भारत में रोड ऐक्सिडेंट के लिए कानूनी प्रोविजन

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Motor Vehicle Act
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 इस ब्लॉग पोस्ट में, आरजीएनयूएल पटियाला की छात्रा, Disha Pareek, भारत में सड़क दुर्घटनाओं की समस्या से निपटने के लिए कानूनी प्रावधानों के बारे में लिखती हैं, जो तेजी से बढ़ रही हैं। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय (इंट्रोडक्शन)

सभ्यता (सिविलाइजेशन) के विकास और भारतीयों की जीवन शैली (लाइफस्टाइल) मे बदलाव के साथ, सड़कों पर चलने वाले वाहनों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। व्यस्त जीवन के कारण लोग वाहन चलाने में लापरवाही बरत रहे हैं। सड़क दुर्घटनाएं, मृत्यु और अपंगता (डिसेबिलिटी) में एक बड़े हिस्से का योगदान करती हैं।

सड़क ट्रैफिक एक्सीडेंट (आरटीए) को, वाहनों के बीच या किसी पैदल यात्री और वाहन के बीच दुर्घटनाग्रस्त (क्रेशिंग) होने के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसमें कम से कम एक वाहन का शामिल होना आवश्यक है। भारत में हर मिनट कम से कम एक सड़क दुर्घटना होती है और हर 4 मिनट में सड़क दुर्घटना में मौत होती है। सरकारी आंकड़ों (स्टेटिस्टिक्स) के मुताबिक-

कारण मृत्य दर (प्रति वर्ष)
सड़क दुर्घटना लगभग 5 लाख (घायल)
वाहन दुर्घटनाग्रस्त (क्रेशिंग ऑफ व्हीकल्स) 1.4 लाख (मृत्यु)
सड़क दुर्घटना 16 (प्रति घंटा, मृत)

अगर हम मारुति सुजुकी की रिपोर्ट को देखे, जो यह बताती है कि हर साल लापरवाही और तेज गति से गाड़ी चलाने और वाहनों की संख्या में तेजी से वृद्धि के कारण, सड़क दुर्घटनाओं में लगभग एक लाख भारतीय मारे जाते हैं।

प्रमुख कारण (मेजर रीज़न्स)

इसके बहुत सारे कारण हैं, लेकिन कुछ प्राथमिक (प्राइमरी) कारण इस प्रकार हैं:

  • भारत में वाहन चलाने के लिए कानूनी उम्र 18 वर्ष है, लेकिन चूंकि कानून का कोई अनुमति (कंप्लायंस) नहीं है, यहां तक ​​कि नाबालिग भी, जिनके पास पर्याप्त वयस्कता (मैच्योरिटी) वाले वाहन नहीं हैं और उनके माता-पिता भी इसकी अनुमति देते हैं और जिसका परिणाम निर्दोष पैदल चलने वालों को भुगतना पड़ता है। हाल ही में एक नाबालिग द्वारा हिट एंड रन का मामला हुआ था, जिसने दिल्ली में एक व्यक्ति को अपनी मर्सिडीज से मार डाला।
  • बहुत से लोग, मुख्य रूप से युवा पीढ़ी, गति सीमा (स्पीड लिमिट) को पार कर जाती है और गति सड़कों पर होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में से एक है।
  • नशे में और लापरवाही से वहा चलाना एक और प्रमुख कारण है, और यह एक ऐसा कारण है जो दैनिक मौतों में सबसे अधिक योगदान देता है।
  • टेलीविजन ने भी युवाओं को प्रभावित किया है। युवा बिना उचित मार्गदर्शन (गाइडेंस) के टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले कार्यों और करतब (स्टंट) की नकल करके या तो किसी को चोट पहुंचाते हैं या मार देते हैं।

भारत में मोटर वाहन पर कानून (लॉ ऑन मोटर व्हीकल्स इन इंडिया)

मोटर व्हीकल एक्ट, 1988

जब कोई सड़क दुर्घटना होती है, तो इसमें एक दायित्व (लायबिलिटी) (सिविल और क्रिमिनल दोनों) शामिल होता है, और यह अधिनियम (एक्ट) ऐसी दुर्घटनाओं के मुद्दों से संबंधित है। यह, सभी संबंधित नियमों और दिशानिर्देशों को  प्रदान करता है। मोटर व्हीकल एक्ट 1989 में लागू हुआ था।

