भारत में ग्रीन प्रोक्योरमेंट स्कीम और इको टैक्सेशन के दायरे और उसे लागू करने के बारे में जाने

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इस लेख को Himanshi Patwa ने लिखा है। इस लेख में लेखक, भारत में ग्रीन प्रोक्योरमेंट स्कीम के लागू करने के प्रभाव और इको टैक्सेशन की अवधारण (कांसेप्ट) पर विस्तृत (डिटेल) में चर्चा करते है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja द्वारा किया गया है। 

Table of Contents

परिचय (इंट्रोडक्शन)

स्टेटमेंट ऑफ़ प्रोब्लम

मनुष्य हमेशा तीव्र (रैपिड) आर्थिक (इकोनॉमिक) विकास को प्राप्त करने के लिए गैर-जिम्मेदार रूप से चिंतित रहता है, जिसके परिणामस्वरूप, उसके साथ बहुत सारी पर्यावरणीय समस्याएं आती है। इन समस्याओं ने मानव जीवन के साथ-साथ पृथ्वी पर जीवन को भी खतरनाक रुप से प्रभावित किया है। इस भयावह स्थिति ने विकास के लिए, पर्यावरण अनुकूल (फ्रेंडली) मॉडल पर विचार करने के लिए जोर दिया है।

भारत जैसे विकासशील (डेवलपिंग) और लोकतांत्रिक (डेमोक्रेटिक) प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) वाले देश में, बाजार आधारित उपकरणों (मार्केट बेस्ड इंस्ट्रूमेंट) को शुरू करने और उसी के लिए नीतियां (पॉलिसीज) तैयार करने के लिए उद्योगों (इंडस्ट्रीज) और सरकार की एक अहम भूमिका है। देश में सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) और पर्यावरण के अनुकूल विकास के तरीकों को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय योजनाओं (इंटरनेशनल स्कीम्स) और संधियों (ट्रीटीज) में विभिन्न दिशा निर्देश (गाइडलाइंस) दिए गए हैं। सरकार, पर्यावरण की सुरक्षा के लिए कुछ बाजार आधारित उपकरणों को बढ़ावा दे रही है। लेकिन तब भी, नीतियों के दायरे (स्कोप) और उनको लागू करने के बीच एक अंतर है।

ग्रीन प्रोक्योरमेंट स्कीम और इको टैक्सेशन की अवधारणा भारत जैसे विकासशील देशों में सतत विकास के लिए जानी जाती है। ऐसे लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बनाई गई नीतियां पर्याप्त हैं, लेकिन इनको अभी तक प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया है।

साहित्य की समीक्षा (रिव्यू ऑफ़ लिटरेचर)

हर गोवन द्वारा लिखे गए लेख, रिसेंट्स डेवलपमेंट इन एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन इन इंडिया: पॉल्यूशन कंट्रोल’ में पर्यावरण के क्षरण (एनवायरनमेंट डिग्रेडेशन) के लिए जिम्मेदार विभिन्न कारकों (फैक्टर) के बारे में बात की गई है और उन कार्यों की पहचान की गई है जिन्हे, अनिवार्य (एसेंशियल) रूप से पर्यावरण के क्षरण पर नियंत्रण (कंट्रोल) पाने के लिए किया गया हैं। सरकार को हाल ही में विभिन्न उपकरणों और रणनीतियों (स्ट्रेटजी) मिली है और इसमें काफी बदलाव आया है। देश की अदालतें विकसित होने लगी हैं और पर्यावरण कार्यकर्ताओं (सोशल एक्टिविस्ट) ने इसके लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

परिधि पोद्दार द्वारा लिखा गया लेख, “एनवायरनमेंटल टैक्सेशन इन इंडिया: नीड फॉर ग्रीन फिसकल रिफॉर्म फॉर ए सस्टेनेबल फ्यूचर: एक सतत भविष्य के लिए की आवश्यकता” एक आर्थिक पर्यावरणीय दृष्टिकोण (इकोनॉमिक एनवायरनमेंट एप्रोच) है, जहां पर्यावरण कराधान की अवधारणा को समझाया गया है। पूरी अवधारणा के दायरे के साथ-साथ, उसके फायदे और नुकसान के बारे में बात की गई है। भारत में वर्तमान नीतियां, इस अवधारणा को लागू करने के लिए एक बड़ी मदद रही हैं।

अपर्णा साहनी द्वारा लिखा गया लेख, ‘मैनेजिंग पॉल्यूशन: पी.आई.एल. एस इनडायरेक्ट मार्केट बेस्ड टूल’ पर्यावरण जनहित याचिका (एनवायरनमेंटल पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन) के बारे में है और 1980 और 1990 के दशक के दौरान भारत में परिणामी न्यायिक सक्रियता (ज्युडिशियल एक्टिविजिम) ने प्रदूषण को संभालने के अप्रत्यक्ष (इनडायरेक्ट) बाजार-आधारित उपकरणों की भूमिका निभाई है। जबकि पर्यावरण को संभालने के लिए विशुद्ध (प्योर) रूप से न्यायिक दृष्टिकोण (ज्यूडिशियल एप्रोच) न तो प्रभावी है और न ही कुशल (एफिशिएंट), जनहित याचिका ने भारत की प्रदूषण प्रबंधन प्रणाली (पॉल्यूशन मैनेजमेंट सिस्टम) को परिभाषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

रीता पांडे और गीतेश भारद्वाज द्वारा लिखा गया लेख, कम्पेरिंग द कॉस्ट इफेक्टिवनेस ऑफ़ मार्केट बेस्ड पॉलिसी इंस्ट्रुमेंट वरसस रेगुलेशन: द केस ऑफ़ एमिशन ट्रेडिंग इन एन इंटीग्रेटेड स्टील प्लांट इन इंडिया’, में लागत प्रभावी नीतियों (कॉस्ट इफेक्टिव पॉलिसीज) के संबंध में अनुपालन लागत (कंप्लायंस कॉस्ट) को कम करने की अनुमति दी गई है, जो की एक वांछित पर्यावरणीय गुणवत्ता लक्ष्य (डिजायर्ड एनवायरनमेंटल क्वालिटी टारगेट) को पूरा करने से संबंधित होती है।

इस मॉडल में उत्सर्जन स्रोतों (एमिशन सोर्सेज) की संख्या, प्रत्येक स्रोत पर उत्सर्जित प्रदूषकों (पॉल्यूटेंट्स) की सांद्रता (कंसंट्रेशन), प्रत्येक स्रोत के लिए कमी की सीमांत लागत (मार्जिनल कॉस्ट), स्थानांतरण गुणांक (ट्रांसफर कोएफिशिएंट) जो परिवेशी वायु गुणवत्ता पर प्रभाव के साथ प्रत्येक स्रोत पर उत्सर्जन से संबंधित है, और वांछित परिवेशी (एंबिएंट) वायु की गुणवत्ता के लक्ष्य को शामिल करता है। यह मॉडल भारत में एक एकीकृत (इंटीग्रेटेड) स्टील प्लांट के लिए लागू किया गया है।

अपर्णा साहनी द्वारा लिखे गए लेख ‘ए रिव्यू ऑफ मार्केट बेस्ड इंस्ट्रूमेंट्स फॉर पॉल्यूशन कंट्रोल: इंप्लीकेशंस फॉर इंडिया’ में पर्यावरण पर बजार अधारित उपकरणों की बाहरीताओं (एक्सटर्नलिटी) और कैसे वे सेवाओं पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं इस पर चर्चा की गई है। परिणामी प्रदूषण सामाजिक रूप से वांछनीय (डिजायरेबल) की तुलना में अधिक है और यह सीमा से परे चला जाता है। इस पर नियंत्रित करने के लिए कई उपकरण और रणनीतियां हैं, जिनमें से बाजार आधारित उपकरण, भारत जैसे विकासशील देश के लिए एक महत्वपूर्ण पहलू है।

