केहर सिंह बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया: केस एनालिसिस

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constitution of India
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यह लेख Varshini Subhinder द्वारा लिखा गया है। यह लेख केहर सिंह बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया से संबंधित है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय (इंट्रोडक्शन)

पारडन को अनुग्रह (ग्रेस), दया और क्षमा का कार्य माना जाता है। यह एक सदियों पुरानी अवधारणा (कांसेप्ट) है जो संप्रभु कार्यपालिका (सोवरेन एग्जिक्यूटिव) को उस व्यक्ति को क्षमादान (क्लीमेंसी) देने की अनुमति देती है जिसे दोषी ठहराया गया है। पहले, यह एक ईश्वर-समान राजा के पास एक प्रतीकात्मक (सिंबॉलिक) शक्ति के कारण हुआ करता था जो अपनी प्रजा के जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण (कंट्रोल) कर सकता था। सेरवई के अनुसार, दया देने की शक्ति आवश्यक है क्योंकि यह “अन्याय को कठोर, अन्यायपूर्ण कानूनों या निर्णयों से रोक सकती है, जिसके परिणामस्वरूप अन्याय होता है; इसलिए न्यायपालिका के अलावा किसी अन्य अधिकार में शक्ति को निहित (वेस्ट) करने की आवश्यकता को हमेशा मान्यता दी गई है।”

आर्टिकल 21

भारतीय संविधान का आर्टिकल 21 प्रत्येक नागरिक के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है और यह संविधान के सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों (प्रोविजंस) में से एक है। जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित (डिप्राइव) होने के खिलाफ असंख्य सुरक्षा उपाय हैं, और न्यायिक फॉरम्स का सहारा लेना उन सुरक्षा में से एक है जब यह अधिकार प्रभावित होता है। लेकिन इस बात का विरोध नहीं किया जा सकता है कि सबसे प्रशिक्षित (ट्रेंड) दिमाग भी पतन (फैलिबिलिटी) की ओर प्रवृत्त (प्रॉन) होता है। ग़लत फ़ैसले, सबूतों के अभाव के बावजूद फ़ैसले, ग़लत दोषसिद्धि (कनविक्शन), या ऐसा कोई भी मामला जहाँ न्यायपालिका किसी फ़ैसले पर पहुँचने के लिए बाध्य थी- जिन्हे मानवीय धारणाओं पर नहीं पहुँचा जाना चाहिए था- संविधान के आर्टिकल 72 के अंदर आते हैं।

आर्टिकल 72

आर्टिकल 72 राष्ट्रपति को “पारडन प्रदान करने, राहत देने, या सजा में छूट देने या किसी भी अपराध के लिए दोषी व्यक्ति की सजा को निलंबित (सस्पेंड) करने, हटाने या कम करने की शक्ति प्रदान करता है।” यह दया क्षेत्राधिकार (ज्यूरिस्डिक्शन) आर्टिकल 161 के तहत राज्यपाल तक भी बढ़ाया गया है। हमारे वर्तमान उद्देश्यों के लिए, हम केवल आर्टिकल 72 के साथ काम कर रहे हैं।

भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान भी, गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट, 1935 की धारा 295 ने क्राउन को, या गवर्नर-जनरल को प्रतिनिधिमंडल (डेलिगेशन) द्वारा, दया देने की शक्ति प्रदान की, लेकिन यह निरंकुश (अनफेटर्ड), निरपेक्ष (एब्सोल्यूट) और किसी न्यायिक जांच (स्क्रूटनी) के अधीन नहीं था। आजादी के बाद का भारतीय अनुभव अलग रहा है।