मुख्य प्रावधान (मेन प्रोविजंस)

  • अधिनियम की धारा 3 में कहा गया है कि, चालन लाइसेंस के बिना, जो प्रभावी होना चाहिए और जो किसी व्यक्ति को वाहन चलाने के लिए अधिकृत (ऑथराइज) करता है, किसी को भी गाड़ी चलाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

लेकिन लाइसेंस देते समय एक सख्त प्रक्रिया होनी चाहिए और संबंधित अधिकारियों को पहले से ही जांच कर लेनी चाहिए कि वह व्यक्ति वाहन चालने में सक्षम हैं। 

  • धारा 4 एक तरह से धारा 3 से संबंधित है क्योंकि यह कानूनी रूप से गाड़ी चलाने के लिए 18 वर्ष की आयु सीमा प्रदान करती है।
  • अधिनियम धारा 3 और 4 के संदर्भ में एक जिम्मेदारी भी लगाता है ताकि वे कानूनों का कड़ाई  से पालन करें। इसलिए, न तो मालिक और न ही वाहन का प्रभारी (इन चार्ज) व्यक्ति, किसी ऐसे व्यक्ति को चलाने की अनुमति नहीं देगा जो धारा 3 और 4 की अनिवार्यताओं (एसेंशियल) को पूरा नहीं करता है।
  • जो कोई भी वाहन प्राप्त करना चाहता है उसे उसके रजिस्ट्रेशन के बारे में जानकारी होनी चाहिए।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा 3965 के तहत वाहन के रजिस्ट्रेशन की पूरी प्रक्रिया निर्धारित की गई है, जिसमें राजनयिकों (डिप्लोमेट्स), केंद्र सरकार के अधिकारियों आदि से संबंधित विभिन्न प्रावधान भी शामिल हैं।

धारा 132: सड़क दुर्घटना के समय की जाने वाली बातें (चालक का कर्तव्य) (सेक्शन 132: थिंग्स टू बी डन एट द टाइम ऑफ रोड ऐक्सिडेंट (डाइवर्स ड्यूटी))

दुर्घटना होने के बाद सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य स्वयं चालक का होता है। उसे घबराना नहीं चाहिए और दुर्घटना स्थल से भागना नही चाहिए, लेकिन जिम्मेदारी से पुलिस अधिकारी की उचित (रीजनेबल) समय के लिए प्रतीक्षा करनी चाहिए, हालांकि ‘उचित समय’ अलग-अलग मामलों में भिन्न होता है।

भारत में समस्या यह है कि, यहां धन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, और ऐसे मामले सामने आए हैं जहां अमीर या तो भाग जाते हैं या इल्जा़म से बच जाते हैं। उदाहरण के लिए, हेमा मालिनी का मामला, ताजा उदाहरण है जिसमें गंभीर रूप से घायल दूसरी कार में सवार बच्चे की जगह, उन्हें आपातकालीन (इमरजेंसी) उपचार दिया गया। यहां तक ​​कि अधिनियम की धारा 134 में घायल व्यक्ति को नजदीकी अस्पताल ले जाने और जल्द से जल्द पुलिस को सूचित करने के लिए चालक या प्रभारी व्यक्ति द्वारा तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है। अधिनियम के प्रावधानों के गैर-अनुपालन (नॉन कंप्लायंस) पर धारा 177210 से एक अलग अध्याय है, जहां सभी विवरण (डिटेल) प्रदान किए गए हैं।

पीड़ित पक्ष को मुआवजा (कंपनसेशन टू द एग्रीवड पार्टी)

अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, पीड़ित पक्ष के पास 3 तरीके हैं जिसके द्वारा वह मुआवजा प्राप्त कर सकता है।