चौधरी और इंद्राणी रॉय द्वारा लिखे गया लेख ‘एनवायरनमेंट पॉलिसी एंड मार्केट स्ट्रक्चर’, अर्थशास्त्र (इकोनॉमिक), पर्यावरण अर्थशास्त्र और औद्योगिक संगठन (इंडस्ट्रियल आर्गेनाइजेशन) के दो सबसे सक्रिय (एक्टिव) और दिलचस्प उप-विषयों (सब डिसिप्लिंस) के प्रतिच्छेदन (इंटरसेक्शन) के बारे में है। अर्थव्यवस्था और पर्यावरण आंतरिक (इंट्रिंसिक) रूप से अलग-अलग तरीकों से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

इन सभी घटनाओं ने यह संदेश दिया है कि पर्यावरण एक दुर्लभ संसाधन (स्कार्स रिसोर्स) है और पर्यावरण का क्षरण, वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक गंभीर खतरा है और विशेष रूप से अविकसित (अनडेवलप्ड) देशों के लिए यह एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक निहितार्थ (इंप्लीकेशन) हैं। यह देखते हुए कि ज्यादातर अर्थशास्त्र दुर्लभ संसाधनों के आवंटन (एलोकेशन) से संबंधित है, यह स्वाभाविक है कि लोग पर्यावरणीय समस्याओं की बेहतर समझ के लिए अर्थशास्त्र की ओर रुख करें।

वल्लभन और टीवी मुरली द्वारा लिखा गया लेख, ‘ग्रीन पॉलिसीज एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट इन केरेला सींस 1890’, उन नीतियों की समीक्षा (रिव्यू) के बारे में है जो विभिन्न बाजार आधारित उपकरणों में विकसित होने लगी हैं और इसके माध्यम से विकास को प्राप्त करने और इसे स्थिर (स्टेबलाइज) करने का लक्ष्य है।

उद्देश्य (ऑब्जेक्टिव्स)

यह शोध प्रबंध (डिसर्टेशन), राजनीतिक, पर्यावरणीय और आर्थिक कारकों के बीच अंतर्संबंध (इंटर रिलेशनशिप) के अध्ययन (स्टडी) का प्रयास करता है। इस अंतर्संबंध ने सतत विकास की अवधारणा को जन्म दिया है और इसके परिणामस्वरूप सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ, विकास के लिए विभिन्न योजनाएं शुरू भी की हैं। इनमें से, नीति बाजार आधारित उपकरण, एक महत्वपूर्ण तंत्र (टूल) है। सतत विकास, दुनिया भर के सभी देशों के लिए एक अनिवार्य उद्देश्य बन गया है। इसलिए, बाजार आधारित उपकरण, सतत विकास का एक अनिवार्य हिस्सा रहे हैं।

अध्ययन का पहला उद्देश्य बाजार आधारित उपकरणों की अवधारणा और दायरे का विश्लेषण (एनालिसिस) और अध्ययन करना है, जो अवधारणा निष्पक्ष विकास (फेयर डेवलपमेंट) के आधार पर प्रचलित (प्रीवेलेंट) हैं।

अध्ययन का दूसरा उद्देश्य, सरकार द्वारा तैयार की गई नीतियों के दायरे और भारत में उस को लागू करने के बीच के अंतर का आकलन (एसेस) करना है।

अध्ययन का तीसरा उद्देश्य, तैयार की गई नीतियों के प्रभाव और उनके संघर्ष के तत्वों (पॉइंट ऑफ़ कॉन्फ्लिक्ट) को इंगित (पॉइंट आउट) करना है, जो नीतियों को लागू करने और लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अंतर पैदा करता है।

परिकल्पना (हाइपोथेसिस)

पर्यावरण संरक्षण (एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन) और सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) के लिए नीतियां बनाने और तैयार करने में सरकार प्रमुख एजेंसी रही है और ग्रीन स्कीम्स को लागू करने के लिए बाजार आधारित उपकरण एक महत्वपूर्ण तंत्र रहा है। ग्रीन प्रोक्योरमेंट और इको टैक्सेशन की नीतियों को लागू करने की प्रक्रिया भारत में पूरी तरह से नहीं की गई है। इन नीतियों को लागू करने का दायरा व्यापक (वाइडर स्कोप) है।

शोध प्रश्न (रिसर्च क्वेश्चंस)

  1. क्या सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के लिए बाजार आधारित उपकरणों के लिए नीतियां बनाई हैं?
  2. क्या भारत में ग्रीन प्रोक्योरमेंट और इको टैक्सेशन की नीतियां लागू की गई हैं?

कार्यप्रणाली (मेथोडोलॉजी)

अध्ययन के दौरान इस्तेमाल की गई विशिष्ट (स्पेसिफिक) विधियाँ (मेथड्स), ऐतिहासिक और विश्लेषणात्मक (एनालिटिकल) हैं। ऐतिहासिक दृष्टिकोण (एप्रोच) में सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के विचार को बढ़ावा देने के लिए बाजार आधारित उपकरणों के संबंध में अवधारणाओं और नीतियों के विकास को शामिल किया गया है। विश्लेषणात्मक विधि में उपकरण नीतियों और उनके संदर्भ (कॉन्टेक्स्ट) और दायरे के अध्ययन को शामिल किया गया है। यह आगे नीतियों को लागू करने और विवादों का विश्लेषण करता है, जो इसके अप्रभावी (इनइफेक्टिव) तरीके से लागू होने की ओर ले जाता है।

इस अध्ययन में अपनाई गई कार्यप्रणाली (मेथोडोलॉज) एक सैद्धांतिक दृष्टिकोण (डॉक्ट्रिनल एप्रोच) है, जहां विभिन्न योजनाओं, संधियों (ट्रीटी), नीतियों और वैधानिक ढांचे (स्टेच्यूटरी फ्रेमवर्क) के डेटा के द्वितीयक स्रोत (सेकेंडरी सोर्स) और उसी के दायरे और उसको लागू करने का तुलनात्मक विश्लेषण (कंपेरिटिव एनालिसिस) आगे किया जाता है। कार्यप्रणाली माध्यमिक दस्तावेजों (सेकेंडरी डॉक्यूमेंट्स) जैसे पुस्तकों, पत्रिकाओं (जर्नल्स), लेखों, शोध पत्रों का विश्लेषणात्मक (एनालिटिकल) अध्ययन है।

बाजार आधारित उपकरण: अर्थ और दायरा (मार्केट बेस्ड इंस्ट्रूमेंट्स: मीनिंग एंड स्कोप)

बाजार आधारित उपकरणों का अर्थ

बाजार आधारित उपकरण, ऐसे नीतिगत (पॉलिसी बेस्ड) उपकरण हैं जो नकारात्मक पर्यावरणीय बाहरीताओं (नेगेटिव एनवायरनमेंटल एक्सटर्नलिटीज) को कम करने या उन्हें समाप्त करने के लिए, प्रदूषकों को प्रोत्साहन (इंसेंटिव्स) प्रदान करने के लिए बाजार मूल्य और अन्य आर्थिक चर (इकोनॉमिक वेरिएबल्स) का उपयोग करते हैं। हम, इतनी तेज गति (स्पीड) से बढ़ने वाले युग में हैं, जहां हमें बाहरी दुनिया के साथ तालमेल बिठाने के लिए, उच्चतम (हाइएस्ट) गति से विकास की आवश्यकता है, लेकिन इसके साथ ही हमारे लिए, पर्यावरण और संबंधित पहलुओं पर गौर करना भी बहुत आवश्यक है।

हम अपने पर्यावरण के क्षरण की कीमत पर अपना विकास नहीं कर सकते। यहां तक ​​कि रियो घोषणापत्र (डिक्लेरेशन) ने भी, अपने सिद्धांत (प्रिंसिपल) 12 में सतत विकास के विचार पर जोर दिया है। लेकिन भारत जैसे विकासशील देश के लिए सतत विकास के विचार को लागू करना थोड़ा मुश्किल रहा है, और इसलिए, पर्यावरण की सुरक्षा के समग्र स्वरूप (ओवरऑल लुक) के लिए रणनीतिक निरूपण (स्ट्रीटेजिक फॉर्मुलेशन) होना चाहिए। सरकार ने एक ही उद्देश्य के लिए कई दृष्टिकोणों को अपनाने की कोशिश की है, लेकिन एक महत्वपूर्ण पहलू ऐसे सामानों के बाजार को विनियमित करने के संबंध में है।