केस लॉज

मारू राम के मामले में, यह माना गया कि राष्ट्रपति को दी गई शक्ति का प्रयोग प्रधान मंत्री और मंत्रिपरिषद (काउंसिल ऑफ मिनिस्टर) की सहायता और सलाह पर किया जाना चाहिए। कुछ समय पहले तक, दया को “विवेकाधीन उपाय (डिस्क्रेशनरी रेमेडी)” माना जाता था, न कि “संवैधानिक दायित्व (कांस्टीट्यूशनल ऑब्लिगेशन)”। यह विचार कोर्ट द्वारा रंगा-बिल्ला में प्रतिपादित (प्रोपाउंड) किया गया था, जिसमें दो आरोपियों को दो नाबालिगों की हत्या करने के लिए दोषी ठहराया गया था और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी।  620 शब्दों के फैसले में, कोर्ट ने फैसला सुनाया कि उन्होंने यह कहने में कोई औचित्य (जस्टिफिकेशन) नहीं देखा कि राष्ट्रपति ने सजा को कम करने से इनकार करके अपनी विवेकाधीन शक्ति का उल्लंघन किया है। इसने विद्वानों (स्कॉलर्स) द्वारा आलोचना (क्रिटिसिज्म) का आह्वान (इन्वोक) किया है क्योंकि क्षमा करने की शक्ति का एक मनमाना (आर्बिट्रेरी) प्रयोग भी पूरी तरह से विवेकाधीन उपाय माना जाता था।

केहर सिंह मामला

तथ्य (फैक्ट्स)

केहर सिंह का मामला जो इस लेख की मुख्य चिंता है, में कोर्ट ने इस संबंध में एक कदम और आगे बढाया है। केहर सिंह को इंदिरा गांधी की हत्या के संबंध में इंडियन पीनल कोड की धारा 120B और 302 के तहत अपराध का दोषी ठहराया गया था, जो उस समय प्रधान मंत्री थीं। एडिशनल सेशन जज द्वारा उन्हें मुकदमे की स्टेज में दोषी ठहराया गया था, और उच्च अधिकारियों की सभी अपीलें बर्खास्तगी (डिस्मिसल) के माध्यम से विफल रहीं। आर्टिकल 72 के तहत पारडन के लिए राष्ट्रपति को आवेदन (एप्लीकेशन) पर दलील दी कि फैसला गलत था, और यह क्षमादान की प्रार्थना थी। यह भी कहा गया कि उन्हें मौखिक सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाए।

राष्ट्रपति ने इस तर्क के साथ पारडन देने से इनकार कर दिया कि वे उस मामले के गुण-दोष (मेरिट्स) में नहीं जा सकते जो अंत में हाईएस्ट कोर्ट द्वारा तय किया गया था। याचिकाकर्ता को मौखिक सुनवाई का अवसर भी नहीं दिया गया। उठाया गया मुख्य मुद्दा यह है कि क्या राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए मामले में गुण-दोष जानने से रोका जाता है।

निर्णय और विश्लेषण (एनालिसिस)

कोर्ट, सबसे पहले, पारडन के विशेषाधिकार (प्रीरोगेटिव) प्रकृति में जाता है, जैसा कि इंग्लैंड में माना जाता है। फिर, यह कहता है कि जब भी आर्टिकल 21 के तहत निहित जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से इनकार किया जाता है या खतरा होता है, तो इस शक्ति को एक उच्च प्राधिकारी (अथॉरिटी) को सौंपकर सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए जो इस तरह के खतरे या  इनकार की वैधता (वैलिडिटी) की जांच कर सके। यह न्यायिक त्रुटि (एरर) के खिलाफ सुरक्षा के महत्व को दिखाने के लिए कहा गया है। इसके अलावा, श्री जस्टिस होम्स की राय पर भरोसा करते हुए, कोर्ट का कहना है कि पारडन का कार्य अनुग्रह का एक निजी कार्य नहीं है, बल्कि संवैधानिक योजना का एक हिस्सा है। यह भारत पर भी लागू होता है, लेकिन जैसा कि मारू राम में कहा गया है, केंद्र सरकार की सलाह पर शक्ति का प्रयोग किया जाएगा।

राष्ट्रपति की निहित शक्ति के महत्व को स्थापित (एस्टेब्लिश) करने के बाद, कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति को आर्टिकल 72 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, रिकॉर्ड पर साक्ष्य की जांच करनी चाहिए और भले ही वह एक अलग निष्कर्ष (कंक्लूजन) पर आता है, लेकिन राष्ट्रपति न्यायिक रिकॉर्ड में संशोधन (मोडिफाई), या स्थानापन्न (सुपरसीड) नहीं करता है। वह जिस प्लेन पर काम करता है वह कोर्ट्स से काफी अलग है।

