भारत का चुनाव आयोग(इलैक्शन कमिशन)

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यह लेख इंदौर इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ, इंदौर के छात्र आदित्य दुबे ने लिखा है । इस लेख में लेखक ने संविधान के तहत परिभाषित भारत के चुनाव आयोग की भूमिका और स्वतंत्र स्थिति के साथ-साथ इसकी शक्तियों और कार्यों पर चर्चा की है। इस लेख का अनुवाद Srishti Sharma द्वारा किया गया है।

परिचय

चुनाव आयोग एक ऐसा सिस्टम है जो देश में स्वतंत्र और बिना किसी एक पार्टी की तरफदारी किए निष्पक्ष(अनबायस्ड) चुनाव करने और कराने के लिए जिम्मेदार है। यह शक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 द्वारा चुनाव आयोग को दी गई है। 1950 में अपनी स्थापना के बाद से और 15 अक्टूबर 1989 तक, चुनाव आयोग में केवल प्रमुख चुनाव आयुक्त (चीफ इलेक्शन कमिश्नर) सदस्य के तौर पर हुआ करते थे। लेकिन 16 अक्टूबर 1989 को, भारत के राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग के बढ़े हुए काम से निपटने के लिए दो और चुनाव आयुक्तों(इलेक्शन कमिश्नर) की नियुक्ति(अपॉइंट) की, ऐसा इसलिए किया गया कि मतदान(वोटिंग) की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई थी।  तब से, आज तक, चुनाव आयोग तीन चुनाव आयुक्तों से मिलकर एक बहु-सदस्यीय(मल्टी मेम्बर) सिस्टम के रूप में कार्य कर रहा है।

चुनाव आयोग क्या है

  • चुनाव आयोग एक स्वतंत्र और स्थायी(परमानेंट) सिस्टम है जिसे पूरे देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करने के लिए भारत के संविधान द्वारा बनाया  गया है।
  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 324 संसद, राज्य विधानसभाओं, भारत के राष्ट्रपति के कार्यालय और भारत के उपराष्ट्रपति के कार्यालय के चुनावों के देख-रेख, निर्देशन(डायरेक्शन) और नियंत्रण(कंट्रोल) की शक्ति प्रदान करता है। इसलिए, चुनाव आयोग एक निकाय है जो केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों के लिए भी काम करता है।
  • चुनाव आयोग का राज्यों में पंचायतों और नगर पालिकाओं के चुनावों से कोई लेना देना नहीं है, इन चुनावों के लिए, एक अलग सिस्टम है जिसे राज्य चुनाव आयोग कहा जाता है।

चुनाव आयोग का मिशन और विजन क्या है

  • चुनाव आयोग का मिशन: भारत के चुनाव आयोग को अपनी स्वतंत्रता (इंडिपेंडेंस), अखंडता (इंटीग्रिटी) और स्वायत्तता (ऑटोनोमी) बनाए रखनी होती है और इसे सुगमता(ईज़), समावेशिता(इनक्लूसिवनेस) और नैतिक भागीदारी (एथिकल पार्टिसिपेशन) को भी बनाए रखना चाहिए। चुनावी लोकतंत्र( इलेक्टोरल डेमोक्रेसी) और शासन (गवर्नेंस) में लोगों के विश्वास को मजबूत करने के लिए इसे भारत में स्वतंत्र(फ्री), निष्पक्ष(फेयर) और पारदर्शी (ट्रांसपेरेंट) चुनावों के लिए अलग अलग मानकों(स्टैंडर्ड्स) को भी अपनाना चाहिए।
  • चुनाव आयोग का दृष्टिकोण: भारत में लोकतंत्र की स्थिति को मजबूत करने के साथ-साथ एक ऐसा संस्थान होना चाहिए को कि लोगों को मतदान में उनकी भागीदारी के बारे में जागरूक करे और लोगों को प्रेरित(इंस्पायर) करे।

चुनाव आयोग की संरचना क्या है?

अनुच्छेद 324 के अनुसार, भारत के संविधान में चुनाव आयोग की संरचना के संबंध में कई प्रावधान(प्रोविजन) दिए हैं, ये हैं:

  1. भारत के राष्ट्रपति की सहमति के अनुसार चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्त, यदि कोई हों, शामिल होंगे।
  2. मुख्य चुनाव आयुक्त (चीफ इलेक्शन कमिश्नर) और किसी अन्य चुनाव आयुक्त (अदर इलेक्शन कमिश्नर) की नियुक्तियां (अपॉइंटमेंट) भारत के राष्ट्रपति खुद करेंगे।
  3. जब किसी अन्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की जाती है तो ऐसे मामलों में मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनाव आयोग के अध्यक्ष(चेयरमैन) के रूप में कार्य करने का अधिकार होगा।
  4. भारत के राष्ट्रपति क्षेत्रीय आयुक्तों (रीजनल कमिश्नर) को भी नियुक्त कर सकते हैं क्योंकि वह चुनाव आयोग की सहायता में मददगार साबित होते हैं, यह चुनाव आयोग की राय से ही किया जाता  है।
  5. चुनाव आयुक्तों और क्षेत्रीय आयुक्तों द्वारा किए जाने वाले कार्य की अवधि और शर्तें भारत के राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाएंगी।

मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्तों के पास एक जैसे अधिकार हैं और उन्हें भी समान वेतन(इक्वल सैलरी)  और भत्ते मिलते हैं।

कार्यकाल(टेन्योर): वे 6 वर्ष के के लिए या 65 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, नौकरी करते हैं और वे किसी भी समय इस्तीफा भी दे सकते हैं या अपने कार्यकाल खत्म होने से पहले ही हटा दिए जा सकते हैं। 

चुनाव आयोग कैसे स्वतंत्र है

भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 में ऐसे कई प्रावधान दिए गए हैं जो चुनाव आयोग के कामकाज में स्वतंत्र और निष्पक्ष होने की सुरक्षा को बनाए रखने में मदद करते हैं, ये निम्नलिखित प्रावधान ( प्रोविजन) हैं

  1. मुख्य चुनाव आयुक्त को स्थिर कार्यकाल (स्टेबल टेन्योर) प्रदान किया गया है और उन्हें उनके पद से हटाया नहीं जा सकता है। 
  2. मुख्य चुनाव आयुक्त की सेवा की शर्तें उनकी नियुक्ति के बाद उनके अहित में नहीं बदल सकतीं।
  3. किसी अन्य आयुक्त (चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त) को उसके कार्यालय से तब तक नहीं हटाया जा सकता जब तक कि यह मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश ना हो।

चुनाव आयोग में खामियां

  • भारत के संविधान ने चुनाव आयोग के सदस्यों की योग्यता के बारे में कुछ साफ नहीं बताया गया है।
  • भारत के संविधान ने चुनाव आयोग के सदस्यों के कार्यकाल की अवधि तय नहीं की है।
  • भारत के संविधान ने सेवानिवृत्त(रिटायर) होने वाले चुनाव आयुक्तों को भारत सरकार द्वारा आगे किसी भी नियुक्ति से प्रतिबंधित(रेस्ट्रिक्टेड) नहीं किया है।

भारत के चुनाव आयोग के पास कौन सी शक्तियाँ और कार्य हैं?

संसद, राज्य विधायिका(स्टेट लेजिस्लेचर) और भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के कार्यालयों के संबंध में चुनाव आयोग की शक्तियों और कार्यों को तीन प्रकारों में बांटा  जा सकता है, ये हैं:

प्रशासनिक शक्तियाँ( एडमिनिस्ट्रेटिव पॉवर)

चुनावों के संचालन देख रेख, निर्देशन(डायरेक्शन) और नियंत्रण(कंट्रोल) की जरूरी जिम्मेदारी में कई प्रकार की शक्तियां, कर्तव्य और कार्य शामिल हैं, ये मुख्य रूप से भारत के चुनाव आयोग की प्रशासनिक शक्तियां हैं। 

सलाहकार शक्तियां (एडवाइजरी पॉवर)

भारत के चुनाव आयोग को उन मामलों में यह शक्ति प्रदान की गई है, जहां यदि कोई व्यक्ति चुनाव के दौरान किसी उच्च न्यायालय द्वारा चुनाव याचिका में या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चुनाव अपील में किसी भी भ्रष्ट आचरण का दोषी पाया जाता है, तो भारत के राष्ट्रपति तय करते हैं कि ऐसे व्यक्ति को भविष्य में चुनाव लड़ने नहीं दिया जाना चाहिए। इस तरह की घटना पर कोई भी फ़ैसला लेने से पहले, भारत के राष्ट्रपति चुनाव आयोग की राय ले सकते हैं और हालातों के अनुसार इस तरह की राय लेकर कार्य कर सकते हैं।

अर्ध-न्यायिक शक्तियां(क्वासी ज्यूडिशियल पॉवर)

कानून के तहत चुनाव आयोग का एक और जरूरी काम है। सभी संघों या नागरिक जो खुद को राजनीतिक दल का हिस्से कहते हैं और अपनी इच्छा से किसी राजनीतिक दल के नाम और बैनर के तहत चुनाव लड़ना चाहते हैं, उन्हें चुनाव आयोग के साथ खुद को पंजीकृत(रजिस्टर्ड) करवाना होगा। चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक दलों के पंजीकरण का ऐसा कार्य सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारत के चुनाव आयोग के एक अर्ध-न्यायिक कार्य के रूप में आयोजित किया गया है।

इसलिए, चुनाव आयोग की शक्तियों और कार्यों में शामिल हैं:

  • चुनाव की तारीखों और कार्यक्रम को अधिसूचित (स्क्रूटिनाइज) करना और नामांकन पत्रों की जांच करना।
  • निर्वाचक नामावलियों (इलेक्टोरल रोल्स) को तैयार और संशोधित करना और सभी वोट देने वालों का पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) करना।
  • राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करना और राजनीतिक दलों को चुनाव चिन्ह प्रदान करना।
  • चुनाव के समय पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा पालन की जाने वाली आचार संहिता(कोड ऑफ कंडक्ट) का पालन करना।
  • चुनाव व्यवस्था से संबंधित विवादों की जांच के लिए अधिकारियों की नियुक्ति।
  • राजनीतिक दलों की नीतियों के प्रचार-प्रसार के लिए रोस्टर तैयार करना।
  • संसद के सदस्यों की अयोग्यता(इनकैपेसिटी) से जुड़े मामलों पर भारत के राष्ट्रपति को सलाह देना।
  • राज्य विधानमंडल के सदस्यों की अयोग्यता से संबंधित मामलों पर राज्य के राज्यपाल को सलाह देना।
  • धांधली, बूथ कैप्चरिंग या किसी दूसरे गलत  मामलों में मतदान (वोटिंग) रद्द(कैंसल) करना।
  • चुनाव कराने के लिए स्टाफ को कमान सौंपने के लिए भारत के राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल से अनुरोध करना।
  • भारत के पूरे क्षेत्र में चुनावों की मशीनरी को देखना  और देश में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करना।
  • राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने पर भारत के राष्ट्रपति को सलाह देना।
  • चुनावों के लिए राजनीतिक दलों का पंजीकरण करना और उनके चुनावी प्रदर्शन के आधार पर उन्हें राष्ट्रीय(नेशनल) या राज्य(स्टेट) के राजनीतिक दल का दर्जा देना।

केस: ब्रुंडाबेन नायक बनाम भारत का चुनाव आयोग और दूसरा 1965 एआईआर 1892, 1965 एससीआर (3) 53

यदि कोई सवाल उठता है कि क्या संसद या राज्य विधानमंडल का कोई भी मौजूदा सदस्य भारत के संविधान (दलबदल के आधार के अलावा अन्य आधारों पर) या किसी कानून के तहत सदस्य के रूप में बने रहने के लिए अयोग्य(इनकैपेबल) हो जाता है, तो ऐसे मामले का निर्णय भारत के राष्ट्रपति द्वारा उन मामलों में किया जाता है जिनमें संसद के सदस्य शामिल होते हैं और जिन मामलों में राज्य विधानमंडल के सदस्य शामिल होते हैं, तो उस राज्य के राज्यपाल को ऐसे मामले पर निर्णय लेना होता है। और वह इन मामलों में चुनाव आयोग की राय से बंधे होते हैं।

सुशासन के मार्गदर्शक सिद्धांत क्या हैं (गाइडिंग प्रिंसिपल्स ऑफ गुड गवर्नेंस)

भारत के चुनाव आयोग ने स्वयं सुशासन के मार्गदर्शक सिद्धांत तय किए हैं, ये हैं:

  • संविधान में निहित मूल्यों को कायम रखना, यानी समानता, समानता, निष्पक्षता, स्वतंत्रता। साथ ही चुनावी शासन पर अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण में कानून का शासन।
  • यथासंभव निष्पक्षता, पारदर्शिता, सत्यनिष्ठा, विश्वसनीयता, स्वतंत्रता, जवाबदेही, स्वायत्तता और व्यावसायिकता के उच्चतम मानकों के साथ चुनाव कराना।
  • मतदाता हितैषी माहौल में चुनाव प्रक्रिया में सभी पात्र नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
  • चुनाव प्रक्रिया के हित में राजनीतिक दलों और सभी हितधारकों के साथ जुड़ना।
  • मतदाताओं, राजनीतिक दलों, चुनाव पदाधिकारियों, उम्मीदवारों और बड़े पैमाने पर लोगों के बीच चुनाव प्रक्रिया के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देना और भारत की चुनावी प्रणाली में लोगों के विश्वास  को बढ़ाना और मजबूत करना।
  • चुनावी सेवाओं के प्रभावी वितरण के लिए मानव संसाधन का विकास करना।
  • चुनाव प्रक्रिया से जुड़े सभी क्षेत्रों में नई और बेहतर तकनीक को अपनाना।
  • भारत की चुनावी प्रणाली में राष्ट्र के लोगों के विश्वास को बनाए रखना।
  • उत्कृष्टता(एक्सीलेंस) प्राप्त करने और भारत के चुनाव आयोग के विजन और मिशन के लिए नई और नवीन प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रयास करना।

निष्कर्ष

इतने सालों से, भारत के चुनाव आयोग ने भारत में अच्छी संख्या में चुनाव कराए हैं और लोकतंत्र को मजबूत करने और भारत में चुनावों को बढ़ाने के लिए चुनावी सुधारों में कई बदलाव किए गए हैं। 

यह नई और बेहतर तकनीक के उपयोग के माध्यम से लोगों को जागरूक बनाने का काम कर रहें हैं और हर तरह की गलत चुनावी गतिविधियों को दूर करने का प्रयास कर रहें हैं। भारत के चुनाव आयोग ने हाल ही के दिनों में मौजूद भ्रष्ट प्रथाओं को दूर करने के लिए कई कदम उठाए हैं। 

 

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