बाजार आधारित उपकरणों के प्रकार

वर्गीकरण (टैक्सोनॉमी) और सुविधा के उद्देश्य के लिए

बाजार आधारित उपकरणों की अवधारणा के पीछे मुख्य विचार टैक्सोनॉमी का पालन करना है, और इसलिए कुछ विद्वानों द्वारा, बाजार आधारित उपकरणों को दो प्रकार में वर्गीकृत किया गया है:

प्रत्यक्ष बाजार आधारित उपकरण (डायरेक्ट मार्किट बेस्ड इंस्ट्रुमेंट):

तंत्र या उपकरण जो सीधे प्रदूषकों से निपट सकते हैं और इसे माप (मेजर) सकते हैं, उन्हें प्रत्यक्ष बाजार आधारित उपकरण माना जाएगा। मुख्य रूप से इसमें ऐसे तीन उपकरण शामिल हैं:

  1. उत्सर्जन (एमिशन)/एफ्लुएंट चार्जेस: सरकार कचरे के निर्वहन (डिस्चार्ज) के कारण खराब हुए पर्यावरण की गुणवत्ता (क्वालिटी) पर नजर रखती है। यह पर्यावरण को होने वाले सामान्य क्षरण की तुलना में की गई एक सापेक्ष (रिलेटिव) ग्रेडिंग है, और फिर उसके अनुसार शुल्क तय किए जाते हैं।
  2. ट्रेडेबल परमिट सिस्टम: सरकार, पर्यावरण की गुणवत्ता का लक्ष्य स्तर (टारगेट लेवल) निर्धारित (डिटरमाइन) करती है और फिर पर्यावरण में विभिन्न कणों (पार्टिकल) के निर्वहन की अनुमति देती है। पर्यावरण पर कण के प्रभाव के अनुसार, विभिन्न कणों की परमिट दर (रेट) अलग होती है। इस प्रकार, कणों को केवल परमिट द्वारा ही छोड़ा जा सकता है।
  3. जमा वापसी प्रणाली (डिपॉजिट रिफंड सिस्टम): उपभोक्ता (कंज्यूमर) किसी भी उत्पाद (प्रोडक्ट) का अंतिम उपयोगकर्ता (एंड यूजर) होता है, जिसके कारण प्रदूषण होता है, और इसलिए, उपभोक्ता उस उत्पाद को इस्तेमाल करने के लिए एक निश्चित राशि जमा करता है, जो लेबल की गई कीमत से अधिक होती है। जब भी उपभोक्ता उचित पुनर्चक्रण (प्रॉपर रीसाइक्लिंग) या बहाली (रेस्टोरेशन) के लिए उपयोग के बाद उत्पाद को वापस देता है, तो जमा राशि उपभोक्ता को वापस कर दी जाती है। इसलिए, यह तंत्र उपभोक्ता पर भी जिम्मेदारी डालता है।

अप्रत्यक्ष बाजार आधारित उपकरण (इनडायरेक्ट मार्किट बेस्ड इंस्ट्रुमेंट)

उपकरण या तरीके, जिनके द्वारा प्रत्यक्ष क्षरण का पता नहीं लगाया जा सकता है, बल्कि यह अप्रत्यक्ष है और इसलिए, माल या उत्पाद को मापा जा सकता है। वे कुछ इस प्रकार हैं:

  1. उत्पाद शुल्क या विभेदक कर शुल्क (प्रोडक्ट चार्जेस और डिफरेंशियल टैक्स चार्जेस): जब भी, उत्पाद में, उस उत्पाद के उपभोग, पुनर्चक्रण या निपटान के संबंध में अतिरिक्त शुल्क जोड़े जाते हैं, जो सीधे पर्यावरण को प्रभावित करता है, तो वह उत्पाद या विभेदक शुल्क के नाम से जाना जाता है। यह उपभोक्ताओं को स्थायी विकल्पों (सस्टेनेबल ऑल्टरनेटिव) पर स्विच करने के लिए प्रेरित करता है।
  2. उपयोगकर्ता और प्रशासनिक शुल्क (यूजर एंड एडमिनिस्ट्रेटिव चार्ज): कुल उपभोग करने वाले लोग, यानी की पूरा समाज, कचरे के निर्वहन और प्रभावी तरीके के लिए एक चार्ज के रूप में, शुल्क का भुगतान करता है, जिससे पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव न पड़े। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि उत्पादों का उपभोग करने वाला प्रत्येक व्यक्ति उत्पादों के निपटान और पुनर्चक्रण का भार वहन करेगा।
  3. विकल्प और कमी इनपुट के लिए सब्सिडी (सब्सिडी फॉर सब्सटीट्यूट एंड अबेटमेंट इनपुट्स): सरकार उन संयंत्रों (प्लांट्स) की स्थापना (सेटिंग अप) के लिए प्रोत्साहन (इंसेंटिव) प्रदान करती है जो एक मानक उद्योग (स्टैंडर्ड इंडस्ट्री) की तुलना में कम प्रदूषकों का निर्वहन करते हैं। यह सतत विकास को बढ़ावा देगा और लोगों को प्रदूषणकारी तत्वों (पॉल्यूटिंग एलिमेंट्स) के विकल्प की खोज करने और अन्य विकल्पो को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित करेगा।
  4. प्रवर्तन प्रोत्साहन (एनफोर्समेंट इंसेंटिव): ये नकारात्मक प्रकार के प्रोत्साहन हैं, जहाँ सरकार द्वारा निर्धारित नियमों और मानकों (स्टैंडर्ड) का पालन नहीं किया जाता है, और इसका अधिक निर्वहन किया जाता है, तो ऐसे में सरकार उन लोगों पर जुर्माना या शुल्क लगा सकती है या कोई कानूनी कार्रवाई भी कर सकती है।
  5. सम्मतकारी (सुएसिव) इंस्ट्रूमेंट्स: यह मुख्य रूप से लोगों को शिक्षित करने और उन्हें पर्यावरण संरक्षण के लिए बाजार नीतियों को लागू करने का उद्देश्य दिखाने के बारे में है, और यह लोगों की खुद की इच्छा है जो उन्हें सरकार की मदद करने के लिए प्रेरित करेगी। यह प्रदूषण और प्रदूषकों को कम करने के लिए लोगों द्वारा हस्ताक्षरित (साइन), उनकी इच्छा से बनाया गया एक समझौता होगा। इसमें इसके लिए एक बड़े मंच पर जागरूकता भी शामिल होगी।

स्थिरता के उद्देश्य के लिए (फॉर द पर्पज ऑफ़ सस्टेनिबिलिटी)

सतत विकास के विचार को जब रियो घोषणा में संप्रेषित (कम्यूमिकेट) किए जाने के बाद, कई सरकारों ने विकास की स्थायी योजनाओं के लिए प्लांस अपनाए थे और इसलिए, इसके आधार पर बाजार आधारित उपकरणों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है:

मूल्य आधारित उपकरण (प्राइस बेस्ड इंस्ट्रुमेंट)

सरकार पर्यावरणीय लागतों और सामाजिक लागतों को ध्यान में रखेगी और उसके अनुसार वस्तुओं या सेवाओं की कीमत तय करेगी। यह दोनों तरह से होगा, पर्यावरण को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने वाली वस्तुओं या सेवाओं की कीमत अधिक होगी, जबकि यदि वस्तुएं पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचा रही हैं, तो लागत कम होगी या सरकार भी ऐसी वस्तुओं और सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए, सब्सिडी प्रदान कर सकती है।

अधिकार आधारित उपकरण (राइट्स बेस्ड इंस्ट्रुमेंट)

