यह लेख एमिटी यूनिवर्सिटी, नोएडा से एलएलबी कर रही Sanchi Garg द्वारा लिखा गया है और इस लेख को Khushi Sharma (ट्रेनी एसोसिएट, ब्लॉग आईप्लेडर्स) द्वारा संपादित (एडिट) किया गया है। इस लेख में औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम (इंडस्ट्रियल एम्प्लॉयमेंट (स्टैंडिंग ऑर्डर) एक्ट), 1946 के तहत स्थायी आदेशों की प्रकृति पर चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।
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परिचय
औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 (जिसे ‘आईईएसओ’ कहा गया है) नियोक्ता और कामगार दोनों के लिए नियोक्ता के तहत रोजगार की शर्तों को सटीक रूप से परिभाषित करता है। आईईएसओ अधिनियम पारित होने से पहले, एक नियोक्ता द्वारा रोजगार की शर्तों के संबंध में आदेश और स्पष्टता की कमी थी। उस समय के कामगारों को व्यक्तिगत रूप से अनुबंध के आधार पर काम पर रखा जाता था, और ज्यादातर मामलों में ये अनुबंध या तो व्यक्त या निहित होते थे, इस प्रकार अक्सर नियोक्ता और कामगारों के बीच अपेक्षाओं की गलतफहमी पैदा हो जाती थी।
कई मामलों में, काम पर रखने के ये नियम और शर्तें अस्पष्ट थीं और इससे कामगारों और प्रबंधन के बीच विवाद हो जाता था। नौकरी की स्थायीता सुनिश्चित करने के लिए नियमों की कमी, निष्पक्ष सौदा और छोटी-छोटी बातों पर अनुशासनात्मक (डिसिप्लिनरी) कार्रवाई औद्योगिक कामगारों के लिए एक चिंताजनक समस्या थी। अचानक बर्खास्तगी (डिस्मिसल) या गलत तरीके से बर्खास्तगी के खिलाफ कोई प्रावधान नहीं था। कामगारों के पास किसी भी अनुशासनात्मक कार्रवाई के खिलाफ कोई सुरक्षा उपाय नहीं था, जो कि नियोक्ताओं ने किया था क्योंकि उनके पास उनके हितो की रक्षा करने वाले कोई दिशानिर्देश या नियम नहीं थे। बड़े उद्योगों में भी, यदि कोई स्थायी आदेश था, तो कोई विशेष दिशा-निर्देश नहीं था जिसका उसे पालन करना था या उसके प्रवर्तन (एनफोर्समेंट) को नियंत्रित करने वाला कोई कानून नहीं था।
ट्रेड यूनियनवाद (यूनियनिज्म) की अवधारणा के चलन में आने के साथ, राज्य और त्रिपक्षीय (ट्राईपार्टिट) श्रम सम्मेलन, कामगारों की आवाज बन गए और 1946 में औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम पारित करने में मदद की, ताकि स्पष्ट और अच्छी तरह से परिभाषित रोजगार की स्थिति या स्थायी आदेश सुनिश्चित करने के लिए जो औद्योगिक कामगारों और नियोक्ताओं के बीच सुचारू कार्य संबंध स्थापित करने में मदद कर सके।
आईईएसओ अधिनियम का उद्देश्य भर्ती, सेवामुक्ति (डिस्चार्ज), अनुशासनात्मक कार्रवाई, अवकाश, श्रमिकों के वर्गीकरण, वेतन दरों के तंत्र, उपस्थिति के मुद्दों आदि की शर्तों को विनियमित (रेग्यूलेट) करना है।
कोई भी चीज जिसके लिए ‘औद्योगिक प्रतिष्ठानों (एस्टेब्लिशमेंट) में नियोक्ताओं को औपचारिक (फॉर्मली) रूप से उनके तहत रोजगार की शर्तों को परिभाषित करने की आवश्यकता होती है’ वह आईईएसओ अधिनियम के दायरे में आता है।
अधिनियम नियोक्ताओं के लिए ‘रोजगार की शर्तों को पर्याप्त सटीकता के साथ परिभाषित करने और उन शर्तों को काम करने वालों को बताने के लिए बाध्यकारी बनाता है।
आईईएसओ अधिनियम ने एक ही श्रेणी के कामगारों और एक औद्योगिक प्रतिष्ठान में समान कार्य का निर्वहन (डिस्चार्ज) करने के संबंध में एकरूपता (यूनिफॉर्मिटी) या रोजगार के नियम और शर्तों को लागू करने में मदद की है। कुल मिलाकर, आईईएसओ अधिनियम ने कामगारों और नियोक्ताओं के बीच विनियमन और व्यवस्था की भावना लाने में मदद की है।
