबंध अनुपस्थित होता है। आपराधिक दुर्विनियोजन में पक्षों के बीच ऐसा कोई संविदात्मक संबंध मौजूद नहीं होता है।
  3. एक आपराधिक न्यास भंग में, आरोपी द्वारा वह संपत्ति उस संपत्ति के मालिक द्वारा उस आरोपी को सौंपे जाने की वजह से प्राप्त की जाती है। लेकिन आपराधिक दुर्विनियोजन में, संपत्ति मालिक द्वारा किसी भी स्रोत से प्राप्त की जाती है। उदाहरण के लिए, A को सड़क पर एक बटुआ मिलता है जिसे वह खोलता है और देखता है कि इसमें उस बटुए के मालिक के सभी विवरण (डिटेल्स) शामिल हैं। बटुए में कुल 500 रुपये थे। लेकिन उसने मालिक से संपर्क करने और उसे उसका बटुआ वापस करने के बजाय, उसने इसे अपने उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया। इस प्रकार, वह आपराधिक दुर्विनियोजन का दोषी है और उसे बटुए के मालिक द्वारा इसे रखने के लिए नहीं सौंपा गया था, बल्कि उसने इसे एक अलग स्रोत के माध्यम से प्राप्त किया था।
  4. आपराधिक न्यास भंग में संपत्ति चल या अचल हो सकती है लेकिन आपराधिक दुर्विनियोजन में संपत्ति चल होती है।
  5. धारा 406 के अनुसार, आपराधिक न्यास भंग 2 साल की अवधि के कारावास या जुर्माना या दोनों से दंडनीय है। धारा 403 के अनुसार, आपराधिक दुर्विनियोग 2 वर्ष की अवधि के कारावास या जुर्माना या दोनों से दंडनीय है।

आपराधिक न्यास भंग से जुड़े मामले

जसवंतलाल नथालाल बनाम गुजरात राज्य (1967)

जसवंतलाल नथालाल बनाम गुजरात राज्य (1967) के एक ऐतिहासिक फैसले में, सरकारी लिथो-प्रिंटिंग प्रेस के लिए एक भवन के निर्माण का अनुबंध गुजरात सरकार द्वारा प्रतिवादी को दिया गया था। उप अभियंता (डेप्युटी इंजीनियर) (निर्माण उप-मंडल, अहमदाबाद) द्वारा प्रतिवादी को 5 टन या सीमेंट के 100 बैग की डिलीवरी की गई थी। इसके बाद, प्रतिवादी ने 40 बैग सीमेंट को एक गोदाम में स्थानांतरित कर दिया और शेष 60 बैग सीमेंट को निर्माण स्थल पर पहुंचा दिया। अपीलकर्ता ने प्रतिवादी के खिलाफ आपराधिक न्यास भंग के लिए मुकदमा चलाने के लिए मामला दायर किया।

उच्च न्यायालय ने माना कि “सौंपना” शब्द का अर्थ है कि वह व्यक्ति जो अपनी संपत्ति दूसरे को सौंप रहा है, उसका मालिक बना रहता है। और यह कि उनके बीच एक प्रत्ययी संबंध मौजूद होना चाहिए। लेकिन वर्तमान मामले में, प्रतिवादी को सीमेंट की बिक्री केवल निर्माण के उद्देश्य से इसका उपयोग करने के उद्देश्य से की गई है। अत: आरोपियों को सीमेंट दिये जाने के बाद सरकार का उस पर कोई अधिकार या प्रभुत्व (डोमिनियन) नहीं रह जाता है। प्रतिवादी पर तभी मुकदमा चलाया जा सकता है जब उसने सीमेंट नियंत्रण से संबंधित किसी कानून का उल्लंघन किया हो। इसमें न्यायालय ने कहा कि न्यास भंग नहीं हुआ है। 

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम बाबू राम उपाध्याय (2000)

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम बाबू राम उपाध्याय (2000) के मामले में, प्रतिवादी पुलिस अधीक्षक (सुपरिटेंडेंट) था। उसने चोरी के एक मामले की जांच करने के लिए एक गांव का दौरा किया। उनके साथ मोहिनुद्दीनपुर के पूर्व पटवारी लालजी भी थे। शाम को लौटते समय उसने देखा कि टीका राम एक नहर (कैनल) के किनारे से आ रहा है और एक खेत की ओर भाग रहा है। ऐसा प्रतीत हुआ कि वह अपनी धोती की तह में कुछ ले जा रहा है। चूंकि उसकी हरकत सामान्य नहीं थी, इसलिए पुलिस अधीक्षक ने उसकी तलाशी ली और करेंसी नोटों का एक बंडल पकड़ लिया। आरोपियों ने बंडल लिया और बाद में टीका राम को लौटा दिया। लेकिन जब टीका राम ने नोटों की गिनती की तो पता चला कि उनमें 250 रुपये कम थे। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संपत्ति उसे सौंपी गई थी और ऐसी संपत्ति पर प्रभुत्व रखने वाले व्यक्ति ने इसे अपने उपयोग के लिए परिवर्तित कर लिया। इसलिए आईपीसी की धारा 409 के तहत मामला दर्ज किया गया।