इस सवाल पर कि क्या न्यायिक समीक्षा (रिव्यू) राष्ट्रपति द्वारा पास आदेश तक फैली हुई है, कोर्ट की राय थी कि मारू राम की सख्त सीमाओं (लिमिटेशन) के अलावा, आदेश की योग्यता के आधार पर न्यायिक समीक्षा के अधीन नहीं किया जा सकता है, जो दुर्भावनापूर्ण तरीके से इस शक्ति का प्रयोग न करने के महत्व की बात करता है।

दया याचिकाकर्ताओं (पिटीशनर) को मौखिक सुनवाई दिए जाने के सवाल पर कोर्ट ने कहा कि मामला पूरी तरह से राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करता है। याचिका (पिटीशन) दायर करते समय, सभी प्रासंगिक (रिलेवेंट) दस्तावेज जमा किए जाने चाहिए, और यदि राष्ट्रपति उचित समझे, तो वह मौखिक सुनवाई के लिए बुला सकते हैं।

जबकि कोर्ट यह इंगित (पॉइंट आउट) करने में सही है कि राष्ट्रपति द्वारा लिया जाने वाला निर्णय न्यायपालिका के निर्णय से अलग है, और यह कि दया या याचिकाकर्ता को दी गई कोई भी कमी या राहत न्यायिक रिकॉर्ड को नहीं बदलेगी, यह अन्य चिंताओं को संतोषजनक ढंग से संबोधित करने में सक्षम नही है।

उपेंद्र बक्सी इस मामले में कोर्ट के रुख की काफी आलोचना करते थे। इस संदर्भ में, उन्होंने अंतुले मामले को उठाया, जो उनके शब्दों में, आर्टिकल 21 की एक पुनर्खोज (रिडिस्कवरी) थी। वह निर्णय में सिद्धांत पर प्रकाश डालते हैं और कहते हैं कि कोई भी कार्य जो स्पष्ट रूप से आर्टिकल 21 का उल्लंघन करता है, चाहे वह कितना भी उच्च अधिकारी का क्यों न हो, उसमें सुधार किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट स्वयं आर्टिकल द्वारा गारंटी की गई उचित प्रक्रिया से बाध्य है और यदि इस संबंध में कोई त्रुटि है तो उसे अपना निर्णय रद्द करना होगा।

केहर सिंह में, सुप्रीम कोर्ट ने न केवल एक समीक्षा को खारिज कर दिया, बल्कि दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ एक रिट याचिका भी खारिज कर दी थी। इसे अंतुले के फैसले के प्रकाश में देखकर, जिसे आर्टिकल 21 के एक उचित प्रक्रिया उल्लंघन के आधार पर रद्द कर दिया गया था, ऐसे मामले में मृत्युदंड नहीं होता है, केवल कोर्ट में याचिकाओ की बर्खास्तगी में त्रुटि की विशालता (एनॉर्मिटी) की कल्पना कर सकते है, जब यह एक इंसान के जीवन और मृत्यु से संबंधित हो।

बक्सी, उन न्यायाधीशों की आलोचना करते हैं, जिन्होंने विदेशी निर्णयों को उद्धृत (कोट) किया, लेकिन अंतुले निर्णय का उल्लेख नहीं किया। वह आगे कहते हैं कि, उनके अनुसार, समकालीन (कंटेंपररी) दुनिया में किसी भी कोर्ट ने न्यायिक आदेशों की समीक्षा करने और उन्हें रद्द करने के लिए उचित प्रक्रिया अधिकारों का विस्तार (एक्सटेंड) नहीं किया है। अगर ये मानक (स्टैंडर्ड) न्यायिक आदेशों पर लागू हो सकते हैं, तो वे कार्यकारी कार्यों पर भी लागू हो सकते हैं। इसलिए, अंतुले जैसे महत्वपूर्ण निर्णय को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) से वंचित करने के सवालों के साथ संलग्न (इंगेज) होना आवश्यक था।