  • त्रुटि के बिना दायित्व (नो फॉल्ट लायबिलिटी)” का सिद्धांत: इसका मतलब है कि दुर्घटना का कारण बनने वाले व्यक्ति की किसी भी गलती के बिना भी, वह उत्तरदायी होगा, और दावेदार (क्लैमेंट) (घायल पक्ष) को चालक के हिस्से की किसी भी गलती / लापरवाही को साबित करने के लिए अदालत के समक्ष अनुरोध (प्लीड) करने की आवश्यकता नहीं है, और स्थायी अपंगता (परमानेंट डिजेबलमेंट) की स्थिति में 25000 रुपये और मृत्यु होने पर 50000 रुपये की  निश्चित राशि मिलेगी।
  • दूसरा सिद्धांत ‘हिट-एंड-रन’ के मामले में है, क़ानून में यह प्रावधान है कि जब कोई व्यक्ति दुर्घटना का कारण बनता है तो उसे संबंधित अधिकारियों को अपना नाम और लाइसेंस नंबर देना चाहिए, लेकिन जब ऐसी पहचान प्रच्छन्न (डिसगाइज्ड) हो, जिसका अर्थ है कि व्यक्ति उस स्थान से भाग जाता है, ऐसे में मृत्यु एवं अपंगता की दशा में शासन की निधि (फंड) से क्रमानुसार (रिस्पेक्टिवली): 25000 एवं 12500 रू की निश्चित राशि देने का प्रावधान है।
  • अंत में अधिनियम की धारा 163A द्वारा जो ‘संरचित सूत्र आधार (स्ट्रक्चर्ड फॉर्मूला बेसिस)’ है: यहाँ भी दावेदार को चालक की लापरवाही साबित करने की आवश्यकता नहीं है। इस मामले में, वाहन के मालिक या अधिकृत बीमाकर्ता (इंश्योर्र) को मुआवजा (कंपनसेट) देना होता है और इस मामले में आरोपी की पहचान होनी चाहिए।

इंडियन पीनल कोड के तहत आपराधिक दायित्व (क्रिमिनल लायबिलिटी अंडर इंडियन पीनल कोड)

  • पहला प्रावधान जो आरोपी पर आपराधिक दायित्व लगाता है, वह धारा 304A है, यानी जब चालक की लापरवाही से कोई दुर्घटना होती है, तो उस व्यक्ति को कारावास (इंप्रिजनमेंट) की सजा दी जाएगी जो 2 साल तक हो सकती है या जुर्माना हो सकता है।

यहां, मुख्य आलोचना (क्रिटिसिजम) अपराधी की ओर से पूरी गलती या लापरवाही का प्रमाण है और यह कि अपराधी के कृत्य टक्कर/दुर्घटना का प्रत्यक्ष (डायरेक्ट) और तत्काल कारण थी। कई बार, व्यक्ति की गलती के बाद भी, उसकी तत्काल भागीदारी साबित करना मुश्किल होता है, और अपराध गैर जमानती (नॉन बैलेबल) होने के कारण पीड़ित/परिवार के साथ कई बार अन्याय होता है।

  • बिना किसी नुकसान के भी तेज गति से वाहन चलाना आईपीसी, 1908 के तहत दंडनीय है, बशर्ते वह कार्य मानव जीवन या सुरक्षा को खतरे में डालता हो। यह तीन महीने की कैद या 250 रुपये के जुर्माने से दंडनीय होगा।

न्यू मोटर व्हीकल बिल, 2015

सड़क, परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ रोड, ट्रांसपोर्ट एंड हाईवे) ने वर्तमान मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 में सुधार और संशोधन (अमेंडमेंट) के लिए एक बिल का प्रस्ताव करने का निर्णय लिया है और प्रस्ताव के अनुसार, अपराधियों को कड़ी सजा के साथ और अधिक जुर्माने की सिफारिश की गई है। नया बिल राज्य को ज्यादा अधिकार नहीं देता।

कानून में खामियां (लूपहोल्स इन द लॉ)

  • किसी भी कानून में हमेशा सुधार की गुंजाइश (स्कोप) होती है। मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 में शक्तियां केंद्र सरकार के अधीन हैं, लेकिन प्रत्येक राज्य के विकास और बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) में अंतर को देखते हुए, प्रत्येक राज्य को अपने नियम और दंड को बनाने की शक्तियां होनी चाहिए।
  • वर्तमान जुर्माना, अमीर लोगों के लिए मूंगफली जैसा है, और उन्हें अत्यधिक जुर्माना देने में कोई आपत्ति नहीं है। इसलिए इन्हें बढ़ाया जाना चाहिए लेकिन साथ ही यह गरीबों के अनुकूल होना चाहिए।
  • चालन लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत है। सबसे पहले, इसे ऑनलाइन किया जाना चाहिए ताकि यह सुविधाजनक हो जाए और यह प्रत्येक चालक की क्षमता पर निर्भर करे न कि उसके संबंध  पर।
  • चालक की शारीरिक क्षमता का परीक्षण करने के लिए मासिक मूल्यांकन (असेसमेंट) भी होना चाहिए। इन सभी उपायों से दुर्घटनाओं और मौतों से बचने के लिए बहुत बड़ा योगदान दिया जा सकता है।