इस अधिनियम में नियोक्ताओं को अपने प्रतिष्ठानों में सेवा की शर्तों को परिभाषित करने और उन्हें लिखित रूप में रखने की आवश्यकता है और फिर भविष्य में नियोक्ताओं और कामगारों के बीच किसी भी अनावश्यक औद्योगिक विवाद से बचने के लिए उन्हें प्रमाणन (सर्टिफाइंग) अधिकारी द्वारा प्रमाणित किया जाना चाहिए। उक्त औद्योगिक प्रतिष्ठान के मॉडल स्थायी आदेश, स्थायी आदेशों के अनुरूप होने चाहिए लेकिन जरूरी नहीं कि केवल मॉडल स्थायी आदेश ही हों। यदि प्रतिष्ठान स्थायी आदेशों में कुछ जोड़ना चाहता है, तो वे ऐसा कर सकते हैं, बशर्ते कि उसके प्रारूप (ड्राफ्ट) को प्रमाणन अधिकारी द्वारा अनुमोदित (अप्रूव) किया जाना चाहिए।
एवरी इंडिया लिमिटेड बनाम सेकेंड इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल, पश्चिम बंगाल के मामले में यह माना गया था कि एक प्रतिष्ठान के स्थायी आदेशों में सेवानिवृत्ति की आयु के प्रावधान सभी कर्मचारियों पर लागू होंगे, भले ही वे उस प्रतिष्ठान का हिस्सा हों या नहीं, जहां वे स्थायी आदेशों के लागू होने से पहले या बाद में काम करते हैं, भले ही पूर्व में सेवानिवृत्ति की आयु के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं था।
स्थायी आदेश
शब्द ‘स्थायी आदेश’ आईईएसओ अधिनियम की अनुसूची में परिभाषित मामलों से संबंधित नियमों को संदर्भित करता है। ये मामले इस अधिनियम के तहत स्थायी आदेशों में प्रदान की गई अनुसूची के अनुसार होने चाहिए:
- कामगारों का वर्गीकरण, जैसे, अस्थायी, स्थायी, शिक्षु (एप्रेंटिस), परिवीक्षाधीन (प्रोबेशनर), आदि।
- कामगारों की अवधि और काम के घंटे, छुट्टियों, वेतन-दिवस और मजदूरी दरों की सूचना देने का तरीका।
- शिफ्ट में काम करना।
- उपस्थिति और देर से आना।
- आवेदन करने की प्रक्रिया की शर्तें और वह प्राधिकारी जो छुट्टी और अवकाश प्रदान कर सकता है।
- कुछ फाटकों से परिसर में प्रवेश करने की आवश्यकता और तलाशी का दायित्व।
- औद्योगिक प्रतिष्ठान के अनुभागों (सेक्शन) को बंद करना और फिर से खोलना, और काम का अस्थायी ठहराव और उससे उत्पन्न होने वाले नियोक्ता और कामगारों के अधिकार और दायित्व।
- रोजगार की समाप्ति और उसकी सूचना नियोक्ता और कामगारों द्वारा दिया जाना है।
- कदाचार (मिसकंडक्ट) के लिए निलंबन (सस्पेंशन) या बर्खास्तगी, और ऐसे कार्य या चूक जो कदाचार का गठन करते हैं।
- नियोक्ता या उसके एजेंटों या नौकरों द्वारा अनुचित व्यवहार या गलत निष्पादन (एग्जिक्यूशन) के खिलाफ कामगारों के लिए निवारण के साधन।
- कोई अन्य मामला जो निर्धारित किया जा सकता है।
अधिनियम की अनुसूची में प्रदान किए गए किसी भी मामले के संबंध में स्थायी आदेशों में प्रावधान करना नियोक्ता के लिए अनिवार्य होगा। एक बार प्रावधान करने के बाद इसे केवल अधिनियम की धारा 10(2) के प्रावधान के अनुसार संशोधित किया जा सकता है।
स्थायी आदेशों की प्रकृति
हालांकि स्थायी आदेशों की कानूनी प्रकृति को ज्यादातर वैधानिक माना जाता है और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कई निर्णयों में इसे मजबूत किया गया है। स्थायी आदेशों की प्रकृति को कभी-कभी संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्चुअल) माना जाता है, और कभी कभी इसे अवॉर्ड माना जाता है। इस बीच, यह तर्क कि स्थायी आदेश की प्रकृति अस्पष्ट और अनिर्णायक है, सही प्रतीत होता है क्योंकि यह वैधानिक, संविदात्मक या एक अवॉर्ड के रूप में अपनी प्रकृति के दावे के खिलाफ ठोस तर्क के बिना एक श्रेणी में रखने में विफल रहता है।