मौखिक सुनवाई पूरी तरह से राष्ट्रपति के विवेक पर होने पर कोर्ट की राय में, बक्सी और कई अन्य लोग बताते हैं कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (प्रिंसिपल ऑफ नेचुरल जस्टिस) जो संविधान में निहित हैं, प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष (फेयर) सुनवाई का अधिकार प्रदान करते हैं। जैसा कि बक्सी ने बताया, स्वयं कोर्ट्स ने इस अधिकार पर जोर दिया है, चाहे वह न्यायिक व्यवस्था में हो, या अर्ध-न्यायिक (क्वासी-ज्यूडिशियल) या कार्यकारी में हो। इसलिए, किसी दोषी को मौत की सजा दिए जाने की स्थिति में, जिसमें वह अपनी जान गंवा देगा, मौखिक सुनवाई के मूल (बेसिक) अधिकार से इनकार करना लगभग क्रूर है।

केहर सिंह दो कारणों का उल्लेख करते हैं जिनके लिए दया शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है। सबसे पहले, “न्यायिक त्रुटि के खिलाफ सुरक्षा”। यहां, अंतुले के बाद, न्यायिक त्रुटि को हल करने के लिए न्यायपालिका उसी कार्यवाही में एक बड़ी बेंच स्थापित कर सकती है। दूसरा, यह “राज्य के कारणों” को एक आधार के रूप में बताता है। बक्सी बताते हैं कि इससे भविष्य में मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हो सकता है क्योंकि यह संविधान में सभी प्रावधानों के लिए विवेकाधीन शक्ति का विस्तार करने के लिए समाप्त होता है जो राज्य सिद्धांत के कारणों को पहचानता है।

इसके अलावा, जब न्यायिक समीक्षा के प्रश्न की बात आती है तो कोर्ट भ्रमित (कन्फ्यूज) लगता है, क्योंकि एक ओर, जैसा कि पहले बताया गया था, कोर्ट ने कहा कि मारू राम की सख्त सीमाएं लागू होंगी, लेकिन दूसरी ओर यह कहता है कि आर्टिकल 72 के तहत राष्ट्रपति की शक्ति के क्षेत्र के बारे में प्रश्न पूरी तरह से न्यायिक क्षेत्र के अंदर आता है। लेकिन न्यायिक समीक्षा की अपनी शक्ति का प्रयोग बिल्कुल नहीं करता है, क्योंकि न तो यह मौखिक सुनवाई देता है और न ही इसने राष्ट्रपति के पालन के लिए कोई दिशा-निर्देश निर्धारित किए है। वास्तव में, कोर्ट ने निर्णय लेने के लिए राष्ट्रपति के पास वापस भेज दिया और कोर्ट ने ठीक वैसा ही किया जैसा पहले किया गया था लेकिन इस बार “अलग” तर्क के साथ किया है।

अगर हम देखें कि केहर सिंह के फैसले के बाद क्या हुआ, तो हम देखते हैं कि कुछ मामलों जैसे एपुरु सुधाकर, ने कुछ दिशानिर्देश निर्धारित करने का प्रबंधन (मैनेज) किया की कब क्षमादान के अनुदान को चुनौती दी जा सकती है, जैसे कि दिमाग के आवेदन के बिना, मैलाफाइड या पूरी तरह से प्रासंगिक विचार और प्रासंगिक सामग्री पर विचार नहीं किया गया है, या यह मनमानी से ग्रस्त है।

शत्रुघ्न चौहान मामला, दया याचिकाओं से निपटने में अत्यधिक देरी के एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दे से निपटता है। कोर्ट ने कहा कि यह कार्यपालिका द्वारा दिए गए फैसले में सजा जोड़ने के बराबर है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने स्पष्ट रूप से कहा कि आर्टिकल 72 और 161 के तहत दी गई शक्ति “संवैधानिक दायित्व” में से एक है, न कि केवल विशेषाधिकार है। इसने कुछ अतिरिक्त दिशा-निर्देश भी निर्धारित किए, और यह कुछ राहत के रूप में आता है, फिर भी यह कुछ अनुत्तरित (अनआंसर्ड) प्रश्नों को छोड़ गया है।