सरकार, पर्यावरण की गुणवत्ता के आधार पर प्रदूषण फैलाने वाले संपन्न लोगों के निर्वहन की सीमा निर्धारित करेगी। इन अधिकारों को सरकार की सहमति के साथ, शुल्क की राशि के साथ निर्वहन संस्थाओं (डिस्चर्जिंग एंटिटीज) के बीच कारोबार किया जा सकता है। यह उस कीमत के आधार पर अधिक समृद्ध (एफल्यूंट) को निर्वहन करने में सक्षम होगा जिस पर कम समृद्ध निर्वहन करने वाला व्यक्ति देने को तैयार है।

बाजार घर्षण न्यूनीकरण उपकरण (मार्केट फ्रिक्शन रिडक्शन इंस्ट्रूमेंट)

सरकार पर्यावरण के क्षरण के मुद्दों के बारे में लोगों को शिक्षित करने और जागरूक करने का प्रयास करती है और उसके आधार पर, जनता द्वारा बड़े पैमाने पर मांग की जाने वाली वस्तुओं को पर्यावरण के अनुकूल दृष्टिकोण के लिए चुना जाता है और इससे सतत विकास अवधारणा को बढ़ावा देने में मदद मिलती है।

बाजार आधारित उपकरणों का दायरा

बाजार आधारित उपकरण सरकार द्वारा तैयार की गई एक रणनीति है, जिसका उद्देश्य सतत विकास और पर्यावरण की रक्षा करना है। इसे इस उद्देश्य से लिया गया है कि वर्तमान युग में सतत विकास की योजनाओं को लागू करने में देरी होगी क्योंकि ऐसे प्लांट्स हैं जो पहले से ही काम कर रहे हैं और अर्थव्यवस्था उसी की आय पर चलती है।

ऐसे उद्योगों को अचानक बंद करने से अर्थव्यवस्था स्थिर हो जाएगी और इसलिए, जब तक इस तरह के नवाचारों (इनोवेशंस) की खोज साथ ही साथ नहीं की जाती है और अर्थव्यवस्था सुचारू (स्मूथ) रूप से चलती है, तब तक सरकार को  ऐसे कदम उठाने होंगे, जिससे एक अपरिवर्तनीय स्तर (इरेवोकेबल लेवल) पर पर्यावरण खराब न हो। इस प्रकार, ऐसी नीतियां जो हरित (ग्रीन) पर्यावरण को बढ़ावा देने में मदद करती है और वित्तीय (फाइनेंशियल) और गैर-वित्तीय (नॉन फाइनेंशियल) दोनों तरीकों से पर्यावरण को और गिरावट से बचाने के विचार को बाजार आधारित उपकरणों में शामिल किया जाएगा।

इस प्रकार, बाजार आधारित उपकरण, नियामक नियंत्रण (रेगुलेटरी कंट्रोल) और कमांड नीतियों के पूरक (कॉम्प्लीमेंट) हैं। इसके पीछे मुख्य विचार यह है कि जब जनता पर चीजें थोपी जाती हैं, तो उसका पालन जरूरी नहीं हो सकता है, और इसलिए पर्यावरण के क्षरण और आम जनता पर इसके प्रभाव के बारे में जागरूकता की आवश्यकता है।

साथ ही, इस तरह के प्रदूषण पैदा करने वाले उद्योगों को अपने डिस्चार्ज को सीमित करना चाहिए और इसलिए यह पर्यावरण को होने वाले क्षरण को कम करने में मदद करेगा। जब भी ऐसी नीति बनाने के लिए सरकार को कोई निर्णय लेना हो तो देश की प्रकृति के अनुसार चुनाव किया जाना चाहिए और विभिन्न कारकों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

बाजार आधारित उपकरणों को अलग-अलग तरीकों से अपनाने की रणनीतियां हैं और इस संबंध में उन सभी पर विचार किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए; यदि किसी वस्तु या सेवा की अच्छी मांग और बाजार है, तो सरकार उत्पाद में डिस्चार्ज मूल्य जोड़ सकती है और इसलिए, यह प्रभावी होगा।

दूसरी ओर, जो उद्योग बहुत छोटे पैमाने पर काम कर रहे हैं, और उस स्तर पर प्रदूषकों का निर्वहन नहीं कर रहे हैं, उनमें हस्तक्षेप (इंटरफेयर) नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए, बाजार आधारित उपकरणों का दायरा विभिन्न बातों को ध्यान में रखते हुए और उस अर्थव्यवस्था पर निर्भर करता है जिसमें इसे अपनाया जाना है। इस प्रकार, दायरे में न केवल उद्योग शामिल हैं, बल्कि उत्पाद का उपभोग करने वाले उपभोक्ताओं के साथ-साथ बड़े पैमाने पर लोगों और आगे के विकास की रणनीति तैयार करने वाली सरकार तक भी शामिल है।

कमांड और नियंत्रण उपायों पर बाजार आधारित उपकरणों के लाभ 

बाजार आधारित उपकरण कमांड और नियंत्रण उपायों के पूरक हैं। कमांड और नियंत्रण उपाय का मतलब है कि एक नियम है जो उद्योग को नियंत्रित करता है, और उस पर वैधता (लिगेलिटी) और अवैधता (ईलिगेलिटी) की शर्तें तय की जाती हैं। बाजार आधारित उपकरण वे नीतियां हैं, जो सरकार द्वारा उद्योग, उपभोक्ताओं या बड़े पैमाने पर जनता द्वारा विशिष्ट प्रदर्शन (स्पेसिफिक परफॉर्मेंस) की जांच के बाद लगाई जाती हैं। यह प्राप्त किया गया है कि बाजार आधारित उपकरण कमांड और नियंत्रण तंत्र की तुलना में सस्ते और लागू करने में आसान हैं।

इस प्रकार, बाजार आधारित उपकरणों द्वारा प्राप्त किए जाने वाले लक्ष्य लागत-कुशल (कॉस्ट एफिशिएंट) होने के साथ-साथ पर्यावरण कुशल भी हैं। साथ ही, यह मूल्य कारक को ध्यान में रखता है, जो सीधे उत्पाद की बिक्री को प्रभावित करता है। वे उत्सर्जन परमिट जैसे, लचीलेपन (फ्लेक्सिबिलिटी) प्रदान करते हैं जो व्यापार योग्य हैं, इस प्रकार यदि कोई उद्योग निर्धारित स्तर से कम उत्सर्जन कर रहा है, तो वह दूसरे उद्योग को बेच सकता है।

यह उद्योगों को भी लचीलापन प्रदान करता है और प्रदान किए गए लचीलेपन के कारण इसे बेहतर तरीके से लागू किया जा सकता है। जैसा कि कमांड और नियंत्रण आधारित तंत्र के विपरीत है, बाजार आधारित उपकरण न केवल पर्यावरण के क्षरण या पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने में मदद करते हैं, बल्कि तकनीकी नवाचारों में भी मदद करते हैं, जो पर्यावरण की गुणवत्ता ने बेहतरी में बहुत मददगार होगा। 

एक अनुभवजन्य अध्ययन (एंपायरिकल स्टडी) किया गया है जो दर्शाता है कि विभिन्न देशों में, जहां कहीं भी आर्थिक उपकरणों का उपयोग किया जाता है, वे उन्हें लागू करने के मामले में और पर्यावरण पर प्रभाव के मामले में भी कमांड और नियंत्रण तंत्र से अधिक कुशल होते हैं। यहां तक ​​​​कि जब कमांड और नियंत्रण तंत्र बनते हैं, तो वे उपलब्ध तकनीक के लिए सहमति में उपलब्ध डेटा के आधार पर बनते हैं। इसके साथ ही, डेटा समय के साथ पुराना हो जाता है, लेकिन वही मानदंड (नॉर्म्स) और तंत्र प्रबल (प्रीवेल) होते हैं और इसलिए, यह पर्यावरणीय गिरावट के नियंत्रण में स्थिति को नियंत्रित करने में मदद नहीं करता है।

