अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड

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यह लेख सिद्धार्थ लॉ कॉलेज, मुंबई के Mehernaz Contractor द्वारा लिखा गया है। यह लेख अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड (ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड) का विस्तृत विवरण प्रदान करता है। यह अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड के कार्यों और संरचना पर भी केंद्रित है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

मुस्लिम समुदाय इस्लाम के सिद्धांतों का पालन करता है क्योंकि उनका मानना है कि इस्लाम उनके जीवन के हर पहलू में उनका मार्गदर्शन करता है। उनका मानना है कि मुस्लिम स्वीय विधि (शरीयत) अधिनियम, 1937 क़ानून के किसी स्रोत के बजाय उनके कार्यों का बेहतर मार्गदर्शन कर सकता है। मुसलमान पूरे भारत पर लागू होने वाली किसी भी तरह की समान संहिता का पालन करने में हमेशा झिझकते हैं। भारत में व्यक्तिगत कानूनों को लागू करने के लिए, 1973 में अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड (एआईएमपीएलबी) नामक एक गैर-सरकारी संगठन का गठन किया गया था। इसका गठन शरिया कानून को किसी भी कानून जो उन्हें दबाने की कोशिश करता है से बचाने के लिए किया गया था। यह मुसलमानों का मार्गदर्शन करता है और समाज में मुद्दों के खिलाफ उनके अधिकारों की रक्षा करता है।

अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड का इतिहास

1970 के दशक की शुरुआत में, सरकार ने मुस्लिम स्वीय विधि (शरीयत) अधिनियम को दबाने की कोशिश की। भारत में समान नागरिक संहिता लाने के लिए दत्तक ग्रहण विधेयक (एडॉप्शन बिल) को 1972 में कानून मंत्री एच. आर. गोखले द्वारा राज्यसभा में पेश किया गया था। यह दत्तक ग्रहण विधेयक मुसलमानों को बच्चा गोद लेने की अनुमति देगा लेकिन मुसलमानों द्वारा इसकी व्यापक आलोचना की गई। इस्लाम दत्तक ग्रहण को मान्यता नहीं देता है, इसलिए गोद लिए गए बच्चे को जन्म लेने वाले बच्चे के समान अधिकार नहीं होंगे। मुसलमान इस विधेयक के विरोध में थे क्योंकि उनका मानना था कि सरकार शरिया कानून को बदलने की कोशिश कर रही है, जो एक मुस्लिम व्यक्ति के विवाह, तलाक और विभिन्न कार्यों को नियंत्रित करता है। उलेमा, मुस्लिम नेताओं और मुस्लिम संगठनों ने मुस्लिम समुदाय को आश्वस्त किया कि सरकार उनके खिलाफ साजिश रच रही है और वे अपने सभी अधिकार खो देंगे।

इसके कारण, विभिन्न विचारधारा, जैसे शिया और सुन्नी विचारधारा से संबंधित मुस्लिम समुदाय के कई लोग व्यक्तिगत मुस्लिम कानून का समर्थन करने के लिए एकत्र हुए। हजरत मौलाना सैयद शाह मिन्नतुल्लाह रहमानी और कई अन्य नेताओं की पहल पर शरिया कानून को बचाने के लिए सभी संगठन पहली बार देवबंद में मिले। बैठक में दिसंबर 1972 में मुंबई में ‘समान नागरिक संहिता, दत्तक ग्रहण विधेयक 1972, इस्लामी शरिया की सुरक्षा’ नामक एक सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लिया गया। सम्मेलन में निर्णय लिया कि दत्तक ग्रहण इस्लाम का हिस्सा नहीं है, इसलिए विधेयक खारिज कर दिया गया। सम्मेलन में सर्वसम्मति से एआईएमपीएलबी के गठन का निर्णय लिया और हैदराबाद में इसके गठन को अपनाया।