पारडन का मुद्दा मृत्युदंड से जुड़ा हुआ है, और इस शक्ति के मनमाने उपयोग से बचने के लिए दिशा-निर्देशों का होना महत्वपूर्ण है। जब जीवन और मृत्यु के प्रश्न सामने आते हैं, तो राज्य के प्रत्येक अंग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रावधानों का दुरुपयोग न हो। ऐसे निर्णय अपरिवर्तनीय (इरेवर्सिबल) हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां राज्य ने एक दोषी की जान ले ली है, केवल कई वर्षों बाद यह महसूस करने के लिए कि उसने जो किया वह गलत था या इससे भी बदतर, कभी यह महसूस नही किया कि उन्होंने एक निर्दोष की जान ले ली है।

ऐसे आंकड़े (स्टेटिस्टिक्स) मौजूद हैं जो बताते हैं कि 1947 और 2015 के बीच मृत्युदंड के दोषियों द्वारा 5106 दया याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें से 65% खारिज कर दी गईं थी और यह दिखाने के लिए आंकड़े हैं कि एक निश्चित समय सीमा में दोषी ठहराए गए कैदियों में से 76% सामाजिक और आर्थिक (इकोनॉमिक) रूप से कमजोर पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड) के हैं। कोई स्पष्ट रूप से अनुमान लगा सकता है कि संसाधनों (रिसोर्सेज) तक पहुंच, सामान्य जागरूकता, कानूनी पहुंच, अपने स्वयं के अधिकारों की मान्यता आदि ज्ञान का हिस्सा है जो सभी के लिए एक्सेसिबल नहीं है। यह प्रणाली को स्वाभाविक रूप से उन लोगों के पक्ष में तिरछा कर देता है जिनकी दूरगामी (फार-रीचिंग) पहुंच, या राजनीतिक या आर्थिक दबदबा है।

यह हमें असहज (अनईजी) स्थिति में डालता है और दया की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। जबकि हम कह सकते हैं कि दया का कार्य एक अच्छी जगह से आता है, एक परोपकार, स्वीकृति, और पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) में मान्यता है। लेकिन इस शक्ति का व्यावहारिक (प्रैक्टिकल) उपयोग, खासकर जब बहुसंख्यकवादी प्रवृत्तियों (मेजोरिटेरियन टेंडेंसीज़) द्वारा संचालित लोकलुभावन समर्थन (पॉपुलिस्ट सपोर्ट) पारडन से इनकार करने के लिए होता है, जैसे अफजल गुरु के मामले में, या केवल वही व्यक्ति (जो कि कार्यपालिका पर एक “संवैधानिक दायित्व”, लेकिन इसके बजाय भाई-भतीजावाद (नेपोटिज्म) या राजनीतिक एहसान जैसे कार्यों को करने के लिए एक विवेकाधीन उपाय के रूप में उपयोग किया जाता है) इस उपाय का लाभ उठाने में सक्षम हैं जो दबदबे (क्लाउट) वाले हैं।

संदर्भ (रेफरेंसेस)

  • Rai, J., 2014. Exercise of Pardoning Power in India: Emerging Challenges. The NEHU Journal, Vol XII, No. 2, July – December 2014(ISSN. 0972 – 8406), pp. 1- 26.
  • Article 72 of the Indian Constitution
  • Maru Ram v. Union of India (1981) 1 SCC 107
  • Kuljit Singh Alias Ranga v. Lt. Governor of Delhi 1982 AIR 774
  • Kehar Singh v. Union of India AIR 1989 SC 653
  • W.I. Biddle v. Vuco Perovich 71 L. Ed. 1161
  • A.R. Antulay v. R.S. Nayak (1988) 2 SCC 602: this case deals with a corruption charge levied against Antulay, which was fast tracked, thereby leading to a violation of Article 21.
  • Article 34, 356, 352, and those relating to entering into treaties and use of force etc.
  • Epuru Sudhakar v. State of Andhra Pradesh (2006) 8 SCC 161.
  • Shatrughan Chauhan v. Union of India, [Writ Petition (Criminal) No. 55 of 2013]

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