बाजार आधारित उपकरणों को लागू करने के कई सकारात्मक पहलू हैं, लेकिन हम बाजार आधारित उपकरणों के बुराइयों या सीमाओं (लिमिटेशन) को भी नहीं छोड़ सकते। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, बाजार आधारित उपकरण देश के पूरी तरह से विकसित होने और ऐसे तकनीकी नवाचारों के साथ तैयार होने तक लागू किए जाने वाले उपकरण हैं, जो देश को सतत विकास प्राप्त करने में मदद करेंगे और पर्यावरण की गुणवत्ता में कोई गिरावट नहीं होगी।

बाजार आधारित उपकरण प्रभावी हो सकते हैं, जहां पर्यावरण की स्थिति के संबंध में कोई खतरनाक स्थिति न हो। यदि पर्यावरण के पहलू को लेकर कोई आपात स्थिति (अलार्मिंग सिचुएशन) है, तो बाजार आधारित उपकरण इतनी गति से पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद नहीं कर सकते, यह सिर्फ पर्यावरण की गुणवत्ता को बनाए रखने या इसे और गिरावट से बचाने में मदद कर सकता है। यहां तक ​​कि, उत्सर्जन व्यापार और व्यापार योग्य परमिट जैसी नीतियों की निगरानी करने का खर्च बहुत अधिक है, और इस प्रकार प्रत्येक स्थान पर इसकी आपूर्ति (सप्लाई) नहीं की जा सकती है और इसलिए, कुछ क्षेत्रों और उद्योगों को छोड़ दिया जाता है और यह पर्यावरण की समग्र गुणवत्ता को कम करता है।

ऐसी नीतियां जो ऐसे सामानों के निर्वहन के लिए उपभोक्ताओं से शुल्क लेती हैं, लागत में वृद्धि करेंगी और इसलिए विकल्पों की लागत कम हो जाती है, और वैकल्पिक वस्तुओं की खपत बढ़ जाती है और इसलिए यह पर्यावरण की गुणवत्ता को प्रभावित करेगा। उद्योगों द्वारा प्रदूषक संपन्न पदार्थों (पॉल्यूटेंट एफल्यूंट्स) के निर्वहन को विनियमित करने वाली नीतियां, उद्योगों को अवैध रूप से कचरे का निर्वहन करने के लिए मजबूर कर सकती हैं और यह मानव जीवन और पर्यावरण के लिए भी अधिक हानिकारक हो सकती हैं।

इस प्रकार, बाजार आधारित उपकरणों को लागू करने के लिए मुख्य भूमिका उन उपकरणों की पसंद पर निर्भर करती है जिन्हें सरकार ने विभिन्न कारकों और सीमाओं के आधार पर लागू करने का निर्णय लिया है। प्रत्येक बाजार आधारित उपकरण की अपनी सीमाएँ भी होंगी लेकिन समस्याओं के लिए सबसे उपयुक्त उपकरणों को लागू किया जाना चाहिए। इस प्रकार, अगले अध्याय (चैप्टर्स) ग्रीन प्रोक्योरमेंट योजना और टैक्सोनॉमी, और इसको लागू करने और विश्लेषण के बारे में भारतीय परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए हैं।

ग्रीन प्रोक्योरमेंट योजना का विश्लेषण

ग्रीन प्रोक्योरमेंट योजना का अर्थ

ग्रीन पब्लिक प्रोक्योरमेंट या ग्रीन प्रोक्योरमेंट योजना, अधिकारियों का एक तरीका है, जो उन वस्तुओं को सुरक्षित करता है जो उत्पादित प्राथमिक (प्राइमरी) सामान्य उत्पादों की तुलना में पूरे जीवन चक्र (लाइफ साइकल) में पर्यावरण को कम प्रभावित करते हैं। इस प्रकार, सरकार ने यह योजना उन वस्तुओं के उत्पादन के लिए तैयार की है जो पर्यावरण के लिए कम हानिकारक हैं। यदि पारिस्थितिक (इकोलॉजिकल) तरीके से वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है, तो उत्पादन अपशिष्ट (प्रोडक्शन वेस्ट) को भी नियंत्रित किया जा सकता है। उत्पादन के साथ-साथ निर्वहन लागत के साथ-साथ गिरावट को भी कम किया जा सकता है।

इस प्रकार, यह रूढ़िवाद दृष्टिकोण (कंजर्वेटिज्म एप्रोच) लागू किया गया है, जो लंबे समय तक परिणाम देगा। यहां तक ​​कि पर्यावरण को लेकर उपभोक्ता की चिंता भी बढ़ती जा रही है और उसके कारण यह पाया गया है कि इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया (पॉजिटिव रिस्पॉन्स) मिली है। ग्रीन पब्लिक प्रोक्योरमेंट, नीतियों की एक श्रृंखला (सिरीज़) है जो पर्यावरण संबंधी विचारों को सुनिश्चित करती है और इसे राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर लागू भी करती है। इससे माल की खरीद प्रक्रिया (प्रोसेस) में मदद मिलती है और इसलिए पर्यावरण की गुणवत्ता में गिरावट कम होगी।

ऐसी ग्रीन प्रोक्योरमेंट योजना को लागू करने का मुख्य लाभ यह है कि सबसे पहले यह लागत प्रभावी है और इसको लागू करने की प्रक्रिया आसान है। इसके अलावा, यह भी कि, यह कचरे के निर्वहन के पैसे बचाता है, क्योंकि यह दोबारा इस्तेमाल करने योग्य या पुन: प्रयोज्य (रिसाइक्लेबल) उत्पाद है। यह उत्पादित खतरनाक कचरे की मात्रा को कम करता है और खतरनाक गैसों के उत्सर्जन को भी कम करता है और यहां तक ​​कि पर्यावरण उद्योग में प्रतिस्पर्धा (कंपेटिटिवनेस) को बढ़ाता है, जिससे ऐसी वस्तुओं या उत्पादों और सेवाओं की बेहतर नवाचार और तकनीकी पहुंच होती है। इसके अलावा, यह प्राकृतिक संसाधनों (रिसोर्सेज) का संरक्षण करता है, जो सतत विकास की अवधारणा का अंतिम लक्ष्य है।

इसके विपरीत, ऐसी सीमाएँ भी हैं जिनका ग्रीन प्रोक्योरमेंट योजना को लागू करने में सामना करना पड़ सकता है। सबसे पहले, जब ग्रीन प्रोक्योरमेंट योजनाओं को लागू किया जाता है, क्योंकि वे बहुत नई और नवीन हैं, तो माल की कीमत अधिक हो सकती है क्योंकि यह बाजार में प्रयोग और खोज कर रही है। साथ ही, फर्मों को तदनुसार काम करने के लिए तैयार रहना चाहिए, यदि उत्पादक फर्म हरित वस्तुओं के इस विचार के बारे में आश्वस्त (रेडी) नहीं हैं, तो पूरी नीति विफल हो जाएगी।

साथ ही, इस पहलू के बारे में विशिष्ट ज्ञान आसानी से उपलब्ध नहीं है, इसलिए तकनीकी नवाचारों और हरित वस्तुओं का विचार भी काम नहीं करता है। यहां तक ​​​​कि अगर अन्य कारक काम करते हैं, तो माल की उपलब्धता एक मुद्दा होगा, जहां सामान प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपलब्ध नहीं होगा, और इसलिए, कचरे को कम करने का विचार विफल हो जाता है। आखिरी और सबसे बड़ी कमी लोगों का मनोविज्ञान (साइकोलॉजी) है। लोग बदलना नहीं चाहते हैं और यह आदत पर्यावरणीय गिरावट को कम करने के लिए इसे सफल नहीं होने देगी।

भारत में ग्रीन प्रोक्योरमेंट योजना के लिए दिशानिर्देश (गाइडलाइंस)

भारत में ग्रीन प्रोक्योरमेंट योजना को जापान की नीति से अपनाया गया था। चर्चा में मुख्य मुद्दा यह था कि शुरू में कौन-सा सामान बनाया जाए, जो इस योजना के लागू करने में सहायक हो। इसका सरल उत्तर यह था कि उपभोक्ता वस्तुओं का नियमित रूप से उपभोग किया जाता है और जिनकी बिक्री दर अच्छी होती है, उन्हें समाज में अपना प्रभाव डालने के लिए हरित वस्तुओं में परिवर्तित (कन्वर्ट) किया जाना चाहिए। इसलिए, एम.ओ.ई.एफ. ने फैसला किया कि ‘दैनिक उपयोग’ उत्पादों को पहले हरित उत्पादों में परिवर्तित किया जाएगा।