कुछ लोगों का मानना है कि एआईएमपीएलबी का गठन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने मुस्लिम समुदाय से वोट प्राप्त करने के लिए किया था क्योंकि कांग्रेस को मुस्लिम लीग से समर्थन नहीं मिला था जिसका इरादा मुस्लिम व्यक्तिगत कानून को मजबूत करना था।

अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड के गठन का उद्देश्य

शरिया कानूनों की रक्षा के लिए अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड का गठन किया गया था। इसका गठन दत्तक ग्रहण विधेयक को अस्वीकार करने के लिए किया गया था, जिसे समान नागरिक संहिता के एक भाग के रूप में अपनाया जाना था। अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड के लक्ष्य और उद्देश्य नीचे दिए गए हैं:

  • शरिया कानून की सुरक्षा के लिए रणनीतियाँ अपनाना और भारत में मुस्लिम स्वीय विधि के निरंतर अनुप्रयोग की निगरानी करना।
  • मुस्लिम स्वीय विधि में हस्तक्षेप करने वाले किसी भी कानून या न्यायालय के फैसले पर रोक लगाना।
  • मुसलमानों के जीवन में मुस्लिम स्वीय विधि की प्रयोज्यता (एप्लीकेबिलिटी) के बारे में जागरूकता पैदा करना।
  • देश में बोर्ड के कार्यों को क्रियान्वित (इंप्लीमेंट) करने के लिए समितियों का गठन करना।
  • केंद्र और राज्य सरकारों और अन्य सरकारी और अर्ध-सरकारी एजेंसियों या संसद में पेश किए गए विधेयकों द्वारा जारी कानूनों, नियमों, विनियमों और परिपत्रों (सर्कुलर) का अध्ययन करने के लिए उलेमा और कानूनी विशेषज्ञों की एक स्थायी समिति का गठन करना।
  • इस्लाम के विभिन्न विचारधारा के अनुयायियों (फॉलोवर्स) के बीच सद्भाव, सद्भावना, भाईचारा, सहयोग और एकता की भावना को बढ़ावा देना।
  • मुस्लिम समुदाय के सामने आने वाली समस्याओं का समाधान खोजना।
  • प्रतिनिधिमंडलों और अध्ययन टीमों का गठन करना और सम्मेलनों, सेमिनारों, संगोष्ठियों (संपोजिया), सार्वजनिक बैठकों का आयोजन करना और दौरे करना और बोर्ड के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उपयुक्त साहित्य प्रकाशित और प्रसारित करना।

अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड की संरचना

अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड में कार्यकारी और सामान्य समिति शामिल है। कार्यकारी समिति में 51 व्यक्ति होते हैं और सामान्य समिति में 201 सदस्य होते हैं। कार्यकारी समिति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10% और सामान्य समिति में 19% है। हाल ही में, एआईएमपीएलबी ने कानपुर में अपनी दो दिवसीय बैठक में 30 महिलाओं को सामान्य समिति में और 3 महिलाओं को कार्यकारी समिति में नियुक्त किया। सामान्य समिति के सदस्य मुसलमानों के विभिन्न विचारधाराों और समूहों से होंगे। निम्नलिखित व्यक्ति बोर्ड में पद संभालेंगे:

  • 1 अध्यक्ष 
  • 5 उपाध्यक्ष 
  • 1 महासचिव
  • कम से कम 3 सचिव
  • कोषाध्यक्ष (ट्रेजरर)

सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष का होगा। सदस्यों को 500/-. रुपये का वार्षिक शुल्क देना होगा। हर साल एक बार, सोसायटी के पदाधिकारियों और सदस्यों की सूची सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 की धारा 4 के तहत उप-रजिस्ट्रार, दिल्ली के कार्यालय में जमा की जाएगी। एआईएमपीएलबी के तहत विभिन्न समितियों का गठन किया जाता है जैसा कि नीचे बताया गया है :

रबीता मदारिस इस्लामिया समिती 

इस समिति का गठन दीनी मदारिस की सुरक्षा के लिए किया गया था। इसमें दीनी मदारिस के बारे में सारी जानकारी एक रूप में एकत्रित की गई ताकि उनके बारे में सभी गलतफहमियां दूर हो जाएं। समिति एकत्रित की गई जानकारी के लिए एक रूपरेखा बनाने की योजना बना रही है।