विभिन्न लोगों की भूमिका (रोल ऑफ डिफरेंट पीपल)

जब कोई दुर्घटना होती है, तो कई प्रमुख लोग होते हैं जिनकी भूमिका प्रमुख हो जाती है।

  • यातायात पुलिस की भूमिका: यातायात पुलिस की जबरदस्त जिम्मेदारियां होती हैं; अगर पुलिस सावधानी से काम करे तो आधे हादसों से आसानी से निपटा जा सकता है।

लेकिन दुर्भाग्य (अनफोर्टिनेटली) से, भ्रष्टाचार (करप्शन) के कारण झटके (सेटबैक) का मुख्य कारण है, किसी को भी, यह तक की नाबालिग को भी रिश्वत देकर गाड़ी चलाने की इजाजत है और इसके कारण हर कोई आसानी से यातायात नियमों का उल्लंघन करता है।

समय की मांग है कि मौजूदा नियमों को और सख्त किया जाए और अगर कोई ट्रैफिक पुलिस अपने कर्तव्य (ड्यूटी) नहीं निभाती, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

  • परिवार और माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। उन्हें शुरू से ही अपने बच्चों को यातायात नियमों का उल्लंघन न करने की शिक्षा देनी चाहिए और नाबालिगों को कभी भी गाड़ी चलाने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। इससे ऐसी दुर्घटनाओं को कम करने में मदद मिल सकती है।
  • देखने वालों के कर्तव्य: उनकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन यह देखा गया है कि लोग दुर्घटनाओं के शिकार होने वाले लोगों की मदद करने से हिचकिचाते हैं, और उनकी अलग-अलग आशंकाएँ (एप्प्रेहेंशन) होती हैं। उदाहरण के लिए, उन्हें अपनी पहचान का खुलासा करना पड़ा, और पुलिस अधिकारियों द्वारा उन्हें परेशान किया गया, और उनकी किसी गलती के बिना अदालतों का दौरा करना पड़ा।

यहां तक ​​कि जब लोग पीड़ितों को अस्पताल ले जाते हैं, तब भी अस्पताल प्रशासन (एडमिनिस्ट्रेशन) उन्हें रोक लेता है। लोग किसी अजनबी के लिए परिवहन और अन्य लागतों (कोस्ट) को वहन (बीयर) करने में भी हिचकिचाते हैं। ज्यादातर देखने वाले लोग इस बात से अनजान हैं कि किसे फोन करना है, और क्या तत्काल कार्रवाई करनी है, और इस प्रकार वे कार्रवाई नहीं करते  है।

अच्छे सामरी लोगों के लिए वर्तमान स्थिति (प्रेजेंट सिचुएशन फॉर द गुड सामरितंस)

एक एनजीओ ‘सेव लाइफ फाउंडेशन’ ने सेव लाइफ फाउंडेशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका (पेटिशन) दायर की ताकि दर्शकों को परेशानी मुक्त तरीके से पीड़ितों की मदद करने में सक्षम बनाया जा सके, और कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए सरकार द्वारा दिशानिर्देश जारी किए गए।

दिशानिर्देश (गाइडलाइंस)

  • पीड़ित को अस्पताल ले जाते ही किसी भी सवाल का जवाब देने की कोई बाध्यता (ऑब्लिगेशन) नहीं है और वह अस्पताल से बाहर भी जा सकता है।
  • वह अपना नाम/पहचान प्रकट करने के लिए भी बाध्य नहीं है।
  • अन्य नागरिकों के प्रोत्साहन के रूप में व्यक्ति को राज्य सरकार द्वारा पुरस्कृत किया जाना चाहिए।
  • परेशानी मुक्त कानूनी कार्यवाही प्रदान करने के लिए, व्यक्ति को अदालत में केवल एक ही सुनवाई में सुना जाना चाहिए।
  • अगर पुलिस या डॉक्टर किसी अच्छे सामरी लोगों (गुड सेमेरिटन) को परेशान करते हैं, तो उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

 फुटनोट

  • परिवहन अनुसंधान विंग, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, भारत में सड़क दुर्घटनाएं 2014, नई दिल्ली: सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, भारत सरकार;  2014.

 

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