लेकिन इसके बाद उसी के लिए उत्पादों के चयन के संबंध में जारी दिशा-निर्देश उत्पाद श्रेणियां हैं, जिनके मानक पहले ही विकसित हो चुके हैं, ताकि लोगों को उस उत्पाद के मानक पर भरोसा हो और उपभोक्ताओं को उस उत्पाद का इस्तेमाल करने में ज्यादा झिझक न हो जो एक नया हरित उत्पाद है। दूसरा सुझाव यह था कि जिन निर्माताओं के पास पहले से ही पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों का उत्पादन है और वे ऐसे उत्पादों के उत्पादन के आदी हैं, उन्हें लागत में कटौती और उत्पादों की बेहतर गुणवत्ता के कारण शामिल किया जाना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह निर्धारित की गई थी कि ऐसे सामानों का उत्पादन किया जाना चाहिए, जिनका मूल्य और मात्रा के मामले में उच्च मूल्य हो, ताकि अधिकांश माल को समाप्त किया जा सके जो पर्यावरण की गुणवत्ता को कम करने वाले प्रदूषक पैदा करते हैं। 

इस प्रकार, कई उत्पादों में परिवर्तन किए गए जिन्होंने पर्यावरण की गुणवत्ता में गिरावट को नियंत्रित करने में योगदान दिया है। इस प्रकार, एम.ओ.ई.एफ. ने प्रावधान किया कि चूंकि हरित खरीद की अवधारणा देश के लिए बिल्कुल नई है और इसलिए इसको लागू करने का कार्य इस बात को ध्यान में रखते हुए सामंजस्यपूर्ण (हार्मोनीयस) ढंग से किया जाना चाहिए कि विभिन्न संगठनों (आर्गेनाइजेशन) के विविध (वेरिड) कामकाज की आवश्यकता है, इसलिए, साधन सभी लोगों को जागरुकता के द्वारा ऑनलाइन परामर्श (कंसल्टेशन), बैठकों और प्रचार द्वारा अपनाया जाएगा।

इन साधनों को लागू करने के लिए बाहरी स्रोत कंपनियां, संघ (एसोसिएशन), फर्म और संबंधित मंत्रालय (मिनिस्ट्रीज) होंगे, जो इस तरह के दिशानिर्देश लागू करेंगे और तय करेंगे कि दिए गए फॉर्म में दिशानिर्देशों का पालन कौन करेगा और सभी को छूट दी जाएगी। सहायता के लिए आंतरिक स्रोत कोर ग्रुप, आई.जी.बी.सी., जी.बी.सी. आदि होंगे जो वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए लागू करने के अगले चरण (स्टेप) का निर्णय लेंगे। इसके अलावा, इसे उत्पाद आधारित दृष्टिकोण अपनाने के लिए भी निर्देशित किया गया था, जहां पहली चिंता पर्यावरण से संबंधित प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना था; जो मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) और सतत संसाधन उपयोग और आवंटन से संबंधित होगा।

दूसरा चरण, मौजूदा नीतिगत साधनों (पॉलिसी इंस्ट्रूमेंट्स) पर निर्माण होगा, जो यह पता लगाएगा कि इस कारण से क्या मौजूद है, और इसलिए, अंतर कहां है जो उद्देश्य की उपलब्धि में बाधा डालता है और अंत में, प्रस्तावित (प्रपोजिंग) नीति, कहां किस तरह की प्रणाली पर्यावरण की गुणवत्ता को पूरा करने और नई नीतियों को कैसे अपनाया जाए और अंतर का आकलन (एसेस) कैसे किया जाए, इसे पूरा करने के लिए अपनाया जाना चाहिए। इस प्रकार, ये दिशानिर्देश ग्रीन प्रोक्योरमेंट योजना के पहले लागू करने के लिए बनाए गए आधे दिशानिर्देश हैं। यह दिशा-निर्देश, यह बदलेंगे की कैसे समाज का परिदृश्य बदलता है और इससे पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद मिलती है।

ग्रीन प्रोक्योरमेंट की नीति का आकलन (एसेसिंग)

हरित खरीद नीति संसाधनों, उपयोगिताओं, ऊर्जा की खपत को कम करने में मदद करती है और नॉन बायोडिग्रेडेबल कचरे के उत्पादन से बचाती है और नवाचार और पारदर्शिता (ट्रांसपेरेंसी) लागत को बढ़ाती है। इस खरीदारी का असर बाजार पर पड़ रहा है। ऐसे उत्पादों को बढ़ावा देने से अधिकारियों को हरित उत्पादों, तकनीको और सामग्रियों का उत्पादन करने वाले उद्योगों को वास्तविक प्रोत्साहन देने में मदद मिलेगी।

साथ ही, यह इको-इनोवेशन को प्रोत्साहित करता है और ‘मेक इन इंडिया’ के लिए बहुत मददगार होगा। ग्रीन प्रोक्योरमेंट की अवधारणा प्रदूषण निवारण के विचार पर आधारित है, और इस प्रकार यह उत्पादित हानिकारक और खतरनाक और जहरीले कचरे को खत्म करने का एक प्रयास है। उपभोक्ताओं, कॉरपोरेट्स, उद्योगों, सरकारों, सभी ने स्वीकार किया है कि पर्यावरण की गुणवत्ता को बनाए रखने और इसे बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है।

इस प्रकार, ग्रीन प्रोक्योरमेंट, लक्ष्य को आसानी से लागू करने और उसकी उपलब्धि में मदद करता है। हरे उत्पादों का उत्पादन आम तौर पर इस तरह से किया जाता है कि कम प्राकृतिक संसाधनों की खपत हो या स्थायी वानिकी (फॉरेस्ट्री) के साथ उनका अधिक स्थायी उपयोग होता है। वे अपने निर्माण में कम ऊर्जा शामिल कर सकते हैं और उपयोग किए जाने पर कम ऊर्जा की खपत कर सकते हैं, और उनमें आम तौर पर कम खतरनाक या जहरीले पदार्थ होते हैं।

ग्रीन प्रोक्योरमेंट की सार्वजनिक नीति तभी लागू की जा सकती है जब जोखिमों की पहचान की जाए, तब जोखिमों के आधार पर तकनीकी नवाचारों की आवश्यकता होती है। फिर, मापदंड (क्राइटेरिया) के आधार पर चयन करना होता है जिसके लिए मानदंड के अनुसार विभिन्न उपकरणों को लागू करने की आवश्यकता होती है। यह देखा गया है कि नीति को लागू करने की प्रक्रिया को भारत में किया गया है, यहां तक ​​कि हरे उत्पादों को लेकर बाजार से अच्छी प्रतिक्रिया मिली है, लेकिन मुख्य चिंता उत्पाद की लागत-प्रभावशीलता को लेकर आती है।

हरित उत्पादों के बारे में अधिक जागरूकता नहीं रही है और उत्पादों की आपूर्ति उन जगहों पर भी अपर्याप्त है जहां लोग इसे खरीद सकते हैं। इस प्रकार, चूंकि ये सिर्फ नीतियां हैं, बिना किसी कानूनी समर्थन के, इसके साथ कोई विशेष सजा नहीं जुड़ी है। केवल देय जुर्माना है, जहां उद्योग दिशानिर्देशों का पालन नहीं करते हैं और इसलिए, इसे वहां कमी का सामना करना पड़ता है। प्रमुख वस्तुओं पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, कागज रहित लेनदेन हो रहे हैं, यहां तक ​​कि कागज भी रिसाइकिल करने योग्य हैं, शौचालय बायोडिग्रेडेबल होने लगे हैं, यहां तक ​​कि हाइड्रो प्लांट भी आ गए हैं। रेलवे ने रिसाइकिल करने योग्य बोतलें शुरू कर दी हैं और ईंधन (फ्यूल) के उपयोग के मामले में अधिक कुशल और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों का उपयोग करना शुरू कर दिया है।