निकाहनामा समिति 

इस समिति का गठन मुस्लिम समुदाय में निकाह संबंधी मुद्दों को सुलझाने के लिए किया गया था। समिति एक मानक निकाहनामे को अंतिम रूप देने के लिए बैठकें करेगी।

बाबरी मस्जिद पर समिति

इस समिति का गठन तब किया गया था जब विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद स्थल पर राम मंदिर के निर्माण की योजना की घोषणा की थी। समिति ने मुस्लिम समुदाय से बाबरी मस्जिद के विध्वंस के संबंध में बैठकें या संगोष्ठी आयोजित करने की अपील की।

सामाजिक सुधार समिति

यह समिति मुस्लिम समुदाय में सामाजिक सुधार लाने में मदद करती है। समिति राज्य और क्षेत्रीय स्तर पर सेमिनार, संगोष्ठी और सम्मेलन आयोजित करने की भी योजना बना रही है। इसका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय में इस्लाम के बारे में जागरूकता पैदा करना है।

दारुल क़ज़ा पर समिति

इस समिति का गठन दारुल क़ज़ा के मुद्दे को सुलझाने के लिए किया गया था। समिति में 5 सदस्य हैं।

फिलहाल, एस. मोहम्मद. राबे हसनी नदवी एआईएमपीएलबी के अध्यक्ष हैं। कल्बे सादिक, जलालुद्दीन उमरी, फखरुद्दीन अशरफ, सईद अहमद ओमेरी बोर्ड के उपाध्यक्ष हैं। सैयद मोवली रहमानी महासचिव हैं और प्रो. रियाज़ उमर बोर्ड के कोषाध्यक्ष हैं।

कार्यकारी समिति

एआईएमपीएलबी की कार्यकारी समिति में 51 सदस्य हैं। 51 सदस्यों में से 35 सदस्य बोर्ड के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं, और 15 सदस्य अध्यक्ष द्वारा नामित होते हैं। बोर्ड की कार्यकारी समिति वर्ष में दो बार बैठक करेगी।

कार्यकारी समिति की शक्तियाँ

कार्यकारी समिति की शक्तियाँ निम्नानुसार बताई गई हैं:

  • कार्यकारी समिति बोर्ड द्वारा अपनाए गए प्रस्तावों को लागू करेगी और बोर्ड के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए उपाय करेगी।
  • इसके पास उपनियम बनाने की शक्ति होगी।
  • इसके पास शरिया कानूनों की सुरक्षा के लिए उप-समितियां बनाने की भी शक्ति होगी।

बोर्ड के कार्य

बोर्ड का मुख्य कार्य भारत में मुस्लिम स्वीय विधि के उपयोग को बढ़ावा देना है, इसके लिए कई कार्य समितियां स्थापित की गई हैं जो अभियान आयोजित करती हैं और बोर्ड के निर्णयों से संबंधित जानकारी प्रदान करती हैं और लोगों को मुस्लिम स्वीय विधि के बारे में जागरूक करती हैं। उलेमा और कानूनविदों की एक समिति के माध्यम से, बोर्ड राज्य और केंद्रीय कानूनों पर नजर रखता है और मुस्लिम स्वीय विधि के साथ उनकी अनुरूपता की जांच करता है। बोर्ड मुस्लिम स्वीय विधि की सुरक्षा के लिए अपने सुझाव और संकल्प भी प्रस्तुत करता है। बोर्ड मुस्लिम स्वीय विधि के तहत अधिकारों और कर्तव्यों से संबंधित मुसलमानों के बीच जागरूकता को भी बढ़ावा देता है और कई सेमिनार, बैठकें, सम्मेलन आयोजित करके लोगों को मुस्लिम स्वीय विधि का पालन करने के लिए प्रोत्साहित करता है, और समाचार पत्र, पत्रिकाएं, समाचार पत्र आदि निकालता है।