स्थायी आदेशों की वैधानिक प्रकृति
प्रकृति में वैधानिक होने के रूप में स्थायी आदेशों का पहला तर्क बागलकोट सीमेंट कंपनी लिमिटेड बनाम आर.के. पठान और अन्य के मामले से आता है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि:
“अधिनियम का उद्देश्य जैसा कि हमने पहले ही देखा है, नियोक्ताओं को रोजगार की शर्तों को सटीक और निश्चित बनाने की आवश्यकता थी और अधिनियम का उद्देश्य अंततः इन शर्तों को स्थायी आदेशों से निर्धारित करना था ताकि जो पहले एक अनुबंध द्वारा शासित होता था वह अब वैधानिक स्थायी आदेशों द्वारा शासित होगा…”।
सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय पर कई अन्य निर्णयों में भरोसा किया गया ताकि यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि स्थायी आदेश, एक बार प्रमाणित होने के बाद, प्रकृति में वैधानिक हैं। इसे टाटा केमिकल्स लिमिटेड और अन्य बनाम कैलाश सी.अध्वर्यु के मामले में गुजरात के उच्च न्यायालय द्वारा प्रबलित (रेनफोर्स) किया गया था। जिसमें न्यायाधीश ने एक वैधानिक दायित्व और एक संविदात्मक दायित्व के बीच अंतर किया और इसलिए इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आईईएसओ अधिनियम के तहत स्थायी आदेशों का प्रमाणीकरण वैधानिक अधिकार और दायित्व बनाता है।
स्थायी आदेशों की वैधानिक प्रकृति से संबंधित एक अन्य तर्क यह है कि प्रमाणन अधिकारी, नियोक्ता द्वारा किए गए स्थायी आदेशों के मसौदे को प्रमाणित करने में, एक प्रत्यायोजित (डेलीगेटेड) कानून का हिस्सा है। स्थायी आदेशों को प्रमाणित करने से पहले दोनों पक्षों की सुनवाई की प्रक्रिया को निर्णय से प्रभावित लोगों के परामर्श के रूप में भी देखा जा सकता है। यह, बदले में, प्रमाणन अधिकारी को नियम बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा बनाता है, इस प्रकार पूरी प्रक्रिया को वैधानिक प्रकृति का बना देता है।
स्थायी आदेशों की वैधानिक प्रकृति के खिलाफ तर्क निम्नानुसार रखे जा सकते हैं:
- यदि हम यह मान लें कि स्थायी आदेश वैधानिक प्रकृति के हैं, तो वे हमारे संविधान में नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों के विपरीत हैं; हमारे मौलिक अधिकारों के खिलाफ इन वैधानिक अधिकारों और दायित्वों की संवैधानिक वैधता पर पक्षों द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के तहत तर्क दिया जा सकता है। एक अन्य पहलू पर विचार करने के लिए अनुच्छेद 14 और समानता के अधिकार का उल्लंघन है जो प्रमाणित स्थायी आदेशों को वैधानिक प्रकृति के रूप में मानने और इसे समान उद्योगों के कामगारों और समान परिस्थितियों में लागू करने के कारण होता है।
- स्थायी आदेशों की वैधानिक प्रकृति के खिलाफ दूसरा तर्क यह है कि न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) को वैधानिक प्रभाव वाले प्रावधानों को ओवरराइड करने की शक्ति नहीं होनी चाहिए। औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत औद्योगिक न्यायाधिकरणों के पास स्थायी आदेशों और आवेदन और स्थायी आदेशों की व्याख्या के तहत एक कामगार द्वारा पारित आदेश के स्वामित्व या वैधता से संबंधित नए अधिकारों और दायित्वों को बनाने और एक समझौते या अनुबंध की शर्तों को बदलने की शक्ति है। यदि हम प्रमाणित स्थायी अधिकारों को प्रकृति में वैधानिक मानते हैं, तो यह न्यायाधिकरणों के लिए स्थायी आदेशों में बदलाव और संशोधन करने की शक्ति को नकार देता है, इस प्रकार औद्योगिक न्याय प्रदान करने की उसकी शक्ति में बाधा उत्पन्न करता है।