हर उद्योग ने ऐसी चीजों को लागू करना शुरू कर दिया है; सब कुछ या तो रिसाइकिल करने योग्य या बायोडिग्रेडेबल है: दुनिया पेपरलेस हो गई है, यहां तक ​​​​कि उपलब्ध कागज भी रिसाइकिल करने योग्य हैं, कंप्यूटर और लैपटॉप और मोबाइल फोन इस तरह से बनाए जाते हैं कि उन्हें रिसाइकिल किया जा सके और उन्हें किसी और चीज में बदला जा सके और इसलिए, यह होगा इस पहलू के बारे में ध्यान रखने में मदद करें और इसलिए, कचरे को कम किया जा सकता है। यहां तक ​​​​कि फार्मास्युटिकल कचरा भी ऐसा है कि यह बायोडिग्रेडेबल हो सकता है और इसलिए, कचरे को कम किया जा सकता है और यह पर्यावरण की गुणवत्ता को उन्नत करने में स्वचालित रूप से हमारी मदद करेगा।

हरित खरीद नीति को फलदायी तरीके से लागू करने के लिए, संगठनात्मक समर्थन (आर्गेनाइजेशनल सपोर्ट) का होना बहुत आवश्यक है। न केवल उन उद्योगों और फर्मों को जिन्हें इसका पालन करना है, बल्कि वे अधिकारी भी हैं जो ऐसी नीतियों को लागू करने के लिए जिम्मेदार हैं। प्रत्येक व्यक्ति और उद्योगों का स्व-मूल्यांकन (सेल्फ इवेल्यूएशन) होना चाहिए कि वे निर्धारित दिशा-निर्देशों और नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं।

लक्ष्यों को निर्धारित किया जाना चाहिए और समय पर पर्यवेक्षण (सुपरवाइज़) और संशोधित (रिवाइज) किया जाना चाहिए। साथ ही ऐसे लक्ष्यों को हासिल करने की रणनीति बनानी चाहिए और रणनीति का पालन सभी को करना चाहिए। एक छोटे स्केल पर लागू करने के लिए के लिए रणनीति को आगे रोक दिया जाना चाहिए और परियोजना को सख्त अर्थों में डिजाइन और कार्यान्वित किया जाना चाहिए। लागू हो जाने के बाद, यह मूल्यांकन किया जाना चाहिए कि पर्यावरण में कोई जीविका है या नहीं और क्रमशः संशोधित किया जाना चाहिए।

भारत में पर्यावरण कराधान (एनवायरनमेंट टैक्सेशन)

पर्यावरण कराधान में इतिहास और वैश्विक विकास (ग्लोबल डेवलपमेंट)

सबसे बुनियादी (बेसिक) और सबसे प्रसिद्ध बाजार आधारित साधन पर्यावरण कर (टैक्स) है। आसान शब्दों में, कर वे हैं जो सरकार द्वारा लगाए जाते हैं, जिनका भुगतान इस तथ्य के बावजूद किया जाता है कि उन वस्तुओं का उपयोग किया जाता है या सेवाओं का लाभ उठाया जाता है। एक पर्यावरणीय कर का आधार किसी ऐसी चीज़ की भौतिक इकाई (फिजिकल यूनिट) (या इसका एक प्रॉक्सी) है जिसका पर्यावरण पर एक विशिष्ट  नकारात्मक प्रभाव पड़ता है – प्रदूषक या माल पर, जिसके उपयोग से ऐसे प्रदूषक पैदा होते हैं।

पर्यावरण कराधान वस्तुओं और गतिविधियों पर एक शुल्क लगाने का विचार है, जो पर्यावरण के प्रदूषण या गिरावट के लिए जिम्मेदार हैं और लक्ष्य ऐसे बाहरीताओं को आंतरिक (इंटरनल) बनाना है। पर्यावरण कराधान के विचार को सबसे पहले रियो घोषणा में व्यवहार्य बनाया गया था, जहां यह कहा गया था कि पर्यावरण से संबंधित मुद्दों को आंतरिक बनाने के लिए, वस्तुओं और सेवाओं के साथ-साथ लागतों को भी आंतरिक किया जाना चाहिए। इसे संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनाइटेड नेशंस एनवायरनमेंट प्रोग्राम) (यू.एन.ई.पी.) की ग्रीन इकोनॉमी रिपोर्ट, ओ.ई.सी.डी. और यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी सहित पर्यावरण से संबंधित विभिन्न अन्य सम्मेलनों (कन्वेंशन) और संधियों (ट्रीटी) में शामिल किया गया था। इस प्रकार, यह विभिन्न देशों में पेश किया गया था और अब बाजार आधारित उपकरण का सबसे अधिक ज्ञात उपकरण है।

पर्यावरण कराधान की नीतियां और लाभ प्राप्त करने के लिए विचार

उचित कर मामले को डिजाइन करने के लिए कई कारकों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। उपयोग किए गए सामानों के प्रकार, पर्यावरण की वर्तमान गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए कर की डिजाइन और प्रकृति बनाई जानी चाहिए। मुख्य कारक जिस पर विचार किया जाना चाहिए वह उद्योग है जो इस प्रकार के प्रदूषण का कारण बनता है और उसके आधार पर कदम उठाए जाने चाहिए। साथ ही, संभावित (पोटेंशियल) उद्योगों, जो ऐसी गैसों का उत्सर्जन कर सकते हैं, पर कर लगाया जाएगा और इसलिए, यह उद्योगों को अधिक सोफिस्तिकेट तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

कर की दर को इष्टतम (ऑप्टिमल) रखा जाना चाहिए क्योंकि इससे रणनीति को लागू करने और उद्देश्यों की प्राप्ति में मदद मिलेगी। इष्टतम दरें प्रदूषकों को कम करने में मदद करेंगी और पर्यावरण की गुणवत्ता को बढ़ाने में भी मदद करेंगी। इसके अलावा, यदि कर की दर को इष्टतम दर से कम या इष्टतम दर से अधिक रखा जाता है, तो यह उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद नहीं करता है। कर के प्रकार की पसंद का प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण विचारों में से एक है, और इसलिए, इसे प्रथम दृष्टया ध्यान में रखा जाना चाहिए। ऐसे कर के चुनाव पर प्रभाव विश्लेषण के बाद ही विचार किया जाना चाहिए।

समानता के पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए। अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण पहलू ऐसे पर्यावरण करों का प्रशासन और उन्हें लागू करना है। प्रशासनिक निकायों और अधिकारियों को विशेष रूप से चुना जाना चाहिए। सभी विभिन्न कानूनी, आर्थिक, वित्तीय और अन्य पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए और इसलिए, यह अनिवार्य है कि ऐसे करों को तैयार करते समय इन सभी विचारों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

तथ्य यह है कि अन्य वैकल्पिक साधनों की तुलना में इको टैक्सेशन का उपयोग किया जाना चाहिए, लाभ यह है कि सबसे पहले कराधान एक प्रोत्साहन है, यदि प्रदूषणकारी मशीनरी का उपयोग बंद नहीं किया जाता है, तो सरकार कर लगाएगी और इसलिए, उद्योग को कम राजस्व (रिवेन्यू) मिलेगा। इसलिए, यह उत्पादन की एक नई पारिस्थितिक प्रणाली को अपनाएगा।

दूसरे, पर्यावरण पर कर लगाने से ऐसे उत्पादों के विभिन्न हानिकारक प्रभावों के बारे में लोगों को जागरूक करने में मदद मिलेगी और इसलिए, यह उन उद्योगों के लिए एक सबक होगा, जिन पर कर भी नहीं लगाया जाता है, वे पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों पर टिके रहते हैं। इस प्रकार, जब जुर्माना लगाया जाता है तो उद्योग इतनी बड़ी राशि का भुगतान करने से बचते हैं और इसलिए, यह उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक होगा। दूसरी ओर, शिकायत निवारण (ग्रीवेंस रिड्रेसल) में कमांड और नियंत्रण तंत्र को लंबा समय लगता है।