शरीयत की रक्षा

भारत में मुसलमान मुस्लिम स्वीय विधि (शरीयत) अधिनियम, 1937 द्वारा शासित होते हैं, जो मुसलमानों को शादी, महर (मेहर), तलाक, भरण-पोषण, उपहार, वक्फ, वसीयत और विरासत में मुस्लिम स्वीय विधि लागू करने का निर्देश देता है। एआईएमपीएलबी का उद्देश्य राज्य या नागरिक समाज के किसी भी हस्तक्षेप के खिलाफ शरीयत की रक्षा करना है। केंद्र सरकार ने मुस्लिम स्वीय विधि (शरीयत) अधिनियम, 1937 को निरस्त नहीं किया है, लेकिन इसकी कुछ विधायिकाएं इसके खिलाफ हैं। देश में भारतीय समाज को समान नागरिक संहिता के तहत एकीकृत करने के प्रयासों का कड़ा विरोध किया जाता है और भारतीय मुसलमानों द्वारा इसे देश के अल्पसंख्यक समूहों की सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने के प्रयास के रूप में देखा जाता है। बोर्ड ने मुस्लिम महिलाओं के लिए तलाक कानूनों पर आपत्ति जताई है और इस संबंध में एक किताब निकाह-ओ-तलाक प्रकाशित की है। एआईएमपीएलबी के अनुसार, तलाक के बाद पति द्वारा पत्नी को गुजारा भत्ता का भुगतान केवल इद्दत अवधि तक ही सीमित है। शाहबानो बेगम के मामले में इस पर चर्चा की गई थी जिसमें यह कहा गया था कि यदि किसी भी समय मुस्लिम स्वीय विधि समान संहिता के साथ टकराव में आता है तो समान संहिता ही मान्य होगी। बोर्ड किसी भी समान संहिता का विरोध करता है जो मुस्लिम स्वीय विधि के तहत नियमों का उल्लंघन करता है।

बोर्ड की वैधता

एआईएमपीएलबी मुस्लिम स्वीय विधि की सुरक्षा के लिए अपने सुझाव और घोषणा प्रस्तुत करता है और उन सुझावों के आधार पर संसद कानून बनाती है। शाहबानो मामले के बाद संसद ने वर्ष 1986 में महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम बनाया। बाद में डेनियल लतीफी के मामले में महिला (तलाक पर अधिकारों की सुरक्षा) अधिनियम 1986 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने अधिनियम की संवैधानिकता को बरकरार रखा लेकिन अधिनियम के पाठ की व्याख्या की और कहा कि अधिनियम की धारा 3(1)(a) के तहत अपनी तलाकशुदा पत्नी के प्रति मुस्लिम पति का गुजारा भत्ता देने का दायित्व इद्दत अवधि तक ही सीमित नहीं है। हालाँकि, क़ानून के अनुसार अब भुगतान इद्दत अवधि के दौरान एकमुश्त (लमसम) भुगतान के रूप में किया जाएगा। इस प्रकार, भले ही बोर्ड द्वारा प्रस्तुत घोषणा संसद द्वारा अधिनियमित की गई हों – ऐसे अधिनियमों में बदलाव की संभावना बहुत अधिक है।

अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड का प्रमुख कौन हो सकता है

बोर्ड के अध्यक्ष को बोर्ड का प्रमुख माना जाता है। आमतौर पर, अध्यक्ष सुन्नी संप्रदाय के देवबंदी/नदवी संप्रदाय से होते हैं। उपाध्यक्ष शिया संप्रदाय से चुना जाता है। हालाँकि, अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड में अहमदियों का प्रतिनिधित्व नहीं है।

अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड को लेकर विवाद

एआईएमपीएलबी लगातार विवादों में रहा है क्योंकि इसने सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों का विरोध किया था। सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे निर्णय नीचे दिये गये हैं:

  • तीन तलाक का मामला– इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक की प्रक्रिया को असंवैधानिक करार दिया। एआईएमपीएलबी ने कहा कि न्यायालय को मुस्लिम स्वीय विधि में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। एआईएमपीएलबी ने तर्क दिया है कि असंहिताबद्ध (अनकोडिफाइड) मुस्लिम स्वीय विधि संवैधानिक न्यायिक समीक्षा के अधीन नहीं है और तीन तलाक इस्लामी धर्म की एक आवश्यक प्रथा है और संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित है। बोर्ड का मानना है कि न्यायालय ने मुस्लिम स्वीय विधि में इसलिए दखल दिया क्योंकि सरकार भारत में समान नागरिक संहिता लागू करना चाहती है।
  • हिजाब प्रतिबंध मामला – इस मामले में, न्यायालय ने माना कि हिजाब पहनना एक आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है। बोर्ड ने महसूस किया कि अदालत ने उन प्रस्तावों पर बहुत अधिक जोर दिया, जिसके परिणामस्वरूप भेदभाव, बहिष्कार और मुख्यधारा की सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली से एक वर्ग का समग्र अभाव हो गया, इस तथ्य के अलावा कि यह किसी व्यक्ति के पवित्र धार्मिक विश्वास पर गंभीर रूप से अतिक्रमण करता है। बोर्ड का मानना था कि हिजाब पहनना इस्लामिक कानूनों के तहत अनिवार्य माना जाता है, जिसका पालन न करने पर यह पाप बन जाएगा।

न्यायालयों द्वारा व्याख्या

अदालतों का विचार है कि जहां एक समान संहिता की शर्तों और किसी व्यक्तिगत समूह के अधिकारों और दायित्वों के बीच टकराव होता है, तो  समान संहिता ही मान्य होगी। देश का कानून सभी पर समान रूप से लागू किया जाना चाहिए, मुसलमानों के लिए कानून का एक सेट और गैर-मुसलमानों के लिए एक अलग कानून के तहत समानता की अवधारणा को कमजोर नहीं करना चाहिए।

अतीत में न्यायालयों ने भारत में मुस्लिम स्वीय विधि के अनुप्रयोग से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण बिंदु निर्धारित किए हैं। शाहबानो मामले को एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा सकता है क्योंकि यहां धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों की स्थिति पर सूक्ष्मता (माइन्यूटली) से चर्चा की गई थी। इस मामले में, आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 और मुस्लिम स्वीय विधि के तहत अपनी तलाकशुदा पत्नी के गुजारा भत्ता के लिए पति के दायित्व पर विवाद था। मुस्लिम स्वीय विधि के तहत इद्दत अवधि समाप्त होने के बाद महिलाओं को कोई गुजारा भत्ता नहीं दिया जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि तलाकशुदा पत्नी पत्नी नहीं रहती है, लेकिन आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत यह कहा गया है कि जब तक महिला दोबारा शादी नहीं कर लेती, तब तक वह पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है। इस मामले में, शाह बानो को उनके पति मुहम्मद अहमद खान ने तलाक दे दिया था और इस प्रकार उन्होंने गुजारा भत्ता के लिए उन पर मुकदमा दायर किया। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले के तत्वों का बहुत सूक्ष्मता से अध्ययन किया और माना कि मुस्लिम स्वीय विधि के तहत निर्धारित नियम को स्वीकार नहीं किया जा सकता है और खुद का गुजारा भत्ता करने में असमर्थ तलाकशुदा पत्नी को अपने पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करना होगा। फैसले में यह भी कहा गया कि संविधान का उद्देश्य एक समान संहिता साबित करके लोगों के बीच समानता स्थापित करना है और इसलिए किसी भी धार्मिक कानून को इसका उल्लंघन नहीं करना चाहिए। इस प्रकार, यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसी स्थिति में जहां मुस्लिम स्वीय विधि और के बीच टकराव होता है, तो समान संहिता ही प्रबल होती है।