जसवंत राय मणिलाल अखाने बनाम बॉम्बे राज्य (1956)

जसवंत राय मणिलाल अखाने बनाम बॉम्बे राज्य (1956) के मामले में, आरोपी एक्सचेंज बैंक ऑफ इंडिया के प्रबंध निदेशक (मैनेजिंग डायरेक्टर) थे। न्यायालय द्वारा यह देखा गया कि बैंक के खातों पर उनका पूर्ण नियंत्रण था। यह विश्वास करना असंभव था कि उन्हें इस तथ्य की जानकारी नहीं थी कि उनका बैंक ओवरड्राफ्ट के माध्यम से सहकारी बैंक के पैसे का भुगतान करने के लिए बाध्य था। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि आरोपी को इसकी जानकारी नहीं थी। आगे यह निर्धारित किया गया कि आरोपी ने यह विश्वास करने में कानून की गलती की हो सकती है कि वह कानून द्वारा उन प्रतिभूतियों (सिक्योरिटीज) से निपटने में न्यायोचित (जस्टिफाइबल) था।

किसी विशेष उद्देश्य के लिए बैंक के पास गिरवी रखी जाने वाली प्रतिभूतियों को ‘सौंपने’ के रूप में माना जाता था। संपत्तियां जो एक कंपनी के निदेशकों के हवाले की गई हैं, वह वैसे ही सौंपने के बराबर होंगी, क्योंकि वे कुछ हद तक कंपनी के न्यासी हैं। लेकिन अगर पैसों का अवैध परितोषण (ग्रेटिफिकेशन) के रूप में भुगतान किया गया हो तो उन्हे सौंपे जाने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।

रश्मि कुमार बनाम महेश कुमार भादा (1996)

रश्मि कुमार बनाम महेश कुमार भादा (1996) में, अपीलकर्ता और प्रतिवादी, हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार, एक विवाहित युगल थे। उनके तीन बच्चे थे। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि उसके वैवाहिक घर में, उसके साथ क्रूरता की गई थी। उसके साथ सम्मान का व्यवहार नहीं किया गया और उसके ससुराल वालों ने उसे उसके तीन बच्चों सहित घर से निकाल दिया। अपीलकर्ता का सामान जो उसने अपने परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों से शादी से पहले और शादी के बाद प्राप्त किया था, उसे उसके पति को सौंप दिया गया था। उसने अपने पति से अपनी स्त्रीधन संपत्ति वापस लेने की मांग की जो उसे सौंपी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि पत्नी की स्त्रीधन संपत्ति का स्वामित्व उसके पास है और उसने अपनी संपत्ति अपने पति को सौंपी है और उस पर केवल उसीका प्रभुत्व है। और यदि वह या उसके परिवार का कोई और सदस्य सौंपी गए चीज के साथ विश्वासघात करता है और उसका खुदके फायदे के लिए गलत इस्तेमाल करता है, तो उन्हे आईपीसी की धारा 405 के तहत आपराधिक न्यास भंग के अपराध के लिए उत्तरदाई ठहराया जाएगा और उसके तहत उन्हें सजा दी जाएगी।

निष्कर्ष

आपराधिक न्यास भंग के अपराध को करने के लिए यह आवश्यक है कि इसके सभी आवश्यक तत्वों को पूरा किया जाए। इसमें संपत्ति सौंपी गई होनी चाहिए। इसे दोनों पक्षों के बीच एक प्रत्ययी संबंध को जन्म देना चाहिए। संपत्ति पर आरोपी का प्रभुत्व होना चाहिए। और यह कि उसने संपत्ति को अपने स्वयं के उपयोग के लिए या किसी अन्य मनमाने उद्देश्य के लिए बेईमान इरादे से परिवर्तित करके दूसरे पक्ष का न्यास तोड़ा है। बेईमान इरादे का अस्तित्व एक बहुत ही महत्वपूर्ण कारक है। संपत्ति का चल या अचल होना जरूरी नहीं है। यह दोनो में से कुछ भी हो सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

आपराधिक न्यास भंग के अपराध के लिए आवश्यक तत्व क्या हैं?

आपराधिक न्यास भंग के अपराध के लिए जिन आवश्यक तत्वों की आवश्यकता होती है, वे हैं संपत्ति पर प्रभुत्व, संपत्ति का बेईमान इरादे से अपने स्वयं के लिए उपयोग करना या संपत्ति का निपटान करना और कानून का उल्लंघन करना। 

क्या यह जमानती अपराध है या गैर जमानती?

आपराधिक न्यास भंग का अपराध एक गैर-जमानती अपराध है।

आईपीसी की धारा 405 के तहत अपराध शमनीय है या गैर समाशोधनीय (कंपाउंडेबल ऑर नॉन-कंपाउंडेबल)?

यह एक शमनीय अपराध है।

आईपीसी की धारा 405 के तहत अपराध संज्ञेय अपराध है या गैर संज्ञेय अपराध?

यह संज्ञेय अपराध है। इसमें पुलिस को बिना वारंट के गिरफ्तार करने का अधिकार है। 

संदर्भ 

 

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