भारत में पारिस्थितिकी कराधान और संघर्ष (इको टैक्सेशन इन इंडिया एंड कॉन्फ्लिक्ट)

हरित कराधान एक अवधारणा है जो 1990 के दशक में भारत में संधियों और सम्मेलनों के कारण पाई गई थी और यह देश द्वारा जल्द से जल्द अपनाई गई सबसे बुनियादी प्रकार की तकनीक है। 1992 में कर समिति के पहले प्रस्ताव में ऐसे कराधान के संबंध में प्रस्ताव दिया गया था।

2006 की राष्ट्रीय पर्यावरण नीति (नेशनल एनवायरमेंट पॉलिसी), भारत में पर्यावरण कर के महत्व और पर्यावरण विनियमन (रेगुलेशन) के संबंध में इस पहलू पर भी जोर देती है। इससे पहले भी, जल अधिनियम (वॉटर एक्ट), 1974 में, जल निकायों (वॉटर बॉडीज) को प्रदूषित करने वाले उद्योगों से उपकर (सेस) एकत्र किया गया था, और इस तरह सरकार को इसे विनियमित करने की शक्ति दी गई और सरकार ऐसे उद्योगों से जुर्माना वसूल सकती है।

वायु (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम (एयर (प्रीवेंशन एंड कंट्रोल पॉल्यूशन) एक्ट), 1981 के तहत इसी तरह के प्रावधान हैं। इसके अलावा सरकार ने ऊर्जा के स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और उद्योगों पर ही रीसाइक्लिंग लागत को शामिल करने पर भी जोर दिया है। लेकिन, अभी भी इस तरह के करों को लागू करने में संघर्ष हैं और इसके सामने आने वाली चुनौतियां हैं, एक पूर्ण कर व्यवस्था की आवश्यकता है, जहां योजना शीर्ष तक नहीं की जाती है। इस तरह के करों में कई कमियां हैं और इसलिए, उद्योगपति करों से बच जाते हैं और इसलिए, उद्देश्य प्राप्त नहीं होते हैं।

सरकार को उद्योगपतियों के तरीकों और साधनों की भविष्यवाणी करने में सक्षम होना चाहिए कि वे नीतियों का उल्लंघन करेंगे और इस प्रकार, खामियों को कवर किया जाना चाहिए और ऐसे कचरे का अवैध निपटान भी नहीं होना चाहिए। नीतियों को सभी राज्यों और पूरे राष्ट्र में लागू किया जाना चाहिए, और इसलिए नीतियों के निर्माण और उनको लागू करने में एकरूपता (यूनिफोर्मिटी) होनी चाहिए। इस तरह के कर कभी-कभी कुछ क्षेत्रों के प्रचार और विकास के लिए दी जाने वाली सब्सिडी के साथ भी संघर्ष करते हैं। यह एक बहुत ही गंभीर मामला है और इसलिए इसे अत्यंत सावधानी से निपटा जाना चाहिए।

ऐसे करों से उत्पन्न राजस्व का उपयोग केवल तकनीकों की बेहतरी और उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किया जाना चाहिए। संस्था सहयोग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इसलिए मंत्रालयों, अधिकारियों और ऐसे संस्थानों को एकजुट होना चाहिए और तब उद्देश्य प्राप्त किया जा सकता है। यह महत्वपूर्ण रहा है कि कराधान एक बहुत ही उपयोगी साधन है और इसलिए, सर्वोत्तम परिणाम और उद्देश्यों की उपलब्धि प्राप्त करने के लिए इसे सावधानी के साथ लागू किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष और सिफ़ारिश (कंक्लूज़न एंड सजेशन)

सतत विकास की अवधारणा को हर देश ने अपनाया है और सभी ने पर्यावरण की गुणवत्ता में गिरावट की कठिनाइयों को स्वीकार किया है। एक पूर्ण विकसित सतत विकास अवधारणा का निष्पादन (एग्जिक्यूशन) केवल तभी संभव है जब भागों को जगह में रखा जाता है और निष्पादित और प्रयोग किया जाता है।

बाजार आधारित उपकरण उसी के लिए एक आदर्श उपकरण हैं। यह आवश्यक है कि समय-समय पर बनाई गई और संशोधित की गई नीतियां जरूरत पड़ने पर बहुत मददगार होंगी और हमें वास्तविक स्थिति के साथ तालमेल बिठाने में सक्षम बनाएगी। इस प्रकार, बाजार आधारित उपकरण पर्यावरण की गुणवत्ता बनाए रखने में काफी हद तक मदद करते हैं। लेकिन, यह स्थापित तथ्य है कि केवल बाजार आधारित उपकरण ही स्थितियों को सुधारने में मदद नहीं कर सकते हैं, इसके लिए कुछ जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए। बाजार आधारित उपकरण इसके लिए केवल पूरक (सप्लीमेंट) प्रदान कर सकते हैं। यह संदेहास्पद (डाउटफुल) है कि यहां जिन तंत्रों की चर्चा की गई है, वे पर्यावरण पर सभी प्रकार के दबाव को रोकेंगे।

फिर भी, जहां सार्वजनिक क्षेत्र (पब्लिक सेक्टर) के संसाधन वाणिज्यिक संसाधनों (कमर्शियल रिसोर्सेज) से कम हैं, बाजार-आधारित दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है, और हमें आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय मूल्यों को मिश्रित (मिक्स) करने वाले बाजार-आधारित उपकरणों को विकसित करने के लिए सावधानी से काम करना चाहिए। नए विचारों का पालन करने और उन्हें लागू करने में हमेशा जोखिम और बाधाएं होंगी, लेकिन कम से कम सीमाओं के साथ हमेशा सबसे अच्छा विचार चुनना होगा।

प्रणाली को लागू करने की प्रक्रिया अच्छी तरह से विनियमित और क्रमबद्ध (सोर्टेड) होनी चाहिए और इसे लागू करने वाले व्यक्ति के मन में स्पष्टता होनी चाहिए। हमेशा यह स्पष्ट नहीं होता है कि वास्तव में किस प्रकार का बाजार आधारित उपकरण लगाया और तैयार किया जाना चाहिए, और उस उद्देश्य के लिए एक साक्ष्य-आधारित (एविडेंस बेस्ड) अध्ययन होना चाहिए, जहां पहले एक छोटी इकाई पर प्रयोग होता है और फिर इसे एक बड़ी इकाई में कार्य में लाया जाना चाहिए।

उद्देश्य व्यापक और बहुविध (मल्टीपल) होने चाहिए और उन्हें पर्यावरण के संबंध में जितनी जल्दी और कुशलता से प्रयास करना चाहिए और हल करना चाहिए। अनिश्चितताओं, देनदारियों (लायबिलिटी) और सीमाओं का फिर से अनुमान लगाया जाना चाहिए और तदनुसार कदम उठाए जाने चाहिए। कार्यान्वित (इंप्लीमेंटेड) बाजार आधारित उपकरणों के प्रभाव का मूल्यांकन नियमित रूप से किया जाना चाहिए और तदनुसार उन्हें संशोधित किया जाना चाहिए।

साथ ही, तकनीकी पक्ष में और अधिक नवाचारों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और पर्यावरण के क्षरण को रोकने के उद्देश्यों की प्रभावी उपलब्धि के लिए अन्य उपकरणों का भी उपयोग किया जाना चाहिए।

बिब्लियोग्राफी और संदर्भ (रेफरेंसेस)

संदर्भित लेख (आर्टिकल्स रेफर्ड)

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रिपोर्ट्स

अंतर्राष्ट्रीय संधियां (इंटरनेशनल ट्रीटी)

  • पर्यावरण और विकास पर रियो घोषणा, 1992।

भारतीय नीतियां और कानून (इंडियन पॉलिसीज एंड लेजिस्लेशन)

वेबसाइट

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