इसके अलावा, मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों के लिए अदालतों की व्याख्या की उचित समझ के लिए नूर शबा खातून के मामले का भी अध्ययन किया जाना चाहिए। उपरोक्त मामले में अपीलकर्ता ने अपने 6 वर्ष, 3 वर्ष और ढाई वर्ष की आयु के बच्चों के लिए गुजारा भत्ता की मांग की। 1986 के अधिनियम की धारा 3 (1)(b) के अधीन उच्च न्यायालय ने माना कि धारा 125 के प्रावधानों के बावजूद, अपनी मां के साथ रहने वाले तलाकशुदा मुस्लिम माता-पिता के बच्चों को गुजारा भत्ता का अनुदान उक्त धारा के तहत निर्धारित अवधि तक सीमित था। हालाँकि, उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि 1986 अधिनियम की धारा 3(1)(b) किसी भी तरह से तलाकशुदा मुस्लिम माता-पिता के नाबालिग बच्चों के अपने पिता से धारा सीआरपीसी की 125 के तहत गुजरा भत्ता का दावा करने के अधिकारों को प्रभावित नहीं करती है जब तक कि वे वयस्क न हो जाएं या अपना गुजारा भत्ता करने में सक्षम न हो जाएं, या महिलाओं के मामले में, जब तक उनकी शादी नहीं हो जाती है। आगे यह माना गया कि जब तक सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता देने की शर्तें पूरी होती हैं, तब तक खुद का गुजारा भत्ता करने में असमर्थ नाबालिग बच्चों के अधिकार, 1986 अधिनियम की धारा 3(1)(b) से प्रभावित नहीं होते हैं।

वर्तमान में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी एक ऐसे व्यक्ति की जमानत याचिका खारिज कर दी है जिसने 17 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार किया था जो उसकी प्रेमिका थी। यह माना गया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और शरिया इसका उल्लंघन नहीं कर सकता। यह माना गया कि “मुस्लिम स्वीय विधि केवल विवाह, तलाक और व्यक्तिगत संबंधों से संबंधित मामलों पर लागू होता है, लेकिन आपराधिक दायित्व के मामले में इसकी कोई प्रयोज्यता नहीं है”। इस प्रकार, निर्णय से यह स्पष्ट है कि मुस्लिम स्वीय विधि आपराधिक कानून को खत्म नहीं कर सकता है।

इस प्रकार, कोई भी धार्मिक स्वीय विधि आपराधिक कानून जैसे सभी नागरिकों पर लागू एक समान कानून के उद्देश्यों का उल्लंघन नहीं कर सकता है। साथ ही, धार्मिक स्वीय विधि का कानूनी प्रणाली में अपना स्थान हो सकता है, लेकिन उन्हें उचित और निष्पक्ष विकल्प होना चाहिए।

अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड की आलोचना

बोर्ड की कठोर प्रकृति के कारण अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड को अपने फैसलों के लिए काफी आलोचना का सामना करना पड़ा है। बोर्ड ने समलैंगिक कार्यों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का विरोध किया। बोर्ड सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ था क्योंकि वह ऐसे कार्यों को अधार्मिक और अप्राकृतिक मानता था। ऐसा माना जाता है कि समलैंगिक समुदाय का समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। बोर्ड ने अंतरजातीय विवाहों को भी अस्वीकार कर दिया है क्योंकि उनका मानना है कि ऐसे विवाह खेदजनक और दुर्भाग्यपूर्ण हैं। इसने सुझाव दिया कि देश भर में मस्जिदों और मदरसों के प्रतिनिधियों को अंतरजातीय विवाह को रोकने के लिए कदम उठाने चाहिए। शरिया कानूनों के तहत ऐसी शादियां वैध नहीं हैं।

बोर्ड ने महिलाओं के लिए विवाह की आयु बढ़ाने का भी समर्थन नहीं किया। सरकार महिलाओं की उम्र बढ़ाकर 21 साल करना चाहती थी लेकिन बोर्ड ने इसका विरोध करते हुए कहा कि शादी एक विकल्प है और इसलिए शादी की उम्र तय नहीं की जानी चाहिए। ऐसा लगा कि सरकार इस तरह का निर्णय थोपकर व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप कर रही है। बोर्ड ने विचारधाराों में योगा को अनिवार्य बनाने के सरकार के फैसले का भी विरोध किया। ऐसा माना जाता है कि इस तरह की गतिविधि थोपने से संविधान की धर्मनिरपेक्षता बाधित हो सकती है।

कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि बोर्ड अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है जो राज्य या नागरिक समाज के किसी भी हस्तक्षेप के खिलाफ शरीयत की रक्षा करना था। बोर्ड ने मुस्लिम समुदायों में अच्छे आचरण के प्रचार-प्रसार के लिए सामाजिक सुधार आंदोलन शुरू किया है और उन्हें अपने व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन में शरीयत का पालन करने के लिए राजी किया है, लेकिन मुस्लिम भारतीय समाज पर उनके प्रभाव का कभी अध्ययन नहीं किया है। कुछ लोगों का आरोप है कि शरीयत के रास्ते से इसके बढ़ते विचलन के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं।

इसके अलावा बोर्ड भारतीय मुसलमानों का एक प्रतिनिधि निकाय होने का दावा करता है, लेकिन अगर इसकी संरचना का ठीक से अध्ययन किया जाए तो यह देखा जाएगा कि इस पर हमेशा हनफ़ी विचारधारा के उलेमा का वर्चस्व (डोमिनेंस) रहा है, जिसमें अन्य सभी विचारधाराों, जैसे शफ़ीई, मलिकी, हम्बाली और जाफरी की मामूली उपस्थिति है। बोर्ड में प्रख्यात न्यायविद, सामाजिक वैज्ञानिक या राजनीतिक हस्तियां, यहां तक कि संसद सदस्य भी शामिल नहीं हैं। उनके वार्षिक खातों की पारदर्शिता से संबंधित और भी प्रश्न उठाए जाते हैं क्योंकि न तो दान और न ही पदाधिकारियों द्वारा यात्रा सहित स्थापना व्यय का विवरण दर्ज किया जाता है।

उपरोक्त आलोचनाओं का परिणाम यह है कि बोर्ड अपना प्रभाव खो रहा है और समानांतर स्वीय विधि बोर्ड परिदृश्य पर उभर रहे हैं, जैसे मुस्लिम महिला स्वीय विधि बोर्ड, सुन्नी और शिया स्वीय विधि बोर्ड, अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड (जदीद)। यदि यह प्रक्रिया तेज होती है, तो इसके परिणामस्वरूप बोर्ड का संप्रदाय-वार और लिंग-वार विघटन हो जाएगा। बोर्ड ने समानांतर बोर्डों के साथ संवाद स्थापित करने या उनके सक्रिय सदस्यों को शामिल करने का कोई प्रयास नहीं किया है।

निष्कर्ष

भारत में इस्लाम की संस्कृति को संरक्षित करने के लिए 1973 में अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड की स्थापना की गई थी। तब से यह शरिया कानूनों की रक्षा के लिए काम कर रहा है। बोर्ड का दावा है कि वह मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा करता है, लेकिन यह पूरे समुदाय के बजाय केवल सुन्नी संप्रदाय का प्रतिनिधित्व करता है। बोर्ड महिलाओं के अधिकारों पर विचार नहीं करता है। यह विभिन्न समितियाँ बनाता है ताकि इसके लक्ष्य और उद्देश्यों को अच्छी तरह से बनाए रखा जा सके। एआईएमपीएलबी ने कई मामलों में हस्तक्षेप किया है और मुसलमानों का समर्थन किया है। तीन तलाक जैसे विभिन्न मामलों पर अपने फैसलों के कारण बोर्ड को काफी आलोचना का सामना करना पड़ा है। बोर्ड का गठन इस्लाम को संरक्षित करने के लिए किया गया था, लेकिन यह अब समुदाय को नहीं देख रहा है और केवल इसके अस्तित्व के बारे में चिंतित है। बोर्ड ने हमेशा समान नागरिक संहिता का विरोध करने की कोशिश की है जिससे मुस्लिम समुदाय को फायदा हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या भारत सरकार अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड को भंग कर सकती है या कम से कम यह सुनिश्चित कर सकती है कि मुसलमानों का उचित प्रतिनिधित्व हो?