- आईईएसओ अधिनियम की धारा 10(1) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि स्थायी आदेशों के प्रमाणीकरण के बाद भी, वे नियोक्ताओं और कामगारों के बीच समझौते पर परिवर्तन के लिए उत्तरदायी हैं। यह स्थायी आदेशों की वैधानिक प्रकृति के पूर्ण विरोधाभास (कांट्रेडिक्टरी) में है क्योंकि दो पक्षों के बीच समझौते पर किसी भी क़ानून को संशोधित नहीं किया जा सकता है। वास्तविक वैधानिक प्रभाव वाले प्रावधान दो पक्षों के बीच समझौतों के आधार पर संशोधनों के लिए अतिसंवेदनशील नहीं हैं।
- अंत में, अधिनियम अनुबंध की स्वतंत्रता को कम करने वाले नियोक्ताओं की सौदेबाजी की शक्ति पर प्रतिबंध लगाता है ताकि नियोक्ताओं को प्रारूप स्थायी आदेश प्रस्तुत करना चाहिए जो क़ानून के अनुकूल हों। अधिनियम किसी भी तरह से किसी भी प्राधिकरण को किसी भी विधायी शक्तियों का प्रत्यायोजन नहीं करता है, बल्कि यह एक व्यक्तिगत नियोक्ता पर अनुसूची में दिए गए मॉडल स्थायी आदेशों को ध्यान में रखते हुए नियम बनाने के लिए बाध्य करता है। इसके अलावा, प्रमाणन अधिकारी के पास केवल सीमित न्यायिक शक्ति है। इस प्रकार, हम समझते हैं कि प्रमाणित स्थायी आदेश प्रत्यायोजित विधान नहीं हैं और इसलिए, प्रकृति में वैधानिक नहीं हैं।
एक अवॉर्ड के रूप में स्थायी आदेश
आईईएसओ अधिनियम की धारा 4 में कहा गया है कि निर्णय निर्माता या प्रमाणन अधिकारी, दोनों पक्षों को सुनने के बाद, रोजगार की शर्तों को निर्धारित करने वाले स्थायी आदेशों की “निष्पक्षता या तर्कसंगतता” पर निर्णय लेता है। यह, बदले में, एक प्रकार के “अवॉर्ड” के रूप में स्थायी आदेश देता है। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 औद्योगिक विवादों के मामलों में प्रमाणन अधिकारियों को निर्णय निर्माता नहीं मानता है और इस प्रकार स्थायी आदेश एक अवॉर्ड नहीं हो सकता है। साथ ही, प्रमाणन अधिकारी किसी भी तरह से या किसी भी रूप में औद्योगिक विवाद का निपटारा नहीं करता है; वह केवल दोनों पक्षों को सुनने के बाद प्रारूप स्थायी आदेशों को संशोधित या प्रमाणित करता है। विचार करने का एक अन्य पहलू यह होगा कि यदि हम स्थायी आदेश को एक अवॉर्ड के रूप में मानते हैं, तो तालाबंदी और हड़ताल पर सीमाओं से संबंधित कुछ प्रावधान औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत लागू होंगे। अंत में, आईईएसओ अधिनियम की धारा 13 (2) नियोक्ता को स्थायी आदेशों के किसी भी उल्लंघन के लिए उत्तरदायी बनाता है, इस प्रकार इस सिद्धांत का खंडन करता है कि एक अवॉर्ड एक पक्ष के लिए बाध्यकारी और दूसरे पर लागू होता है।
इसलिए हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि प्रमाणित स्थायी आदेश न तो पूरी तरह से वैधानिक हैं और न ही वे किसी अवॉर्ड की श्रेणी में आते हैं।
विशेष प्रकार के अनुबंधों के रूप में स्थायी आदेश