सरकार एआईएमपीएलबी को केवल इसलिए बंद नहीं कर सकती क्योंकि उसे उसकी राय पसंद नहीं है। सरकार एआईएमपीएलबी के कामकाज में तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकती जब तक वह गैरकानूनी मामलों में शामिल न हो।

अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड क्या है?

एआईएमपीएलबी एक गैर-सरकारी संगठन है जो मुसलमानों के अधिकारों के समर्थन के लिए काम करता है। इसका उद्देश्य मुस्लिम स्वीय विधि को संरक्षित करना है

एक धर्मनिरपेक्ष देश होने के नाते भारत को अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड की आवश्यकता क्यों है?

भले ही भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, मुसलमानों का मानना है कि उनके जीवन को इस्लाम के सिद्धांतों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए, न कि एक समान संहिता द्वारा। मुसलमान एक ऐसी संस्था द्वारा प्रतिनिधित्व चाहते हैं जो समुदाय को समझे और उनके अधिकारों को सुरक्षित कर सके।

भारत में मुस्लिम स्वीय विधि की कमियाँ क्या हैं?

जब महिलाओं के अधिकारों की बात आती है तो एआईएमपीएलबी बहुत प्रगतिशील नहीं है। तीन तलाक पर प्रतिबंध का उन्होंने समर्थन नहीं किया है।

समान नागरिक संहिता का बहिष्कार करने और तीन तलाक पर प्रतिबंध को भारत के सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने के अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड के फैसले पर आपकी क्या राय है?

एआईएमपीएलबी महिलाओं को समान अधिकार देने में झिझक रहा है। तीन तलाक पर प्रतिबंध का मतलब होगा कि महिलाएं स्वतंत्र रूप से रह सकती हैं और अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकती हैं जो एआईएमपीएलबी नहीं चाहता है। एआईएमपीएलबी मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों को संरक्षित करने के लिए काम कर रहा है, इसलिए समान नागरिक संहिता का मतलब व्यक्तिगत कानूनों को खोना होगा, और यह एआईएमपीएलबी के उद्देश्यों के खिलाफ है।

अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड अयोध्या फैसले पर पुनर्विचार याचिका क्यों दायर करना चाहता है?

एआईएमपीएलबी ने बाबरी मस्जिद-राम-जन्मभूमि विवाद मामले के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर की क्योंकि उसका मानना था कि फैसले में कुछ त्रुटियां थीं। उसका मानना था कि इस तरह की स्थिति में किसी अन्य स्थल पर उसी मस्जिद का निर्माण करना इस्लामी कानून के अनुसार स्वीकार्य नहीं है।

अखिल भारतीय मुस्लिम स्वीय विधि बोर्ड द्वारा भारत में शरिया अदालतें स्थापित करने की घोषणा पर आपकी क्या राय है?

सर्वोच्च न्यायालय के विचार में, पूरे देश को एक समान अदालतों द्वारा विनियमित किया जाना चाहिए जो भारत के संविधान के अनुसार पहले से ही विद्यमान हैं। इसमें कहा गया कि मुस्लिम स्वीय विधि को अलग से लागू करने के लिए शरिया अदालतें स्थापित करने की जरूरत नहीं है। पूरे देश में एकरूपता बनाए रखी जानी चाहिए, ताकि विभिन्न धर्मों के सभी लोगों के साथ समान व्यवहार किया जा सके।

संदर्भ

  • Danial Latifi & Anr v. Union Of India, Writ Petition (civil) 868 of 1986
  • Mohd. Ahmed Khan v. Shah Bano Begum And Ors, 1985 AIR 945, 1985 SCR (3) 844
  • Noor Saba Khatoon v. Mohd, 1997 AIR 3280

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