प्रमाणित स्थायी आदेशों में एक वैधानिक शक्ति होती है लेकिन वे आवश्यक रूप से वैधानिक प्रकृति के नहीं होते हैं जैसा कि हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं। स्थायी आदेश नियोक्ता और कामगार के बीच एक अनुबंध को दर्शाता है। इसलिए, नियोक्ता और कामगार प्रमाणित स्थायी आदेशों में दिए गए वैधानिक अनुबंध को ओवरराइड करते हुए अनुबंध में प्रवेश नहीं कर सकते हैं। स्थायी आदेश जब लागू होता हैं, तब नियोक्ता के लिए उनके वैधानिक संशोधनों की मांग करने की अनुमति नहीं है, जिसके कारण कुछ कामगारो के संबंध में स्थायी आदेशों का एक सेट होता है और अन्य के लिए दूसरा सेट होता है।
इसलिए, किसी भी कामगार को नियोक्ता द्वारा स्थायी आदेशों में परिभाषित नियमों और शर्तों के साथ नियुक्त नहीं किया जा सकता है, जब तक कि आईईएसओ अधिनियम की अनुसूची में चर्चा किए गए मामले के प्रावधानों के अनुसार स्थायी आदेशों को संशोधित नहीं किया जाता है। व्यक्तिगत अनुशासन को संदर्भित करने वाले मामलों में मौजूदा स्थायी आदेश को नजरअंदाज करने के लिए यह एक औद्योगिक न्यायाधिकरण के लिए खुला नहीं है और कोई भी औद्योगिक न्यायाधिकरण स्थायी आदेशों में तब तक संशोधन नहीं कर सकता जब तक कि वे संविदात्मक प्रकृति के न हों।
स्थायी आदेश की संविदात्मक प्रकृति के पक्ष में एक तर्क बकिंघम एंड कार्नेटिक कंपनी बनाम वेंकटायगा के मामले से आता है। जिसमें न्यायमूर्ति गजेंद्रगडकर ने कहा था कि:
“प्रमाणित स्थायी आदेश एक वैधानिक रूप में सेवा के प्रासंगिक नियमों और शर्तों का प्रतिनिधित्व करते हैं और वे पक्षों के लिए कम से कम, यदि अधिक नहीं, तो निजी अनुबंधों के समान सेवा के नियमों और शर्तों को शामिल करने के लिए बाध्यकारी हैं।”
स्थायी आदेश की संविदात्मक प्रकृति के पक्ष में एक और बयान मेट्टूर इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम ए.आर. वर्मा और अन्य के मामले से आता है। इस मामले में मद्रास के उच्च न्यायालय ने कहा कि:
“अधिनियम को समग्र रूप से पढ़ने से यह स्पष्ट है कि स्थायी आदेश प्रबंधन और उसके प्रत्येक कामगार के बीच अनुबंध का हिस्सा हैं।”
अंत में, औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1964 के एक संशोधन में, निम्नलिखित को धारा 33 में जोड़ा गया:
“… या, जहां उसके और कामगार के बीच अनुबंध की शर्तों के अनुसार, व्यक्त या निहित ऐसे कोई स्थायी आदेश नहीं हैं।”
इस प्रकार, स्थायी आदेशों की संविदात्मक प्रकृति के तर्क को स्पष्ट रूप से मजबूत किया गया है।
निष्कर्ष
जब हम स्थायी आदेशों की प्रकृति को व्यक्तिगत रूप से वैधानिक, संविदात्मक या एक अवॉर्ड के रूप में मानते हैं, तो हम सकारात्मक रूप से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यह पूरी तरह से किसी एक श्रेणी के अंतर्गत नहीं आता है। स्थायी आदेशों के सफल वर्गीकरण के खिलाफ ठोस तर्क हैं और इस प्रकार स्थायी आदेशों की प्रकृति को अनाकार और अस्पष्ट प्रकृति के रूप में समाप्त किया जा सकता है।
संदर्भ
- The Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946, No. 20, Acts of Parliament, 1946 (India).
- The Industrial Disputes Act, 1947, Acts of Parliament,1947 (India).
- Singh, Yogendra. “NATURE OF STANDING ORDERS UNDER INDUSTRIAL EMPLOYMENT (STANDING ORDERS) ACT, 1946.” Journal of the Indian Law Institute 9, no. 3 (1967): 443–52. http://www.jstor.org/stable/43949946
- 1962 Latest Caselaw 17 SC.
- 1973 Latest Caselaw 143 SC.